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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

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पृष्ठ 32

हित चौरासी • • २७ विहार स्वरूप को अचिन्त्य और अतर्क्य समझ कर ही इन्हें श्रुतियाँ 'नेति नेति' कह कर पुकारती हैं। इसी प्रकार- यतो वाचो निवर्त्तन्ते अप्राप्य मनसा सह।

  • श्रुति अर्थात् "जिस तक वाणी नहीं पहुँच सकती और जो मन एवं इन्द्रियों से भी अप्राप्य है।" ऐसा कहकर श्रीकृष्ण के विहारी स्वरूप का ही संकेत किया गया है। यह विहारी श्रीकृष्ण रूप, रस, श्रृंगार, माधुर्य्य, अनुराग एवं भाव की परावधि है। किन्तु आश्चर्य की बात तो यह है कि ऐसा परात्पर तत्व, अव्यक्त ब्रह्म विहारी श्रीकृष्ण भी किसी अनिर्वचनीय दिव्या किशोरी मणि के श्रीचरणों में अपना शिखि पिच्छ विलुण्ठित करते देखा जाता है।¹ यह श्रीकृष्ण वन्दिता, आराधनीया श्रीराधा ही रसिकाचार्य्य श्रीहित हरिवंश चन्द्र की इष्ट आराध्या हैं। इनके तात्विक रूप का वर्णन करते हुए आपने बताया है- प्रेम्णः सन् मधुरोज्वलस्य हृदयं श्रृंगार लीला कला, वैचित्री परमावधिर्भगवतः पूज्यैव कापीशता। ईशानी च शची महा सुख तनुः शक्तिः स्वतन्त्रा परा, श्रीवृन्दावन नाथ पट्ट महिषी राधैव सेव्या मम।। श्रीराधा सुधानिधि, श्लो.-७८ अर्थात् "जो मधुर एवं उज्ज्वल प्रेम की प्राण स्वरूपा, शृङ्गार लीला कलाओं की विचित्रता पूर्ण परम अवधि भगवान् श्रीकृष्ण की भी आराधनीया और अनिर्वचनीय शासन कर्त्री हैं। जो ईश्वर रूप श्रीकृष्ण की शची तथा परम सुख मय वपु धारिणि परा एवं स्वतन्त्रा शक्ति हैं। श्रीवृन्दावन नाथ श्रीकृष्ण की पट्ट-महिषी श्रीराधा ही मेरी सेव्या-आराधनीया स्वामिनी हैं।" 1 रसघन मोहन मूर्त्ति विचित्र केलि महोत्सबोल्लासितम्। राधा चरण विलोडित रुचिर शिखण्डं हरिं वन्दे।। -श्रीराधा सुधा निधि, श्लोक २००