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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

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हित चौरासी • • ४३ मेरे कहें बिलंब न करु सखि ! भूरि भाग तो भालहिं। (जै श्री) हित हरिवंश उचित हैं चाहति स्याम कंठ की मालहिं।।

  • स्फुट वाणी पद (२) मोहनी मदन गोपाल की बाँसुरी। माधुरी श्रवन पुट सुनत सुनि राधिके! करत रतिराज के ताप कौ नासु री।। सरद राका रजनि बिपिन बृंदा सजनि! अनिल अति मंद सीतल सहित बासु री। परम पावन पुलिन भृंग सेवत नलिनु कल्पतरु तीर बलवीर कृत रासु री।। सकल मंडल भलीं तुम जु हरि सौं मिलीं, बनी वर बनित उपमा कहौं कासु री। तुम जु कंचन तनीं लाल मरकत मनी उभै कल हंस हरिवंश बलि दासु री।। हित चौरासी प. २६ नित्य रास के अवसरों पर इन सखियों के चित्त में कभी गोपियों की भाँति श्रीकृष्ण से आलिंगन, चुम्बन एवं रमण आदि की वासना नहीं जागतीं। इनका रासोत्सव श्रीराधा के सुखार्थ ही होता है- प्रसृमर पटवासे प्रेम सीमा विकासे मधुर मधुर हासे दिव्य भूषा विलासे। पुलकित दयितांसे संवलद्बाहु पाशे तदति ललित रासे कर्हि राधा मुपासे।। -श्रीराधा सु० १५९ अर्थात् "जिस रास में विस्तार प्राप्त पटवास, प्रेम सीमा का विकास, मधुर मधुर हास, दिव्य आभूषणों का विलास एवं प्रियतम के अंस पर सुवलित बाहु पाश है, उस रास में श्रीराधा की मैं कब उपासना करूँगी ?" इन तत्सुख मयी कैतव रहिता सखियों की पूर्ण प्रीति का प्रकाश हमें युगल की सुरत केलि के उपरान्त की जाने वाली सखियों की सेवा में देखने को मिलता है-