गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
कण्डिका ७ ॥
३७० गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ३ । क० ७ आयु ही इस [ यजमान ] के लिये उससे वह बढ़ाता है । ( आ प्यायस्व सं ते पयांसि इति द्वाभ्याम् अभिरूपाभ्यां चमसान् आप्याययन्ति ) आ प्यायस्व, और सं ते पयांसि ऋ० १ । ६१ । १७, १८--इन दो अनुकूल विषय वाली ऋचाओं से खाद्य पदार्थों को वह बढाते हैं । ( यत् यज्ञे अभिरूपम्, तत् समृद्धम् ) जो यज्ञ में विषय के अनुकूल है वह समृद्ध [ सफल ] है ॥ ६ ॥ भावार्थ:--वाणी, प्राण और अपान अर्थात् समस्त इन्द्रियों के सुप्रयोग से मनुष्य संसार में उन्नति करता है ॥ ६ ॥ विशेष: १--इस कण्डिका को ऐ० ब्रा० ३ । ८ तथा ७ । ३३ से मिलाओ ॥ विशेष: २--( इन्द्रो ) के स्थान पर ( इन्दो ) ऋ० ८ । ४८ । ४ से और ( प्रत्यवि- हर्तुर्मनर्रिहन् ) के स्थान पर ( प्रत्यवहर्तुमनहन् १) ऐ० ब्रा० ७ । ३३ से शुद्ध किया है ॥ विशेष: ३-दोनों प्रतीक वाले मन्त्र अर्थ सहित लिखे जाते हैं ॥ १--आ प्यायस्व मदिन्तम सोम विश्वेभिरंशुभिः । भवा नः सुश्रवस्तमः सखा वृधे--ऋ० १ । ६१ । १७ ( मदिन्तम ) हे अत्यन्त आनन्द॒ वाले ( सोम ) सोम ! [ बड़े ऐश्वर्य वाले विद्वान् ] ( विश्वेभिः ) सब ( अंशुभिः ) तत्त्व के अंशों के साथ ( आ ) अच्छे प्रकार ( प्यायस्व ) तू बढ़, और ( सुश्रवस्तमः ) अत्यन्त बड़ी कीर्ति वाला वा अत्यन्त सुन्दर अन्नों वाला ( सखा ) मित्र तू ( नः वृधे ) हमारी बढ़ती के लिए ( भव ) हो ॥ २--सं ते पयांसि समुयन्तु वाजाः सं वृष्ण्यान्यभिमातिषाहः । आप्याय- मानो अमृताय सोम दिवि श्रवांस्युत्तमानि धिष्व-ऋ० १ । ९१ । १८ । ( सोम ) हे सोम ! [ बड़े ऐश्वर्य वाले विद्वान् ] ( ते ) तेरे लिये ( वृष्ण्यानि ) वीरत्व बढ़ाने वाले ( पयांसि ) अनेक अन्न ( सं यन्तु ) अच्छे प्रकार मिलें, ( उ ) और ( अभिमाति- षाहः ) अभिमानी शत्रुओं के दबाने वाले ( वाजाः ) पराक्रम ( सं मम् ) बहुत अच्छे प्रकार [ मिलें ] । ( अमृताय ) अमरपन वा मोक्ष के लिए ( आप्यायमानः ) सब ओर से बढ़ता हुआ तू ( दिवि ) व्यवहार के बीच ( उत्तमानि श्रवांसि ) उत्तम यशों को ( धिष्व ) धारण कर ॥ कण्डिका ७ ॥ प्राणा वा ऋतुयाजाः, तद्यदृतुयाजैश्चरन्ति, प्राणानेव तद्यजमाने दधति । षडृतुनेति यजन्ति, प्राणमेव तद्यजमाने दधति । चत्वार ऋतुभिर्यजन्ति, अपानमेव तद्यजमाने दधति । द्विर्ऋतुनेति उपरिष्टाद् व्यानमेव तद्यजमाने दधति । स चासु- सम्भृतस्त्रेधा विहृतः, प्राणोऽपानो व्यान इति ततोऽन्यत्र गुणितस्तथाह, यजमानः ( प्यायस्व ) वर्धस्व ( सम् ) सम्यक् ( ते ) तव ( पयांसि ) जलानि । अन्नानि ( चमसान् ) भक्ष्यपदार्थान् ( आप्याययन्ति ) प्रवर्धयन्ति ( अभिरूपाभ्याम् ) विषयानुकूलाभ्याम् ॥ १. जर्मन सं० में भी यही पाठ है ॥ सम्पा० ॥
कण्डिका ७ ॥ प्राण ही ऋतुयाज हैं, ऋतुयाजों में अनुवषट् न करे ॥
गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ३ । क० ७ ३७१ सर्वमायुरेत्यस्मिंल्लोक आध्नोत्याप्नोत्यमृतत्वमक्षितं स्वर्गे लोके । ते वा एते प्राणा एव, यदृतुयाजाः । तस्मादनवानं ततो यजन्ति प्राणानां सन्तत्यै । सन्तता इव हीमे प्राणाः । अथो ऋतवो वा ऋतुयाजाः । सथ्स्थानुवषट्कारः । योऽत्रानुवषट् कुर्य्यात्, असथ्स्थितानृतून् संस्थापयेत् । यस्तं तत्र ब्रूय त्, असथ्स्थितानृतून् सम- तिष्ठिपत्१ दुःखमनुभविष्यतीति, शश्वत्तथा स्यात् ॥ ७ ॥ कण्डिका ७ ॥ प्राण ही ऋतुयाज हैं, ऋतुयाजों में अनुवषट् न करे ॥ ( प्राणाः वै ऋतुयाजाः ) प्राण ही ऋतुयाज [ ऋतुओं के लिये यज्ञ ] हैं । ( यत् यत् ऋतुयाजैः चरन्ति, प्राणान् एव तत् यजमाने दधति ) इसलिये जो ऋतुयाजों से वे यज्ञ करते हैं, प्राणों [ प्राण, अपान, व्यान ] को ही उससे यजमान में धारण करते हैं । ( षट् ऋतुना इति यजन्ति, प्राणम् एव तत् यजमाने दधति ) छह [ ऋत्विज् लोग ]—ऋतु के साथ [ ऋतुना—इन मन्त्रों के लिये देखो यजु० २१ । २३-२८ ] इससे वे यज्ञ करते हैं, प्राण [ भीतर जाने वाले वायु ] को ही उससे यजमान में धारण करते हैं । ( चत्वारः ऋतुभिः यजन्ति, अपानम् एव तत् यजमाने दधति ) चार [ ऋत्विज् ]—ऋतुओं से [ ऋतुभिः—इसके लिये देखो यजु० १४ । ७ ]—वे यज्ञ करते हैं, अपान [ बाहर जाने वाले वायु ] को ही उससे यजमान में धारण करते हैं । ( द्विः ऋतुना इति उपरिष्टात्, व्यानम् एव तत् यजमाने दधति ) दो [ ऋत्विज् ]— ऋतु से [ ऋतुना-ऊपर देखो ]—इससे पीछे से [ यज्ञ करते हैं ], व्यान [ शरीर में फैले हुये वायु ] को ही उससे यजमान में वे धारण करते हैं । ( सः च सम्भृतः असुः त्रेधा विहृतः, प्राणः अपानः व्यानः इति ) और वह अच्छे प्रकार पुष्ट किया हुआ प्राण तीन प्रकार से विहार वाला है—प्राण, अपान और व्यान । ( ततःअन्यत्र गुणितः तथा आह ) इस [ ग्रन्थ ] से दूसरे [ ऐतरेय आदि ] में यह कहा गया है—ऐसा वह [ ब्रह्मवादी ] कहता है । ( यजमानः सर्वम् आयुः एति, अस्मिन् लोके स्वर्गे लोके आध्नोति, अक्षितम् अमृतत्वम् आप्नोति ) यजमान [ उससे ] पूर्ण आयु पाता है और इस लोक में स्वर्ग लोक के बीच समृद्ध होता है, और अक्षय अमरपन पाता है । ( ते वै एते प्राणाः एव, यत् ऋतुयाजाः ) वे ही यह प्राण हैं, जो ऋतुयाज हैं । ( तस्मात् अनवानं ततः प्राणानां सन्तत्यै यजन्ति ) इसलिये श्वास न लंकर उसके पीछे प्राणों की निरन्तरता के लिये वे यज्ञ करते हैं । ( सन्तताः इव हि इमे प्राणाः ) क्योंकि लगातार फैले हुये ही यह प्राण हैं । ( अथो ऋतवः वै ऋतुयाजाः ) फिर ऋतुयें ही ऋतुयाज हैं । ( अनुवषट्- कारः संस्था ) अनुवषट्कार [ पीछे से बोला गया वषट् ] समाप्ति है । ( यः अत्र ७-( चरन्ति ) अनुतिष्ठन्ति ( दधति ) स्थापयन्ति ( षट् ) षट्संख्याकाः ऋत्विजः ( द्विः ) द्वौ ( उपरिष्टात् ) पश्चात् ( असुः ) प्राणः ( सम्भृतः ) सम्यक् पोषितः ( विहृतः ) विविधं प्राप्तः ( अनवानम् ) नञ् + अव+अन प्राणने— घञ् । द्वितीयान्तं यथा भवति तथा । उच्छ्वासमकृत्वा ( सन्तत्यै ) अविच्छेदाय । १. पू० सं० 'यः' इत्यधिकः पाठः ॥ सम्पा० ॥
३७२ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ३ । क० ७ अनुवषट् कुर्यात्, असंस्थितान् ऋतून् संस्थापयेत् ) जो यहां [ ऋतुयाज में ] अनुवषट् करे, बिना समाप्त हुये ऋतुओं को वह रोक देवे । ( यः तं तत्र ब्रूयात्, असंस्थितान् ऋतून् समतिष्ठिपत् दुःखम् अनुभविष्यति इति ) जो उस [ अनुवषट्कार ] को वहां बोले और बिना पूरे हुये ऋतुओं को रोक देवे, वह दुःख ही पावेगा । ( शश्वत् तथा स्यात् ) [ इसलिये यह नियम ] सदा वैसा [ अनुवषट् बिना ] होवे ॥ ७ ॥ भावार्थः-मनुष्य प्राण, अपान और व्यान की गतियों से बल और पराक्रम बढ़ाकर सब ऋतुओं को उपयोगी बनावें ॥ ७ ॥ विशेषः १-इस कण्डिका को ऐ० ब्रा० २ । २६ से मिलाओ ॥ विशेषः २-( षडतुना ) के स्थान पर ( षडृतुना ) और ( समतिष्ठिठ ) के स्थान पर ( समतिष्ठि१पत् ) पद ऐ० ब्रा० २ । २६ । में है, पहिला पद शुद्ध कर दिया है ॥ विशेषः ३-प्रतीक वाले मन्त्रों में से एक एक अर्थ सहित लिखा जाता है- १-वसन्तेन ऋतुना देवा वसवस्त्रिवृता स्तुताः । रथन्तरेण तेजसा हविरिन्द्रे वयो दधुः-यजु० २१ । २३ ॥ ( त्रिवृता ) तीनों काल में वर्तमान ( वसन्तेन ऋतुना ) वसन्त ऋतु के साथ ( स्तुताः ) स्तुति किये गये ( देवाः ) दिव्य गुण वाले ( वसवः ) पृथिवी आदि आठ वसु वा प्रथम कक्षा वाले विद्वान् लोग ( रथन्तरेण ) रथ से तरने वाले ( तेजसा ) तीक्ष्ण स्वरूप से ( इन्द्रे ) सूर्य के प्रकाश में ( हविः ) देने योग्य ( वयः ) आयु बढ़ाने हारे वस्तु को ( दधुः ) धारण करें ॥ २-सजूर्र्ऋतुभिः सजूर्विधाभिः सजूर्देवैः सजूर्देवैर्वयोनाधैरग्नये त्वा वैश्वा- नरायाश्विनाध्वर्यू सादयतामिह त्वा । सजूर्र्ऋतुभिः सजूर्विधाभिः सजूर्वसुभिः सजूर्देवैर्वयोनाधैरग्नये त्वा वैश्वा- नरायाश्विनाध्वर्यू सादयतामिह त्वा । सजूर्र्ऋतुभिः सजूर्विधाभिः सजू रुद्रैः सजूर्देवैर्वयोनाधैरग्नये त्वा वैश्वा- नरायाश्विनाध्वर्यू सादयतामिह त्वा । सजूर्र्ऋतुभिः सजूर्विधाभिः सजूर्रादित्यैः सजूर्देवैर्वयोनाधैरग्नये त्वा वैश्वा- नरायाश्विनाध्वर्यू सादयतामिह त्वा । सजूर्र्ऋतुभिः सजूर्विधाभिः सजूर्विश्वैर्देवैः सजूर्देवैर्वयोनाधैरग्नये त्वा वैश्वा- नरायाश्विनाध्वर्यू सादयतामिह त्वा-यजु० १४ । ७ ॥ [ हे स्त्री वा पुरुष ! ] ( ऋतुभिः ) वसन्त आदि ऋतुओं के साथ ( सजूः ) एक सी प्रीति वा सेवा वाला, ( विधाभिः ) विविध प्रकार धारण करने वाले जलों के साथ ( सन्तताः ) अविच्छिन्नाः । निरन्तराः ( संस्था ) समाप्तिः ( असंस्थितान् ) असमाप्तान् ( संस्थापयेत् ) उपरमयेत् ( शश्वत् ) सदा । अवश्यम् ॥ १. जर्मन सं. में भी यही पाठ है अतः हमने कण्डिका में ऐसा ही रख दिया है ॥ सम्पा० ॥
गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ३ । क० ७ १७३ सजूः ) एक सी प्रीति वाला, ( देवैः ) अच्छे गुणों के साथ ( सजूः ) एक सी प्रीति वाला , देवैः ) दिव्य सुख देने वाले ( वयोधायैः ) जीवन आदि वा गायत्री छन्दों से सम्बन्ध वाले प्राणों के साथ ( सजूः ) एकसी प्रीति वाला [ तू हो ], ( वैश्वानराय ) सम्पूर्ण पदार्थों को प्राप्त कराने वाली ( अग्नये ) अग्नि विद्या के लिए ( त्वा त्वा ) तुझको तुझ को ( अध्वर्यू ) हिंसा रहित गृहाश्रम आदि यज्ञ के चाहने वाले ( अश्विना ) सब विद्याओं में व्यापक अध्यापक और उपदेशक दोनों (इह) यहां जगत् में (सादयताम्) स्थापित करें । [ हे स्त्री वा पुरुष ! ] ( ऋतुभिः ) वसन्त आदि ऋतुओं के साथ ( सजूः ) एक सी प्रीति वा सेवा वाला (विधाभिः ) विविध वस्तुओं को धारण कराने वाली प्राणों की चेष्टाओं के साथ ( सजूः ) एक सी प्रीति वाला, (वसुभिः) अग्नि आदि आठ वसुओं के साथ ( सजूः ) एक सी प्रीति वाला; (देवैः ) विजय चाहने वाले (वयोधायैः ) विज्ञानों से सम्बन्ध युक्त विद्वानों के साथ (सजूः ) एक सी प्रीति वाला [ तू हो ], (वैश्वानराय ) सब जगत् के चलाने वाले (अग्नये ) विज्ञान के लिए (त्वा त्वा ) तुझको तुझको ( अध्वर्यू ) हिंसारहित गृहाश्रम आदि यज्ञ के चाहने वाले (अश्विना ) सब विद्याओं में व्यापक अध्यापक और उपदेशक दोनों ( इह ) यहां [जगत् में] (सादयताम्) स्थापित करें । [ हे स्त्री वा पुरुष ! ] ( ऋतुभिः ) वसन्त आदि ऋतुओं के साथ ( सजूः ) एक सी प्रीति वा सेवा वाला ( विधाभिः ) विविध वस्तुओं को धारण कराने वाली प्राणों की चेष्टाओं के साथ ( सजूः ) एक सी प्रीति वाला, (रुद्रैः) [ प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान, नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त, धनञ्जय और जीव, इन ग्यारह ] रुद्रों के साथ ( सजूः ) एक सी प्रीति वाला, ( देवैः ) व्यापार कुशल ( वयोधायैः ) वेद आदि शास्त्रों को जताने के प्रबन्ध करने वालों के साथ ( सजूः ) एक सी प्रीति वाला [ तू हो ], ( वैश्वानराय ) सब नरों के सुखसाधक ( अग्नये ) सब शास्त्रों के विज्ञान के लिये ( त्वा त्वा ) तुझको तुझको ( अध्वर्यू ) हिंसारहित गृहाश्रम आदि यज्ञ के चाहने वाले ( अश्विना ) सब विद्याओं में व्यापक अध्यापक और उपदेशक दोनों ( इह ) यहां [ जगत् में ] ( सादय- ताम् ) स्थापित करें । [ हे स्त्री वा पुरुष ! ] ( ऋतुभिः ) वसन्त आदि ऋतुओं के साथ ( सजूः ) एक सी प्रीति वा सेवा वाला ( विधाभिः ) विविध प्रकार सत्य धारण कराने वाली क्रियाओं के साथ ( सजूः ) एक सी प्रीति वाला, (आदित्यैः) वर्ष के बारह महीनों के साथ ( सजूः ) एक सी प्रीति वाला, ( देवैः ) तेजस्वी ( वयोधायैः ) पूर्ण विद्या के विज्ञान और प्रचार के प्रबन्ध करने वालों के साथ ( सजूः ) एक सी प्रीति वाला [ तू हो ] ( वैश्वा- नराय ) सब नरों के पूर्ण सुख साधने वाले (अग्नये ) पूर्ण विज्ञान के लिये ( त्वा त्वा ) तुझको तुझको ( अध्वर्यू ) हिंसारहित गृहाश्रम आदि यज्ञ के चाहने वाले ( अश्विना ) सब विद्याओं में व्यापक अध्यापक और उपदेशक दोनों ( इह ) यहां [ जगत् में ] ( साद- यताम् ) स्थापित करें । [ हे स्त्री वा पुरुष ! ] ( ऋतुभिः ) क्षण आदि सब काल अवयवों के साथ ( सजूः ) एक सी प्रीति वा सेवा वाला ( विधाभिः ) सब सुखों में व्यापक क्रियाओं के साथ ( सजूः )
कण्डिका ८ ॥
३७४ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ३ । क० ८ एक सी प्रीति वाला (विश्वैः) समस्त (देवैः) परोपकार के लिये सत्य असत्य जताने वालों के साथ (सजूः) एक सी प्रीति वाला (देवैः) प्रशंसा योग्य (वयोनाधैः) काम- यमान जीवन का प्रबन्ध करने वालों के साथ (सजूः) एक सी प्रीति वाला [तू हो], (वैश्वानराय) सब नरों के हितकारक (अग्नये) अच्छी शिक्षा के प्रकाश के लिये (त्वा त्वा) तुझ को तुझ को (अध्वर्यू) हिंसारहित गृहाश्रम आदि यज्ञ के चाहने वाले (अश्विना) सब विद्याओं में व्यापक अध्यापक और उपदेशक दोनों (इह) यहां [जगत् में] (सादयताम्) स्थापित करें। कण्डिका ८ ॥ तदाहुः, यद्धोता यक्षद्धोता यक्षदिति, मैत्रावरुणो होत्रे प्रेष्यति, अथ कस्माद- होतृभ्यः सद्द्भ्यो होत्राशंसिभ्यो होता यक्षद्धोता यक्षदिति प्रेष्यतीति । वाग्वै होता, वाक् सर्वं ऋत्विजः वाग् यक्षद्वाग् यक्षदिति । अथो सर्वे वा एते सप्तहोतारोऽपि वा ऋचाभ्युदितं, सप्तहोतार ऋतुथा यजन्तीति । अथ य उपरिष्टाद् १ *द्वादशर्चजा- मितायै, ते वै द्वादश भवन्ति, द्वादश ह वै मासाः ॐ संवत्सरः, संवत्सरः प्रजापतिः, प्रजापतिर्यज्ञः । स योऽत्र भक्षयेद्वस्तं तत्र ब्रूयात्, अशान्तो भक्षो नानुवषट्कृत आत्मानमन्तरगान्न जीविष्यतीति । तथा हास्याद्यो वै भक्षयेत्, प्राणो भक्षः प्राण आत्मानमन्तरगादिति । तथैव ह भवति लिम्पेदिति वात्र जिघ्रेत्तत्र च२ द्विदेवत्येषु चेति, तद्यु तत्र शासनं वेदयन्ते अथ यदमू व्यभिचरतो नानान्योऽन्यमनुप्रपद्येते अध्वर्यू । तस्मादृतून्मृतुं नानुप्रपद्यते ॥ ८ ॥ कण्डिका ८ ॥ होता यक्षत् होता यक्षत्—इन मन्त्रों के उच्चारण का विषय ॥ (तत् आहुः, होता यक्षत् होता यक्षत् इति, यत् मैत्रावरुणः होत्रे प्रेष्यति, अथ कस्मात् अहोतृभ्यः सद्द्भ्यः होत्राशंसिभ्यः प्रेष्यति इति—होता यक्षत् होता यक्षत् इति) फिर कहते हैं—होता यज्ञ करे, होता यज्ञ करे—[इन मन्त्रों के लिये देखो यजु० २१ । २६--४७] इस प्रकार जब मैत्रावरुण [प्राण और अपान वायु जानने वाला याजक] होता से कहता है, फिर किसलिये होता से भिन्न, उपस्थित, वेदवाणी से स्तुति करने वालों से यह कहता है—होता यज्ञ करे, होता यज्ञ करे । (वाक् वै होता, वाक् ८—(होता) दाता। ग्रहीता (यक्षत्) यजेत् (प्रेष्यति) अनुजानाति (अहोतृभ्यः) होतृभिन्नयाजकेभ्यः (सद्भ्यः) वर्त्तमानेभ्यः (होत्राशंसिभ्यः) होत्रां १. अस्यां कण्डिकायां पुष्पाङ्कितः पाठः पूर्वसंस्करणे 'भक्षयेत्, प्राणः···'इत्यस्यानन्तरमासीत् । अर्थसङ्गत्या जर्मनसंस्करणानुसारणास्माभिरत्र स्थापितः । तथैव भाष्यमपि यथा- वस्थितं कृतम् ॥ २. पू० सं० 'त' इति पाठः ॥ सम्पा० ॥
गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ३ । क० ८ ३७५ सर्वे ऋत्विजः, वाक् यक्षत् वाक् यक्षत् इति ) [ समाधान ] वाणी ही होता, [ हवन करने वाला ] है, वाणी ही सब ऋत्विज् लोग हैं—वाणी यज्ञ करे, वाणी यज्ञ करे [ यह उसका अभिप्राय है ] । ( अथो सर्वे वै एते सप्त होतारः अपि वै ऋचा अभ्युदितं, सप्त होतारः ऋतुथा यजन्ति इति ) और यह सब ही सात हवन करने वाले होते हैं, यह ही इस ऋचा द्वारा कहा गया है—सात हवन करने वाले ऋतु ऋतुओं के अनुसार हवन करते हैं [ यह ब्राह्मण वचन है—इसको आगे टिप्पणी में दिये यजु० ३४ । ५५ के आशय से मिलाओ ] । ( अथ यः उपरिष्टात् द्वादशर्चंजामितायै ते वै द्वादश भवन्ति, द्वादश ह वै मासाः संवत्सरः, संवत्सरः प्रजापतिः, प्रजापतिः यज्ञः ) फिर जो पहिले से बारह ऋचाओं से सम्बन्ध के लिये हैं वे बारह हैं, बारह ही मास होते हैं । संवत्सर यज्ञ होता है, संवत्सर [ वर्ष ] प्रजापति है, 'प्रजापति यज्ञ है । ( सः यः अत्र भक्षयेत्, यः=सः, तं तत्र ब्रूयात्, अशान्तः भक्षः अनुवषट्कृतः आत्मानम् अन्तः न अगात्, न जीविष्यति इति ) सो जो यहां [ यज्ञ में ] भोजन करे, वह उस [ भोजन विषय ] को वहां बोले—अशान्त भोजन अनुवषट् [ समाप्तिसूचक यज्ञ ] करने वाले के आत्मा में नहीं जाता, वह [ उसे ] न जिलावेगा । ( तथा ह अस्य आद्यः वै भक्षयेत्, प्राणः भक्षः प्राणः आत्मानम् अन्तः अगात् इति ) इस कारण से ही इस [ यज्ञ ] के खाने योग्य पदार्थ को ही वह खावे, प्राण भोजन है जो वह प्राण आत्मा में पहुँचता है । ( तथा एव ह भवति लिम्पेत् इति वाव तत्र च द्विदेवत्येषु च जिघ्रेत् इति ) वह वैसा ही होता है कि वह [ भोजन उसे ] बढ़ावे, और वहां ही उसको दो देवता वाले यज्ञों में वह ग्रहण करे । ( तत्र तत् उ शासनं वेदयन्ते, अथ यत् अमू अध्वर्यू व्यभिचरतः, अन्योऽन्यं नाना अनुप्रपद्येते, तस्मात् ऋतुः ऋतुं न अनुप्रपद्यते ) वहां पर यह शासन बताते हैं—फिर जब दो अध्वर्यु विरुद्ध व्यवहार करते हैं और एक दूसरे के बिना दोनों चले चलते हैं, इसलिये ऋतु ऋतु को साथ साथ प्राप्त नहीं होते ॥ ८ ॥ वेदवाचं शंसन्ति कथयन्ति तेभ्यः (अभ्युदितम्) सर्वतः कथितम् (ऋतुथा) ऋतुप्रकारेण । ऋतुना ऋतुना (द्वादशर्चंजामितायै) जमतिर्गतिकर्मा-निघ० २। १४ । जनिघसिभ्यामिण् ( उ० ४ । १३० ) जमु भक्षणे गतौ च—इण् । जामिशब्दः समानजातीयवाचकः । द्वादशर्चैः संबन्धाय संयोगाय ( अनुवषट्कृतः ) अनुवषट्कारकस्य ( आत्मानम् ) शरीरम् । जीवम् ( अन्तः ) मध्ये ( अगात् ) गच्छति ( जीविष्यति ) जीवयिष्यति ( आद्यः ) आद्यं भक्षणीयं पदार्थम् ( प्राणः ) प्राणवायुः । ( लिम्पेत् ) वर्धयेत् ( जिघ्रेत् ) घ्रा गन्धोपादाने ग्रहणमात्रे च । गृह्णीयात् ( द्विदेवत्येषु ) द्विदेवताकेषु मन्त्रेषु ( व्यभिचरतः ) विरोधेन गच्छतः ( नाना ) बिना ॥ १. भाष्यकार का यह अर्थ सोमयाग की प्रक्रियानुसार संगत प्रतीत नहीं होता, क्योंकि सोमयाग में अनुवषट्कार प्रधानाहुति का समर्थक एवं समाप्ति सूचक होता है, अतः उन आहुतियों से रहित जो यज्ञ का यज्ञशेष होगा वह 'अशान्त भक्ष' होगा । यह यहाँ तात्पर्य है । विषय का स्पष्टीकरण भूमिका में देखें ॥ सम्पा० ॥
कण्डिका ९ ॥
३७६ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ३ । क० ९ विशेष: १—प्रतीक वाले मन्त्रों में से एक मन्त्र और दूसरा संकेत वाला मन्त्र अर्थ सहित यहां दिया जाता है ॥ १—होता यक्षत् समिधाग्निमइडस्पदेऽश्विनेन्द्र १७ सरस्वतीमजो धूम्रो न गोधूमैः कुवलैर्भेषजं मधुशष्पैर्न तेज इन्द्रियं पयः सोमः परिस्रुता घृतं मधु व्यन्त्वाज्यस्य होतर्यज ॥ यजु० २१ । २६ ॥ ( होता ) हवन करने वाला ( समिधा ) इन्धन आदि से ( अग्निम् ) आग, ( अश्विना ) सूर्य और चन्द्रमा, ( इन्द्रम् ) ऐश्वर्य वा जीव और ( सरस्वतीम् ) सुशिक्षित वाणी को ( इडः पदे ) पृथिवी और अन्न के स्थान में ( यक्षत् ) संगत करे । ( धूम्रः ) धुमैले वर्ण वाला ( अजः ) अज [ माक्षिक धातु-औषधविशेष ] ( गोधूमैः ) गेहूं, ( न ) और ( कुवलैः ) बेरों ( न ) और ( शष्पैः ) घासों के सहित ( मधु ) मधुर जल, ( भेषजम् ) औषध, ( तेजः ) तेज, ( इन्द्रियम् ) धन, ( पयः ) दूध वा अन्न, ( परिस्रुता ) सब ओर से प्राप्त हुये रस के साथ ( सोमः ) सोम [ औषधियों का रस ], ( घृतम् ) घी ( मधु ) मधु [ रस विशेष ] ( व्यन्तु ) प्राप्त हों । ( होतः ) हे होम करने वाले जन ! ( आज्यस्य ) घी का ( यज ) होम कर ॥ २—सप्त ऋषयः प्रतिहिताः शरीरे सप्त रक्षन्ति सदमप्रमादम् । सप्तापः स्वपतो लोकमीयस्तत्र जागृतो अस्वप्नजौ सत्रसदौ च देवौ ॥ यजु० ३४ । ५५ ॥ (सप्त ऋषयः) सात ऋषि [ विषयों को प्राप्त कराने वाले, पांच ज्ञानेन्द्रिय, मन और बुद्धि ] ( शरीरे ) शरीर में ( प्रतिहिताः ) ठहरे हुये हैं, ( सप्त ) वे सात ( सदम् ) ठहरने के स्थान [ शरीर ] की ( अप्रमादम् ) बिना भूल ( रक्षन्ति ) रक्षा करते हैं । ( सप्त ) वे सात ( आपः ) व्यापने वाले [ ऋषि ] ( स्वपतः ) सोते हुये जन के ( लोकम् ) लोक [ दीखते हुये शरीर वा जीवात्मा ] को ( ईयुः ) प्राप्त होते हैं, ( तत्र ) वहां [ शरीर में ] ( अस्वप्नजौ ) दो न सोते हुये ( सत्रसदौ ) सत्र में बैठने वाले [ यज्ञ अर्थात् शरीर में काम करने वाले ] ( च ) और ( देवौ ) दिव्य गुण वाले [ प्राण और अपान ] ( जागृतः ) जागते हैं ॥ कण्डिका ९ ॥ प्रजापतिर्वै यत् प्रजा असृजत, ता वै तान्ता असृजत । ता हिङ्कारेणैवा- भ्यजिघ्रत् । ताः प्रजा अश्व'मारन्, तद् बध्यते वा एतद्यज्ञो यद्धवींषि पच्यन्ते । यत् सोमः सूयते, यत् पशुरालभ्यते, हिङ्कारेण वा एतत् प्रजापतिर्ह तमभिजिघ्रति, यज्ञस्याहृतता१यै यज्ञस्याप्त्यै यज्ञस्य वीर्य्यवत्ताया ३ इति । तस्मादु हिङ्क्रियते, तस्मादु य एव पिता पुत्राणां मूर्द्धति, स श्रेष्ठो भवति, प्रजापतिर्हि तमभिजिघ्रति । यच्छ- कुनिराण्डमध्यास्ते यन्न सूयते, तद्धि सापि हिङ्कृणोति । अथो खल्वाहुः, महर्षिर्वा एतद्यज्ञस्याग्रे गेयमपश्यत् । तदेतद्यज्ञस्याग्रे गेयं, यद्धिङ्कारः । तं देवाश्च ऋषयश्चाब्रुवन्, वसिष्ठोऽयमस्तु, यो नो यज्ञस्याग्रे गेयमद्रागिति । तदेतद्यज्ञस्याग्रे गेयं, यद्धिङ्कारः । १. पू. सं. 'अमारन्' इति पाठः ॥ २. पू. सं. 'अहतायै' इति पाठः ॥ ३. पू. सं. 'वीर्यंवत्तयै' इति पाठः ॥ सम्पा० ॥
कण्डिका ९ ।। हिङ्कार [ प्रतिध्वनि ] के उच्चारण की महिमा
गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ३ । क० ६ ३७७ ततो वै स देवानां श्रेष्ठोऽभवत् । येन वै श्रेष्ठः, तेन वसिष्ठः । तस्माद् यस्मिन्वासिष्ठो ब्राह्मणः स्यात्, तं दक्षिणाया नान्तरीयात् । तथा हास्य प्रीतो हिङ्कारो भवति । अथ देवाश्च ह वा ऋषयश्च यदृक्सामे अपश्यन् । ते ह स्मैते अपश्यन् । ते यन्नैते अपश्यन्, तत एवैनं सर्वं दोहमदुहन् । ते वा एते दुग्धे यातयामे, य ऋक्सामे । ते हिङ्कारेणै- वाप्याय्येते । हिङ्कारेण वा ऋक्सामे आपीने यजमानाय दोहं दुहाते । तस्मादु हिङ्कृत्याध्वर्यवः सोममभिपुण्वन्ति । हिङ्कृत्योद्गातारः साम्ना स्तुवन्ति । हिङ्कृत्योक्थश ऋचाँर्त्विज्यं कुर्वन्ति । हिङ्कृत्याथर्वाणो ब्रह्मत्वं कुर्वन्ति । तस्मादु हिङ्क्रियते । प्रजापतिर्हि तमभिजिघ्रति । अथो खल्वाहुः, एको वै प्रजापतेर्व्रतं बिभर्त्ति गौरैव, तदुभये पशव उपजीवन्ति, ये च ग्राम्या ये चारण्या इति ॥ ६ ॥ कण्डिका ९ ।। हिङ्कार [ प्रतिध्वनि ] के उच्चारण की महिमा और प्रमाण ।। ( प्रजापतिः वै याः प्रजाः असृजत, ताः वै तान्ताः असृजत ) प्रजापति ने जब प्रजाओं को उत्पन्न किया, उन ही ( तान्ताः ) फैली हुई [ प्रजाओं ] को उत्पन्न किया । ( ताः हिङ्कारेण एव अभ्यजिघ्रन् ) उन [ प्रजाओं ] को हिङ्कार [ प्रीतिध्वनि ] से ही उसने ग्रहण किया । ( ताः प्रजाः अश्वम् आरन् १ ) उन प्रजाओं को वह न मारता हुआ [ था ] । ( तत् एतत् यज्ञः वै बध्यते यत् हवींषि पच्यन्ते ) इसलिये यह ही यज्ञ [ संगतिकरण व्यवहार ] संयुक्त किया जाता है, जो हवि [ खाने के पदार्थ ] पकाये जाने हैं । ( यत् सोमः सूयते, यन् पशुः आलभ्यते, हिङ्कारेण वै एतत् प्रजापतिः ह तं यज्ञस्य अह्रततायै, यज्ञस्य आप्त्यै, यज्ञस्य वीर्यवत्तायै अभिजिघ्रति इति ) जो सोम [ तत्त्वरस ] निचोड़ा जाता है, जो पशु ग्रहण किया जाता है, हिङ्कार [ प्रतिध्वनि ] से ही यह प्रजापति उस [ सोम ] को यज्ञ के अविनाश के लिये, यज्ञ की प्राप्ति के लिये और यज्ञ की वीर्यवत्ता के लिये ग्रहण करता है । ( तस्मात् उ हिङ्क्रियते ) इसलिये यह हिङ्कार किया जाता है । ( तस्मात् उ यः एव पिता पुत्राणां मूर्द्धति, सः श्रेष्ठो भवति, प्रजापतिः हि तम् अभिजिघ्रति ) इसलिये ही जो पिता [ हिङ्कार से ] पुत्रों का आदर करता है, वह [ पुत्र ] श्रेष्ठ होता है, प्रजापति [ परमात्मा ] उसको ग्रहण करता है । ( यत् शकुनिः आण्डम् अध्यास्ते यन् न सूयते तत् हि सा अपि हिङ्कृणोति ) जो चिड़िया अण्डे पर बैठती है और जब वह उसे अब उत्पन्न करती है, तब वह भी हिङ्कार करती है । ( अथो खलु आहुः, ६—( असृजत ) सृष्टवान् ( ताः ) प्रजाः ( तान्ताः ) हसिमृग्रिण्वमिदम० ( उ० ३ । ८६ ) तनु विस्तारे-तन्, आर्षो दीर्घः । तन्ताः । विसृताः ( हिङ्कारेण ) हि गतिवृद्ध्योः-डि + करोतेः-अण्, आर्षं रूपम् । वृद्धिकरेण व्यवहारेण । प्रीतिध्वनिना ( अभ्यजिघ्रत् ) सर्वतो गृहीतवान् ( आरन् ) ऋ गतौ-लङ् ( बध्यते ) बध संयमने । संयम्यते । संबध्यते । नियमे क्रियते (सूयते) अभिपवणेन प्राप्यते (आलभ्यते) समन्तात् १. यहाँ शोधे हुये पाठानुसार अर्थ ऐसा होगा—"वे सृष्ट प्रजायें अश्वः=मेध्य, यज्ञ का रूप धारण किये हुये प्रजापति के पास आईं" इस विषय के लिये देखें-वृ०आ० १ । १ ॥ सम्पा० ॥
३७८ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ३ । क० ६ महर्षिः वै यज्ञस्य अग्रे एतत् गेयम् अपश्यत् ) फिर लोग कहते हैं—महर्षि [ बड़े ज्ञानी पुरुष ] ने ही यज्ञ के पहिले [ होने वाले ] इस गाने योग्य वाक्य को देखा। ( तत् यज्ञस्य अग्रे एतत् गेयं, यत् हिङ्कारः ) सो यज्ञ के पहिले यह गाने योग्य वाक्य है, जो हिङ्कार है। (तं देवाः च ऋषयः च अब्रुवन्, अयं वसिष्ठः अस्तु यः नः यज्ञस्य अग्रे गेयम् अद्राक् इति) उस [ महर्षि ] से देव [ विद्वान् ] और ऋषि [ वेदार्थ जानने वाले ] बोले —यह वसिष्ठ [ अत्यन्त निवास कराने वाला वा अत्यन्त जितेन्द्रिय पुरुष ] होवे, जिसने हमारे लिये यज्ञ के पहिले गाने योग्य देखा है। ( तत् यज्ञस्य अग्रे एतत् गेयं यत् हिङ्कारः ) सो यज्ञ के पहिले यह गाने योग्य वाक्य है—जो हिङ्कार है। ( ततः वै सः देवानां श्रेष्ठः अभवत् ) इसलिये ही वह [ हिङ्कार का देखने वाला ] विद्वानों में श्रेष्ठ हुआ है। ( येन वै श्रेष्ठः, तेन वसिष्ठः ) जिस कारण से ही वह श्रेष्ठ है, उसी से वह वसिष्ठ [ अत्यन्त निवास देने वाला ] है। ( तस्मात् यस्मिन् वासिष्ठः ब्राह्मणः स्यात् तं दक्षिणायाः न अन्तरोयात् ) इसलिये जिस [ यज्ञ ] में वासिष्ठ [ वसिष्ठ के देखे हुये हिङ्कार को जानने वाला ] ब्राह्मण होवे, उसको दक्षिणा से पृथक् न करे। ( तथा ह अस्य प्रीतः हिङ्कारः भवति ) इस प्रकार से कि हिङ्कार इसका प्रिय है। ( अथ देवाः च ह वै ऋषयः च यत् ऋक् सामे अपश्यन् ) फिर देवताओं और ऋषियों ने ही जो ऋग्वेद [ पदार्थों की स्तुति विद्या ] और सामवेद [ मोक्ष विद्या ] को देखा है। ( ते ह स्म एते अपश्यन् ) उन्होंने ही इन दोनों को देखा है। ( ते यत्र एते अपश्यन्, ततः एव एनं सर्वं दोहम् अब्दुहन् ) उन्होंने जिस [ ब्रह्मचर्य्यादि व्रत ] में इन दोनों को देखा है, उससे ही उन्होंने इस सब दोहने योग्य पदार्थ [ तत्त्वरस ] को दुहा है। ( ते वै एते दुग्धे यातयामे, ये ऋक्सामे ) वह ही यह दोनों दुहे हुये नियम प्राप्त किये हुये हैं, जो ऋग्वेद और सामवेद हैं। ( ते हिङ्कारेण एव आप्यायते ) वे दोनों हिङ्कार से ही बढ़ते हैं। ( हिङ्कारेण वै आपीने ऋक्सामे यजमानाय दोहं दुहाते ) हिङ्कार से ही बढ़े हुये ऋग्वेद और सामवेद यजमान के लिये दुहने योग्य पदार्थ दुहते हैं [ भरपूर करते हैं ] । ( तस्मात् उ हिङ्कृत्य अध्वर्य्यवः सोमम् अभिषुण्वन्ति ) इसलिये ही हिङ्कार करके अध्वर्यु [ सन्मार्ग बताने वाले ] लोग सोम [ तत्त्व रस ] निचोड़ते हैं। ( हिङ्कृत्य उद्गातारः साम्ना स्तुवन्ति ) हिङ्कार करके उद्गाता [ वेद गाने वाले ] लोग साम [ मोक्ष विद्या ] से स्तुति करते हैं। ( हिङ्कृत्य उक्थशः ऋचा आर्त्विज्यं कुर्वन्ति ) हिङ्कार करके वेदमन्त्र बोलने वाले लोग ऋग्वेद [ पदार्थों की स्तुति विद्या ] से ऋत्विजों का काम करते हैं। ( हिङ्कृत्य अथर्वाणः ब्रह्मत्वं कुर्वन्ति ) हिङ्कार करके प्राप्यते (अहततायै) अविनाशाय (आप्त्यै) पर्याप्त्यै (वीर्य्यवत्तायै) वीरत्वप्राप्तये (सूक्ष॑ति) सूक्षं सत्कारे । सत्करोति ( शकुनिः ) शकुनी । पक्षिणी ( अध्यास्ते ) उपतिष्ठति ( न ) सम्प्रति ( सूयते ) उत्पद्यते ( गेयम् ) गातव्यं वेदम् ( वसिष्ठः ) अतिशयेन निवासकः । अतिशयेन वशी ( अद्राक् ) अद्राक्षीत् ( वासिष्ठः ) दृष्टं साम. ( पा० ४ । २ । ७ ) वसिष्ठ—अण् । वसिष्ठेन दृष्टो हिङ्कारो वासिष्ठः । तदधीते तद्वेद ( पा० ४ । २ । ५६ ) वासिष्ठ—अण् । वासिष्ठवेत्ता । वसिष्ठ—दृष्टहिङ्कारवेत्ता ( यातयामे ) प्राप्तनियमे ( आप्यायते ) प्रवर्धते ( आपीने ) प्रवृद्धे ( उक्थशः ) उक्थानि उक्थैर्वा शंसतीति उक्थशः । मन्त्रे श्वेतवहोक्थशस्पुरोडाशो ण्विन् ( पा० ३ । २ । ७१ ) उक्थ + शंस
कण्डिका १० ॥
गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ३ । क० १० ३७६ अथर्वा लोग [ निश्चल ब्रह्म विद्या जानने वाले ] ब्रह्मा का काम करते हैं । ( तस्मात् उ हिङ्क्रियते ) इसलिये ही यह हिङ्कार किया जाता है । ( प्रजापतिः हि तम् अभिजिन्नति ) प्रजापति [ परमात्मा ] ही उस [ हिङ्कार करने वाले ] को ग्रहण करता है । (अथो खलु आहुः, एकः गोः वै एव प्रजापतेर्व्रतं बिभर्ति, तत् उभये पशवः उपजीवन्ति, ये च ग्राम्याः ये च आरण्याः इति ) फिर अवश्य वे कहते हैं—एक ही गौ [ स्तोता वेदवेत्ता ] निश्चय करके प्रजापति के व्रत [ नियम ] को धारण करता है, दोनों प्रकार के पशु [ जीव ] उस पुरुष के आश्रय जीते हैं जो ग्राम वाले और वन वाले हैं।' ६ ॥ भावार्थः—परमेश्वर की आज्ञा मानने वाले विद्वानों के आदेश के अनुसार जो पुरुष प्रयत्न करते हैं, वे सिद्धि पाते हैं ॥ कण्डिका १० ॥ देवविशः कल्पयितव्या इत्याहुः, छन्दश्छन्दसि प्रतिष्ठाप्यमिति । शंसो३सा- वोमित्याह्वयते, प्रातःसवने त्र्यक्षरेण । शंसावो दैवेत्यध्वर्युः प्रतिगृणा१ति पञ्चाक्षरम् । तत् अष्टाक्षरं सम्पद्यते । अष्टाक्षरा वै गायत्री, गायत्रीमेवैतत् पुरस्तात् प्रातःसवनेऽ- चीक्लपताम् । उक्थं वाचीत्याह शस्त्वा चतुरक्षरमोमुक्थशा इत्यध्वर्युः प्रतिगृणाति चतुरक्षरं तत्, अष्टाक्षरं सम्पद्यते अष्टाक्षरा वै गायत्री, गायत्रीमेवैतत् । उभयतः प्रातःसवनेऽचीक्लपताम् । अध्वर्यो शंसावोमित्याह्वयते माध्यन्दिने षडक्षरेण, शंसावो दैवेत्यध्वर्युः प्रतिगृणाति पञ्चाक्षरम् । तदेकादशाक्षरं सम्पद्यते । एकादशाक्षरा वै त्रिष्टुप्, त्रिष्टुभमेवैतत् पुरस्तान्माध्यन्दिनेऽचीक्लपतामुक्थं वाचीन्द्रायेत्याह, शस्त्वा षडक्षरमोमुक्थशा यजेत्यध्वर्युः प्रतिगृणाति पञ्चाक्षरं, तदेकादशाक्षरं सम्पद्यते । एकादशाक्षरा वै त्रिष्टुप्, त्रिष्टुभमेवैतत् । उभयतो माध्यन्दिनेऽचीक्लपताम् । अध्वर्यो शंसो३शंसो३सावोमित्याह्वयते तृतीयसवने सप्ताक्षरेण, शंसो३सावो दैवेत्यध्वयुः प्रतिगृणाति पञ्चाक्षरं, तद्द्वादशाक्षरं सम्पद्यते । द्वादशाक्षरा वै जगती, जगतीमेवैतत् पुरस्तात्तृतीयसवनेऽचीक्लपताम्, उक्थं वाचीन्द्राय देवेभ्य इत्याह, शस्त्वा नवाक्षरमोमुक्थशा इत्यध्वर्युः प्रतिगृणाति त्र्यक्षरं, तद् द्वादशाक्षरं सम्पद्यते । द्वादशाक्षरा वै जगती, जगतीमेवैतत् उभयतस्तृतीयसवनेऽचीक्लपतामिति । एतद्वै तच्छन्दः, छन्दसि प्रतिष्ठापयति, कल्पयत्येव देवविशः, य एवं वेद । तदप्येषाभ्यनूक्ता, यद्गायत्रे अधिगायत्रमाहितमिति ॥ १० ॥ कथने स्तुतौ च—ण्विन् । आर्षरूपं बहुवचनस्य उक्थशासः । उक्थानां वेदमन्त्राणां कथयितारः (अथर्वाणः) निश्चलज्ञानिनः । सर्ववेदवेत्तारः ( गोः ) गमेर्डोः ( उ० २ । ६७) गै गाने स्तुतौ च—डोः । स्तोता—णिच् ० ३ । १६ ( ग्राम्याः ) ग्रामीणाः ( आरण्याः ) अरण्य—णः । अरण्ये भवाः ॥ १. पू. सं. 'प्रतिगृह्णाति' इति पाठः ॥ सम्पा० ॥
कण्डिका १० ॥ प्रातःसवन, माध्यन्दिन और तृतीयसवन में
३८० गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ३ । क० १० ॥ कण्डिका १० ॥ प्रातःसवन, माध्यन्दिन और तृतीयसवन में विशेषता से मन्त्रों का प्रयोग ॥ ( देवविशः कल्पयितव्यः इति छन्दः छन्दसि प्रतिष्ठाप्यम् इति आहुः ) देवताओं की प्रजायें बनाई जावें और छन्द [ वेद ] छन्द [ वेद के आधार परमात्मा ] में रखा -- जावे—ऐसा वे [ ब्रह्मवादी ] कहते हैं। (शंसावोम्—इति प्रातःसवने त्र्यक्षरेण आह्वयते) ( शंसाव ओम् ) हम दोनों स्तुति करें, अच्छा ! प्रातःसवन में इस तीन अक्षर वाले वाक्य से वह [ होता अध्वर्यु से ] कहता है। ( शंसावो देव--इति अध्वर्युः पञ्चाक्षरं प्रतिगृणाति ) ( शंसावः दैव ) हम दोनों स्तुति करते हैं, हे देव ! अध्वर्यु इस पांच अक्षर वाले वाक्य को उत्तर में बोलता है। ( तत् अष्टाक्षरं सम्पद्यते ) उससे [ शंसावोम् + शंसावो दैव—पहिला और दूसरा वाक्य मिल कर ] आठ अक्षर वाला वाक्य बनता है। ( अष्टाक्षरा वै गायत्री, गायत्रीम् एव एतत् पुरस्तात् प्रातःसवने अचीक्लपताम् ) आठ अक्षर वाला ही गायत्री [ छन्द ] है, गायत्री [ स्तुति योग्य वेद विद्या ] को ही इससे आरम्भ में प्रातःसवन के बीच उन दोनों ने ठहराया है। ( उक्थं वाचि--इति शस्त्वा चतुरक्षरम् आह ) ( उक्थं वाचि ) स्तोत्र [ मेरी ] वाणी में है—स्तोत्र पढ़के यह चार अक्षर वाला वाक्य वह [ होता ] बोलता है। ( ओम् उक्थशाः-इति अध्वर्युः चतुरक्षरं प्रतिगृणाति ) ( ओम् उक्थशाः ) हां, तू स्तोत्र बोलने वाला [ हो ]—अध्वर्यु यह चार अक्षर वाला वाक्य उत्तर में बोलता है। ( तत् अष्टाक्षरं सम्पद्यते ) उससे [ उक्थं वाचि + ओम् उक्थाः-पहिला और दूसरा वाक्य मिलकर ] आठ अक्षर वाला वाक्य बनता है। ( अष्टाक्षरा वै गायत्री, गायत्रीम् एव एतत् उभयतः प्रातःसवने अचीक्लपताम् ) आठ अक्षर वाला ही गायत्री छन्द है, गायत्री [ गाने योग्य वेद विद्या ] को ही इससे दोनों ओर [ स्तोत्र के पहिले और पीछे ] प्रातःसवन में उन दोनों ने ठहराया है ॥ ( अध्वर्यो शंसावोम्—इति माध्यन्दिने षडक्षरेण आह्वयते ) ( अध्वर्यो शंसावोम् ) हे अध्वर्यु ! हम दोनों स्तुति करें, अच्छा ! माध्यन्दिन यज्ञ में इस छह अक्षर वाले वाक्य से वह [ होता अध्वर्यु से ] कहता है। ( शंसावो दैव—इति अध्वर्युः पञ्चाक्षरं प्रतिगृणाति ) ( शंसावः दैव ) हम दोनों स्तुति करते हैं, हे देव ! अध्वर्यु इस पांच अक्षर वाले वाक्य को उत्तर में बोलता है। ( तत् एकादशाक्षरं सम्पद्यते ) उससे [ अध्वर्यो शंसावोम् + शंसावो दैव--पहिला और दूसरा वाक्य मिलकर ] ग्यारह अक्षर वाला वाक्य बनता है। ( एकादशाक्षरा वै त्रिष्टुप्, त्रिष्टुभम् एव एतत् पुरस्तात् माध्यन्दिने अचीक्लपताम् ) ग्यारह अक्षर वाला ही त्रिष्टुप् छन्द है, त्रिष्टुप् [ तीन कर्म, उपासना और ज्ञान से पूजित ब्रह्म ] को ही इससे आरम्भ में माध्यन्दिन सवन के बीच उन दोनों ने ठहराया है। ( उक्थं वाचीन्द्राय--इति शस्त्वा षडक्षरम् आह ) ( उक्थं वाचि इन्द्राय ) स्तोत्र [ मेरी ] वाणी में इन्द्र के लिये है—स्तोत्र पढ़कर यह छह अक्षर वाला वाक्य वह [ होता ] १०—(देवविशः) देवानां प्रजाः (कल्पयितव्याः) सम्पादनीयाः (प्रतिष्ठाप्यम् ) प्रतिष्ठापनीयम् ( शंसाव ) आवां शंसनं स्तोत्रं करवाव (ओम् ) अनुमती ( शंसावः )
गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ३ । क० १० ३८१ बोलता है। (ओम॒क्थशा॑: यज-इति अध्व॒र्युः पञ्चाक्षरं प्रतिगृणाति ) हां, स्तुति बोलने वाला तू यज्ञ कर--अध्वर्यु यह पांच अक्षर वाला वाक्य [ उक्थ = उक्थ ] उत्तर में बोलता है। (तत् एकादशाक्षरं सम्पद्यते) उससे [ उक्थं वाचीन्द्राय + ओमुक्थशा यज-पहिला और दूसरा वाक्य मिलकर ] ग्यारह अक्षर वाला वाक्य बनता है। ( एकादशाक्षरा वै त्रिष्टुप् त्रिष्टुभम् एव एतत् उभयतः माध्यन्दिने अचीक्लृपताम् ) ग्यारह अक्षर वाला ही त्रिष्टुप् छन्द है, त्रिष्टुप् [ तीन कर्म, उपासना और ज्ञान से पूजित ब्रह्म ] को ही इससे दोनों ओर [ स्तोत्र के आदि और अन्त में ] माध्यन्दिन सवन के बीच उन दोनों [ होता और अध्वर्यु ] ने ठहराया है ॥ (अध्वर्यो शंशा॑सावोम्-इति तृतीयसवने सप्ताक्षरेण आह्वयते ) ( अध्वर्यो शंशांसाव ओम् ) हे अध्वर्यु ! हम दोनों स्तुति करें, अच्छा ! तृतीयसवन में इस सात अक्षर वाले वाक्य से वह [ होता अध्वर्यु से ] कहता है। ( शंसावो दैव-इति अध्वर्युः पञ्चाक्षरं प्रतिगृणाति ) ( शंसावः दैव ) हम दोनों स्तुति करते हैं, हे देव ! अध्वर्यु इस पांच अक्षर वाले वाक्य को उत्तर में बोलता है। ( तत् द्वादशाक्षरं सम्पद्यते ) उससे [ अध्वर्यो शंशासावोम् + शंसावो दैव--पहिला और दूसरा वाक्य मिलकर ] बारह अक्षर वाला वाक्य बनता है। ( द्वादशाक्षरा वै जगती, जगतीम् एव एतत् पुरस्तात् तृतीयसवने अचीक्लृपताम् ) बारह अक्षर वाला ही जगती छन्द है, जगती [ जगत् का उपकार करने वाली वेद विद्या ] को ही इससे आरम्भ में तृतीयसवन के बीच उन दोनों ने ठहराया है। ( उक्थं वाचीन्द्राय देवेभ्यः—शस्त्वा इति नवाक्षरम् आह) ( उक्थं वाचि इन्द्राय देवेभ्यः ) स्तोत्र [ मेरी ] वाणी में इन्द्र [ परमेश्वर ] को दिव्य गुणों के पाने के लिये हैं— स्तोत्र पढ़कर यह नौ अक्षर वाला वाक्य [ होता ] बोलता है। (ओम् उ॒क्थशाः--इति अध्वर्युः त्र्यक्षरं प्रतिगृणाति ) ( ओम् उक्थशाः ) हां ! तू स्तुति पढ़ने वाला हो-अध्वर्यु इस तीन अक्षर वाले वाक्य को उत्तर में बोलता है [ इस वाक्य में एक स्वर के लोप से तीन अक्षर माने हैं, ऊपर चार अक्षर कह आये हैं ] । ( तत् द्वादशाक्षरं सम्पद्यते ) इससे बारह अक्षर वाला वाक्य बनता है। ( द्वादशाक्षरा वै जगती, जगतीम् एव एतत् उभयतः तृतीयसवने अचीक्लृपताम् इति ) बारह अक्षर वाला ही जगती छन्द है, जगती [जगत् का उपकार करने वाली वेद विद्या ] को ही इस से दोनों ओर [ स्तुति के आदि और अन्त में ] तृतीय सवन के बीच उन दोनों [ होता और अध्वर्यु ] ने ठहराया है ॥ ( एतत् वै तच्छन्दः छन्दसि प्रतिष्ठापयति, देवविशः एव कल्पयति, यः एवं वेद ) इस से ही वह [ यजमान ] छन्द [ वेद ] को छन्द [ वेद के आधार परमात्मा ] में स्थापित करता है और देवताओं की प्रजाओं की भी कल्पना करता है, जो ऐसा जानता है। आवां स्तुवः ( दैव ) देव--अञ् स्वार्थे। हे देव। विद्वन् ( प्रतिगृणाति ) प्रत्युत्तरं ब्रूते ( सम्पद्यते ) सम्यक् प्राप्नोति (पुरस्तात् ) आदौ। आरम्भे (अचीक्लृपताम् ) तौ कल्पितवन्तौ (उक्थम् ) शंसनम् । स्तोत्रम् (वाचि ) मम वाचि वर्तते ( शस्त्वा ) स्तोत्रं पठित्वा ( उक्थशाः) गो० उ० ३ । ६ । मन्त्रशंसिनः (उभयतः) स्तोत्रस्य
कण्डिका ११ ॥
३८२ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ३ । क० ११ ( तद् अपि एषा अभ्यनूक्ता—यद् गायत्रे अधि गायत्रम् आहितम् इति ) इससे ही यह बहुत अनुकूल ऋचा कही गयी है—यद् गायत्रे अधि गायत्रम् आहितम्, इत्यादि—अथर्व० ६ । १० । १ ॥ १० ॥ भावार्थ :—मनुष्यों को यथोचित वाक्यों द्वारा पदार्थों के गुणों के यथावत् ज्ञान और उपयोग से परमेश्वर की भक्ति के साथ आनन्द भोगना चाहिये ॥ १० ॥ विशेष: १—इस कण्डिका को ऐतरेय ब्राह्मण ३ । १२ से मिलाओ ॥ विशेष: २—(छन्दसि) के स्थान पर ( छन्दश्छन्दसि) और (उभयः) के स्थान पर ( उभयतः) ऐ० ब्रा० और इसी कण्डिका के दूसरे स्थल से शुद्ध किया है ॥ विशेष: ३—( यद्गायत्रे अधि...... ) यह मन्त्र अर्थ सहित लिखा जाता है ॥ यद् गायत्रे अधि गायत्रमाहितं त्रैष्टुभं वा त्रैष्टुभाग्निरतक्षत । यद् वा जगज्ज- गत्याहितं पदं य इत् तद् विदुस्ते अमृतत्वमानशुः—अथर्व० ६ । १० । १, ऋग्० १ । १६४ । २३ ॥ (यत्) क्योंकि (गायत्रम्) गायत्र [स्तुति करने वालों का रक्षक ब्रह्म] (गायत्रे) गायत्र [स्तुति योग्य गुण] में (अधि) ऐश्वर्य के साथ (आहितम्) स्थापित है, (वा) और (त्रैष्टुभम्) त्रैष्टुभ [तीन सत्त्व, रज और तम के बन्धन वाले जगत्] को (त्रैष्टुभात्) त्रैष्टुभ [तीन कर्म, उपासना और ज्ञान से पूजित ब्रह्म] से (निरतक्षत) उन्होंने [ऋषियों ने] पृथक् किया है। (वा) और (यत्) क्योंकि (जगत्) जगत् [जानने योग्य] (पदम्) पद [पाने योग्य मोक्ष पद] (जगति) जगत् [संसार] के भीतर (आहितम्) स्थापित है, (ये इत्) जो ही [पुरुष] (तत्) उस [ब्रह्म] को (विदुः) जानते हैं, (ते) उन्होंने (अमृतत्वम्) अमरपन (आनशुः) पाया है ॥ कण्डिका ११ ॥ अथैतन्नानाच्छन्दां-यन्तरेण गर्त्ता इव । अथैते श्रविष्ठे बलिष्ठे नान्तरे देवते१ ताभ्यां प्रतिपद्यते, तद्गर्तं कन्दं रोहस्य रूपं स्वं२ग्यँ तदनवा३नं सङ्क्रामेत् । अमृतं वै प्रणवः, अमृतेनैव तत् मृत्युं तरति । तद्यथा मन्त्रेण वा वंशेन वा गर्तं सङ्क्रामेत्, एवं तत् प्रणवेनोपसन्तनोति । ब्रह्म ह वै प्रणवः, ब्रह्मणैवास्मै तद् ब्रह्मोपसन्तनोति । शुद्धः प्रणवः स्यात् प्रजाकामानां मकारान्तः । प्रतिष्ठाकामानां मकारान्तः प्रणवः स्यादिति हैक आहुः । शुद्ध इति त्वेव स्थितो मीमांसितः प्रणवः । अथात इह शुद्ध इह पूर्ण इति, शुद्धः प्रणवः स्याच्छस्त्रानुवचनयोर्मध्य इति, ह स्माह कौषीतकिः । तथा संहितं भवति पुरस्तात् पश्चाच्च (शंशिसाव) आवां शंसाव स्तवाव (अभ्यनूक्ता) अभितः आनुकूल्येनोक्ता कथिता (यत्) यस्मात् कारणात् (गायत्रे) अमिनक्षियजि० (उ० ३ । १०५) गै गाने—अत्रन् युक् च । गायत्रं गायतेः स्तुतिकर्मणः—निरु० १ । ८ । स्तुत्ये गुणे (अधि) ऐश्वर्ये (गायत्रम्) गै गाने--शत् + त्रैङ् पालने--कः, तलोपः । गायतां रक्षकं ब्रह्म (आहितम्) धृतम् ॥ १. पू. सं. 'णवते' इति पाठः ॥ २. पू. सं. 'स्वर्गम्' इति पाठः ॥ ३. पू. सं. 'तदनु वा न' इति पाठः ॥ सम्पा० ॥
कण्डिका ११ ॥ छन्दों के साथ प्रणव का सम्बन्ध और व्याख्यान ॥
गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ३ । क० ११ ३८३ मकारान्तोऽवसानार्थै । प्रतिष्ठा वा अवसानं, प्रतिष्ठित्या एव । अथोभयोः कामयोराप्त्या एतौ वै छन्दः प्रवाहावरं छन्दः परञ्छन्दोऽतिप्रवहतः, तस्यायुर्न हिनस्ति, छन्दसां छन्दोऽतिप्रौढं स्यात्, यत्रैव यं द्विष्यातं मनसा प्रैव विध्येन्छन्दसां क्रन्दत्रे द्रवति वाचं वा शीर्य्यत इति । त्रिः प्रथमां त्रिरुत्तमामन्वाह, यज्ञस्यैव तद्बर्हिषौ नह्यति, स्थेम्ने बलाया- विस्रंसाय । यद्यपि छन्दः प्रातःसवने युज्येतार्द्धर्चश एव तस्य शंस्यं गायत्र्या रूपेण । अथो प्रातःसवनरूपेणेति, न त्रिष्टुब्जगत्यावेत्तस्मिन् स्थानेऽर्द्धर्चशस्ये यत् किञ्चिच्छन्दः प्रातःसवने युज्येतां पच्छ एवैनयोः शस्यमिति सा स्थितिः ॥ ११ ॥ कण्डिका ११ ॥ छन्दों के साथ प्रणव का सम्बन्ध और व्याख्यान ॥ (अथ एतत् नाना च्छन्दांसि अन्तरेण गर्ताः इव) फिर यह अनेक छन्द [पूर्व कण्डिका में कहे हुये] एक दूसरे के बीच गर्तों [गड्ढों] के समान हैं। (अथ एते अविष्ठे बलिष्ठे) फिर यह दोनों [दो प्रकार के छन्द पूर्व कण्डिका में कहे हुये] अति विख्यात और अति बलवान् हैं। ('नान्तरे देवते ताभ्यां प्रतिपद्यते) अभिन्न देवता हैं, उन दोनों [दो प्रकार के छन्दों] से समझा जाता है। (तत् गर्तस्कन्दं रोहस्य रूपं स्वर्ग्यं तदनवानं सङ्क्रामेत्) उससे गर्त [गड्ढा वा भूमिच्छिद्र] को प्राप्त होके अङ्कुर के रूप स्वर्ग को उसके अनुकूल निश्चय करके अब वह [पुरुष] अच्छे प्रकार प्राप्त करे। (अमृतं वै प्रणवः, अमृतेन एव तत् मृत्युं तरति) अमृत [अविनाशी] ही प्रणव [स्तुति योग्य ओम्] है, अमृत [अविनाशी ओम्] के साथ ही तब वह मृत्यु को पार करता है। (तत् यथा मन्त्रेण वा वंशेन वा गर्तं सङ्क्रामेत्, एवं तत् प्रणवेन उपसन्तनोति) सो जैसे मन्त्र [विचार] द्वारा अथवा बांस द्वारा गड्ढे को अच्छे प्रकार प्राप्त करे, वैसे ही तत्त्व को प्रणव द्वारा वह अच्छे प्रकार फैलाता है। (ब्रह्म ह वै प्रणवः, ब्रह्मणा एव अस्मै तत् ब्रह्म उपसन्तनोति) ब्रह्म [सब से बड़ा] ही निश्चय करके प्रणव है, ब्रह्म के द्वारा ही इस [संसार] के लिये उस ब्रह्मज्ञान को मनुष्य अच्छे प्रकार फैलाता है। (प्रजाकामानां प्रणवः शुद्धः मकारान्तः स्यात्, प्रतिष्ठाकामानां प्रणवः मकारान्तः स्यात् इति ह एके आहुः) प्रजा चाहने वालों ११-(अन्तरेण) परस्परमध्ये (गर्ताः) हसृमृग्रिण्वमि० (उ० ३।८६) गॄ निगरणे-तन्। भूमिच्छिद्राणि (अविष्ठे) श्रु श्रवणे-अप्, श्रवः-मतुप्, इष्ठन्, मतुपो लुक्। अतिशयेन प्रसिद्धे (नान्तरे) अनन्तरे। अभेदे (ताभ्याम्) द्विप्रकाराभ्यां छन्दोभ्याम् (गर्तस्कन्दम्) गर्त+स्कन्दिङ्गतिशोषणयोः-णमुल्। गर्तं स्कत्त्वा प्राप्य (रोहस्य) अङ्कुरस्य (न) सम्प्रति (सङ्क्रामेत्) सम्यक् प्राप्नुयात् (अमृतम्) १. नान्तरे देवते से लेकर तदनवानम् तक पूर्व संस्करण का मूल कण्डिका का पाठ अत्यन्त भ्रष्ट होने के कारण भाष्य भी असङ्गत हो गया है। पाठ हमने शोधा है। वाक्य का भाव इस प्रकार है-"जो गायत्री एवं जगती छन्दों के पादों में ४-४ अक्षरों का भेद है मानों गायत्री छन्द का पाद गड्ढे का किनारा है और जगती में ४ अक्षरों की अधिकता मानों (रोहस्य रूपम् स्वर्ग्यम्) चढ़ाई का स्वर्ग का रूप है ! (तत् अनवानम्) उस पाद को बिना श्वास तोड़े एक साथ बोलना चाहिये ॥ पहिले दशम कण्डिका में गाय.ो एवं जगती छन्दों का प्रकरण आया था, उसी का यहाँ पुनः वर्णन है ॥ सम्पा० ॥
३८४ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ३ । क० ११ का प्रणव [ओम्] शुद्ध मकारान्त है, और प्रतिष्ठा चाहने वालों का प्रणव मकारान्त है—ऐसा कोई कोई कहते हैं । ( शुद्धः प्रणवः इति तु एव स्थितः मीमांसितः ) प्रणव शुद्ध है—यह जो स्थिर तत्त्व से निर्णय किया हुआ [ सिद्धान्त ] है । ( अथ अतः इह शुद्धः इह पूर्णः इति शुद्धः प्रणवः शस्त्रानुवचनयोः मध्ये स्यात् इति ह स्म कौषीतकिः आह ) फिर इस कारण से कि—वह यहाँ शुद्ध है, वह यहाँ पूर्ण है—वह शुद्ध प्रणव दोनों स्तोत्र और व्याख्यान के बीच में है—ऐसा कौषीतकि [ तत्त्व परीक्षक का पुत्र ऋषि ] कहता है । ( तथा संहितं भवति मकारान्तः अवसानार्थे ) इस प्रकार से यह संगत होता है—मकारान्त [ ओम् ] सीमा वा ठहराव के लिये है। ( प्रतिष्ठा वै अवसानं प्रतिष्ठित्थै एव ) प्रतिष्ठा [ठहराव] ही सीमा है, वह [ ओम् ] प्रतिष्ठा के लिये ही है । ( अथ उभयोः कामयोः आप्त्यै एतौ वै छन्दःप्रवाहौ अरं छन्दः परं छन्दः अतिप्रवहतः ) फिर [ प्रजा और प्रतिष्ठा की ] दोनों कामनाओं की प्राप्ति के लिये यह दोनों छन्द प्रवाह अरं छन्द और परं छन्द [ अर्थात् पर्याप्त छन्द और श्रेष्ठ छन्द ] अत्यन्त करके बहते रहते हैं । ( तस्य आयुः न हिनस्ति, छन्दसां छन्दः अतिप्रौढं स्यात् ) उस के आयु को वह नहीं नाश करता [ जिसका ] छन्द [ वेद ज्ञान ] छन्दों के बीच अति पुष्ट होवे । ( यत्र एव यं द्विष्यात् तं मनसा एव प्र विध्येत् ) जहां पर ही जिससे द्वेष करे, उसको मनन से ही छेद डाले । ( छन्दसां क्रन्दत्रे वाचं द्रवति वा शीर्यते इति ) छन्दों के बोलने वाले के लिये वह [ शत्रु अपनी ] वाणी पिघला देता है वा [ आप ] नष्ट हो जाता है । ( त्रिः प्रथमां त्रिः उत्तमाम् अन्वाह तत् बर्हिसो यज्ञस्य एव स्थेम्ने बलाय अविस्त्रंसाय नह्यति ) वह तीन बार पहिली [ ऋचा ] और तीन बार सबसे पिछली [ ऋचा ] पढ़ता है और उससे दो वृद्धि- कारक व्यवहारों [ प्रजा कामना और प्रतिष्ठा कामना, अथवा दो कुशाओं ] को यज्ञ की स्थिरता के लिये, बल के लिये और अविनाश के लिए नियत करता है । ( यद्यपि प्रात - सवने अर्धर्चशः एव तस्य शंस्यं छन्दः गायत्र्याः रूपेण युज्येत, अथो प्रातःपवन- रूपेण इति ) यद्यपि प्रातःसवन में आधी आधी ऋचाओं से ही उस का बोलने योग्य छन्द गायत्री के रूप से बोला जावे और प्रातःसवन के रूप से भी । ( त्रिष्टुब्जगत्यौ एतस्मिन् स्थाने अर्धर्चशस्ये न युज्येताम् यत् किञ्चित् छन्दः प्रातःसवने ) त्रिष्टुप् और जगती छन्द इस स्थान पर आधी आधी ऋचाओं के बोलने में न बोले जावें, जो कुछ छन्द प्रातः- सवन में [ होवे वह ही बोला जावे ] । ( पच्छः एव एनयोः शस्यम् इति सा
अविनाशि ब्रह्म ( मन्त्रेण ) विचारेण ( वंशेन ) तृणजातिभेदेन ( मीमांसितः ) तत्त्वेन निर्णीतः ( शस्त्रानुवचनयोः ) स्तोत्रव्याख्यानयोः ( कौषीतकिः ) कुसेरुन्मोमेदेताः ( उ० ४ । १०६ ) कुष निष्कर्षे—इतः, स्वार्थे—कन् दीर्घश्च । कुषीतक—इञ् अपत्यार्थे । कुषीतकस्य तत्त्वनिष्कर्षकस्य पुत्रः । ऋषिविशेषः ( संहितम् ) संगतम् ( अवसानम् ) विरामः । सीमा ( अरम् ) अलम् । पर्याप्तम् ( परम् ) श्रेष्ठम् ( अतिप्रौढम् ) अति प्रवृद्धम् ( क्रन्दत्रे ) कथयित्रे ( द्रवति ) रसीभूतां नग्ना करोति ( बर्हिसो ) वृद्धिभ्य- हारौ । कुशौ ( स्थेम्ने ) स्थिर—इमनिच् । स्थिरतायै ( अविस्त्रंसाय ) अविध्वं- साय .( अर्धर्चशः ) अर्धर्चप्रयोगेण ( शंस्यं, शस्यम् ) शंसु कथने—क्यप् ।
कण्डिका १२ ॥
गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ३। क० १२ ३८५ स्थितिः) पाद पाद करके ही इन दोनों [ त्रिष्टुप् और जगती ] का कथन होवे-यह मर्यादा है ॥ ११ ॥ भावार्थः—प्रणव वा ओम् सर्वनियन्ता और सर्वरक्षक है। जहाँ जहां मन्त्र में अवसान अर्थात् विराम किया जावे, वहाँ ओम् शब्द बोला जावे ॥ ११ ॥ विशेषः—इस कण्डिका का अर्थ और अधिक विचारणीय है। प्रणव वा ओम् के लिये माण्डूक्योपनिषद् और यही गो० ब्रा० पू० १। १६–२८ देखो ॥ कण्डिका १२ ॥ अथात एकाहस्य प्रातःसवनम् । प्रजापतिं ह वै यज्ञं तन्वानं बहिष्पवमान एव मृत्युः मृत्युपाशेन प्रत्युपाक्रामत् । स आग्नेय्या गायत्र्याज्यं प्रत्यपद्यत । मृत्युर्वाव तं पश्यत् प्रजापतिं पर्य्यक्रामत् । तं साम्राज्येष्ठ सीदत् । स वायव्या प्रउगं प्रत्यपद्यत । मृत्युर्वाव तं पश्यत् प्रजापतिं पर्य्यक्रामत् । तं माध्यन्दिने पवमानेऽसीदत् । स ऐन्द्र्या त्रिष्टुभा मरुत्वतीयं प्रत्यपद्यत । मृत्युर्वाव तं पश्यत् प्रजापतिं पर्य्यक्रामत् । स तेनैव द्रविणे पूर्वो निष्केवल्यस्य स्तोत्रियमासीदत्, तमस्तृणोत् । तस्मादु य एव पूर्वमासीदति, स तत् स्तृणुते । विद्वान् मृत्युरनवका- शमपादद्रवत्, अश्रंष्ठसत, इतरो निष्केवल्यम् । तस्मादेकमेवोक्थं होता मरुत्वतीयेन प्रतिपद्यते । निष्केवल्यमेवात्र हि प्रजापतिं मृत्युर्व्यजहात् ॥ १२ ॥ कण्डिका १२ ॥ एकाह यज्ञ के प्रातःसवन में प्रजापति मृत्यु को स्तोत्रों द्वारा भगाता है ॥ ( अथ अतः एकाहस्य प्रातःसवनम् ) अब यहां एकाह [ एक दिन वाले ] यज्ञ का प्रातःसवनं [ कहा जाता है ] । ( यज्ञं तन्वानं प्रजापतिं ह वै बहिष्पवमाने एव मृत्युःमृत्युपाशेन प्रत्युपाक्रामत ) यज्ञ फैलाते हुये प्रजापति पर वहिष्पवमान स्तोत्र [ जैसे—उपास्मै गायता नरः......साम उ० १। १। तृच १-३ वा ६ मन्त्र ] पर ही मृत्यु [ विघ्न ] ने मृत्युपाश से धावा किया। ( सः आग्नेय्या गायत्र्या आज्यं प्रत्यपद्यत ) उस [ प्रजापति ] ने आग्नेयी गायत्री से [ अग्नि देवता वाले गायत्री छन्द से, जैसे—अग्निं दूतं वृणीमहे......ऋग्० १। १२। १-१२, अथवा—समिधाग्निं दुवस्यत...... यजु० ३। १-३ ] आज्य [ उस गायत्री छन्द से घृत, इस नाम वाले स्तोत्र ] को आरम्भ किया। ( मृत्युः वाव तं प्रजापतिं पश्यत् पर्य्यक्रामत् ) मृत्यु ने उस प्रजापति को देखा और [ उस पर ] धावा किया। ( तं साम्राज्येष्ठ सीदत् ) उस [ प्रजापति ] को साम्राज्येष्ठ कथनीयम् । कथनम् ( पच्छः ) पद्-शः । पादशः । पादेन पादेन ( स्थितिः ) मर्यादा ॥ १२—( तन्वानम् ) विस्तारयन्तम् ( बहिष्पवमाने ) एतन्नामके स्तोत्रे ( प्रत्युपाक्रामत ) प्रातिकूल्येन आक्रान्तवान् ( आज्यम् ) एतन्नामकं स्तोत्रम् (पश्यत्) अपश्यत् (पर्य्यक्रामत् ) आक्रान्तवान् ( साम्राज्येष्ठ ) सामज्येष्ठे । एतन्नामके स्तोत्रे ( सीदत् ) असीदत् । प्राप्नोत् ( प्रउगम् ) प्र+युजिर् योगे—अच्, पृषोदरादिरूपम् । २५
३८६ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ३ क० १२ ॥ [ बृहत्साम नाम वाले स्तोत्र ] में उस [ मृत्यु ] ने पाया । ( सः वायव्या प्रउगं प्रत्य- पद्यत ) उस [ प्रजापति ] ने वायवी से [ वायु देवता वाले गायत्री छन्द से, जैसे—वायवा याहि दर्शतेमे・・・・・・ऋग्० १ । २ । १—३ ] प्रउग [ उस गायत्री छन्द से प्रयोग योग्य, इस नाम वाला स्तोत्र ] को आरम्भ किया । ( मृत्युः वाव तं प्रजापतिं पश्यत् पर्य्यक्रामत् ) मृत्यु ने उस प्रजापति को देखा और [ उस पर ] धावा किया । ( तं माध्यन्दिने पवमाने असीदत् ) उस [ प्रजापति ] को माध्यन्दिनं पवमान [ इस नाम वाले स्तोत्र ] में उसने पाया । ( सः ऐन्द्र्या त्रिष्टुभा मरुत्वतीयं प्रत्यपद्यत ) उस [ प्रजापति ] ने ऐन्द्री त्रिष्टुप् से [ इन्द्र देवता वाले त्रिष्टुप् छन्द से, जैसे—इन्द्रस्य नु वीर्याणि प्र वोचम्・・・・・・ऋग्० १ । ३२ । १—१५ ] मरुत्वतीय [ मरुतों अर्थात् झोकों से युक्त मरुत्वान् इन्द्र अर्थात् वायु वा बिजुली देवता वाले स्तोत्र ] को आरम्भ किया । ( मृत्युः वाव तं प्रजापतिं पश्यत् पर्य्यक्रामत् ) मृत्यु ने उस प्रजापति को देखा और [ उस पर ] धावा किया । ( सः पूर्वः तेन एव द्रविणे निष्केवल्यस्य स्तोत्रियम् आसीदत् तम् अस्तृणोत् ) उस [प्रजापति] ने पहिले होकर उस [ मरुत्वतीय स्तोत्र ] से ही द्रविण [ नाम वाले यज्ञ भाग ] में निष्केवल्य [ नाम वाले स्तोत्र ] के स्तोत्रिय [ नाम वाले स्तोत्र भाग ] को पाया और उस [ मृत्यु ] को ढक दिया । ( तस्मात् उ यः एव पूर्वम् आसीदति, सः तत् स्तृणुते ) इसलिये जो ही पुरुष पहिले पहुँचता है, वह उस [ मृत्यु ] को ढक देता है। (मृत्युः अनवकाशं विद्वान् अपाद्रवत्, इतरः निष्केवल्यम् अशंसत् ) मृत्यु अनवसर जानता हुआ भाग गया, दूसरे [ प्रजापति ] ने निष्केवल्य स्तोत्र पढ़ा । ( तस्मात् एकम् एव उक्थं होता मरुत्वतीयेन प्रतिपद्यते ) इसलिये एक ही उक्थ [ कहने योग्य स्तोत्र ] को होता मरुत्वतीय स्तोत्र से आरम्भ करता है। ( निष्केवल्यम् एव अत्र हि प्रजापतिं मृत्यु. व्यजहात् ) निष्केवल्य स्तोत्र से ही यहाँ प्रजापति को मृत्यु ने छोड़ दिया है ॥ १२ ॥ भावार्थः—जैसे पहिले से विचार के साथ विघ्नों को हटा कर अग्नि प्रज्वलित कर- के यज्ञ सिद्ध करते हैं, वैसे ही मनुष्य प्रत्येक कार्य्य को पहिले से विचार कर प्रयत्न के साथ पूरा करें ॥ १२ ॥ विशेषः १—इस कण्डिका के कुछ २ अंश के लिये ऐतरेय ब्राह्मण ३ । १४ देखो ॥ विशेषः २—सङ्केतित मन्त्र वेद में देखो ॥ प्रउगं । प्रयोग र्हम् । एतन्नामकं स्तोत्रम् (प्रत्यपद्यत ) प्रारब्धवान् ( मरुत्वतीयम् ) द्यावापृथिवीशुनासीरमरुत्वदग्नीषोम० ( पा० ४ । २ । ३२ ) मरुत्वत्—छ, अस्य देवता इत्यर्थे । मरुत्वान् इन्द्रो देवता यस्य तत् स्तोत्रम् ( द्रविणे ) बले—निघ० २ । ६ । घने--निघ० २ । १० । एतन्नामके यज्ञभागे ( निष्केवल्यस्य ) एतन्नामकस्य स्तोत्रस्य ( स्तोत्रियम् ) स्तोत्र--घः । एतन्नामकं स्तोत्रभागम् ( अस्तृणोत् ) आच्छादितवान् ( विद्वान् ) जानन् ( अनवकाशम् ) अनवसरम् (-अपाद्रवत् ) दूरमगच्छत् ( अशंसत् ) स्तुतवान् ( प्रतिपद्यते ) आरभते ( निष्केवल्यम् ) निष्केवल्येन ( व्यजहात् ) विशेषेण त्यक्तवान् ॥
कण्डिका १३ ॥
गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ३ । क० १३ ३८७ कण्डिका १३ ॥ मित्रावरुणावब्रवीद्, युवं न इमं यज्ञस्याङ्गमनुसमाहरतं मैत्रावरुणीयाम् । तथेत्यब्रूताम् । तो सयुजौ सबलौ भूत्वा प्रासहा मृत्युमत्येताम् । तो हास्यैतद्यज्ञ- स्याङ्गमनुसमाहरतां मैत्रावरुणीयाम् । तस्मात् मैत्रावरुणः प्रातःसवने मैत्रावरु- णानि शंसति । तौ हास्यैतद्यज्ञस्याङ्गमनुसमाहरताम् । यद्देव मैत्रावरुणानि शंसति, प्रति वां सूर उदिते विधेम नमोभिर्मित्रावरुणोत हव्यैः । उत वामुषसो बुधिः माकं सूर्य्यस्य रश्मिभिरिति ऋचाभ्यनूक्तम् । मा नो मित्रावरुणा नो गन्तं रिशादसेति, मैत्रावरुणस्य स्तोत्रियानुरूपौ । प्र वो मित्राय गायतेति उक्थमुखम् । प्र मित्र- योर्वरुणयोरिति पर्यासः । आयातं मित्रावरुणेति यजति । एते एव तद् देवते यथाभागं प्रीणाति वषट्कृत्यानुवषट्करोति । प्रत्येवाभिमृशन्ते नाप्याययन्ति न ह्यानाराशंसाः सीदन्ति ॥ १३ ॥ कण्डिका १३ ॥ प्रातःसवन में मैत्रावरुण द्वारा मित्र और वरुण की स्तुति ॥ ( मित्रावरुणौ अब्रवीत्, युवं नः यज्ञस्य इमम् अङ्गं मैत्रावरुणीयाम् अनु- समाहरतम् ) वह [ यजमान ] मित्र और वरुण [ हितकारक और उत्तम आचरण वाले दोनों पुरुषों ] के विषय में [ ब्रह्मा और होता से ] बोला—तुम दोनों हमारे यज्ञ के इस अङ्ग को मित्र और वरुण वाली [ स्तुति ] से अनुकूलता के साथ समाप्त करो । ( तथा इति अब्रूताम् ) ऐसा ही हो—वे दोनों [ ब्रह्मा और होता ] बोले । ( तौ सयुजौ सबलौ प्रासहऽ भूत्वा मृत्युम् अति ऐताम् ) [ -और ] वे दोनों [ मित्र और वरुण ] समान योग [ मेल ] वाले, समान बल वाले और विजयी होकर मृत्यु को लांघकर चले हैं । ( तो हि अस्य यज्ञस्य एतत् अङ्गं मैत्रावरुणीयाम् अनुसमाहरताम् ) उन दोनों ने ही इस यज्ञ के इस अङ्ग को मित्र और वरुण वाली [ स्तुति ] से अनुकूलता के साथ समाप्त किया है । ( तस्मात् मैत्रावरुणः प्रातःसवने मैत्रावरुणानि शंसति ) इसलिये मैत्रावरुण [ मित्र और वरुण की स्तुति करने वाला ऋत्विज् ] प्रातःसवन में मित्र और वरुण वाले [ स्तोत्र ] बोलता है । ( तौ हि अस्य यज्ञस्य एतत् अङ्गम् अनुसमाहरताम् ) वे दोनों [ मित्र और वरुण ] ही इस यज्ञ के इस अङ्ग को अनुकूलता से पूरा करें । ( यत् उ एव मैत्रा- वरुणानि शंसति, मित्रावरुणा वां सूरे उदिते नमोभिः उत हव्यैः प्रति विधेम उत १३--( मित्रावरुणौ ) हितकरं च श्रेष्ठं च पुरुषम् ( अब्रवीत् ) द्विकर्मकः । अकथयत् ( युवम् ) युवाम् ( अनुसमाहरतम् ) अनुकूलतया समापयतम् ( मैत्रा- वरुणीयाम् ) मित्रवरुणसम्बन्धिनीं स्तुतिम् ( सयुजौ ) युजिर् योगे - क्विप् । समानं युञ्जानौ ( सबलौ ) समानबलवन्तौ ( प्रासहा ) प्र+षह मर्षणे अभिभवे च--अच्, आर्षो दीर्घः, विभक्तेराकारः । प्रकर्षेण जेतारौ ( अति ) अतीत्य । उल्लङ्घ्य ( प्रति ) प्रत्यक्षेण ( सूरे ) सूर्य्ये ( उदिते ) उद्गते ( विधेम ) पूजयेम
३८८ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ३ । क० १३ ॥ वाम् उषसः बुधिः सूर्यस्य रश्मिभिः साकम्--इति ऋचा अभ्यनूक्तम् ) क्योंकि वह ही [ मैत्रावरुण ] मित्र और वरुण वाले स्तोत्र [ इस प्रकार ] पढ़ता है--हे मित्र और वरुण ! [ हितकारक और उत्तम आचरण वाले पुरुषो ] तुम दोनों को सूर्य के उदय होने पर सत्कारों और ग्रहण करने योग्य अन्नों से प्रत्यक्ष करके हम पूजें, और तुम दोनों को प्रभात वेला के ज्ञान में सूर्य की किरणों के साथ [ हम पूजें ]—यह इस ऋचा [ ब्राह्मण वचन ] करके अनुकूल कहा गया है । ( रिशादसा मित्रावरुणा मा, नः नः गन्तम्, इति मैत्रावरुणस्य स्तोत्रियानुरूपौ ) हे दुःख के नाश करने वाले मित्र और वरुण [ हितकारक और उत्तम आचरण वाले पुरुषो ] तुम दोनों मत [ जाओ ], हमको हमको प्राप्त हो-- यह [ और पहिला ब्राह्मण वचन ] मैत्रावरुण के स्तोत्र के अनुरूप दो [ मन्त्र ] हैं । ( प्र वो मित्राय गायत--इति उक्थमुखम्, प्र मित्रयोर्वरुणयोः, इति पर्यासः, आ यातं मित्रावरुणा--इति यजति ) प्र वो मित्राय गायत--ऋग्० ५ । ६८ । १, यह उक्थ यज्ञ का आरम्भ है, प्र मित्रयोर्वरुणयोः-ऋग्० ७ । ६६ । १, यह अन्त है, आ यातं मित्रावरुणा-- ऋग्० ७ । ६६ । १६, इससे वह यज्ञ करता है । ( एते एव देवते तत् यथाभागं प्रीणाति, वषट्कृत्य अनुवषट्करोति ) इन ही दोनों देवताओं को उससे अपने अपने भाग के अनुसार वह प्रसन्न करता है, और वषट्कार करके अनुवषट्कार [ अन्तिम आहुति दान ] करता है । ( प्रति एव अभिमृशन्ते, अनाराशंसाः न आप्याययन्ति न हि सीदन्ति ) वे [ ऋषि लोग ] प्रत्यक्ष ही विचारते हैं--नरों की स्तुति रहित यज्ञ न बढ़ाते हैं और नहीं चलते हैं [ नहीं बढ़ते हैं ] ॥ १३ ॥ भावार्थः—चतुर मनुष्य विद्वानों की स्तुति उनके गुणों के अनुकूल करते हैं, उससे संसार में आनन्द बढ़ता है ॥ १३ ॥ विशेषः—प्रतीक वाले मन्त्र अर्थ सहित लिखे जाते हैं । १—प्र वो मित्राय गायत वरुणाय विपा गिरा । महिक्षत्रावृतं बृहत्--ऋग्० ५ । ६८ । १ ॥ [ हे विद्वानों ] ( वः ) अपने लिये ( विपा गिरा ) प्रेरित [ वेद ] वाणी से ( मित्राय ) मित्र [ हितकारक ] और ( वरुणाय ) वरुण [ उत्तम आचरण वाले पुरुष ] की ( प्र गायत ) अच्छे प्रकार बड़ाई करो । ( महिक्षत्रौ ) वे दोनों बड़े हानि से बचाने वाले ( बृहत् ) बड़े ( ऋतम् ) सत्य नियम रूप हैं ॥ ( नमोभिः ) सत्कारैः ( उत ) च ( हव्यैः ) ग्राह्यैरन्नैः ( बुधिः ) भुवः कित् ( उ० २ । ११२ ) बुध अवगमने--इसिन्, विभक्तेर्लुक् । बुधिसि । बोधे ( मा ) निषेधे ( मा गन्तम् ) मा गच्छतम् ( नः ) अस्मान् ( रिशादसा ) शत्रुनाशकौ ( पर्यासः ) परि उपरमे + अस सत्तायां--घञ् । समाप्तिः । अन्तः ( अभिमृशन्ते ) सर्वतो विचारयन्ति ऋषयः ( न ) निषेधे ( आप्याययन्ति ) वर्धयन्ति ( अनाराशंसाः ) नञ् + नृ नये--अच् + शंसु हिंसायां स्तुतौ कथने च--घञ् । नराः नेतारः शस्यन्ते प्रशस्यन्ते यत्र स नराशंसः, नराशंसः एव नाराशंसः । नराणां प्रशंसारहितो यज्ञः ( सीदन्ति ) गच्छन्ति । प्रवर्त्तन्ते ॥
कण्डिका १४ ॥
गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ३ । क० १४ ॥ ३८१ २—प्र मित्रयोर्वरुणयोः स्तोमो न एतु शूष्यः । नमस्वान् तुविजातयोः—ऋग्० ७ । ६६ । १५ ॥ (तुविजातयोः) बहुत प्रसिद्ध (मित्रयोः, वरुणयोः) मित्र और वरुण [हितकारक और श्रेष्ठ आचरण वाले] दोनों को (नः) हमारा (शूष्यः) सुख देने वाला और (नमस्वान्) उत्तम अन्नों वाला (स्तोमः) स्तुति योग्य व्यवहार (प्र एतु) अच्छे प्रकार प्राप्त हो ॥ ३—आ यातं मित्रावरुणा जुषाणावाहूतिं नरा। पातं सोममृतावृधा—ऋग्० ७ । ६६ । १६ ॥ (नरा) हे दोनों नरो ! [नेताओं] (मित्रावरुणा) मित्र और वरुण ! [हितकारक और उत्तम आचरण वाले पुरुषों] (आहुतिम्) आहुति [भेंट] को (जुषाणौ) सेवन करते हुये (आ यातम्) आओ, (ऋतावृधा) हे सत्य नियम बढ़ाने वाले दोनों (सोमम्) सोम [तत्त्व रस] की (पातम्) रक्षा करो ॥ कण्डिका १४ ॥ इन्द्रमब्रवीत्, त्वं न इमं यज्ञस्याङ्गमनुसमाहर¹ ब्राह्मणाच्छंसीयाम्। केन सहेति। सूर्य्येणेति। तथेत्यब्रूताम्। तौ सयुजौ सबलौ भूत्वा प्रासहा मृत्युमत्यैताम्। तौ ह्यस्यैतद्यज्ञस्याङ्गमनुसमाहरतां ब्राह्मणाच्छंसीयाम्। तस्माद् ब्राह्मणाच्छंसी प्रातःसवन ऐन्द्राणि सूर्य्याण्यङ्गानि शंसति। तौ ह्यस्यैतद्यज्ञस्याङ्गमनुसमाहरताम्। यद्वेव ऐन्द्राणि सूर्य्याण्यङ्गानि शंसति, इन्द्र पिब प्रतिकामं सुतस्य प्रातःसावस्तव हि पूर्वपीतिरिति ऋचाभ्यनूक्तम्। आ याहि सुषुमा हि त आ नो याहि सुतावत इति ब्राह्मणाच्छंसिन स्तोत्रियानुरूपौ। अयमु त्वा विचर्षण इति उक्थमुखम्। उद् घेदभिश्रुतामघमिति पर्य्यासः। इन्द्र ऋतुविदमिति यजति। एते एव तद् देवते यथाभागं प्रीणाति, वषट्कृत्यानुवषट् करोति। प्रत्येवाभिमृशन्ते, नाप्याययन्ति न ह्वानाराशंस्याः सीदन्ति ॥ १४ ॥ कण्डिका १४ ॥ प्रातः सवन में ब्राह्मणाच्छंसी द्वारा इन्द्र॑ और सूर्य की स्तुति ॥ (इन्द्रम् अब्रवीत्, त्वं नः यज्ञस्य इमम् अङ्गं ब्राह्मणाच्छंसीयाम् अनुसमाहर) वह [यजमान] इन्द्र [बड़े ऐश्वर्य वाले पुरुष] के विषय में [ब्रह्मा और होता से] बोला—तू [तुम दोनों] हमारे यज्ञ के इस अङ्ग को ब्राह्मणाच्छंसी [वेद से स्तुति करने वाले ऋत्विज्] वाली [स्तुति] से अनुकूलता के साथ समाप्त करो। (केन सह इति) [वे बोले] किसके साथ। (सूर्येण इति) [यजमान बोला] सूर्य [प्रेरणा करने वाले वा सूर्य के समान प्रतापी पुरुष] के साथ। (तथा इति अब्रूताम्) वे दोनों [ब्रह्मा और होता] बोले—ऐसा ही हो। (तौ सयुजौ सबलौ प्रासहा भूत्वा मृत्युम् अति ऐताम्) और वे दोनों [इन्द्र और सूर्य] समान योग [मेल] वाले, समान बल वाले और विजयी १४—(इन्द्रम्) परमैश्वर्यवन्तं पुरुषम् (त्वम्) युवाम् (अनुसमाहर) १. पू. सं. 'समाहरन्' इति पाठः ॥ सम्पा० ॥