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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

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हित चौरासी • • १०५ हुए है। जहाँ तहाँ सर्वत्र चम्पक, बकुल, मालती मेदिनि आदि लताएँ फूल रही हैं। वन सुवास से पूरित है। उस सुगन्ध भार को लेकर शीतल पवन मन्द मन्द गति श्रीवन में डोल रहा है। इस रास रस का वर्णन श्रीहित सखी अपनी किसी सखि से इस प्रकार कर रही हैं- धनाश्री मूल-आजु गोपाल रास रस खेलत, पुलिन कलपतरु तीर री सजनी। सरद विमल नभ चंद विराजत, रोचक त्रिविध समीर री सजनी।। चंपक बकुल मालती मुकुलित, मत्त मुदित पिक कीर री सजनी। देसी सुधंग राग रँग नीकौ, ब्रज जुवतिनु की भीर री सजनी।। मघवा मुदित निसान बजायौ, व्रत छाँड़यौ मुनि धीर री सजनी। (जै श्री) हित हरिवंश मगन मन स्यामा, हरति मदन घन पीर री सजनी।।२४।। भावार्थ- (श्रीहित सजनी ने कहा-) "अरी सजनी ! आज विमल कल्पवृक्ष के तीर यमुना पुलिन पर श्रीगोपाल लाल रास क्रीड़ा कर रहे हैं। सजनी ! जैसा निर्मल शरद का समय है वैसा ही सुन्दर चन्द्रमा आकाश में शोभित है और रोचक त्रिविध (शीतल मन्द सुगन्धित) पवन भी बह रहा है। अरी सखी ! देख तो चम्पा, मौलिश्री और मालती कैसी सुन्दर फूली हैं एवं कोयल भी कैसी मुदित और प्रेम मतवाली हो रही है ! अरी वीर ! देसी और सुधंग (नृत्य) का राग रङ्ग कितना भला है और ब्रज युवतियों की अपार भीड़ भी (कितनी भली) है !" श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु कहते हैं-सजनी! इन्द्र ने प्रसन्न होकर दुन्दुभी बजायी है और [रास रस से विह्वल होकर] परमधीर मुनियों ने भी