हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६२ • • हित चौरासी श्रीहित हरिवंश चन्द्र कहते हैं" हे सखी ! सुन !! सुरत सुख सङ्ग्राम में अत्यन्त शूर वीर प्रियाजी के लावण्य-अनुपम सौन्दर्य पर प्रियतम तल्लीन हो गये-भिद गये। – ४७ – अवतरण-इस पद में वन विहार के अवसर पर श्रीलालजी के मन में उत्पन्न हुए संभ्रम का वर्णन है। श्रीलालजी के मन में श्रीप्रियाजी से मिलने- आलिङ्गन करने की तीव्र अभिलाषा जाग उठी है और प्रियाजी उनकी उस अभिलाषा को समझ कर भी पूर्ण न करके अपितु छिपकर, झमक कर एक प्रकार से धोखा दे रही हैं। वे वृन्दावन के पत्र पत्र, पुष्प पुष्प में अपना रूप प्रकाशित कर देती हैं जिससे लालजी उनके यथार्थ रूप को नहीं पहचान पाते-धोखा खा जाते हैं, तब वे सखियों के उपहास के पात्र भी बन जाते हैं किन्तु फिर भी भेंट करने का लोभ संवरण न कर सकने के कारण वे भ्रमर का रूप धारण करते और तब पत्र पुष्प राजित प्रिया रूप का आलिङ्गन करना चाहते हैं...इत्यादि। 'प्रीति-विवश प्रेमी की स्थिति कैसी होती है ? इसका परिचय यही 'श्याम' है' ऐसा सब परिकर ने स्वीकार किया। इस लीला और सिद्धान्त का पूर्ण रसास्वाद श्रीहिताचार्य्य के श्रीवचनों से कीजिये- सारङ्ग मूल-वन की लीला लालहिं भावै। पत्र प्रसून बीच प्रतिबिंबहिं नख सिख प्रिया जनावै।। सकुच न सकत प्रकट परिरंभन अलि लंपट दुरि धावै। संभ्रम देति कुलकि कल कामिनि रति रन कलह मचावै।। उलटी सबै समझि नैननि में अंजन रेख बनावै। (जै श्री) हित हरिवंश प्रीति रीति बस सजनी स्याम कहावै।।४७।। भावार्थ-श्रीलालजी को वन की लीला बड़ी प्यारी लगती है, तभी तो उन्हे वहाँ के फूल पत्तों पर पड़े हुए प्रति बिम्बों में भी नख सिख प्रिया रूप ही