भारतकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

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३४२ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० २ । क० १५ प॒र्यु॑पर्यसुराणां ब्रह्माणमवेक्ष॑१त । तत एषामधःशिरा ब्रह्माऽपतत्, ततो यज्ञः, ततो- ऽसुरा इति ॥ १५ ॥ कण्डिका १५ ॥ स्तोम भागों से शत्रुओं का नाश ॥ ( यः ह वै विष्पर्धमानयोः सवृत्तसोमयोः आयतान् च प्रतियतान् च स्तोम- भागान् विद्यान्, स ब्रह्मा स्यान्, देवस्य सवितुः सवे वः वृहस्पतिं प्रजापतिम् इषे स्तुत ऊर्जे स्तुत स्तुत ) जो [ परमात्मा ] ही विविध प्रकार लगातार उन्नति वाले दो समान स्वीकार किये हुये सोम यज्ञ वालों के लम्बे और चौड़े स्तोम भागों [ स्तुति योग्य व्यवहार के भागों ] को निश्चय करके जाने वह ब्रह्मा होवे [ तुम ] प्रकाशमान प्रेरक [ परमात्मा ] की प्रेरणा में अपने बीच [ उस ] बृहस्पति [ बड़े बड़े लोकों के पालक ] और प्रजापति [ प्रजापालक परमात्मा ] की अन्न के लिये स्तुति करो, पराक्रम के लिये स्तुति करो, स्तुति करो । ( वः वसून्, वः देवान् रुद्रान्, वः देवान्, आदित्यान्, वः देवान् साध्यान्, वः देवान् आप्त्यान्, वः विश्वान् देवान्, वः सर्वान् देवान् वः देवान् विश्वतः जनेभ्यः परिहवामहे, अस्माकं केवलः अस्तु ) तुम वसुओं [ निवास कराने वालों] को, तुम विजयी रुद्रों [ शत्रुओं के रुलाने वालों ] को, तुम कामना योग्य आदित्यों [ अखण्ड- व्रतियों ] को, तुम गति वाले साध्यों [ व्यवहार साधकों ] को, तुम दिव्य गुण वाले आप्त [ यथार्थ वक्ता ] पुरुषों में रहने वालों को, तुम सब आनन्ददायकों को, तुम सब व्यवहार- कुशलों को, और तुम सब स्तुति योग्यों को सब प्राणियों के लिए सब प्रकार हम बुलाते हैं। वह [ परमात्मा ] हमारा सेवनीय होवे ( इतः वीर्यं कृणोतु ) इस [ व्यवहार ] से वह [ परमात्मा ] वीरत्व करे—( इति एते ह वै आयताः च प्रतियताः च स्तोमभागाः, तान् जपन् उपरि उपरि परेषां ब्रह्माणम् अवेक्षेत ) यह ही निश्चय करके लम्बे और चौड़े स्तोम भाग [ स्तुति योग्य व्यवहारों के भाग ] हैं, उनको जपता हुआ [ विचारता हुआ ] ऊपर ऊपर होकर वैरियों के ब्रह्मा [पुरोहित] को निहारे [ उसके छल बल रोके ] । ( ततः एषां ब्रह्मा अधःशिराः पतति, ततः यज्ञः, ततः यजमानः ) इस [ व्यवहार ] से इन [ वैरियों ] का ब्रह्मा ओंधे सिर गिरता है, उससे यज्ञ [ संगति व्यवहार ], उससे यजमान [ ओंधे सिर गिरता है ] । ( यजमाने अधःशिरसि पतिते सः देशः अधःशिराः पतति ) यजमान के ओंधे सिर गिरने पर वह देश ओंधे सिर गिरता है । ( यस्मिन् अर्द्धे १५—( आयतान् ) आ+यमु उपरमे—क्तः, वा यती प्रयत्ने—अच् । दीर्घान् ( प्रतियतान् ) विस्तीर्णान् ( स्तोमभागान् ) स्तुत्यव्यवहारभागान् ( विद्यात् ) जानाति ( विष्पर्धमानयोः ) विविधा स्पर्धा श्रमोन्नतेर्ययोस्तयोः ( सवृत्तसोमयोः ) समान- स्वीकृतसोमयज्ञयोः ( इषे ) अन्नाय ( ऊर्जे ) पराक्रमाय ( सवितुः ) प्रेरकस्य परमेश्व- रस्य ( सवे ) प्रेरणायाम् ( वृहस्पतिम् ) बृहतां लोकानां पालकं परमात्मानम् ( वः ) युष्माकं मध्ये ( वः ) युष्मान् ( वसून् ) निवासानशीलान् ( रुद्रान् ) शत्रुरोदकान् ( आदित्यान् ) अखण्डव्रतिनः पुरुषान् ( साध्यान् ) व्यवहारसाधकान् ( आप्त्यान् ) १. पू० सं० 'अवेक्षेत' इति पाठः ॥ सम्पा० ॥