गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 109, कुल 600 में से
संदर्भ में पढ़ेंगोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० १ । क० ३६ · ७१ प्रभासों ] को इस [ विधि ] से इस [ शरीर ] में पुष्ट करता है [ और उन मात्राओं को भी पुष्ट करता है ] जो शरीर से बाहर चलती हुई मात्रा यें हैं, सो जैसे यह हैं-- पौर्णमासी १, [ अर्थात् पूर्णमासेष्टि, जिसमें विचारा जाता है कि उस दिन चन्द्रमा पूरा क्यों दीखता है, पृथिवी, समुद्र आदि पर उसका क्या प्रभाव होता है ], अष्टका २, [ अष्टमी आदि तिथि का यज्ञ, जिसमें विद्वान् पित्तर लोग विचारते हैं कि ज्योतिष शास्त्र की मर्यादा से इन तिथियों में सूर्य और चन्द्र आदि लोकों का क्या प्रभाव पड़ता है]. अमावास्या ३, [ अर्थात् दर्शष्टि जिसमें विचार होता है कि अमावस को सूर्य और चन्द्रमा एक राशि में आकर क्या प्रभाव डालते हैं ], श्रद्धा ४, [ अर्थात् ईश्वर और वेदों में विश्वास ], दीक्षा ५, [ नियम और व्रत पालन की शिक्षा ]. यज्ञ ६, [ परमेश्वर और विद्वानों का सत्कार. परस्पर संयोग और विद्या आदि का दान ]. और दक्षिणायें ७, [ यज्ञ समाप्ति पर विद्वानों के सत्कार के लिये द्रव्य ] - इन सब को इस [ विधि ] से इस [ शरीर ] में पुष्ट करता है, [ क्योंकि ] जल अमृत है। ( सः यत् तृतीयम् आचामति सप्त तान् व्यानान् एतेन अस्मिन् आप्याययति [ ताः च अपि ] याः हि शरीरात् बाह्याः एताः मात्राः, तत् यथा एतत्, पृथिवीम् अन्तरिक्षं दिवं नक्षत्राणि ऋतून् आर्त्तवान् संवत्सरान् तान् एतेन अस्मिन् आप्याययति - आपः अमृतम् ) वह जो तीसरा आचमन करता है उन सात व्यानों [ शरीर में फैले हुए पवनों ] को इस [ विधि ] से इस [ शरीर ] में पुष्ट करता है [ और उन मात्राओं को भी पुष्ट करता है ] जो शरीर से बाहर चलती हुई मात्रायें हैं, सो जैसे यह हैं पृथिवी १, [ भूगर्भ विद्या, राज्य पालनादि विद्या ], अन्तरिक्ष २, [ वायुमण्डल, मेघमण्डल, आदि की विद्या ] प्रकाश ३, [ प्रकाश के ताप, आकर्षण और फैलाव आदि की विद्या ]; नक्षत्रों ४ प्रश्वासान् । शरीरबहिर्गामिनो दोषनाशकान् वायून् (पौर्णमासीम् १) पूर्ण- मास-अण्, ङीप् । पूर्णमासेष्टिम् । पूर्णचन्द्रसम्बन्धिनीं विद्याम् (अष्ट- कास्) इष्यशिभ्यां तकन् ( उ० ३ । १४८) अशूङ् व्याप्तौ अश भोजने वा-तकन्, टाप् । अष्टका पितृदैवत्ये (वा० पा० ७ । ३ । ४५) इत्वाभावः । अष्टम्यादितिथौ पितॄणां समागमेन ज्योतिषविद्याविचारम् (अमावास्याम्) अमा सह वसतः चन्द्राकौँ यत्र । अमावस्यदन्यतरस्याम् (पा० ३ । १ । १२२) अमा + वस निवासे-ण्यत्, टाप् । कृष्णपक्षशेषतिथिम्, तद्दिने चन्द्राकैकराशिस्थौ भवतः । दर्शष्टिम् (श्रद्धाम् ) ईश्वरवेदयोर्निश्चयम् (दीक्षाम्) नियमव्रतयोः शिक्षाम् । (यज्ञम्) यज देवपूजासंगतिकरणदानेषु-नङ् । परमेश्वरविद्वत्सत्कारपरस्परसंयोग- विद्यादिदानव्यवहारम् (दक्षिणाः) यज्ञसमाप्तौ विद्वद्भ्यः सत्कारद्रव्याणि । (व्यानान्) सर्वशरीरव्यापकान् वायून् (पृथिवीम्) भूगर्भविद्यां राज्यपालनादि- विद्यां च (अन्तरिक्षम्) मध्यलोकस्थवायुमण्डलमेघमण्डलादिविद्याम् (दिवम्) सूर्यतापाकर्षणविस्तारादिविद्याम् (नक्षत्राणि) णक्ष गतौ-अत्रन् । गतिशीलानां १. पूर्णमासोऽस्यां वर्त्ततं इति पौर्णमासी तिथिः, इत्यत्र पूर्णमासाद्ण् (वा० ४ । २ । ३५) इति अण् ॥ सम्पा० ॥