विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 398, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें३७६ श्रीमद्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
अस्त्र ग्रहण करके समराङ्गणमे खडे हुए वे दोनों अग्रज और अनुज वीर बलराम तथा श्रीकृष्ण अन्योन्यमय (एक-दूसरेपर आश्रित अथवा एक दूसरेके स्वरूप ) थे ॥ १७ ॥
समरेऽप्रतिरूपौ तौ विष्णुरेको द्विधा कृतः।
द्विषत्सु प्रतिकुर्वाणौ पराक्रान्तौ यथेश्वरौ ॥ १८ ॥
रणभूमिमें उनकी तुलना करनेवाला दूसरा कोई नहीं था। वे दोनों एक ही विष्णुके दो स्वरूप थे तथा शत्रुओंका प्रतीकार करते हुए सर्वसमर्थ ईश्वरकी भाँति पराक्रम प्रकट कर रहे थे ॥ १८ ॥
हलमुद्यम्य रामस्तु सर्पेन्द्रमिव कोपनम्।
चचार समरे वीरो द्विषतामन्तकोपमः ॥ १९ ॥
वीर बलराम क्रोधमे भरे हुए सर्पराजके तुल्य सांवर्तक हलको हाथमें उठाकर समरमें शत्रुओंके लिये कालरूप होकर विचरने लगे ॥ १९ ॥
विकर्षन् रथवृन्दानि क्षत्रियाणां महात्मनाम् ।
चकार रोषं सफलं नागेषु च हयेषु च ॥ २० ॥
कुञ्जराँल्लाङ्गलोत्क्षिप्तन् मुसलाक्षेपताडितान् ।
रामोऽभिरामः समरे निर्ममन्थ यथाचलान् ॥ २१ ॥
वे महामनस्वी क्षत्रियोंके रथसमूहोंको पीछे ढकेलते हुए हाथियों और घोड़ोंपर अपना रोष सफल करने लगे। समरमें परम सुन्दर प्रतीत होनेवाले बलराम हलसे हाथियोंको ऊपर उछाल देते और मूसल फेंककर उन्हें मार डालते थे। इस प्रकार उन पर्वतोपम हाथियोंको उन्होंने मार डाला ॥ २०-२१॥
ते वध्यमाना रामेण समरे क्षत्रियर्षभाः ।
जरासंधान्तिकं भीता विरथाः प्रतिजग्मिरे ॥ २२ ॥
समराङ्गणमें बलरामजीके द्वारा मारे जाते हुए वे क्षत्रिय-शिरोमणि योद्धा रथहीन हो भयके मारे जरासंधके पास भाग गये ॥ २२ ॥
तानुवाच जरासंधः क्षत्रधर्मे व्यवस्थितः ।
धिगेतां क्षत्रवृत्तिं वः समरे कातरात्मनाम् ॥ २३ ॥
तब क्षत्रियधर्ममें स्थित रहनेवाले जरासंधने उनसे कहा- 'समरभूमिमे आकर मनमे कायरता लानेवाले तुमलोगोंकी इस क्षत्रियवृत्तिको धिक्कार है ॥ २३ ॥
पराक्रान्तस्य समरे विरथस्य पलायतः।
भ्रूणहत्यामिवासह्यां प्रवदन्ति मनीषिणः ॥ २४ ॥
'मनीषी पुरुष समरमें पराक्रम प्रकट करके रथहीन होकर भागनेवाले योद्धाकी इस कायरताको भ्रूणहत्याके समान असह्य बताते हैं ॥ २४ ॥
पत्तिनो भुवि चैकस्य गोपस्याल्पबलीयसः ।
भीताः किं विनिवर्तध्वं धिगेतां क्षत्रवृत्तिताम् ॥ २५ ॥
'यह ग्वाला अत्यन्त बलहीन है, पैदल है और पृथ्वीपर अकेला खड़ा है। भला, इससे भयभीत होकर तुमलोग क्यों भाग रहे हो ? तुम्हारी इस क्षत्रियवृत्तिको धिक्कार है ॥२५॥
क्षिप्रं समभिवर्तन्तां मम वाक्येन नोदिताः ।
यावदेतौ रणे गोपौ प्रेषयामि यमक्षयम् ॥ २६ ॥
'मेरी आज्ञासे प्रेरित होकर तुम सब लोग शीघ्र ही शत्रुओंपर आक्रमण करो। तबतक मैं रणभूमिमें इन दोनो ग्वालोंको मारकर यमलोक भेज देता हूँ' ॥ २६ ॥
ततस्ते क्षत्रियाः सर्वे जरासंधेन नोदिताः।
क्षिपन्तः शरजालानि हृष्टा योद्धुमुपस्थिताः ॥ २७ ॥
ते हयैः काञ्चनापीडै रथैश्चेन्दुसमप्रभैः ।
नागैश्चाम्भोदसंकाशैर्महामात्रप्रणोदितैः ॥ २८ ॥
तब जरासंधसे प्रेरित होकर वे समस्त क्षत्रिय वाणसमूहों-की वर्षा करते हुए बड़े हर्षके साथ युद्धके लिये डट गये । वे सोनेके आभूषणोंसे विभूषित अश्वों, चन्द्रमाके समान कान्तिमान् रथों और महावतोंद्वारा हाँके गये एवं मेघोंके समान काले रंगवाले हाथियोंद्वारा रणभूमिमें आगे बढ़ने लगे ॥
सतनुत्राणनिस्त्रिंशाः सायुधाभरणाम्बराः ।
स्वारोपितधनुष्मन्तः सतूणीराः ससायकाः ॥ २९ ॥
उनके शरीरोंमें कवच और हाथोंमें खड्ग थे। वे आयुध, आभूषण तथा वस्त्रोंसे सुसज्जित थे। उन्होंने धनुषोंको भली-भाँति चढ़ा रखा था। वे बाणों और तरकशोंसे सम्पन्न थे॥२९॥
सच्छत्रोत्सेधिनः सर्वे चारुचामरवीजिताः ।
रणावनिगता रेजुः स्यन्दनस्था महीक्षितः ॥ ३० ॥
जो राजा रणभूमिमें रथोंपर बैठे हुए थे, उनके सिरपर ऊँचे छत्र तने थे तथा मनोहर चामरोंद्वारा उनके लिये हवा की जा रही थी। इस तरह वे सभी बड़ी शोभा पाते थे ॥ ३० ॥
तौ युद्धरङ्गापतितौ विधावन्तौ महाभुजौ।
वसुदेवसुतौ वीरौ युयुत्सू प्रत्यदृश्यताम् ॥ ३१ ॥
युद्धकी रंगभूमिमे उतर कर सब ओर धावा करनेवाले वे महाबाहु वीर वसुदेवपुत्र युद्धके लिये उत्सुक दिखायी देते थे ॥ ३१ ॥
तद् युद्धमभवत् तत्र तयोस्तेषां तु संयुगे।
सायकोत्सर्गबहुल गदानिर्घातदारुणम् ॥ ३२ ॥
वहाँ रणभूमिमें उन दोनो भाइयो तथा उन राजाओंमे भारी युद्ध होने लगा। उसमें बहुत-से वाणोंकी वर्षा की जा रही थी। गदाओंके आघातसे उस युद्धकी भयंकरता और बढ़ गयी थी ॥ ३२ ॥
ततः शरसहस्राणि प्रतीच्छन्तौ रणेविणौ।
तस्थतुर्योधमुख्यौ तावभिवृष्टौ यथाचलौ ॥ ३३ ॥