गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 580, कुल 600 में से
संदर्भ में पढ़ें५४२ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ६ । क० १४ भावार्थः-जो मनुष्य नीति निपुण होकर उपद्रवी शत्रुओं को निकाल देते हैं, वे ही अपनी और प्रजा की रक्षा कर सकते हैं ॥ १४ ॥ विशेषः १-इस कण्डिका को ऐतरेय ब्राह्मण ६ । ३४, ३५, ३६ से मिलाओ ॥ विशेषः २ - प्रतीक वाले मन्त्र अर्थ सहित लिखे जाते हैं । १-आदित्या और आङ्गिरसी ऋचायें-आदित्या ह जरितरङ्गिरोभ्यो दक्षिणामनयन् । तां ह जरितः प्रत्यायंस्तामु ह जरितः प्रत्यायन्-अथ० २० । १३५ । ६ ॥ ( आदित्याः ) अखण्ड ब्रह्मचारियों ने ( ह ) ही, (जरितः) हे स्तुति करने वाले ! ( अङ्गिरोभ्यः) विज्ञानी पुरुषों के लिये ( दक्षिणाम् ) दक्षिणा [ दान वा प्रतिष्ठा ] को (अनयन्) प्राप्त कराया है। (ताम् ) उस [ दक्षिणा ] को ( ह ) ही, ( जरितः) हे स्तुति करने वाले ! (प्रति आयन्) उन्होंने प्रत्यक्ष पाया है, ( ताम् ) उस [ दक्षिणा ] को (उ) निश्चय करके (ह) ही, (जरितः) हे स्तुति करने वाले ! ( प्रति आयन् ) उन्होंने प्रत्यक्ष पाया है ॥ २-तां ह जरितर्नः प्रत्यगृह्णंस्तामु ह जरितनंः प्रत्यगृह्णः । अहानेतरसं न वि चेतनानि यज्ञानेतरसं न पुरोगवामः-अथ० २० । १३५ । ७ ॥ ( ताम् ) उस [ दक्षिणा ] को ( ह ) ही, ( जरितः ) हे स्तुति करने वाले ! ( नः ) हमारे लिये ( प्रति अगृह्णन् ) उन्होंने [ विज्ञानियों ने-मन्त्र ६ ] प्रत्यक्ष पाया है, ( ताम् ) उसको ( उ ) निश्चय करके ( ह ) ही ( जरितः) हे स्तुति करने वाले ! ( नः) हमारे लिये ( प्रति अगृह्णः ) तूने प्रत्यक्ष पाया है। ( न ) अभी (अहानेतरसम् ) व्यक्ति में बल रखने वाले व्यवहार को, ( वि ) विविध ( चेतनानि ) चेतनाओं को, और ( न ) अभी ( यज्ञानेतरसम् ) यज्ञ [देवपूजा, संगतिकरण और दान] में बल रखने वाले व्यव- हार को ( पुरोगवामः) हम आगे होकर पावें ॥ ३-उत श्वेत आशुप्तवा उतो पदाभिर्यविष्ठः । उतेमाशु मानं पिपर्ति- अथ० २० । १३५ । ८ ॥ ( आशुप्तवाः) हे शीघ्रगामी पुरुषो ! ( श्वेतः ) श्वेत वर्ण वाला [ सूर्य ] (उत) भी ( यविष्ठः ) अत्यन्त बलवान् होकर ( पदाभिः ) चलने योग्य गतियों से ( उतो ) निश्चय करके ( उत ) अवश्य ( ईम् ) प्राप्ति योग्य (मानम्) परिमाण को ( आशु ) शीघ्र (पिपर्ति ) पूरा करता है ॥ ४-आदित्या रुद्रा वसवस्त्वेऽनु त इदं राधः प्रति गृभ्णीह्याङ्गिरः । इदं राधो विभु प्रभु इदं राधो बृहत् पृथु-अथ० २० । १३५ । ९ ॥ [ हे शूर सेना- पति ! ] ( ते ) वे (आदित्याः) अखण्ड ब्रह्मचारी [ अथवा १२ महीने ], (रुद्राः ज्ञान दाता [ अथवा ११ रुद्र, १० प्राण और आत्मा ] और ( वसवः ) श्रेष्ठ विद्वान् लोग [ अथवा पृथिवी आदि ८ वसु [ (त्वे अनु ) तेरे पीछे पीछे हैं, ( अङ्गिरः ) हे विज्ञानी पुरुष ! ( इदम् ) इस (राधः ) धन को ! प्रति ) प्रत्यक्ष रूप से (गृभ्णीहि ) तू ग्रहण कर । ( इदम् ) यह ( राधः ) धन ( विभु ) व्यापक और ( प्रभु ) बल युक्त है, ( इदम् ) यह ( राधः ) धन ( बृहत् ) बहुत और ( पृथु ) विस्तीर्ण है ॥