हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहित चौरासी • • ४१ अस्तु; ये सन्धि रूपा सखियाँ केवल विहार की ही सम्पन्नता नहीं सिद्ध कराती वरं सब प्रकार की सेवाओं में भी नित्य तत्पर हैं। वे श्रीवृषभानु नन्दिनी के कुञ्ज केलि प्राङ्गण की मार्जनी होने में भी अपना परम सौभाग्य मानती हैं क्योंकि इसी सेवा के कारण उन्हें युगल किशोर के एकान्त विहारावसर में 'नहिं नहिं' मधुर वचनामृत सुनने को मिलते हैं। कभी हास परिहास में वे अपनी नागर वचन रचना से श्रीस्वामिनी जी को प्रसन्न करने की चेष्टा करतीं और फिर रसद केलि का उल्लास छलका देती हैं। कभी रात भर की सुरत केलि उनींदी श्रीराधा को प्रातः स्नान कराके, सुस्वादु भोजन कराके चरण सम्वाहन का सुख लेती हैं। श्रीवृषभानु किशोरी राधा अपनी रसच्छटा से हमें सींचती रहें, हमें अपने प्रेम पूर्ण शीतल आलिंगन से कृतार्थ कर दें। हम उनके सप्रेम सिंधु की अजस्र धारा का प्रवाह करने वाले श्रीचरण-कमलों को अपने सिर पर धारण करें, ऐसी इच्छा करती रहती हैं। सखियाँ सुरत भवन चलिता राधा का समयोचित सामग्री लेकर अनुगमन करतीं और कुञ्ज रन्ध्रों से केलि का दर्शन करके अपने तन, मन एवं प्राणों को परितृप्त करती हैं। कभी सुन्दर मुकुट, नवीन चन्द्रिका, गुञ्जाहार आदि भूषण निर्माण कर युगल को धारण करातीं तो कभी सङ्केत कुञ्ज में पल्लव आस्तरण रचकर श्याम के निकट श्यामा को पहुँचाती हैं। और इसके फल में चाहती हैं, केवल राधा कृपा कटाक्ष। नव सङ्गम के समय लज्जावती श्रीराधा को प्रियतम के समीप पहुँचाकर माला, कर्पूर और ताम्बूल बीटिका आदि पहुँचाना उनके सहचरी भाव की सार्थकता है। इतना करके वे दूर खड़ी रहकर युगल के मधुर संलाप से उच्छलित अनङ्ग-तरङ्ग माला रूप प्रत्येक शब्द को सुनतीं और रति विहारावसर जनित कङ्कण किङ्किणि एवं नूपूरों की झंकार सुनकर वे रस समुद्र में डूब जाती हैं। फिर सुरत विरत श्रीराधा की कुन्तल केश माला को अपनी कोमल कराङ्गुलियों से सुलझातीं, उनकी कुच तटी में कंचुकि धारण करातीं, चरणों में नूपुर मणि मंजीर पहनातीं और तलवों में अलक्तक रस का लेपन कर अपने को सुखी करती हैं।