विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 394, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| ३७२ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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दुर्गयुद्धे क्रमः श्रेयान् रोधयुद्धेन पार्थिवाः ॥ ४६ ॥
भक्तोदकेन्धनैः क्षीणाः पात्यन्ते गिरिसंश्रिताः ।
वयं बहव इत्येवं नाप्येष निपुणो नयः ॥ ४७ ॥
राजाओ ! दुर्गयुद्धमें रोधयुद्ध (घेरा डालने) के द्वारा जो लड़ाईका क्रम चालू किया जाता है, वह श्रेयस्कर होता है (क्योंकि दुर्गकी खाद्यसामग्री समाप्त होनेपर वहाँके निवासियोंका पतन अवश्यम्भावी है; परंतु यहाँ पर्वतनिवासियोंके लिये खाने-पीनेकी सामग्री सदा सुलभ है) । अन्न, जल और लकड़ीकी कमी हो जाय तभी पर्वतवासी योद्धाओंको धराशायी किया जा सकता है। हमारी संख्या बहुत है और विपक्षियोंकी कम—ऐसा सोचना भी निपुण नीतिका परिचायक नहीं है ॥ ४६-४७ ॥
यादवौ नावमन्तव्यौ द्वावप्येतौ रणे स्थितौ ।
अविज्ञातबलावेतौ श्रूयेते देवसम्मितौ ॥ ४८ ॥
'ये दोनों यदुवंशी भी युद्धके लिये तैयार खड़े हैं; अतः इनकी अवहेलना नहीं करनी चाहिये। इनके पूरे-पूरे बलका ज्ञान किसीको नहीं है। ये दोनों देवताओंके समान तेजस्वी सुने जाते हैं ॥ ४८ ॥
कर्मभिस्त्वमरौ विभो बालावतिबलान्वितौ ।
दुष्कराणीह कर्माणि कृतवन्तौ यदूत्तमौ ॥ ४९ ॥
'अपने कर्मोंसे तो ये अमर जान पड़ते हैं; क्योंकि बाल्यावस्थामें ही ये अत्यन्त बलशाली हैं। यदुकुलके इन श्रेष्ठ पुरुषोंने इस जगत्में बड़े-बड़े दुष्कर कर्म किये हैं ॥ ४९ ॥
शुष्कैःकाष्ठैस्तृणैर्वेष्ट्य सर्वतः पर्वतोत्तमम् ।
अग्निना दीपयिष्यामो दहोतां गतचेतनौ ॥ ५० ॥
'अतः सूखे काठों और तिनकोंसे आवेष्टित करके इस उत्तम पर्वतमें हम सब ओरसे आग लगा देंगे। इससे अचेत होकर वे दोनों भस्म हो जायेंगे ॥ ५० ॥
यदि चेन्निष्क्रमिष्येते दह्यमानावितोऽन्तिके ।
समेत्य पातयिष्यामस्त्यक्ष्यतो जीवितं ततः ॥ ५१ ॥
'यदि आगसे जलते हुए वे दोनों हमारे पाससे निकलेंगे तो हम सब लोग मिलकर उन्हें मार गिरायेंगे। इस तरह उन दोनोंको अपने जीवनसे हाथ धोना पड़ेगा' ॥ ५१॥
वाक्यमेतत्तु रुरुचे सबलानां महीक्षिताम् ।
यदुक्तं चेदिराजेन नृपाणां हितशंसिना ॥ ५२ ॥
राजाओंके हितकी बात बतानेवाले चेदिराजने जो बात वहाँ कही, वह सेनासहित समस्त राजाओंको अच्छी लगी ॥ ५२ ॥
ततः काष्ठैस्तृणैर्वेष्ट्यैः शुष्कशाखैश्च पादपैः ।
उपादीप्यत शैलेन्द्रः सूर्यपादैरिवाम्बुदः ॥ ५३ ॥
तदनन्तर उन्होंने काठ-कबाड़, घास-फूस और सूखी डालवाले वृक्ष लाकर उनके द्वारा उस गिरिराज गोमन्तमें आग लगा दी। उस समय आगकी ज्वालाओंसे घिरा हुआ वह पर्वत सूर्यकी किरणोंमे आवृत मेघके समान प्रतीत होता था ॥ ५३ ॥
ददुस्ते सर्वतस्तूर्णं पावकं तत्र पार्थिवाः ।
यथोद्देशं यथावातं शैलस्य लघुविक्रमाः ॥ ५४ ॥
इसके बाद शीघ्रतापूर्वक पैर बढ़ाते हुए राजाओंने जहाँ जैसा हवाका रुख था, उसके अनुसार तुरंत ही पर्वतके चारों ओर वह आग फैला दी ॥ ५४ ॥
स वायुदीपतो वह्निरुत्पपात समन्ततः ।
सधूमज्वालमालाभिर्भाभिः खमिव शोभयन् ॥ ५५ ॥
वायुसे प्रज्वलित हुई आग वहाँ सब ओरसे ऊपरको उठने लगी और धूमयुक्त ज्वालामालाओंकी प्रभासे आकाशकी शोभा-सी बढ़ाने लगी ॥ ५५ ॥
सोऽनलः पवनायस्तः काष्ठसंचयमूलवान् ।
ददाह शैलं श्रीमन्तं गोमन्तं कान्तपादपम् ॥ ५६ ॥
सूखे काठोंके ढेर ही जिसकी जड़ थे, वह आग वायुके सहारेसे बढ़कर कमनीय वृक्षोंवाले शोभा-सम्पन्न गोमन्तपर्वतको चारों ओरसे दग्ध करने लगी ॥ ५६ ॥
स दह्यमानः शैलेन्द्रो मुमोच विपुलाः शिलाः ।
शतशः शतधा भूत्वा महोल्काकारदर्शनाः ॥ ५७ ॥
उस आगसे दग्ध होता हुआ गिरिराज गोमन्त बड़ी-बड़ी शिलाएँ छोड़ने लगा (अग्निके तापसे चटककर प्रस्तर-खण्ड टूट-टूटकर गिरने लगे), वे सैकड़ों शिलाएँ सौ-सौ टूक होकर गिरते समय बड़ी-बड़ी उल्काओंके समान दिखायी देती थीं ॥ ५७ ॥
स चित्रभानुः शैलेन्द्रं भाभिर्भानुरिवाम्बुदम् ।
आलिम्पतीव विधिवत् समन्तादर्चिरुद्गतः ॥ ५८ ॥
लपटोंसे ऊपरको उठती हुई वह आग उस पर्वतराजको सब ओरसे प्रभाओंद्वारा विधिपूर्वक लीपती-सी प्रतीत होती थी, ठीक उसी तरह जैसे सूर्यदेव अपनी किरणोंद्वारा मेघोंको अनुलिप्त कर देते हैं ॥ ५८ ॥
धातुभिः पच्यमानैश्च ज्वलद्भिश्चैव पादपैः ।
उद्भ्रान्तश्वापदो रौति तुद्यमान इवाद्रिराट् ॥ ५९ ॥
पकती हुई धातुओं, जलते हुए वृक्षो तथा घबराये हुए हिंसक जन्तुओंसे युक्त वह पर्वतराज ऐसा जान पड़ता था, मानो व्यथासे पीड़ित होकर रो रहा हो ॥ ५९ ॥
प्रतप्तो दह्यमानस्तु स शैलः कृष्णवर्त्मना ।
रीतीर्निर्वर्तयामास काञ्चनाञ्जनराजतीः ॥ ६० ॥
आगसे दग्ध होकर तपा हुआ वह पर्वत सोने, चाँदी