गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 582, कुल 600 में से
संदर्भ में पढ़ें५४४ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ६ । क० १५ पितर [पालनेवाले] हैं, पितर प्रजापति [प्रजापालक] हैं। (प्रजापतिः आह, न स्यात्, तादृशं शंसेत् इति) प्रजापति कहता है-अब ऐसा होवे, वैसा बोले [सृष्टि उत्पादन मन्त्र बोले]। (शाम्भव्यस्य वचः, दशाक्षरा विराट्, वैराजः यज्ञः, गर्भाः तम् उपजीवन्ति) शाम्भव्य ऋषि का वचन है-[दस ऋचायें बोले] दस अक्षर वाला विराट् छन्द है, विराट् [विविध ऐश्वर्य] वाला यज्ञ है, गर्भ उस [यज्ञ] के आश्रय जीते हैं। (श्रीः वै विराट्, यशः, अन्नाद्यं, तत् श्रियम् एव विराजं यशसि अन्नाद्ये प्रतिष्ठा- पयति) श्री [सम्पत्ति] ही विराट्, यश और खाने योग्य अन्न है, तब श्री [अर्थात्] विराट् को यश में और खाने योग्य अन्न में वह स्थापित करता है। (प्रतिष्ठन्तीः अनु इदं सर्वं प्रतितिष्ठति) ठहरी हुई [प्रजाओं] के साथ साथ यह सब प्रतिष्ठा पाता है। (प्रजया पशुभिः प्रतितिष्ठति, यः एवं वेद) प्रजा से और पशुओं से वह प्रतिष्ठा [ठहराव] पाता है, जो ऐसा विद्वान् है। (तिस्रः शंसेत् इति वात्स्यः) तीन [ऋचायें] बोले, यह वात्स्य [कहता है]। (त्रिवृत् वै रेतः सिक्तं सम्भवति-आण्डम् अल्प जरायुः त्रिवृत् प्रत्ययम्) तीन विधि से वर्तमान ही सींचा हुआ वीर्य समर्थ होता है- आण्ड [अण्डज पक्षी आदि], अल्प [सूक्ष्म, अङ्कुर वृक्ष आदि] और जरायु [जरायुज मनुष्य आदि] यह तीन विधि से वर्तमान प्रतीति है। (माता पिता यत् जायते, तत् तृतीयम्) माता और पिता [दो] और जो उत्पन्न होता हैं वह तीसरा है [यह भी त्रिवृत् है]। (अभूतोद्यम् एव एतत्, यत् चतुर्थीं शंसेत्) भविष्य कर्म का कथन ही यह है जो चौथी [ऋचा] को बोले। (सर्वाः एव षोडश शंसेद् इति ह एके) सब ही सोलह [ऋचाओं] को बोले-यह कोई कोई [कहते हैं]। (कामार्तः वै रेतः सिञ्चति, रेतसः सिक्ताः प्रजाः प्रजानां प्रजननाय प्रजायन्ते) काम से पीड़ित पुरुष ही वीर्य सींचता है, वीर्य से सींची हुई प्रजायें प्रजाओं के उत्पन्न करने के लिये उत्पन्न होती हैं। (प्रजनयिष्णुः प्रजावान् भवति, प्रजात्यै प्रजया पशुभिः प्रजायते, यः एवं वेद) उत्पन्न करने वाला पुरुष प्रजाओं वाला होता है, प्रजा की उत्पत्ति के लिये प्रजा से और पशुओं से वह बढ़ता है, जो ऐसा विद्वान् है ॥ १५ ॥ अंहुरः = अंहस्वान्-निरु० ६ । २७ । अवितृस्तृतन्त्रिभ्य ईः (उ० ३ । १५८) भिदिर् विदारणे-ईप्रत्ययः। अंहुना तापेन भेदनीया विदारणीया या सा अंहुभेदी तरणः प्रजायाः (न) निषेधे। सम्प्रति (त्रिवृत्) त्रिविधवर्तमानम् (सम्भवति) समर्थं भवति (आण्डम्) अमन्ताड्डः (उ० १ । ११४) अम संयोगे-डः, अण्। पक्ष्यादिप्रादुर्भावकोषजम्। अण्डजम् (अल्पम्) पानीविषिभ्यः पः (उ० ३ । २३) अल वारणपर्याप्तिभूषासु-पः। सूक्ष्मम्। अङ्कुरजम् (जरायुः) किंजरयोः श्चिणः (उ० १ । ४) जरा + इण् गतौ-उण्। गर्भाशयः। गर्भजम् (प्रत्ययम्) प्रतीतिः (अभूतोद्यम्) वद कथने-क्यप्। अभूतस्य अनतीतस्य अनागतस्य भविष्यकर्मणः कथनम् (प्रजनयिष्णुः) गेश्छन्दसि (पा० ३ । २ । १३७) प्रजनयतेः-इष्णुच्। प्रजनयिता ॥