गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 323, कुल 600 में से
संदर्भ में पढ़ेंगोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० १ । क० १७ ।। २८५ फैलावेंगे, हमारा भाग होवे । (तत् भूमः एव वैश्वदेवः) सो विद्यमान चरु ही विश्वे- देवों का है । (अथो एतेन एव पयसि प्रथयति, वैश्वदेवत्वाय वैश्वदेवं हि पयः स्यात् ) फिर इससे ही अन्न में वह [यजमान] फैलता है, विश्वेदेवों के लिये विश्वेदेवों वाला अन्न होवे । ( अथ इमौ अब्रूताम् आवाभ्याम् ऋते एनत् एत्र न वै ) फिर यह दोनों [ देवता इन्द्र और अग्नि ] बोले-हम दोनों के बिना यह [अन्न] नहीं होता । (यूयं प्रथयत मयि प्रतिष्ठिनम् एनत् असौ वृष्ट्या न पचति, इतः अभ्युज्जेष्यति इति, नौ भागः अस्तु इति) तुम प्रसिद्ध करते हो-मुझमें ठहरे हुये इस [अन्न] को वह [ईश्वर] वृष्टि से अब पकाता है, इससे वह [ इन्द्र वा अग्नि ] जीतेगा, इससे हम दोनों का भाग होवे । (ताभ्यां वै एषः भागः उज्जित्यै एव अथो प्रतिष्ठित्यै एव क्रियते यः द्यावापृथिवीयः) उन दोनों [ इन्द्र और अग्नि ] के लिये ही यह भाग जीत के लिये ही और प्रतिष्ठा के लिये ही किया जाता है, जो [ भाग ] सूर्य और पृथिवी वाला है । ( सौमीः वै ओषधीः ) सोम देवता वाली हीं ओषधियां [ अन्न, सोमलता आदि ] हैं । (सोमः ओषधीनाम् अधिराजः याः च ग्राम्याः याः च आरण्याः ) सोम ओषधियों का राजा है जो गांव में उपजने वाली और जो वन में उपजने वाली हैं । (तासाम् एषः उद्धारः यत् श्यामाकः ) उन [ ओषधियों ] का यह उद्धार [ उठाने का व्यवहार ] है जो समा [ अन्न विशेष का यज्ञ ] है । ( यत् श्यामाकः सौम्यः तम् एव भागिनं कृणुते ) जो समा [ छोटे कणों वाला अन्न सब ओषधियों का स्थानापन्न ] सोम देवता वाला है, उस [ सोम ] को ही [ उस समा का ] भागी वह [ यजमान ] करता है । ( यत् आग्रयणम् अकृत्वा नवस्य अश्नीयात्, देवानां प्रतिव्लृप्तं भागम् अद्यात् ) जो वह [ यजमान ] अग्रयण [ नये अन्न का यज्ञ ] न करके नये [ अन्न ] का भोजन करे, वह देवताओं के प्रत्यक्ष उपस्थित भाग को खा लेवे । (संवत्सरात् वै एतत् अधिप्रजायते यत् आग्रयणम् ) संवत्सर के आरम्भ से ही यह प्रकट होता है जो आग्रयण [ नये यज्ञ का अन्न है ] । ( संवत्सरं वै ब्रह्मा, तस्मात् ब्रह्मा पुरस्ताद्धोमसंस्थितहोमेषु आवपेत् ) संवत्सर ही ब्रह्मा [ बढ़ा हुआ ] है, इसलिये ब्रह्मा [ चारों वेद जानने वाला ] पुरस्तात्-होम और संस्थित-होमोँ में [ इन अन्नों को ] होमे । (एकहायनः दक्षिणाः, सः हि संवत्सरस्य प्रतिमा रेत: एव हि एषः प्रजात्यै प्रजातः ) एकहायन [ एक वर्ष वाला यज्ञ ] दक्षिणा [ नाम ष्यामः) विस्तारयिष्यामः (भूमः) इषियुवीन्धिदसिभ्याषूसभ्यो मकू (उ० १ । १४५ ) भू सत्तायाम्-मक्। विद्यमानपदार्थः। चरुः (पयसि) अन्ने-- निघ० २।७। (वैश्वदेवत्वाय) विश्वेभ्यो देवेभ्यः ( ऋते ) विना ( न ) सम्प्रति-निरु० ७ । ३१ । (ग्राम्याः) ग्रामाद् यखओ ( पा० ४ । २ । ९४ ) ग्राम-यः । ग्रामे भवाः । (आरण्याः) अरण्याण्णो वक्तव्यः । (वा० पा० ४ । २ । १०४) अरण्य-णः । वनजाताः ( उद्धारः ) उत् + हृञ् हरणे-घञ् । उत्थापनम् (श्यामाकः) पिना- कादयश्च ( उ० ४।१५) श्यैङ् गतौ - आकः, मुगागमश्च । व्रीहिभेदः (आग्रयणम्) अग्र + अयन, पृषोदरादित्वाद् ह्रस्वदीर्घौ । नवशस्येष्टिः (नवस्य ) नवीना म् ( प्रतिक्लृप्तम् ) प्रस्तुतम् (संवत्सरम्) संवत्सरः ( आवपेत ) निर्वपेत् । जुहुयात्