भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

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१२८ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे


हुए; कुन्तिके रणमें ढीठ एवं प्रतापवान् धृष्ट नामक पुत्र हुए। धृष्टके शूरवीर एवं परम धार्मिक आवन्त, दशार्ह और बलवान् विषहर नामक तीन पुत्र उत्पन्न हुए। दशार्हके पुत्र व्योम हुए और व्योमके पुत्र जीमूत हुए ॥ २३-२४ ॥

देवरतके पुत्र देवक्षत्र हुए। देवक्षत्रको आनन्द देनेवाले महायशस्वी दैवक्षत्रि हुए, वे देवताओंके बालकोंके समान तेजस्वी थे। उनका नाम मधु था, उनकी वाणी भी मधुर थी, वह मधुवंशके प्रवर्तक राजा थे। मधुके वैदर्भोंसे मरुवस नामक पुत्र उत्पन्न हुए ॥ २७-२८ ॥

जीमूतपुत्रो वृहतिस्तस्य भीमरथः सुतः।
अथ भीमरथस्यासीत् पुत्रो नवरथस्तथा ॥ २५ ॥

जीमूतके पुत्र वृहति और उनके पुत्र भीमरथ हुए; भीमरथके पुत्र नवरथ हुए ॥ २५ ॥

आसीन्मरुवसः पुत्रः पुरुद्वान् पुरुषोत्तमः।
मधोर्जज्ञेऽथ वैदर्भ्यां भद्रवत्यां कुरुद्वहः ॥ २९ ॥
ऐक्ष्वाक्यामभवद् भार्या सत्त्वांस्तस्यामजायत।
सत्त्वान् सर्वगुणोपेतः सात्त्वतां कीर्तिवर्धनः ॥ ३० ॥

मरुवसके पुत्र पुरुषोत्तम पुरुद्वान् हुए। उन्हींके विदर्भ-राजकुमारी भद्रवतीसे कुरुवंशकी वृद्धि करनेवाला मधु नामक पुत्र हुआ और इक्ष्वाकुवंशकी भार्यासे सत्त्वान् नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। सत्त्वान् सर्वगुणसम्पन्न थे और अपने वंशमें सात्त्वतोंकी कीर्तिको बढ़ानेवाले थे ॥ २९-३० ॥

तस्य चासीद् दशरथः शकुनिस्तस्य चात्मजः।
तस्मात् करम्भः कारम्भिर्देवरतोऽभवन्नृपः ॥ २६ ॥

नवरथके पुत्र दशरथ हुए और दशरथके पुत्र शकुनि हुए। शकुनिके पुत्र करम्भ हुए और करम्भके पुत्र राजा देवरत हुए ॥ २६ ॥

देवक्षत्रोऽभवत् तस्य दैवक्षत्रिमहायशाः।
देवगर्भसमो जज्ञे देवक्षत्रस्य नन्दनः ॥ २७ ॥
मधूनां वंशकृद् राजा मधुर्मधुरवागपि।
मधोर्जज्ञेऽथ वैदर्भ्यां पुत्रो मरुवसास्तथा ॥ २८ ॥

इमां विसृष्टिं विज्ञाय ज्यामघस्य महात्मनः।
युज्यते परया कीर्त्या प्रजावांश्च भवेन्नरः ॥ ३१ ॥

मनुष्य महात्मा ज्यामघके इस वंशका परिचय प्राप्त कर परम कीर्ति पाता है और संतानवान् हो जाता है ॥ ३१ ॥

इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि षट्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३६ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारत खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंश पर्वमें (ज्यामघके वंशका वर्णनविषयक) छत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३६ ॥


सप्तत्रिंशोऽध्यायः

बभ्रुवंशका वर्णन

वैशम्पायन उवाच
सत्त्वतात्सत्त्वसम्पन्नान् कौशल्या सुपुवे सुतान्।
भजिनं भजमानं च दिव्यं देवावृधं नृपम् ॥ १ ॥
अन्धकं च महाबाहुं वृष्णिं च यदुनन्दनम्।
तेषां विसर्गाश्चत्वारो विस्तरेणेह तान् शृणु ॥ २ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! सत्त्वान् उपनाम-वाले सत्त्वतसे कौशल्याने भजिन, भजमान, दिव्य राजा देवावृध, महाभुज अन्धक और यदुनन्दन वृष्णि नामक सत्त्वसम्पन्न पुत्रोंको उत्पन्न किया ! उनके चार वंश चले, उनको आप विस्तारपूर्वक सुनिये ॥ १-२ ॥

भजमानस्य सृञ्जय्यौ बाह्याकाथोपबाह्यका।
आस्तां भार्ये तयोस्तस्माज्जज्ञिरे बहवः सुताः ॥ ३ ॥

भजमानके सृञ्जयकी पुत्री बाह्यका और उपबाह्यका नामवाली दो स्त्रियाँ थीं। उनसे उसके बहुतसे पुत्र उत्पन्न हुए ॥ ३ ॥

कृमिश्च क्रमणश्चैव धृष्टः शूरः पुरंजयः।
एते बाह्याकसृञ्जयां भजमानाद् विजज्ञिरे ॥ ४ ॥

भजमानके सृञ्जयकी पुत्री बाह्यकासे कृमि, क्रमण, धृष्ट, शूर और पुरंजय नामक पुत्र उत्पन्न हुए ॥ ४ ॥

अयुताजित्सहस्राजिरूच्छताजिच्चाथ दाशकः।