भारतकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

पृष्ठ 453, कुल 600 में से

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पृष्ठ 453

गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ४ । क० २ ॥ ४१५ अ॒न॒राशं॑साः न आप्याययन्ति न हि सीदन्ति ) वे [ ऋषि लोग ] प्रत्यक्ष ही विचारते हैं—नरों की स्तुति बिना [ यज्ञ यजमान को ] न बढ़ाते हैं और नहीं चलते हैं [ नहीं आप बढ़ते हैं । देखो क० १ ] ॥ २ ॥ भावार्थः—कण्डिका १ के समान है ॥ २ ॥ विशेषः—प्रतीक वाले मन्त्र अर्थ सहित लिखे जाते हैं ॥ १—तं वो॑ दस्ममृ॑तीषहं॒ वसोर्मन्दानमन्ध॑सः । अ॒भि व॒त्सं न स्वस॑रेषु धे॒नव॒ इन्द्रं॑ गी॒र्भिर्न॑वामहे—अथर्व० २० । ६ । १, ऋग्० ८ । ८८ । [ सायण भाष्य ७७ ] । १, साम० उ० १ । १ । १ । ३ ॥ [ हे मनुष्यों ! ] ( वः ) तुम्हारे लिये ( तम् ) उस ( दस्मम् ) दर्शनीय, ( ऋतीषहम् ) शत्रुओं के हराने वाले, ( वसोः ) धन से और ( अन्धसः ) अन्न से ( मन्दानम् ) आनन्द देने वाले ( इन्द्रम् ) इन्द्र [ बड़े ऐश्वर्य वाले परमात्मा ] को ( गीर्भिः ) वाणियों से ( अभि ) सब प्रकार ( नवामहे ) हम सराहते हैं, ( न ) जैसे ( धेनवः ) गौयें ( स्वसरेषु ) घरों में [ वर्तमान ] ( वत्सम् ) बछड़े को [ हिङ्कारती हैं ] ॥ २—तत् त्वा यामि सुवीर्यं तद् ब्रह्म पूर्वचित्तये । येना यतिभ्यो भृगवे धने हिते येन प्रस्कण्वमाविथ—अथर्व० २० । ६ । ३, ऋग् ० ८ । ३ । ६ ।। [ हे परमात्मन् ! ] ( त्वा ) तुझसे ( तत् ) वह ( सुवीर्यम् ) बड़ा वीरत्व और ( तत् ) वह ( ब्रह्म ) बढ़ता हुआ अन्न ( पूर्वचित्तये ) पहिले ज्ञान के लिए ( यामि ) मैं माँगता हूँ । ( येन ) जिस [ वीरत्व और अन्न ] से ( धने हिते ) धन के स्थापित होने पर ( यतिभ्यः ) यतियों [ यत्नशीलों ] के लिए ( भृगवे = भृगुम् ) परिपक्व ज्ञानी को और ( येन ) जिससे ( प्रस्कण्वम् ) बड़े बुद्धिमान् पुरुष को ( आविथ ) तूने बचाया है । ३—उदुत्ये मधुमत्तमा गिर स्तोमास ईरते । सत्राजितो धनसा अक्षितोतयो वाजयन्तो रथा इव—अथर्व० २० । १० । १, ऋ० ८ । ३ । १५, साम उ० ६ । १ । ६ ॥ ( त्ये ) वे ( मधुमत्तमा ) अति मधुर ( स्तोमासः ) स्तोत्र ( उ ) और ( गिरः ) वाणियाँ ( उत् ईरते ) ऊँची जाती हैं। ( इव ) जैसे ( सत्राजितः सत्य से जीतने वाले, ( धनसा ) धन देने वाले, ( अक्षितोतयः ) अक्षय रक्षा वाले, ( वाजयन्तः ) बल प्रकट करते हुए ( रथाः ) रथ [ आगे बढ़ते हैं ] ॥ ४—इन्द्रः पूर्भिदातिरद् दासमर्केर्विदद्वसुर्दय मानो वि शत्रून् । ब्रह्मजूतस्तन्वा वावृधानो भूरिदात्र आपृणद् रोदसी उभे—अथर्व० २० । ११ । १ । ऋ० ३ । ३४ । १ ।। ( विदद्वसुः ) ज्ञानी श्रेष्ठ पुरुषों से युक्त, ( पूर्भित् ) [ शत्रुओं के ] गढ़ों को तोड़ने वाले ( शत्रून् ) बैरियों को ( वि ) विविध प्रकार । ( दयमानः ) मारते हुए ( इन्द्रः ) इन्द्र [ बड़े ऐश्वर्य वाले राजा ] ने ( अर्कैः ) पूजनीय विचारों से ( दासम् ) दास [ सेवक ] को ( आ अतिरत् ) बढ़ाया है । ( ब्रह्मजूतः ) ब्रह्माओं [ महाविद्वानों ] से प्रेरणा किये गये ( तन्वा ) उपकार शक्ति से ( वावृधानः ) बढ़ते हुये; ( भूरिदात्रः ) बहुत से अस्त्र शस्त्र वाले [ शूर ] ने ( उभे ) दोनों ( रोदसी ) आकाश और भूमि को ( आ ) भले प्रकार ( अपृणत् ) तृप्त किया है ॥

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