हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)
Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
पृष्ठ 5, कुल 254 में से
संदर्भ में पढ़ें[ ४ ] इतिहास पर अपना प्रतिबिम्ब डाले बिना नहीं रह सकती चाहे वह जागृति की लहर राजपूतों में उमड़ उठी हो या सिखों में, मराठों में अथवा मद्रासियों में। एक अंग की सफलता समस्त जाति की निहित शक्तियों की द्योतक होती है। इस दृष्टिकोण के अतिरिक्त भी मरहठों की जागृति का आंदोलन तो प्रांतीय सीमाओं को लांघ कर 'अखिल हिन्दू आन्दोलन' का महत्व रखता है। इसलिए इस विवेचनात्मक पुस्तक लिखने का मुख्य उद्देश्य महाराष्ट्र के बाहर अन्य-प्रान्त-वासियों को इस मरहठा आंदोलन का सम्पूर्ण हिन्दू-इतिहास के दृष्टिकोण से दिग्दर्शन कराना है। अतएव इस में महाराष्ट्र के हिन्दू साम्राज्य की पूरी कहानी तो नहीं दी गई,केवल उन मुख्य आदर्शों और उद्देश्यों का ही चित्रण किया गया है जो इस आंदोलन के आत्मा थे। हिन्दू-साम्राज्य के उत्थान और पतन की कहानी हमें एक महान् संदेश देती है जो इस पुस्तक के पन्ने २ पर अंकित है। अतएव हिन्दुओं को इस पुस्तक का विशेष परिचय कराने की कोई बड़ी आवश्यकता नहीं। परन्तु मुसलमान पाठकों से इस विषय में दो शब्द कहना ज़रूरी है। इतिहासकार का यह कर्त्तव्य है कि वह अपने पात्रों की आकां- क्षाओं, भावनाओं और कारनामों का भी यथारूप चित्रण करे। यह तभी सम्भव है जब कि वह अपनी पहले से बनाई धारणाओं को एक ओर रख दे और इस बात की भी परवाह न करे कि उसके इस चित्रण से वर्तमान् के हितों पर कैसा प्रभाव पड़ेगा। वर्तमान के हितों की रक्षा के लिए इतिहास की घटनाओं को हल्का, गहरा अथवा नकली रंग दे देना कदापि उचित नहीं। उदाहरणतया, हज़रत मुहम्मद के जीवन को लिखने वाला अपना कर्त्तव्य ठीक प्रकार से नहीं निभाएगा यदि वह बुतपरस्तों और काफिरों के प्रति मुहम्मद की तीव्र चोटों को इस विचार से चुभते ढंग से वर्णन न करे कि इससे गैर-मुसलमानों की भावनाओं को ठेस पहुंचेगी। दूसरों की भावनाओं की रक्षा का ठीक ढंग तो यह है कि लेखक स्वयं अन्यमतावलम्बियों के प्रति सहिष्णु हो और अपनी