इच्छानुसार संतान
Ichhanusar Santan
बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta) द्वारा
स्रोत: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (उद्गम)
पृष्ठ 204, कुल 250 में से
संदर्भ में पढ़ेंसदा प्रहृष्टया भाव्यां गृहकार्येषु दक्षया। सुसंस्कृतोपस्करया व्यये चामुक्तहस्तया॥
मनु ५/१५०
अर्थ- सर्वदा प्रसन्न चित्त और घर के कामों में चतुर तथा घर के बर्तन भीड़े ठीक रखे और व्यय करने में स्त्री सर्वदा हाथ सिकोड़े रहे।
यत्कर्म कुर्वातोऽस्य स्यात्परितोषोन्तरात्मनः।
तत्प्रयत्ने कुर्वीत विपरीतं तु वर्जयेत्॥ मनु ४/१६१
अर्थ- जिस कर्म के करने से कर्म करने वाले पुरुष का अन्तरात्मा प्रसन्न हो, वे कर्म यत्न पूर्वक करे और इसके विपरीत कर्मों को छोड़ दे।
धन धान्य प्रयोगेषु विद्यासंग्रहणेषु च।
आहारे व्यवहारे च त्यक्तलज्जः सुखी भवेत्॥
षाणक्य नीति ७/२
अर्थ- धन धान्य के व्यापार में, विद्या के संग्रह करने में और आहार व्यवहार में जो पुरुष संकोच न करेगा, वही सुखी होगा।
संतोषस्त्रिषु कर्त्तव्यः स्वदारे भोजने धने।
त्रिषु चैध न कर्त्तव्योऽध्ययने जपदानयोः॥
षाणक्य नीति ७/४
अर्थ- अपनी स्त्री, भोजन और धन, इन तीनों में सदैव सन्तोष करना चाहिये, परन्तु अध्ययन (पढ़ना) जप और दान इन तीनों में कभी सन्तोष न करना चाहिए।
पादाभ्याम् न स्पृशेदग्निं गुरु ब्राह्मणमेव च।
नैव गां न कुमारी च न वृद्धं न शिशुं तथा॥
षाणक्य नीति ७/६
अर्थ-अग्नि, गुरु और ब्राह्मण इनको पैर से कभी नहीं छूना चाहिए, और न गौ को, न कुमारी को, न वृद्ध को और न बालक को ही।
इच्छानुसार सन्तान
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वीरेन्द्र गुप्तः
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