हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
पृष्ठ 162, कुल 275 में से
संदर्भ में पढ़ें१५६ • • हित चौरासी उसके लिये मौत के क्षण है। परवाना कहता है- शमे को फानूस में देखा तो परवाने यूँ बोले। क्यों जलाते हो नाहक कि हमें जलने नहीं देते।। इस जल जाने या प्रेम पर मिट जाने की बात इन प्रेमियों से ही पूछी जा सकती है कि उन्हें इस वलिदान में क्या सुख है ? 'कोई परवाने से पूछे कि जलने में मजा क्या है ?' बस, यही उत्सर्ग ही प्रेमियों का जीवन है। इस प्रेम का गन्तव्य लक्ष्य है द्वैत की सृष्टि मिटाकर प्रियतम से एक हो जाना। इस प्रेम के अद्वैत पद तक पहुँचने के लिये प्रेमी सब कुछ कर सकता है। लोक और वेद की सुदृढ़ बेड़ियों को वह सरलता पूर्वक तड़ातड़ तोड़ फेंकता है तब उसके मार्ग का कण्टक कोई भी नहीं बन सकता। वह पूर्ण निष्कण्टक निरङ्कुश बनकर जिस मार्ग से चल पड़ता है वही उसका सुपथ होता है। ऐसे ही दीवाने आशिक के लिये रसज्ञ जन मुग्ध कण्ठ से सराहना कर उठते हैं- कोई न पहुँचा वहाँ तक आसिक नाम अनेक। इश्क चमन के बीच में आया मँजनू एक।। -श्रीनागरीदासजी और ऐसा आशिक ताज मँजनू ही परवर दिगार अल्लाह से कह भी सकता है कि यदि हुजूर को जरूरत थी कि कैश (मँजनू) हुजूर के कदमों से मुहब्बत करे तो हुजूरे आलम लैला बनकर इस दीवाने के सामने क्यों न आ गये ? ख़ता मुआफ हों इसने तो अपना सब उसी एक माहरू पर निसार कर दिया है। धन्य है प्रेम देव ! तेरी दीवानगी !! सचमुच कोई तेरा मार्ग नहीं रोक सकता। तभी तो तुमने अखिल लोक चूड़ामणि निपुण नायक नवल मोहन के स्वाभिमान-अपनपै को किसी के चरणों में चढ़ा देने के लिये वाध्य कर दिया ! अस्तु; प्रेम तो प्रेम है। उसमें ईश्वरीय और मानवीय (हकीकी और मजाजी) का भेद व्यर्थ और बुद्धि कृत है। तभी तो इसमें चलने वाले के लिये