भारतकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

पृष्ठ 408, कुल 600 में से

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पृष्ठ 408

३७० गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ३ । क० ७ आयु ही इस [ यजमान ] के लिये उससे वह बढ़ाता है । ( आ प्यायस्व सं ते पयांसि इति द्वाभ्याम् अभिरूपाभ्यां चमसान् आप्याययन्ति ) आ प्यायस्व, और सं ते पयांसि ऋ० १ । ६१ । १७, १८--इन दो अनुकूल विषय वाली ऋचाओं से खाद्य पदार्थों को वह बढाते हैं । ( यत् यज्ञे अभिरूपम्, तत् समृद्धम् ) जो यज्ञ में विषय के अनुकूल है वह समृद्ध [ सफल ] है ॥ ६ ॥ भावार्थ:--वाणी, प्राण और अपान अर्थात् समस्त इन्द्रियों के सुप्रयोग से मनुष्य संसार में उन्नति करता है ॥ ६ ॥ विशेष: १--इस कण्डिका को ऐ० ब्रा० ३ । ८ तथा ७ । ३३ से मिलाओ ॥ विशेष: २--( इन्द्रो ) के स्थान पर ( इन्दो ) ऋ० ८ । ४८ । ४ से और ( प्रत्यवि- हर्तुर्मनर्रिहन् ) के स्थान पर ( प्रत्यवहर्तुमनहन् १) ऐ० ब्रा० ७ । ३३ से शुद्ध किया है ॥ विशेष: ३-दोनों प्रतीक वाले मन्त्र अर्थ सहित लिखे जाते हैं ॥ १--आ प्यायस्व मदिन्तम सोम विश्वेभिरंशुभिः । भवा नः सुश्रवस्तमः सखा वृधे--ऋ० १ । ६१ । १७ ( मदिन्तम ) हे अत्यन्त आनन्द॒ वाले ( सोम ) सोम ! [ बड़े ऐश्वर्य वाले विद्वान् ] ( विश्वेभिः ) सब ( अंशुभिः ) तत्त्व के अंशों के साथ ( आ ) अच्छे प्रकार ( प्यायस्व ) तू बढ़, और ( सुश्रवस्तमः ) अत्यन्त बड़ी कीर्ति वाला वा अत्यन्त सुन्दर अन्नों वाला ( सखा ) मित्र तू ( नः वृधे ) हमारी बढ़ती के लिए ( भव ) हो ॥ २--सं ते पयांसि समुयन्तु वाजाः सं वृष्ण्यान्यभिमातिषाहः । आप्याय- मानो अमृताय सोम दिवि श्रवांस्युत्तमानि धिष्व-ऋ० १ । ९१ । १८ । ( सोम ) हे सोम ! [ बड़े ऐश्वर्य वाले विद्वान् ] ( ते ) तेरे लिये ( वृष्ण्यानि ) वीरत्व बढ़ाने वाले ( पयांसि ) अनेक अन्न ( सं यन्तु ) अच्छे प्रकार मिलें, ( उ ) और ( अभिमाति- षाहः ) अभिमानी शत्रुओं के दबाने वाले ( वाजाः ) पराक्रम ( सं मम् ) बहुत अच्छे प्रकार [ मिलें ] । ( अमृताय ) अमरपन वा मोक्ष के लिए ( आप्यायमानः ) सब ओर से बढ़ता हुआ तू ( दिवि ) व्यवहार के बीच ( उत्तमानि श्रवांसि ) उत्तम यशों को ( धिष्व ) धारण कर ॥ कण्डिका ७ ॥ प्राणा वा ऋतुयाजाः, तद्यदृतुयाजैश्चरन्ति, प्राणानेव तद्यजमाने दधति । षडृतुनेति यजन्ति, प्राणमेव तद्यजमाने दधति । चत्वार ऋतुभिर्यजन्ति, अपानमेव तद्यजमाने दधति । द्विर्ऋतुनेति उपरिष्टाद् व्यानमेव तद्यजमाने दधति । स चासु- सम्भृतस्त्रेधा विहृतः, प्राणोऽपानो व्यान इति ततोऽन्यत्र गुणितस्तथाह, यजमानः ( प्यायस्व ) वर्धस्व ( सम् ) सम्यक् ( ते ) तव ( पयांसि ) जलानि । अन्नानि ( चमसान् ) भक्ष्यपदार्थान् ( आप्याययन्ति ) प्रवर्धयन्ति ( अभिरूपाभ्याम् ) विषयानुकूलाभ्याम् ॥ १. जर्मन सं० में भी यही पाठ है ॥ सम्पा० ॥