हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)
Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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या जाति वालों ने भी जो अपनी स्वतन्त्रता के लिये लड़े, कोई निन्दित कर्म नहीं किया क्योंकि यह मानव प्राकृति ही है। वे भी शूरवीर थे। यही कारण है कि उन्होंने परतन्त्रता के सामने सिर झुकाना बुरा समझा। हर्ष और पुलकेशिन ने दो शक्तिशाली साम्राज्य स्थापित करके जो राष्ट्रीय सेवायें अपने देश के प्रति की हैं उनके लिये प्रत्येक हिन्दू को उनके प्रति सदैव कृतज्ञता प्रकट करनी चाहिये। इन दो राज्यों की स्थापना ने हिन्दुओं के राजनैतिक विचारों को दृढ़ और उनके जीवन को कर्मशील बना दिया। कुछ समय पश्चात् अपनी वीरता की तुलना करने के लिये हर्ष और पुलकेशिन रणभूमि में उतर पड़े। युद्ध में प्रस्तुत हुए उनके युद्ध कौशल की तुलना इस प्रकार निष्पक्ष भाव से करनी चाहिए जैसे पिता अपने पुत्रों की, अथवा गुरु अपने शिष्य की तुलना इस दृष्टि से करता है कि समय आ पड़ने पर कौन अपने प्रतिद्वंदी पर विजय पा सकता है! हिन्दुओं के भीतर जो इस प्रकार के विचार- कि हम सब एकही के वंश के हैं, हमारी एकही पवित्र मातृभाषा है, हम एकही धर्म और सभ्यता के- हैं अब भी वर्त्तमान हैं, इसका एकमात्र कारण पुराने समय में चक्रवर्ती राज्यों का होना है, जिन चक्रवर्ती राज्यों की राजधानियां भारत के भिन्न २ प्रान्तों में समयानुसार बदलती रही। ये राजधानियां अयोध्या, दिल्ली, हस्तनापुर, पाटलीपुत्र, कश्मीर, कन्नौज, कांची, मदूरा और कल्यान आदि स्थानों में गईं। जिस समय एक प्रान्त से राजधानी हटकर दूसरे प्रान्त में जाती थी उस प्रान्त के योग्य शूरवीर, विद्वान् और सेनापति इत्यादि भी बहुधा वहीं चले जाते थे। इसलिये अपने प्रांत की रीति, सभ्यता और सद्गुण इत्यादि भी साथ लेते जाते थे और इस प्रकार मिलते-जुलते सारे भारतवर्ष की सभ्यता इत्यादि एक हो गयी और लोग एक दूसरे को भ्रातृभाव से देखने लगे। चूंकि उन पुराने चक्रवर्ती राज्यों द्वारा