भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 753

[विष्णुपर्व] षड्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ७३१

तं दीनमनसं ज्ञात्वा रणे बाणं सुविक्लवम् ॥ ८४ ॥
चिन्तयद् भगवान् रुद्रो बाणरक्षणमातुरः ।

रणभूमिमें बाणासुरको अत्यन्त व्याकुल और दीन-चित्त हुआ जान भगवान् रुद्र आतुर हो उसकी रक्षाका उपाय सोचने लगे ॥ ८४॥

ततो नन्दीं महादेवः प्राह गम्भीरया गिरा ॥ ८५ ॥
नन्दिकेश्वर याहि त्वं यतो बाणो रणे स्थितः ।
रथेनानेन दिव्येन सिंहयुक्तेन भास्वता ॥ ८६ ॥
बाणं संयोजयाशु त्वमलं युद्धाय बानघ ।

तत्पश्चात् महादेवजीने गम्भीर वाणीद्वारा नन्दीसे कहा— 'नन्दिकेश्वर ! जहाँ बाणासुर रणभूमिमें स्थित है, वहाँ जाओ और उसे सिंहोंद्वारा जुते हुए इस तेजस्वी दिव्य रथसे शीघ्र संयुक्त करो। निष्पाप नन्दिकेश्वर ! यह रथ युद्धके लिये पर्याप्त है ॥ ८५-८६॥

प्रमाथगणमध्येऽहं स्थास्यामि न हि मे मनः ॥ ८७ ॥
योद्धुं प्रभवते ह्यद्य बाणं संरक्ष गम्यताम् ।

'मैं यहाँ प्रमथगणोंके बीचमें रहूँगा। अब मेरा मन युद्ध करनेके लिये उत्साहित नहीं हो रहा है। तुम जाओ, बाणासुरकी रक्षा करो' ॥ ८७॥

तथेत्युक्त्वा ततो नन्दी रथेन रथिनां वरः ॥ ८८ ॥
यतो बाणस्ततो गत्वा बाणमाह शनैरिदम् ।
दैत्यामुं रथमातिष्ठ शीघ्रमेहि महाबल ॥ ८९ ॥
ततो युध्यस्व कृष्णं वै दानवान्तकरं रणे ।

तब 'बहुत अच्छा' कहकर रथियोंमें श्रेष्ठ नन्दी रथके द्वारा उस स्थानपर गये जहाँ बाणासुर विद्यमान था। वहाँ पहुँचकर उन्होंने बाणासुरसे धीरे-धीरे इस प्रकार कहा, 'महाबली दैत्य ! तुम शीघ्र आओ और इस रथपर आरूढ़ हो जाओ। तदनन्तर दानवोंका विनाश करनेवाले श्रीकृष्णके साथ समराङ्गणमे युद्ध करो' ॥ ८८-८९॥

आरुरोह रथं बाणो महादेवस्य धीमतः ॥ ९० ॥
आरूढः स तु बाणश्च तं रथं ब्रह्मनिर्मितम् ।
तं स्यन्दनमधिष्ठाय भवस्यामिततेजसः ॥ ९१ ॥
प्रादुश्चक्रे महारौद्रमस्त्रं सर्वास्त्रघातनम् ।
दीप्तं ब्रह्मशिरो नाम बाणः क्रुद्धोऽतिवीर्यवान् ॥ ९२ ॥

नन्दीकी यह बात सुनकर बाणासुर बुद्धिमान् महादेवजीके रथपर आरूढ़ हुआ। उन तेजस्वी महादेवजीके उस रथका निर्माण साक्षात् ब्रह्माजीने किया था, उसपर बैठे हुए अत्यन्त पराक्रमी बाणासुरने कुपित हो ब्रह्मशिर नामक महाभयंकर प्रज्वलित अस्त्रका प्रयोग किया, जो सम्पूर्ण अस्त्रोंका विनाश करनेवाला था ॥ ९०-९२ ॥

प्रदीप्ते ब्रह्मशिरसि लोकः क्षोभमुपागमत् ।
लोकसंरक्षणार्थं वै तत् सृष्टं ब्रह्मयोनिना ॥ ९३ ॥
तच्चक्रेण निहत्यास्त्रं प्राह कृष्णस्तरस्विनम् ।
लोके प्रख्यातयशसं बाणमप्रतिमं रणे ॥ ९४ ॥

उस ब्रह्मशिर अस्त्रके प्रज्वलित होते ही यह सम्पूर्ण जगत् क्षुब्ध हो उठा। ब्रह्मयोनि ब्रह्माने जगत्की रक्षाके लिये ही उस अस्त्रकी सृष्टि की थी। श्रीकृष्णने अपने चक्रद्वारा उस अस्त्रका विनाश करके वेगशाली विश्वविख्यात यशस्वी तथारणक्षेत्रमें अनुपम शक्तिशाली बाणासुरसे इस प्रकार कहा—॥

कत्थितानि क ते तात बाण किं न विकत्थसे ।
अयमस्मि स्थितो युद्धे युद्ध्यस्व पुरुषो भव ॥ ९५ ॥

'तात ! तुम्हारी वे बहकी-बहकी बातें कहाँ गयीं ? बाणासुर ! अब तुम बढ़-चढ़कर बातें क्यों नहीं बनाते हो ? देखो, यह मैं युद्धके लिये खड़ा हूँ, तुम मेरे साथ युद्ध करो और मर्द बनो ॥ ९५ ॥

कार्तवीर्यार्जुनो नाम पूर्वं बाहुसहस्रवान् ।
महाबलः स रामेण द्विबाहुः समरे कृतः ॥ ९६ ॥

'पूर्वकालमें कृतवीर्यका पुत्र अर्जुन सहस्र भुजाओंसे सम्पन्न था, किंतु परशुरामजीने समराङ्गणमें उस महाबली वीरको दो बाँहवाला बना दिया था ॥ ९६ ॥

तथा तवापि दर्पोऽयं बाहूनां वीर्यसम्भवः ।
एष ते दर्पशमनं करोमि रणमूर्धनि ॥ ९७ ॥

'उसी प्रकार तुम्हारा भी जो यह घमंड है, यह तुम्हारी सहस्र भुजाओंके बल-पराक्रमसे ही उत्पन्न हुआ है, अतः यह मैं युद्धके मुहानेपर तुम्हारा सारा घमंड चूर किये देता हूँ ॥

यावत् ते दर्पशमनं करोम्यद्य स्वबाहुना ।
तिष्ठेदानीं न मेऽद्य त्वं मोक्ष्यसे रणमूर्धनि ॥ ९८ ॥

'आज मैं अपनी एक बाँहसे जबतक तुम्हारा घमंड दूर न कर दूँ, तबतक इस समय तुम यहीं ठहरे रहो। आज युद्धके मुहानेपर तुम मेरे हाथसे जीवित नहीं छूट सकोगे' ॥

अथ तद् दुर्लभं दृष्ट्वा युद्धं परमदारुणम् ।
तत्र देवासुरसमे युद्धे नृत्यति नारदः ॥ ९९ ॥

तदनन्तर देवासुर-संग्रामके समान उस समराङ्गणमें वह अत्यन्त भयंकर और दुर्लभ युद्ध देखकर देवर्षि नारदजी नृत्य करने लगे ॥ ९९ ॥

निर्जिताश्च गणाः सर्वे प्रद्युम्नेन महात्मना ।
निष्क्षिप्तवादा युद्धस्य देवदेवं गताः पुनः ॥ १०० ॥

महात्मा प्रद्युम्नने वहाँ समस्त रुद्रगणोंको पराजित कर दिया, वे युद्धकी बातचीत करना छोड़कर पुनः देवाधिदेव महादेवजीके पास चले गये ॥ १०० ॥