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इच्छानुसार संतान

इच्छानुसार संतान

Ichhanusar Santan

बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta) द्वारा

स्रोत: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (उद्गम)

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गुरु जी आपने मेरे ऊपर बड़ी दया की जो मेरे मस्तिष्क पर अज्ञान का पर्दा पड़ा हुआ था उसे अपने हटा कर प्रकाश दिखा दिया। सन्यासी ने कहा 'नहीं बेटा यह सब दया तो दयानन्द सरस्वती की है। जो आज हम अपने सत्य स्वरूप को जान कर स्वाभिमान के साथ संसार के सामने खड़े हो सकते हैं। यह जो कल मैंने तुम्हें वेद मन्त्र बताया था वह यजुर्वेद के चालीसवें अध्याय का आठवीं मन्त्र है। सदैव स्मरणीय गुरुवर दयानन्द सरस्वती ने अपनी आर्याभिविनय में इसका अर्थ 'इस प्रकार लिखा है।'

'वह परमात्मा आकाश के समान सब जगह में परिपूर्ण (व्यापक) है, सब जगत का करने वाला वही है और वह कभी शरीर (अवतार) नहीं धारण करता क्योंकि वह अखण्ड और अनन्त, निर्विकार है, इससे देह धारण कभी नहीं करता, उससे अधिक कोई पदार्थ नहीं है, इससे ईश्वर का शरीर धारण करना कभी नहीं बन सकता। वह अखण्डैकरस, अच्छेद्य, अमेद्य, निष्कम्प और अचल है। इससे अंशाशिभाव भी उसमें नहीं है, क्योंकि उसमें छिद्र किसी प्रकार से नहीं हो सकता नाड़ी आदि का प्रतिबन्ध भी उसका नहीं हो सकता, अति सूक्ष्म होने से ईश्वर का कोई आवरण नहीं हो सकता, वह परमात्मा सदैव निर्मल अविद्यादि जन्म-मरण, हर्ष, शोक, क्षुधा, तृषादि दोषोपाधियों से रहित है, शुद्ध की उपासना करने वाला शुद्ध हो होता है और मलिन का उपासक मलिन ही होता है, परमात्मा कभी अन्याय नहीं करता क्योंकि वह सदैव न्यायकारी ही है त्रकालज्ञ महाविद्वान जिसकी विद्या का अन्त कोई कभी नहीं ले सकता सब जीवों के मन (विज्ञान) का साक्षी सब के मन का दमन करने वाला है, सब दिशा और सब जगह में परिपूर्ण हो रहा है। सब के ऊपर विराजमान है, जिसका आदिकरण माता-पिता उत्पादक कोई नहीं, किन्तु वही सब का आदिकरण है, उस ईश्वर ने अपनी प्रजा को यथावत सत्य, सत्यविद्या जो चार वेद उनका सब मनुष्यों के परमहितार्थ उपदेश किया है उस

इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

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