भारतकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

पृष्ठ 531, कुल 600 में से

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पृष्ठ 531

गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ६ । क० १ ४२५ ४-सद्यो ह जातो वृषभः कनीनः--......... ऋ० ३ । ४८ । १-५, विश्वा- मित्र ऋषि ॥ यह मन्त्र आ चुका है-गो० उ० ४ । १ ॥ शेष मन्त्र वेद में देखो ॥ ५--उदु ब्रह्माण्यैरत श्रवस्येन्द्रं समर्ये महया वसिष्ठ । आ यो विश्वानि शवसा ततानोपश्रोता म ईवतो वचांसि-अथर्व० २० । १२ । १--६, ऋग्० ७ । २३ । १ ६, वसिष्ठ ऋषि ॥ यह मन्त्र आ चुका है--गो० उ० ४ । १ ॥ शेष मन्त्र वेद में देखो ॥ ६-अभि तष्टेव दीधया मनीषामत्यो न वाजी सुधुरो जिहानः । अभि- प्रियाणि मर्मृशत् पराणि कवीँरिच्छामि संदृशे सुमेधाः-ऋ० ३ । ३८ । १- १० । विश्वामित्र के गोत्र का प्रजापति, अथवा वाच्य वाक् का पुत्र, अथवा प्रजापति और वाच्य दोनों, अथवा विश्वामित्र ही ऋषि-शाकलर्कं संहिता और सायण भाष्य ॥ [ हे इन्द्र विद्वन् ! ] (तष्टा इव) बढ़ई के समान और (सुधुरः) बहुत बोझ उठाने वाले, (अत्यः) लगा- तार चलने वाले (वाजी न) घोड़े के सदृश (जिहानः) चलता हुआ तू (मनीषाम्) बुद्धि को (अभि)सब ओर से (दीधय) प्रकाशित कर, (प्रियाणि) प्रिय और (पराणि) श्रेष्ठ कर्मों को ( अभि मर्मृशत् ) सब ओर से विचारता हुआ ( सुमेधाः ) उत्तम बुद्धि वाला मैं (कवीन्) बड़े विद्वानों को ( सन्दृशे ) ठीक ठीक दर्शन के लिए ( इच्छामि ) चाहता हूँ ॥ [ शेष मन्त्र वेद में देखो ] ॥ ७-इन्द्रः पूर्भिदातिरद् दासमर्कैर्विदद्वसुर्दयमानो वि शत्रून् । ब्रह्मजतस्तन्वा वावृधानो भूरिदात्र आपृणद्रोदसी उभे-ऋ० ३ । ३४ । १-११, विश्वामित्र ऋषि-अथर्व० २० । ११ । १-११ ॥ यह मन्त्र आ चुका है--गो० उ० ४ । २, शेष मन्त्र वेद में देखो ॥ ८--य एक इद्धव्यश्चर्षणीनामिन्द्रं तं गीर्भिरभ्यर्च आभिः । यः पत्यते वृषभो वृष्ण्यावान्त्सत्यः सत्वा पुरुमायः सहस्वान्-ऋ० ६ । २२ । १-११, भरद्वाज ऋषिः । अथर्व० २० । ३६ । १-११ ॥ (तम् ) उस ( इन्द्रम् ) इन्द्र [ बड़े ऐश्वर्य वाले परमात्मा ] को (आभिः ) इन (गीर्भिः ) वाणियों से (अभि ) सब प्रकार (अर्चें ) मैं पूजता हूँ । ( यः ) जो ( एकः ) अकेला (इत् ) ही ( चर्षणीनाम् ) मनुष्यों के बीच ( हव्यः ) ग्रहण करने योग्य है और ( यः ) जो ( वृषभः ) श्रेष्ठ ( वृष्ण्यावान् ) पराक्रम वाला ( सत्यः ) सच्चा (सत्वा ) वीर (पुरुमायः ) बहुत बुद्धि वाला और ( सहस्वान् ) महाबलवान् (पत्यते ) स्वामी है ॥ [ शेष मन्त्र वेद में देखो ] ॥ ९-यस्तिग्मशृङ्गो वृषभो न भीम एकः कृष्टीश्च्यावयति प्र विश्वाः । यः शश्वतो अदाशुषो गयस्य प्रयन्तासि सुश्वितराय वेदः--ऋ० ७ । १६ । १--११, वसिष्ठ ऋषि, अथर्व० २० । ३७ । १--११ ॥ (एकः) अकेला [ वही ] (विश्वाः) सब (कृष्टीः) मनुष्य प्रजाओं को (प्र ) अच्छे प्रकार (च्यावयति) चलाता है, (यः) जो (तिग्मशृङ्गः न) तीखी किरणों वाले सूर्य के समान (भीमः) भयरूप और (वृषभः) वर्षा करने वाला है। और (यः) जो तू (शश्वतः) निरन्तर (अदाशुषः)

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