इच्छानुसार संतान
Ichhanusar Santan
बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta) द्वारा
स्रोत: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (उद्गम)
व्यवहार और कर्तव्य
गुरु जी आपने मेरे ऊपर बड़ी दया की जो मेरे मस्तिष्क पर अज्ञान का पर्दा पड़ा हुआ था उसे अपने हटा कर प्रकाश दिखा दिया। सन्यासी ने कहा 'नहीं बेटा यह सब दया तो दयानन्द सरस्वती की है। जो आज हम अपने सत्य स्वरूप को जान कर स्वाभिमान के साथ संसार के सामने खड़े हो सकते हैं। यह जो कल मैंने तुम्हें वेद मन्त्र बताया था वह यजुर्वेद के चालीसवें अध्याय का आठवीं मन्त्र है। सदैव स्मरणीय गुरुवर दयानन्द सरस्वती ने अपनी आर्याभिविनय में इसका अर्थ 'इस प्रकार लिखा है।'
'वह परमात्मा आकाश के समान सब जगह में परिपूर्ण (व्यापक) है, सब जगत का करने वाला वही है और वह कभी शरीर (अवतार) नहीं धारण करता क्योंकि वह अखण्ड और अनन्त, निर्विकार है, इससे देह धारण कभी नहीं करता, उससे अधिक कोई पदार्थ नहीं है, इससे ईश्वर का शरीर धारण करना कभी नहीं बन सकता। वह अखण्डैकरस, अच्छेद्य, अमेद्य, निष्कम्प और अचल है। इससे अंशाशिभाव भी उसमें नहीं है, क्योंकि उसमें छिद्र किसी प्रकार से नहीं हो सकता नाड़ी आदि का प्रतिबन्ध भी उसका नहीं हो सकता, अति सूक्ष्म होने से ईश्वर का कोई आवरण नहीं हो सकता, वह परमात्मा सदैव निर्मल अविद्यादि जन्म-मरण, हर्ष, शोक, क्षुधा, तृषादि दोषोपाधियों से रहित है, शुद्ध की उपासना करने वाला शुद्ध हो होता है और मलिन का उपासक मलिन ही होता है, परमात्मा कभी अन्याय नहीं करता क्योंकि वह सदैव न्यायकारी ही है त्रकालज्ञ महाविद्वान जिसकी विद्या का अन्त कोई कभी नहीं ले सकता सब जीवों के मन (विज्ञान) का साक्षी सब के मन का दमन करने वाला है, सब दिशा और सब जगह में परिपूर्ण हो रहा है। सब के ऊपर विराजमान है, जिसका आदिकरण माता-पिता उत्पादक कोई नहीं, किन्तु वही सब का आदिकरण है, उस ईश्वर ने अपनी प्रजा को यथावत सत्य, सत्यविद्या जो चार वेद उनका सब मनुष्यों के परमहितार्थ उपदेश किया है उस
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हमारे दयामय पिता परमेश्वर ने बड़ी कृपा से अविद्यान्धकार का नाशक वेद विद्यारूपी सूर्य प्रकाशित किया है और सबका आदिकरण परमात्मा है ऐसा अवश्य मानना चाहिए। ऐसे विद्या पुस्तक का भी आदिकरण ईश्वर को ही निश्चित मानना चाहिए, विद्या का उपदेश ईश्वर ने अपनी कृपा से किया है, क्योंकि हम लोगों के लिये उसने सब पदार्थों का दान दिया है तो विद्यादान क्यों न करेगा। सर्वोत्कृष्ट विद्या पदार्थ का दान परमात्मा ने अवश्य किया है तो वेद के बिना अन्य कोई पुस्तक संसार में ईश्वरोक्त नहीं है जैसा पूर्ण विद्यावान् और न्यायकारी ईश्वर है वैसा ही वेद पुस्तक भी है अन्य कोई पुस्तक ईश्वर कृत वेद तुल्य वा अधिक नहीं है।
बेटा! उस पारब्रह्म परमेश्वर के गुण गाओ साथ में उसे दिखाने वाले जगत गुरु ऋषिवर दयानन्द के ऋण को न भूलो। अब जाओ अपने माता-पिता से क्षमा माँगे और मेरा भोजन जिसे पाने के लिए मैं यहाँ आया था लाओ। सन्यासी जी भोजन पाकर चल दिए, सेठ जी के लाख कहने पर भी सन्यासी जी ने कुछ भी नहीं लिया और कहा मैंने तुमसे भोजन की भिक्षा माँगी थी उसे पा लिया और चले गये।
माता-पिता को बच्चों की शिक्षा पर विशेष ध्यान देना चाहिए। बच्चे के माता-पिता ही सर्व प्रथम गुरु हैं। वह बच्चे में पाँच वर्ष की आयु तक जैसे संस्कार, विचार, भाव अपने व्यवहार द्वारा भर देते हैं वह अन्त तक विद्यमान रहते हैं। बच्चों पर माता पिता के व्यवहार, कृत्य, वातावरण, खान-पान, रहन-सहन आदि का तत्काल प्रभाव पड़ता है। इसलिए बच्चों का जीवन सफल बनाने के लिए अपने जीवन को सादा, सात्विक, धार्मिक और सत्य मय बनाना पड़ेगा, तभी सन्तान भी वैसी ही होगी। बुद्धिमान जन गुरु के द्वारा सन्तानों को सर्वदा नाना प्रकार के शुभ गुणों में लगावें। यदि वे विद्वान्, शीलवान्, गुणवान् हो जाते हैं। तो वह स्वयं पूजित होते हैं और उनके द्वारा देश जाति का गौरव ऊँचा होता है और
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अपने गुण कर्म स्वभाव से देश को उच्च शिखर पर पहुँचा देता है।
माता शत्रुः पिता वैरी येन बालो न पाठितः।
न शोभते सभामध्ये हैसमध्येबको यथा॥
चाणक्य नीति २/१२
अर्थ- वह माता शत्रु है और वह पिता वैरी है जिसने अपने बालकों को नहीं पढ़ाया। वह सभा के बीच में ऐसे ही सोहता है, जैसे हंसों के बीच बगुला।
विद्या वह गुप्त धन है जिसे कोई चुरा नहीं सकता तथा जो वितरण करने से कम नहीं होता परन्तु बढ़ता है। विद्या में कामधेनु के समान गुण हैं, क्योंकि कुसुमय में भी यह फल देती है और विदेश में यह माता के समान है। इसीलिए विद्या को गुप्त धन कहा गया है। जो माता-पिता अपनी सन्तानों के लिये बहुत-सा पार्थिव धन छोड़ जाते हैं। उनकी सन्तानें उस धन से कुमार्गी होकर धन तथा स्वास्थ्य को खो बैठती हैं। इसलिये माता-पिता को योग्य है कि यदि वह अपनी सन्तानों को सुयोग्य, सुकर्मों देखना चाहते हैं तो वह धन, सम्पत्ति की अपेक्षा विद्यारूपी गुप्त धन ही देकर जायें। क्योंकि मुद्रारूपी धन से भाई-भाई में वैमनस्य हो जाता है और विद्या रूपी धन से स्नेह, प्रीति और सहयोग होता है।
व्यवहार और कर्तव्य
यज्ञोऽनुत्तेन क्षरति तपः क्षरति विस्मयात्।
आयुर्वि प्रापवादेन दान च परिकीर्तनात्॥
मनु ४/२३७
अर्थ- असत्य भाषण से यज्ञ नष्ट होता है, विस्मय से तप तथा ब्राह्मणों की निन्दा से आयु और चारों ओर कहने से दान घटता है।
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न देवो विद्यते काष्ठे न पाषाणे न मूरामये। भावे हि विद्यते देवस्तस्माद्भावोहि कारणम्॥
चाणक्य नीति ८/११
अर्थ- देवता काठ में नहीं है न पत्थर में है, न मिट्टी की मूर्ति में है, देवता भाव ही में विद्यमान है, इस हेतु भाव ही सबका कारण है।
देवदत्तां पतिभ्यां विन्दते नेच्छात्तमनः। तां साध्वीं विभुयान्नित्यं देवानां प्रियमाचरन्॥
मनु ९/१५
अर्थ- देवतां की दी हुई भार्या को पति पाता है कुछ अपनी इच्छा से नहीं, इसलिये देवतां का प्रियाचरण करता हुआ उस सती का नित्य-पालन करे।
मूर्खा यत्र न पूज्यन्ते धान्यं यत्र सुसन्धितम्। दम्यत्योः कलाहो नास्ति तत्र श्रीः स्वयमागता॥
चाणक्य नीति ३/२१
अर्थ- जहाँ मूर्ख नहीं पूजे जाते, जहाँ अन्न संचित रहता है, और जहाँ स्त्री-पुरुष में कलाह नहीं होता, वहाँ लक्ष्मी स्वयं विद्यमान रहती है।
स्त्री (वज्र) तलवार के समान है। यदि तलवार को म्यान में सुरक्षित रखने के समान स्त्री को भी सुरक्षित रूप से उचित व्यवहार, कर्तव्य और अधिकारों के साथ गृह में रखा जाय तो वह भी तलवार के समान समय पर अपनी तथा परिवार की रक्षा का साधन होती है और अपना सहारा भी होती है। यद्यपि उसे अरक्षित रखा जाय तो वह रखने वाले की ही घातक हो जाती है।
पितृभिर्घ्रातृभिश्चैताः पतिभिर्देवैरस्तथा। पूज्या भूषयितव्याश्च बहुकल्याण मीप्सुभिः॥
मनु ३/५५
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अर्थ- अपनी बहुत भलाई चाहें तो पिता भाई पति और देवर भी (वस्त्रालंकारादि से) इनका पूजन (सत्कार) करें।
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।
यत्रैतास्सु न पूज्यन्ते सर्वासन्नाऽफलाः क्रियाः॥
मनु ३/५६
अर्थ- क्योंकि जिस कुल में स्त्रियाँ पूजी जाती हैं, वही देवता रमते हैं और जहाँ इनका पूजन सत्कार नहीं होता, वही सम्पूर्ण कर्म (यज्ञादि) निरर्थक हैं।
शोचन्ति जामयो यत्र विनश्यत्याशु तत्कूलम्।
न शोचन्ति तु यत्रैता वर्थते तद्धि सर्वदा॥
मनु ३/५७
अर्थ- जिस कुल में स्त्रियाँ दुःखित हो शोक करती हैं, वह कुल शीघ्र नाश को प्राप्त हो जाता है, जहाँ ये शोक नहीं करतीं, वह कुल सर्वदा बढ़ता है।
स्त्रियां तु रोचमानायां सर्वं तद्रोचते कुलम्।
तस्यां त्वरोचमानायां सर्वं मेव न रोचते॥
मनु ३/६२
अर्थ- स्त्री (वस्त्राभूषणादि से) शोभित हो तो सम्पूर्ण कुल की शोभा है और उसके मलीन होने से सम्पूर्ण कुल मलीन रहता है।
सन्तुष्टो भायाया भर्ता भर्ता तथैव च।
यस्मिन्नेव कुले नित्यं कल्याणां तत्रैव ध्रुवम्॥
मनु ३/६०
अर्थ- जिस कुल में नित्य स्त्री से पति और पति से स्त्री प्रसन्न रहती है। उस कुल में निश्चय कल्याण होता है।
यदि हि स्त्री न रोचेत पुमांसं न प्रभोदयेत्।
अप्रभोदात् पुनः पुंसः प्रजनं प्रवर्तते॥
मनु ३/६२
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अर्थ- यदि स्त्री पुरुष पर रुचि न रखे वा पुरुष को प्रहर्षित न करे तो अप्रसन्नता से पुरुष के शरीर में कामोत्पत्ति कभी न होकर सन्तान नहीं होती और यदि होती है तो दुष्ट होती है।
स्त्री पुरुष का मन से, वचन से और कर्म से कभी भी अपमानित न करे, इसी प्रकार पुरुष भी स्त्री का मन, वचन और कर्म से अपमानित न करे।
अनतावृतुकाले च मन्त्रसंस्कारकृत्यतिः।
सुखस्य नित्य दातेह परलोकं च योषितः॥
मनु ५/१५३
अर्थ- मन्त्र संस्कार (विवाह) करने वाला पति ऋतु और अनुतु में सुख देने वाला है, उसकी सेवा से यहाँ और परलोक में भी सुख प्राप्त होता है।
न दानैः शुध्यते नारी नोपवासशत्रैरपि।
न तीर्थं सेवया तद्भ्यदतुः पादोदकैर्यथा॥
चाणक्य नीति १७/१०
अर्थ- न दानों से, न सैकड़ों उपवासों से न तीर्थ के सेवन से, स्त्री वैसी शुद्ध होती है, जैसी स्वामी के चरण सेवा से अर्थात् पति सेवा से।
अशीलः कामवृत्ता वा गुणैर्वा परिर्वजितः।
उपचर्यः स्त्रिया साध्या सतत देववत्पतिः॥
मनु ५/१५४
अर्थ- पति शील रहित कामी तथा विद्यादि गुणों से हीन भी हो तथापित अच्छी स्त्री को देववत् आराधन योग्य है।
नास्ति स्त्रीणां पृथयज्ञो न व्रत नाप्यपोषिताम्।
पतिं शुश्रूषते येन तेन स्वर्गं महीयते॥
मनु ५/१५५
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अर्थ- स्त्रियों का अलग कोई यज्ञ नहीं, न व्रत न उपवास केवल एक पति की शुश्रूषा से स्वर्ग में पूज्य हो जाती है।
पाणिग्रहस्थ साध्वी स्त्री जीवतो वा मृतस्य वा।
पतिलोकम भीष्मन्ती नाचरेतिकञ्चदप्रियम्॥
मनु ५/१५६
अर्थ- पति की इच्छा करने वाली स्त्री जीवित या मृत पति को अप्रिय कोई कर्म न करे।
जिस समय श्री रामचन्द्र जी बन जा रहे थे उस समय उनकी माता कौशिल्या ने भी साथ बन चलने को कहा उस समय यह उपदेश रामचन्द्र जी ने अपनी माता को दिया था।
भर्तृः किल परित्राया नृशंसः केवलं स्त्रियाः।
स भवत्या न कर्तव्यो मनसापि विग्रहितः॥
वाल्मीकि रामायण अयोध्या काण्ड २०/१२
अर्थ- स्त्री के लिये पति का त्याग करना बड़ा निन्दित कर्म है, वह निन्दित कर्म आपको मन में भी नहीं लाना चाहिये।
यावज्जीवति काकृत्यस्थः पिता मे जगतीपतिः।
शुश्रूषा क्रियतां तावत्स हि धर्मः सनातनः॥
बा- रा- अयोध्या काण्ड २४/१३
अर्थ- जब तक मेरे पिता जीवित हैं तब तक आप उनकी सेवा करती रहें, यही प्राचीन धर्म है।
जीवन्त्या हि स्त्रिया भर्ता देवतं प्रभुरेव च॥
बा- रा- अयोध्या काण्ड २४/२१
अर्थ- स्त्री के जीते जी उसका पति ही उसका देवता और स्वामी है।
ब्रतोपवासनिरता या नारी परमोत्तमा॥
भर्तारं नानुवर्तत सातु पापगतिर्भवतु।
भर्तुः शुश्रूषया नारी लभते स्वर्गमृतम्॥
बा- रा- अयोध्या काण्ड २४/२५, २६
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अर्थ- कोई स्त्री कितनी श्रेष्ठ हो और चाहे नाना प्रकार के व्रत एवं उपवास करती हो, किन्तु यदि वह अपने पति की सेवा करती हुई उसकी अनुयायिनी नहीं होती तो वह नरक में जाती है। पति की सेवा से स्त्री उत्तम स्वर्ग को प्राप्त करती है।
अपि या निर्गमस्कारा निवृत्ता देवपूजनात्।
शुश्रूषामेव कुर्वीत भर्तुः प्रियहिते रता॥
वा० रा० अयोध्या काण्ड २४/२७
अर्थ- वह चाहे किसी पूज्य को नमस्कार भी न करे और चाहे किसी देवता की पूजा तक भी न करे। अपने पति के प्रिय तथा हितकारी कार्य में तत्पर स्त्री स्वामी की सेवा ही करती रहे।
एषधर्मः पुरा दृष्टो लोके वेदे श्रुतः स्मृतः।
अग्निकार्येषु च सदा सुमनोभिश्च देवताः॥
वा० रा० अयोध्या काण्ड २४/२८
अर्थ- स्त्रियों का यही धर्म प्राचीन काल से चला आ रहा है। यही वेद विहित है और यही लोक में प्रचलित है। हे माता जी! आप यहाँ मन लगा कर अग्निहोत्रादि, विद्वान् तथा व्रतशील ब्राह्मणों की सेवा करती रहें।
एक सन्यासी जंगल में तप कर रहे थे। एक दिन उनके ऊपर चिड़िया ने बीट कर दी सन्यासी ने क्रोधित हो चिड़िया की ओर देखा, देखते ही चिड़िया भस्म होकर भूमि पर गिर पड़ी। सन्यासी ने समझा कि अब मेरा तप पूर्ण हो गया। वह जब नगर में भिक्षा मांगने गये तो एक गृह पर जाकर भिक्षा माँगी, अन्दर से स्त्री ने कहा अभी आती है, कुछ देर बाद सन्यासी ने पुनः पुकारा तो अन्दर से ध्वनि आई अभी आती है, जब अन्दर से कोई नहीं आया तो सन्यासी ने पुनः पुकारा और अन्दर से ध्वनि आई, आती है, तत्काल एक स्त्री अन्दर से आटा लेकर आई, सन्यासी ने क्रोध की दृष्टि से स्त्री को देखा। स्त्री सन्यासी को क्रोधित देखकर कहने लगी, महाराज मैं वन की चिड़िया नहीं
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वीरेन्द्र गुप्तः
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हूँ जो भस्म हो जाऊँ। सन््यासी ने चकित होकर स्त्री से पूछा, देवी तुम्हें कौन-सी शक्ति प्राप्त है जिससे तुमने यह जान लिया कि मैंने वन में चिड़िया को भस्म किया था। स्त्री ने कहा महाराज यह शक्ति मुझे पति सेवा से प्राप्त हुई है। जब आपने भिक्षा माँगी थी उस समय मैं अपने पति की सेवा कर रही थी, जब सेवा से निवृत्त हुई तभी आपके लिए आटा लाई हूँ।
महाभारत
पति यानाभिचरति मनो वाग्देहसंयता। सामर्तूलोकमाप्नोति सधिदः साध्वीतिचोच्यते॥
मनु ५/१६५
अर्थ- मन वाणी देह से जो पति को दुःख नहीं देती वह पति लोक को प्राप्त होती है और अच्छे पुरुष उसको साध्वी कहते हैं।
पुरुषों को पर स्त्री गमन नहीं करना चाहिए और स्त्रियों को पर पुरुष गमन नहीं करना चाहिए। क्योंकि इस कर्म के करने से स्त्री पुरुष दोनों को ही इस पाप कर्म का फल भोगना होता है।
न ही दूशमानायुष्यं लोके किञ्चन विद्यते।
यादृशं पुरुषस्येह परदारोपसेवनम्॥
मनु ४/१३४
अर्थ- इस प्रकार का आयुक्षय करने वाला संसार में दूसरा कोई कर्म नहीं है (जैसा मनुष्य की आयु घटाने वाला) दूसरे की स्त्री का सेवन है।
परदारान् गच्छेच्च मनसापि कथञ्चन।
किमु वाचास्थिबन्धोऽपि नास्ति तेषु व्यवधानिम्॥
विष्णु पुराण ३/१२/१२३
अर्थ- पर स्त्री से तो वाणी से क्या मन से भी प्रसंग न करे, क्योंकि उनसे मैथुन करने वालों को अस्थि बन्धन भी नहीं होता अर्थात् उन्हें अस्थि शून्य कीटादि होना पड़ता है।
इस लिये स्त्रियों पतिव्रता और पुरुष पत्नीव्रत धर्म का पालन करें।
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साभार्या या शुचिर्दक्षा सा भार्या या पतिव्रता। सा भार्या या पतिप्रीता सा भार्या सत्यवादिनी॥
षाणव्य नीति ४/१३
अर्थ- भार्या वही है जो पवित्र और चतुर हो, भार्या वही है जो पतिव्रता है, भार्या वही है जो पति से प्रीति रखती है भार्या वही है जो सत्य बोलती है।
पिता रक्षति कोमारे भर्ता रक्षति यौवन।
रक्षन्ति स्थिरिरे पुत्रा न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति॥
मनु १/३
अर्थ- बाल्याऽवस्था में पिता रक्षा करता है। यौवन में पति रक्षा करता है। बुढ़ापे में पुत्र रक्षा करते हैं। स्त्री स्वातन्त्रता के योग्य नहीं।
तथा नित्यं यतेयातां स्त्रीपुंसौ तु कृतक्रियौ।
यथा नाभिचरेतां तौ विमुक्वावितरेतरम्॥
मनु १/१०२
अर्थ- विवाह वाले स्त्री पुरुषों को सदा ऐसा यत्न करना चाहिये जिसमें कभी आपस में जुदाई न हो।
आदर्श नारी के छः रूप
परामर्श में है मन्त्री सी, सेवा में नित दासी है।
भोजन में है माता सम, शयन-समय रंभा-सी है॥
धर्म-कर्म में सदा सगिनी, रोष-सहिष्णु धरा-सी है।
छः आदर्श गुणों से शोभित नारि पुण्य की राशि है॥
अधिकोश देखा गया है विवाह से पूर्व माता पुत्र में प्रेम, स्नेह बना होता है और विवाह के पश्चात् यह बात नहीं रहती। कहीं माता रुष्ट होती है कहीं पुत्र। विवाह से पूर्व पुत्र का पूरा प्रेम माता पर ही रहता है। विवाह के पश्चात् वह प्रेम अपनी पत्नी की ओर स्वभावता खिंचकर माता की ओर से कम हो जाता है।
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यह प्राकृतिक बात है। परन्तु मातायें उसको यह समझ बैठती हैं कि वह ने घर में आते ही लड़के को भड़का कर मुझसे बोलना कम करा दिया। बस यहीं सास वह, माता पुत्र के बीच अज्ञानता के कारण वैमनस्य की दीवार खड़ी हो जाती है। जब माता वह को, चेत कर बुरा भला कहती है तो पुत्र समझता है कि माता को हमारे प्रेम से चिढ़ है और माता सोचती है वह ने पुत्र को मेरे विरुद्ध कर दिया। परन्तु ना तो माता दाम्पत्य प्रेम से चिढ़ती है और न वह पुत्र को माता के विरुद्ध करती है। यह दोनों की अज्ञानता का कारण है।
“प्रेम विकसित नहीं सीमित है।”
जो प्रेम विवाह से पूर्व माता-पिता भाई बहिनों आदि में विभक्त रहता है वही प्रेम विवाह के पश्चात् सब ओर से खिंचकर पत्नी में केन्द्रित होने लगता है। यही कारण है कि विवाह के पश्चात् माता-पिता आदि से प्रेम का कुछ अंश में कम हो जाना।
स्त्री प्रेम की प्रतिमा है वह प्रेम चाहती है। चाहे वह प्रेम माता का हो, सास का हो, पुत्र का हो या पति का हो। चूड़्यावस्था में माता को पुत्र के प्रेम की आशा होती है यदि वह उस प्रेम को कम करके विवाह के पश्चात् पत्नी को दे देता है तो उससे माता को स्वाभाविक ठेस पहुँचोगी। परन्तु वह माता यह नहीं सोचती कि यदि पुत्र ने अपने प्रेम का मेरा अंश कम करके अपनी पत्नी को दे दिया तो क्या हो गया। क्या वह अपने माता-पिता के भाग का प्रेम का अंश मुझे नहीं देगी? वह अपने माता-पिता का प्रेम सास ससुर को देती है और यदि पुत्र वधू को सास का भी प्रेम प्राप्त हो जाय तो उसके हृदय में जितना सास का प्रेम स्थान ले चुका है उतना कम स्थान पति का प्रेम लेगा। क्यों?
“जिस प्रकार प्रेम सीमित है उसी प्रकार प्रेम का स्थान भी सीमित है।”
फिर पुत्र का बचा हुआ प्रेम पुनः माता की ओर खिंचेगा
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और माता पुत्र के प्रेम को पुनः प्राप्त करेगी।
यह मनोवैज्ञानिक बात है यदि इस पर पूर्ण विवेचना के साथ मनन किया जाय तो माता पुत्र, सास बहु का क्लेश समाप्त होकर सुख और शान्ति का जीवन व्यतीत होने लगे। माता को पुत्र वधू पर अपने प्रेम द्वारा इतना प्रभाव डालना चाहिये कि वह सास को अपनी माता ही समझने लगे। बालक माता से ही अपनी सारी व्यथा कह सकता है अन्य से नहीं। इसलिये पुत्र वधू और अपनी पुत्री को माता एक ही समान समझे।
सास भली, निज कन्या-पुत्र वधू को करती है सम प्यार। सास-बुरी, कर वधू अनाहत, करती कन्या का सत्कार।।
यं माता पितरौ क्लेश सहेते सम्भवे नृणाम्।। न तस्यनिष्कृतिःशक्या कर्तुं वर्षशतैरपि।।
मनु २/२२७
अर्थ- मनुष्यों की उत्पत्ति और पालन में जो क्लेश माता पिता सहते हैं उस क्लेश का बदला सौ वर्ष में भी नहीं हो सकता।
तयोर्नित्यं प्रियं कुर्यादाचार्यस्य च सर्वदा।
तेष्वेव त्रिषु तुष्टेषु तपः सर्वं समाप्यते।।
मनु २/२२८
अर्थ- माता-पिता और गुरु का सर्व कार्य में नित्य प्रिय करे। इन तीनों की ही प्रसन्नता होने पर सम्पूर्ण तप पूरा होता है।
यावत्त्रयस्ते जीवेषुस्तावन्नानांन्यं समाचदेत।
तेष्वेव नित्यं शुश्रूषां कुर्यात्प्रियहिते रतः।।
मनु २/२३५
अर्थ- इस कारण उनकी प्रीति और हित में परायण होता हुआ जब तक वे जीवें तब तक चाहे और कुछ न करे, किन्तु उनकी नित्य शुश्रूषा करे।
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वीरेन्द्र गुप्तः
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आकाशशास्त्रविज्ञो
बालवृद्धकृशातुरा।
प्राता ज्येष्ठः समः पित्रा भार्या पुत्राःस्वकान्तुः॥
मनु ४/१८४
अर्थ- बालक, वृद्ध, कृश, आतुर ये आकाश के स्वामी (निराधार) हैं और ज्येष्ठ प्राता पिता के तुल्य है। भार्या और पुत्र अपने शरीर के तुल्य हैं। इससे विवाद करना उचित नहीं।
देवतातिथिभृत्यानां पितृणामात्मनश्च यः।
न निर्वपति पञ्चानामुक्छवसन्न स जीवति।
मनु ३/७२
अर्थ- देवता, अतिथि, भृत्य, माता-पिता आदि और आत्मा इन पाँचों को अन्न न दे तो जीता हुआ भी मरे के तुल्य है।
देवता का अन्न यज्ञ और वलिवैश्य अर्थात् यज्ञ करना और अन्न की दस आहुति देना। अतिथि सत्कार, माता-पिता की शुश्रूषा और भोजन से सत्कार करना, आत्मा का भोजन अन्न तथा वेदादि धर्म ग्रन्थों का स्वाध्याय करना है।
पितेव पालयेत्पुत्रान्न्येष्टो प्रातुन् यवीयसः।
पुत्रवच्चापिवर्तैर्न ज्येष्ठे भ्रातरि धर्मतः॥
मनु ९/१०८
अर्थ- ज्येष्ठ प्राता छोटे भाइयों का पिता पुत्र के समान पालन करे और छोटे भाई भी बड़े भाई को धर्म से पिता के समान मानें।
लालयेत् पञ्च वर्षाणि दशवर्षाणि ताडयेत्।
प्राप्ते तु षोडशे वर्षे पुत्रे मित्रवदाचरेत्॥
षाणवयनीति ३/१८
अर्थ- पुत्र को पाँच वर्ष की आयु तक प्यार करे, फिर दस वर्ष तक ताड़ना करे अर्थात् १५ वर्ष तक और सोलहवर्षे वर्ष की प्राप्ति होने पर उसके साथ मित्र के समान आचरण करे।
हृच्छानुसार सन्तान
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वीरेन्द्र गुप्तः
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लालनाद् पहवदोषास्ताडनाद् बहवो गुणाः। तस्मात्पुत्रव्य शिष्यव्य ताडयेन्न तु लालयेत्॥
चाणक्य नीति २/१२
अर्थ- लाड़ करने से बहुत दोष होते हैं और ताड़ना देने से बहुत गुण, इसलिए पुत्र और शिष्य को ताड़ना देता रहे, लाड़ न करे।
अति प्रत्येक कार्य में हानिप्रद होती है। बच्चों को अति प्यार करना अर्थात् स्नेह के कारण उन्होंने जो भी कार्य उचित अनुचित किया उससे कुछ न कहा, या अति क्रोध अर्थात् बच्चों ने कोई किञ्चित भी कार्य नहीं किया या बिगाड़ दिया तो उसे अति दण्ड दिया। यह दोनों ही बातें बच्चों को बिगाड़ देती हैं। परन्तु बिगाड़ ही नहीं देतीं वरन् इस कारण बच्चे अपने हाथों से भी निकल जाते हैं। इसलिए बच्चों को समयानुसार प्यार और ताड़ना दोनों ही करने चाहिये। जिसका व्यवहार क्रम चाणक्य ने कहा है।
पुत्र औ पुत्रियां में कोई भेद माता-पिता को नहीं रखना चाहिए दोनों के साथ समान व्यवहार करना उचित है। वे दोनों ही आत्मज हैं।
माता भली, पुत्र-कन्या का पालन करती एक समान।
माता बुरी, डांटती कन्या को, सुत का करती सम्मान॥
गाय अपने बच्चे को कितनी ममता प्यार से पालती है। वह अपना दूध पिलाकर उसे प्रसन्न देखना चाहती है, जब बच्चा कहीं चला जाता है तो गाय डकरा डकरा कर उसे पुकारती है। हालाँकि मनुष्य शरीर में स्त्री भी इसी प्रकार बच्चे का पोषण करती है परन्तु अन्तर इतना ही है कि वह गाय निस्वार्थ बच्चे का पोषण करती है। वह यह विचार कर बच्चे को नहीं पालती कि जब बड़ा हो जायगा तो वह मेरे लिए जंगल से हरी-हरी घास लाकर देगा या मुझे ठण्डा जल लाकर पिलायेगा, मेरी सेवा करेगा वह
इच्छानुसार सन्तान
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वीरेन्द्र गुप्तः
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यह कुछ नहीं चाहती परन्तु अपने सब कार्य पहले की भाँति वैसे ही स्वयं करती रहती है। परन्तु मनुष्य स्वार्थ के साथ बच्चे का पोषण करते हैं, कि वह हमारी बुढ़ापे में सेवा करेगा और जब वह सेवा नहीं करता तो दुःख होता है। क्यों! क्योंकि स्वार्थ पूर्ण पोषण किया गया था। परन्तु गाय को कभी इस बात का कष्ट नहीं होता, क्योंकि वह निःस्वार्थ बच्चे को पालती है इसी प्रकार हम मनुष्यों को गाय से शिक्षा लेनी चाहिए कि हम अपनी सन्तान का निःस्वार्थ भाव से पोषण करें और जब बालक योग्य हो जाये तो उससे अपनी सेवा न लेकर स्वयं वानप्रस्थ आश्रम में चले जायें।
अभिवादन शीलस्य नित्य वृद्धोपसेविनः।
चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुविद्यायशोबलं॥
मनु २।२२२
अर्थ- जो प्रतिदिन वृद्धों की सेवा करता है और अभिवादन (नमस्ते) करने के स्वभाव वाला है, उसकी चार वस्तु बढ़ती हैं। आयु, विद्या यश और बल।
मात्रा स्वस्वा दुहित्रा वा विवकासनोभवैत्।
बल वानिन्द्रयग्रामो विद्वांसमपि कर्षति॥
मनु २।२२५
अर्थ- माँ या बहिन या लड़की के साथ एकान्त स्थान में न बैठे, क्योंकि अति बलवान् इन्द्रियों का गुण विद्वान् पुरुष को भी खींच सकता है।
सुवासिनी कुमारीश्च रोगिणो गर्भिणीः स्त्रियः।
अतिथिभ्योऽग्रवैतान्मोजयेद विचारयन्॥
मनु ३।१२४
अर्थ- सुवासिनी (जिनका अभी विवाह हुआ हो) कुमारी, रोगी व्यक्ति तथा गर्भवती स्त्री इनको अतिथि के पहले ही बिना विचार भोजन करा देवे।
इच्छानुसार सन्तान
१९७
वीरेन्द्र गुप्तः
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सदा प्रहृष्टया भाव्यां गृहकार्येषु दक्षया। सुसंस्कृतोपस्करया व्यये चामुक्तहस्तया॥
मनु ५/१५०
अर्थ- सर्वदा प्रसन्न चित्त और घर के कामों में चतुर तथा घर के बर्तन भीड़े ठीक रखे और व्यय करने में स्त्री सर्वदा हाथ सिकोड़े रहे।
यत्कर्म कुर्वातोऽस्य स्यात्परितोषोन्तरात्मनः।
तत्प्रयत्ने कुर्वीत विपरीतं तु वर्जयेत्॥ मनु ४/१६१
अर्थ- जिस कर्म के करने से कर्म करने वाले पुरुष का अन्तरात्मा प्रसन्न हो, वे कर्म यत्न पूर्वक करे और इसके विपरीत कर्मों को छोड़ दे।
धन धान्य प्रयोगेषु विद्यासंग्रहणेषु च।
आहारे व्यवहारे च त्यक्तलज्जः सुखी भवेत्॥
षाणक्य नीति ७/२
अर्थ- धन धान्य के व्यापार में, विद्या के संग्रह करने में और आहार व्यवहार में जो पुरुष संकोच न करेगा, वही सुखी होगा।
संतोषस्त्रिषु कर्त्तव्यः स्वदारे भोजने धने।
त्रिषु चैध न कर्त्तव्योऽध्ययने जपदानयोः॥
षाणक्य नीति ७/४
अर्थ- अपनी स्त्री, भोजन और धन, इन तीनों में सदैव सन्तोष करना चाहिये, परन्तु अध्ययन (पढ़ना) जप और दान इन तीनों में कभी सन्तोष न करना चाहिए।
पादाभ्याम् न स्पृशेदग्निं गुरु ब्राह्मणमेव च।
नैव गां न कुमारी च न वृद्धं न शिशुं तथा॥
षाणक्य नीति ७/६
अर्थ-अग्नि, गुरु और ब्राह्मण इनको पैर से कभी नहीं छूना चाहिए, और न गौ को, न कुमारी को, न वृद्ध को और न बालक को ही।
इच्छानुसार सन्तान
१९८
वीरेन्द्र गुप्तः
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नात्यन्तं सरलैर्भाव्यं गत्वां पश्य वनस्थलीम्।
छिद्यन्ते सरलास्तत्रकृष्णस्तिष्ठन्ति पादपाः॥
चाणक्य नीति ७/१२
अर्थ- अत्यन्त सीधे स्वभाव का नहीं होना चाहिए वन में जाकर देखो, वहाँ सीधे वृक्ष काट डाले जाते हैं, और टेढ़े खड़े रहते हैं।
वित्तं देहि गुणान्विते षु मतिमन्वान्यत्र देहि कृचित्।
प्राप्तं वारिनिधेर्जलं धनमुखे माधुर्ययुक्तं सदा॥
जीवान्स्थावर जगमांश्च सकलान्सञ्जीव्य भूमण्डलं।
भूयः पश्य तदेव कोटिगुणित गच्छेत् मम्प्यनिधिम्॥
चाणक्य नीति ८/४
अर्थ- हे मतिमान्! गुणियों को धन दो, अन्यत्र कहाँ भी न दो क्योंकि समुद्र का जल बादल के मुख में प्राप्त होकर सदा मीठा हो जाता है। देखो वही जल भूमण्डल के सब चराचर जीवों को जिलाकर फिर कोटि गुणा होकर उसी समुद्र में चला जाता है।
यत्किंचिदपि दातव्यं याचितेनाऽनुसूयया ।
उत्पश्यते हि तत्प्राप्तं यत्तारयति सर्वतः॥
मनु ४/२२८
अर्थ- दोष न लगाकर कोई अपने से कुछ माँगो तो यथा शक्ति कुछ न कुछ देवे ही, क्योंकि देने वाले को वह पात्र भी कभी मिल जावेगा जो कि सबसे तार देगा।
अपने अथवा अपनी सन्तान के जीवन को इतना अधिक महंगा न बनाओ, जिसकी पूर्ति के लिये अनीति से धन अर्जित करने को बाध्य होना पड़े।
अन्यायोपासितं द्रव्यं दशवर्षाणि तिष्ठति।
प्राप्ते चैकादशे वर्षे समूलं च विनश्यति॥
चाणक्य १५/६
इच्छानुसार सन्तान
११९
वीरेन्द्र गुप्तः
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अर्थ- अनीति से अर्जित धन दस वर्ष पर्यन्त ठहरता है, और ग्यारहवें वर्ष के प्राप्त होने पर मूल सहित नष्ट हो जाता है। अर्थात् अन्याय का धन थोड़े ही दिन रहता है।
बिना श्रम किये कुछ भी खाना महान पाप है।
बिना श्रम अथवा बिना मूल्य की मिली खीर से अपने श्रम का रूखा - सूखा टुकड़ा अति श्रेष्ठ है।
अनावश्यक वस्तु को प्राप्त करने की इच्छा रखना पाप है।
द्वारम्भसि निवेष्ट व्योगले वृद्धा दृढां शिलाम्।
धनवन्त मदातारम् दरिद्रव्या तपस्विनम्॥
बिदुर
अर्थ- दो व्यक्तियों को गले में भारी शिला बाँध कर पानी में डुबो देना चाहिये। १- जो धनवान होकर दानी नहीं है। २- जो गरीब होकर तपस्वी अर्थात् दुःख सहन करने की सामर्थ्य नहीं रखता और पुरुषार्थी भी नहीं।
नमस्या मो देवान् ननु हत विधेस्तेऽपि वशगा,
विधि वन्धीः सोऽपि किं प्रति नियत कर्मैक फलदः।
फलं कार्यायत यदि किं म मरैः किं च विधिना,
न मस्तु कर्मभ्यो विधि-रपिन मेभ्यः प्रभवति॥
भर्तहरि
अर्थ- हम देवताओं को नमन क्यों करें। किन्तु वह भी कठोर विधि के हाथ में हैं। तो विधि को वन्दना करनी चाहिये, किन्तु विधि भी हमारे नियत कर्म के अनुसार फल देती है। यदि फल कर्मों के अधीन है तो फिर क्या देवताओं से क्या विधि से प्रयोजन, इस लिये हम इन कर्मों को ही नमन करते हैं जिन पर विधि का कोई प्रभाव नहीं है अर्थात् कर्म स्वतन्त्र है।
एकं हन्यानवां हन्यात् इषुर्मुक्तो धनुष्यता।
बुद्धि बुद्धिमतोत्सृष्टा राष्ट्रं हन्यात्स राजकम्।
इच्छानुसार सन्तान
२००
वीरेन्द्र गुप्तः
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सन्तति निरोध
अर्थ- धनुषारी से चलाया गया वाण एक को भी मारे या न मारे। किन्तु बुद्धिमान से बुद्धि में चुक करने पर बुद्धि राजा के साथ राष्ट्र को भी ध्वस्त कर देती है।
निन्दन्तु नीतिनिपुणा यदि वा स्तुवन्तु।
लक्ष्मीः समाविशतु गच्छतु वा यथेष्टम्॥
अद्यैव वा मरणमस्तु युगान्तरे वा।
न्यायात्पथः प्रविचलन्ति पदं न धीराः॥
भर्तृहरि नीति शतक ८५
अर्थ- नीति में पारंगत चाहे प्रशंसा करे या निन्दा, धन अपने पास आये या जाय, आज मरे या कल्यान्त में, परन्तु धीर पुरुष न्याय के मार्ग से एक पग भी विचलित नहीं होते।
वृत्तं यत्नैन संरक्षेत, वितभायति याति च।
अक्षीणो वित्ततः क्षीणः, वृत्ततस्तु हतो हतः॥
अर्थ- चरित्र को यत्न से रक्षित करना चाहिये, द्रव्य आता है और जाता है। धन से रहित व्यक्ति क्षीण नहीं होता, चरित्र से हीन व्यक्ति नष्ट हो जाता है।
शतं विहाय भोक्तव्यं, सहस्रं स्नान माचरेत्।
लक्षं विहाय दातव्यं, कोटिं त्यक्त्वा हरि भजते॥
महाभारत
अर्थ- सौ काम छोड़कर भोजन करना, हजार काम छोड़ कर स्नान करना चाहिये। लाख काम छोड़ कर दान और करोड़ों कार्यों को त्याग कर प्रभु भजन अर्थात् सन्ध्योपासनादि यज्ञकर्म करना।
एकेन तत् समर्ज्यैव, द्वाभ्यां शत गुणं भवेत्।
त्रीभिः शत सहस्रं च, अनन्तं तज्जनैः सह॥
व्याघ्रपाद स्मृति
अर्थ- जो अकेला बैठ कर उपासना करता है उसे एक का फल मिलता है, जो दो मिलकर उपासना करते हैं उन्हें सौ
इच्छानुसार सन्तान
२०१
वीरेन्द्र गुप्तः
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गुना फल मिलता है, जो तीन मिलकर उपासना करते हैं उन्हें हजार गुना फल मिलता है, और जो इससे अधिक मिलकर उपासना करते हैं उनको अनन्त फल मिलता है।
गोलडसटकर साहब पैरिस अर्थात् फ्रांस देश निवासी अपनी (वायविल इन इण्डिया) में लिखते हैं । सब विद्या और भलाई का भण्डार आर्यावर्त देश है। और विद्या तथा मत इस देश से फैले हैं। और परमात्मा की प्रार्थना करते हैं कि हे परमेश्वर ! जैसी उन्नति आर्यावर्त देश की पूर्व काल में थी वैसीही हमारे देश की कीजिये।
जो उन्नति करना चाहो तो 'आर्य समाज' के साथ मिलकर उसके उद्देश्यानुसार आचरण करना स्वीकार कीजिये नहीं तो कुछ हाथ न लगेगा। क्योंकि हम और आपको अति उचित है कि जिस देश के पदार्थों से अपना शरीर बना, अब भी पालन होता है, आगे भी होगा, उसकी उन्नति तन, मन, धन से सब जने मिलकर प्रीति से करें। इसलिये जैसा आर्य समाज आर्यवर्त देश की उन्नति का कारण है वैसा दूसरा नहीं हो सकता।
सत्यार्थ प्रकाश एकादशसमुल्लास सब प्रकार से अपनी उन्नति करना चाहो तो आर्य समाज के सत्संगों में अवश्य जाया करो।
★★★
इच्छानुसार सन्तान
२०२
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