भारतकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

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पृष्ठ 510

४७२ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ५ । क० ८ ॥ (दिविष्टिषु) विजय की इच्छाओं में (ते) तेरे लिये (मध्वः) मधु [तत्त्व ज्ञान] का (अग्रम्) प्रधान अंश (अयामि) लाता हूं। (देव) हे देव ! [विजय चाहने वाले शूर] (स्पार्हंः) चाहने योग्य तू (सोमपीतये) सोम [तत्त्वरस] पीने के लिये (नियुत्वता) नित्य मेल वाले व्यवहार के साथ (आ याहि) आ ॥ २—ज्योतिष्मती ऋचा—अस्य देवाः प्रदिशि ज्योतिरस्तु सूर्यो अग्िनरुत वा हिरण्यम् । सपत्ना अस्मदधरे भवन्तूत्तमं नाकमधि रोहयेमम्—अथर्व० १ । ६ । २ ॥ (देवाः) हे व्यवहार जानने वाले महात्माओ ! (अस्य) इसके [मेरे] (प्रदिशि) शासन में (ज्योतिः) तेज, [अर्थात्] (सूर्यः) सूर्य, (अग्निः) अग्नि, (उत वा) और भी (हिरण्यम्) सुवर्ण (अस्तु) होवे । (सपत्नाः) सब वैरी (अस्मत्) हमसे (अधरे) नीचे (भवन्तु) होवें । (उत्तमम्) अति ऊंचे (नाकम्) सुख में (इमम्) इसको [मुझको] (अधि) ऊपर (रोहय = रोहयत) तुम चढ़ाओ ॥ ३--वाजवती ऋचा—मरुतां मन्वे अधि मे ब्रुवन्तु प्रेमं वाजं वाजसाते अवन्तु । आशून्निव सुयमानह्व ऊतये ते नो मुञ्चन्त्वंहसः—अथर्व० ४ । २७ । १ ॥ (मरुताम्) शत्रुनाशक वीरों का (मन्वे) मैं मनन करता हूं। (मे) मेरे लिये (अधि) अनुग्रह से (ब्रुवन्तु) वे बोलें और (इमम्) इस (वाजम्) बल को (वाजसाते) अन्न के सुख वा दान के निमित्त (प्र) अच्छे प्रकार (अवन्तु) तृप्त करें। (आशून् इव) शीघ्रगामी घोड़ों के समान (सुयमान्) उन सुन्दर नियम वालों को (ऊतये) अपनी रक्षा के लिये (अह्वं) मैंने पुकारा है। (ते) वे (नः) हमें (अंहसः) कष्ट से (मुञ्चन्तु) छुड़ावें ॥ ४--अन्नवती ऋचा—यत् ते अन्नं भुवस्पत आक्षियति पृथिवीमनु । तस्य नस्त्वं भुवस्पत संप्रयच्छ प्रजापते--अथर्व० १० । ५ । ४५ ॥ (भुवः पते) हे भूपति [राजन् !] (यत्) जो (ते) तेरा (अन्नम्) अन्न (पृथिवीम् अनु) पृथिवी पर (आक्षियति) रहा करता है। (भुवः पते) हे भूपति ! (प्रजापते) हे प्रजापति [राजन् !] (त्वम्) तू (.नः) हमें (तस्य) उस [अन्न] का (संप्रयच्छ) दान करता रह ॥ ५--गणवती ऋचा—मरुतो मा गणैरवन्तु प्राणायापानायायुषे वर्चस ओजसे तेजसे स्वस्तये सुभूतये स्वाहा—अथर्व० १६ । ४५ । १० ॥ (मरुतः) शूर पुरुष (मा) मुझे (गणैः) सेना दलों के साथ (अवन्तु) बचावें, (प्राणाय) प्राण के लिये, (अपानाय) अपान के लिये, (आयुषे) जीवन के लिये, (वर्चसे) प्रताप के लिये, (ओजसे) पराक्रम के लिये, (तेजसे) तेज के लिये, (स्वस्तये) स्वस्ति [सुन्दर सत्ता] के लिये और (सुभूतये) बड़े ऐश्वर्य्य के लिये (स्वाहा) स्वाहा [सुन्दर वाणी] हो ॥ ६—पशुमती ऋचा—सं सं स्रवन्तु पशवः समश्वाः समु पूरुषाः । सं धान्यस्य या स्फातिः संस्राव्येण हविषा जुहोमि--अथर्व० २ । २६ । ३ ॥ (पशवः) गो आदि पशु (सम्) मिलकर, (अश्वाः) घोड़े (सम्) मिल कर, (उ) और (पूरुषाः) सब पुरुष (सम् सम्) मिल मिल कर (स्रवन्तु) चलें । और (या) जो (धान्यस्य) धान्य [अन्न] की (स्फातिः) बढ़ती है, [वह भी] (सम् सम् स्रवन्तु) मिल मिलकर