गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 424, कुल 600 में से
संदर्भ में पढ़ें३८६ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ३ क० १२ ॥ [ बृहत्साम नाम वाले स्तोत्र ] में उस [ मृत्यु ] ने पाया । ( सः वायव्या प्रउगं प्रत्य- पद्यत ) उस [ प्रजापति ] ने वायवी से [ वायु देवता वाले गायत्री छन्द से, जैसे—वायवा याहि दर्शतेमे・・・・・・ऋग्० १ । २ । १—३ ] प्रउग [ उस गायत्री छन्द से प्रयोग योग्य, इस नाम वाला स्तोत्र ] को आरम्भ किया । ( मृत्युः वाव तं प्रजापतिं पश्यत् पर्य्यक्रामत् ) मृत्यु ने उस प्रजापति को देखा और [ उस पर ] धावा किया । ( तं माध्यन्दिने पवमाने असीदत् ) उस [ प्रजापति ] को माध्यन्दिनं पवमान [ इस नाम वाले स्तोत्र ] में उसने पाया । ( सः ऐन्द्र्या त्रिष्टुभा मरुत्वतीयं प्रत्यपद्यत ) उस [ प्रजापति ] ने ऐन्द्री त्रिष्टुप् से [ इन्द्र देवता वाले त्रिष्टुप् छन्द से, जैसे—इन्द्रस्य नु वीर्याणि प्र वोचम्・・・・・・ऋग्० १ । ३२ । १—१५ ] मरुत्वतीय [ मरुतों अर्थात् झोकों से युक्त मरुत्वान् इन्द्र अर्थात् वायु वा बिजुली देवता वाले स्तोत्र ] को आरम्भ किया । ( मृत्युः वाव तं प्रजापतिं पश्यत् पर्य्यक्रामत् ) मृत्यु ने उस प्रजापति को देखा और [ उस पर ] धावा किया । ( सः पूर्वः तेन एव द्रविणे निष्केवल्यस्य स्तोत्रियम् आसीदत् तम् अस्तृणोत् ) उस [प्रजापति] ने पहिले होकर उस [ मरुत्वतीय स्तोत्र ] से ही द्रविण [ नाम वाले यज्ञ भाग ] में निष्केवल्य [ नाम वाले स्तोत्र ] के स्तोत्रिय [ नाम वाले स्तोत्र भाग ] को पाया और उस [ मृत्यु ] को ढक दिया । ( तस्मात् उ यः एव पूर्वम् आसीदति, सः तत् स्तृणुते ) इसलिये जो ही पुरुष पहिले पहुँचता है, वह उस [ मृत्यु ] को ढक देता है। (मृत्युः अनवकाशं विद्वान् अपाद्रवत्, इतरः निष्केवल्यम् अशंसत् ) मृत्यु अनवसर जानता हुआ भाग गया, दूसरे [ प्रजापति ] ने निष्केवल्य स्तोत्र पढ़ा । ( तस्मात् एकम् एव उक्थं होता मरुत्वतीयेन प्रतिपद्यते ) इसलिये एक ही उक्थ [ कहने योग्य स्तोत्र ] को होता मरुत्वतीय स्तोत्र से आरम्भ करता है। ( निष्केवल्यम् एव अत्र हि प्रजापतिं मृत्यु. व्यजहात् ) निष्केवल्य स्तोत्र से ही यहाँ प्रजापति को मृत्यु ने छोड़ दिया है ॥ १२ ॥ भावार्थः—जैसे पहिले से विचार के साथ विघ्नों को हटा कर अग्नि प्रज्वलित कर- के यज्ञ सिद्ध करते हैं, वैसे ही मनुष्य प्रत्येक कार्य्य को पहिले से विचार कर प्रयत्न के साथ पूरा करें ॥ १२ ॥ विशेषः १—इस कण्डिका के कुछ २ अंश के लिये ऐतरेय ब्राह्मण ३ । १४ देखो ॥ विशेषः २—सङ्केतित मन्त्र वेद में देखो ॥ प्रउगं । प्रयोग र्हम् । एतन्नामकं स्तोत्रम् (प्रत्यपद्यत ) प्रारब्धवान् ( मरुत्वतीयम् ) द्यावापृथिवीशुनासीरमरुत्वदग्नीषोम० ( पा० ४ । २ । ३२ ) मरुत्वत्—छ, अस्य देवता इत्यर्थे । मरुत्वान् इन्द्रो देवता यस्य तत् स्तोत्रम् ( द्रविणे ) बले—निघ० २ । ६ । घने--निघ० २ । १० । एतन्नामके यज्ञभागे ( निष्केवल्यस्य ) एतन्नामकस्य स्तोत्रस्य ( स्तोत्रियम् ) स्तोत्र--घः । एतन्नामकं स्तोत्रभागम् ( अस्तृणोत् ) आच्छादितवान् ( विद्वान् ) जानन् ( अनवकाशम् ) अनवसरम् (-अपाद्रवत् ) दूरमगच्छत् ( अशंसत् ) स्तुतवान् ( प्रतिपद्यते ) आरभते ( निष्केवल्यम् ) निष्केवल्येन ( व्यजहात् ) विशेषेण त्यक्तवान् ॥