इच्छानुसार संतान
Ichhanusar Santan
बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta) द्वारा
स्रोत: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (उद्गम)
स्वप्न दोष नाशक चमत्कारी बूटियाँ
कन्यों पर भारत का भविष्य है। युवाकाल में खोटी संगत में न पड़कर इन कुट्टेओं से बचकर अपने शरीर को पुष्ट बनाकर विद्या प्राप्त करो। जिससे भारत का भविष्य उज्ज्वल होकर समस्त विश्व को सभ्यता और साम्यता का पाठ दे सके।
हमारा इतिहास बताता है कि द्वारपर में वीर अर्जुन ने अमरीका के राजा की कन्या उलूपी से विवाह किया था। धर्मराज युधिष्ठिर की राजसूय यज्ञ में समस्त विश्व के राजाओं ने अपना-अपना कर देकर महाराजा युधिष्ठिर को चक्रवर्ती राजा माना था। हे भारतवासियों! हांशा मत हो ब्रह्मचर्य का पालन करो और फिर से अपने पूर्वजों के समान चक्रवर्ती राजा बनो।
ब्रह्मचर्य साधन
प्रातः सूर्योदय से कुछ समय पूर्व शौच, संध्यापासनादि से निवृत्त होकर सिद्धासन पर बैठे। आसन लगाते समय ध्यान रहे कि पहले बायें पैर को एड़ी गुदा और अण्डकोषों के मध्य सीमन पर लगायें, पश्चात् दाहिने पैर की एड़ी लिंग के मूल पर रखनी चाहिए, दोनों पैरों के गट्टे आपस में ऊपर नीचे मिले रहें। कुछ ही दिनों में आसन पर बैठने का सही अभ्यास हो जायगा। आसन पर सीधे बैठकर देखें कौन-सा स्वर चल रहा है, जिस नथने से श्वास आ जा रही हो उससे दूसरे नथने को अंगुली या अंगुठे से दबाकर बन्द करें, फिर चलते हुए नथने से धीरे-धीरे श्वास अन्दर खींचें, उसी समय गुदा को ऊपर खींचकर संकोचन करते हुए मूल बन्ध लगायें। पूर्ण श्वास भर जाने पर नथने से हाथ हटाकर श्वास को भीतर ही रोकें रहें, ध्यान रहे गुदा, द्वार बराबर ऊपर को खिंचा रहे, ढीला न होने पावे। श्वास रोक कर पेट के निचले भाग को गति दें अर्थात् पेट को अन्दर सिकोड़ें और बाहर को फेकें, निरन्तर पेट को गति देते रहें, मानों लिंग द्वारा कोई चीज
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वीरेन्द्र गुप्तः
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ऊपर को खींची जा रही है, परन्तु मूलबन्ध बराबर लगा रहे, सरलता से जितनी देर श्वास रुक सकें उतनी देर तक पेट की गति का अभ्यास करते रहें, तत्पश्चात् पेट की गति को रोक कर जिस नथने से श्वास खींची है उसे अंगुली या अंगूठे से बन्द करके दूसरे नथने से धीरे धीरे श्वास को बाहर निकाल दो, नाक से हाथ हटाकर जितनी देर हो सकें श्वास को बाहर ही रोको। मूलबन्ध लगा रहे और पेट को भी गति नहीं देनी। यह एक प्राणायाम हुआ। इसी प्रकार चलते नथने से पुनः श्वास-खींचकर पूर्ववत् क्रिया करें, इस प्रकार तीन प्राणायाम करें। जब भली प्रकार गुदा का संकोचन होने लगे तो प्राणायाम की संख्या बढ़ाते जायें। गुदा संकोचन से ही वीर्य का स्तम्भन होता है और गुदा के ढीले रहने से ही स्वप्नदोष एवं वीर्यपातादि होते हैं। अतः जब गुदा संकोचन द्वारा वश में होगी तो वीर्य में पूर्ण स्तम्भन होगा। इस साधन में जितना मनसा, वाचा, कर्मणा, स्त्री प्रसंग से दूर रहेंगे उतना ही शीघ्र लाभ होगा। जब एक बार इस साधन को सिद्ध कर चुके हैं तो आयु पर्यन्त स्वप्नदोष, शीघ्रपतन, शुक्रमेह आदि सारे वीर्य सम्बन्धी दोषों से आपको मुक्ति मिल जायगी और दिन प्रतिदिन आपका स्वास्थ्य, आयु, बल और बुद्धि में विकास होता रहेगा। यदि साधन समय में पेट के नलों में पीड़ा होने लगे तो शुद्ध देशी घी गर्म करके मलें या पिसी हल्दी की कपड़े में पोटली बीचकर गर्म करके उसकी टकोरें दें। ध्यान रहे साधन काल में सुपाच भोजन लें, मिर्च, खटाई और तेज पदार्थों का त्याग करें।
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स्वप्नदोष नाशक चमत्कारिक बूँटी
जिन नवयुवकों को स्वप्नदोष होता ही रहता है, उन्हें चाहिए कि वह प्रातःकाल शौच, स्नानादि से निवृत्त होकर निराहार मुँह 'अपामार्ग' जिसे 'औंगा' भी कहते हैं, लम्बी शाख वाली जिस पर चावल से लगे रहते हैं, उसकी ताजा जड़ उखाड़ कर जल से मिट्टी साफ करके तीन अंगुल अर्थात् २ इंच अनुपात में लेकर मुख में रखकर धीरे-धीरे चबाकर रस चूसते जायें, बाद में फोकस को थूक दें। इसे आठ दिन निरन्तर सेवन करें। इसके सेवन से स्वप्नदोष जैसे भयंकर रोग से शीघ्र छुटकारा मिल जायगा। बाद में भी सप्ताह में एक दो बार बूँटी का सेवन करते रहा करें। अभूतपूर्व लाभ होगा। जड़ नित्य ताजा लेनी चाहिए।
विवाह
विवाह जीवन में बड़े महत्त्व का संस्कार है। इसी पर आगामी सन्तानोत्पत्ति तथा देशोन्मति निर्भर है। विवाह ही सृष्टि वृद्धि का साधन है तथा पारिवारिक सुख का एक मात्र द्वार है।
विवाह प्रेम तथा नवजीवन का आरम्भ है। इसके द्वारा पति और पत्नि दो शब्दों की उत्पत्ति होती है। विवाह के नाम से बच्चों के मुख पर हँसी आ जाती है। युवकों का हृदय विवाह के नाम से नव-प्रेम संचार की आशा तथा पूर्णसुख का अनुभव के लिए लालायित हो जाता है। युवतियों का मदन-कुमुद खिलने लगता है तथा लज्जा से नेत्र नीचे हो जाते हैं। यह विवाह सुख और आनन्द के आमोद-प्रमोद से भरा होता है। इसी कारण यह समारोह के साथ सम्पन्न होता है।
विवाह का उद्देश्य सुख के साथ पारिवारिक जीवन
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वीरेन्द्र गुप्तः
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व्यतीत करना है। परन्तु आजकल इसके सर्वथा विपरीत देखने में आता है। विरले ही पुरुष विवाह करके यथार्थ सुख को पाते हैं। विवाह का मुख्य उद्देश्य बलिष्ठ सन्तान उत्पन्न करके अपने परिवार देश तथा जाति को उन्नति की ओर अग्रसर करना है। बाल-विवाह से इस हेतु की पूर्ति नहीं हो सकती। बाल-विवाह के कारण ही विविध रोगों को उत्पत्ति हो गई है। सहस्रों बालक अकाल मृत्यु से पंचतत्व में विलीन हो जाते हैं। जिस देश में बच्चे बाल्यकाल में ही मृत्यु को प्राप्त हो जायें, वह देश आगे को कैसे उन्नति कर सकता है। बाल-विवाह ही के कारण सहस्रों बाल-विधवा स्त्रियाँ भारत को कर्त्तविकर रहती हैं। जो देश में वेश्याओं के रूप में पुरुषों से अपना प्रतिशोध लेती हैं। वह कहती हैं कि तुमने हमारा विवाह बाल्यकाल में ही कर दिया और जब हमारी आयु तरुणावस्था को प्राप्त हुई उस समय से पूर्व ही विधवा हो जाने पर घर से निकाल दिया। क्या पुरुष अपने अनेक विवाह नहीं करते हैं? तो हमें द्वितीय विवाह करने का अधिकार क्यों नहीं? हम वेश्या वृत्ति करके तुम्हारे पुरुषत्व को समय से पूर्व ही अपने हाव-भाव दिखाकर नष्ट कर देंगी।
मित्रों, आपको योग्य है कि आप अपने बच्चों का विवाह पूर्ण तरुणता प्राप्त होने पर ही करें अर्थात् युवकों का २५ वर्ष और युवतियों का १६ वर्ष से पूर्व विवाह न करें।
ऊन षोडश वर्षा याम प्राप्तः पंचविंशतिम्।
यद्याधत्ते पुमान गर्भं कृक्षिस्थः सविपद्यते॥
जातो वा न चिरं जीवेत् जीवेद्वा दुर्बलेन्द्रियः।
तस्मादत्यन्त बालायां गर्भाधानं न कारयेत्॥
सुश्रुत शरीर स्थान अ- १०
अर्थ- यदि २५ वर्ष से कम आयु का युवक १६ वर्ष से कम आयु की युवती के साथ समागम करता है तो गर्भ की स्थिति नहीं हो पाती। यदि गर्भ रह भी जाता है तो वह नष्ट हो
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वीरेन्द्र गुप्तः
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जाता है। यदि गर्भ नष्ट न हो और बच्चा उत्पन्न हो जाय तो वह अधिक समय तक जीवित नहीं रहता। यदि अधिक समय तक जीवित रह जाय तो वह दुर्बलीन्द्रिय होता है। अतः अपरिपक्व आयु की युवती से बच्चा उत्पन्न करने का प्रयत्न न होना चाहिए।
जब आम के नये वृक्ष पर मौल आता है तो माली ३ वर्ष तक उस मौल को तोड़ते रहते हैं। एक माली से मालमू किया कि आम के नये वृक्ष का मौल ३ साल तक क्यों तोड़ देते हैं? उसने कहा कि पुरखों से ऐसा ही चला आता है। पर जो वनस्पति विद्या के जानकार हैं वह कहते हैं कि यदि तीन वर्ष तक आम का मौल तोड़ दिया जायगा तो उस पर लगे फलों में कीड़े नहीं पड़ते और फल भी मीठा और बड़ा आवेगा। यह एक प्रत्यक्ष चमकता हुआ सर्वदेशीय नियम है, इसी नियम के ज्ञाता मनु भगवान ने लिखा है—
श्रीणि वषाण्युदीक्षेत कुर्मार्मृतुमती सती।
ऊर्ध्वं तु काला देतस्माहिन्देत सदृशं पतिम्॥
मनु १/१०
अर्थ— जब तीन वर्ष तक (अर्थात् छत्तीस बार) कन्या पिता के यहाँ रजस्वला हो ले तब अपने सदृश गुण वाले पति को प्राप्त होवे।
परो देहिं शामुल्यं ब्रह्मभ्यो वि भजा वसु।
कृत्येषा पद्मती भूत्वा जाया विशते पतिम्॥
ऋग्वेद १०/८५/२९
भावार्थ— जब स्त्री का विषाक्त शरीरस्थ मल का अंश दूर हो जाय तभी पुरुष के समीप जाना उचित है। अन्यथा स्त्री का विषाक्त पुरुष के शरीर में प्रविष्ट होकर पुरुष को रोग युक्त बना देता है। अर्थात् जब तक ३६ बार रजोदर्शन द्वारा स्त्री का शरीर शुद्ध न हो जाय तब तक स्त्री से कभी समागम न करे। यदि इससे पूर्व समागम करेगा तो वीर्य सम्बन्धी अनेक रोग उत्पन्न हो
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वीरेन्द्र गुप्तः
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जनक और जननी
जावंगे तथा रजस्वला स्त्री से भी समागम न करे।
जब इन नियमों पर मनुष्य चलते थे तब बच्चे आजकल की भाँति निर्बल, रोगी, अल्पायु नहीं होते थे और अब भी यदि सन्तानोत्पत्ति में नियमों का पालन होने लग तो पुनः वहाँ समय आ जाने की सम्भावना है और फिर से अर्जुन, द्रोणाचार्य और भीष्म जैसी वज्रगंभी सन्तानों उत्पन्न होने लगेंगे।
मनु जी ने विवाह आठ प्रकार के लिखे हैं— ब्राह्मो दैवतर्थेवार्षः प्राजापत्यस्यसासुरः।
गान्धर्वोराक्षसश्चैव पेशाचश्चाष्टमोघमः॥
मनु ३/२१
अर्थ— १. ब्राह्म २. दैव ३. आर्य ४. प्रजापत्य ५. आसुर ६. गान्धर्व ७. राक्षस ८. पेशाच, यह आठ प्रकार के विवाह हैं।
ब्राह्मदिषु विवाहेषु चतुर्विजानुपूर्वशः।
ब्रह्मवर्चस्विनः पुत्रा जायन्ते शिष्टसम्पत्ता॥
मनु ३/२९
अर्थ— ब्रह्मादि चार प्रकार के विवाहों में ही क्रम से ऐसे पुत्र होते हैं जो ब्रह्म, तेजस्वी और श्रेष्ठ मनुष्यों के प्यारे।
रूप सत्त्वगुणोपेता धनवन्तो यशस्विनः।
पर्याप्तभोगा धर्मिष्ठा जीवन्ति च शतं समाः॥
मनु ३/४०
अर्थ— रूपवान्, पराक्रमी, गुणवान्, धनवान्, यश वाले, पुष्कल भोग वाले, धर्मात्मा और सौ वर्ष की आयु वाले होते हैं।
इतरे तु शिष्टेषु नृशंसानृतवादिनः।
जायन्ते दुर्विवाहेषु ब्रह्मधर्म द्विषः सुता॥
मनु ३/४१
अर्थ— शेष दुष्ट विवाह से सन्तान निर्लज्ज, झूठ बोलने वाली, ब्रह्म, धर्म द्वेषी (ब्राह्मणों व धर्मों के शत्रु) उत्पन्न होते हैं।
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वीरेन्द्र गुप्तः
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अनिन्दतैः स्त्री विवहैरनिन्द्या भवति प्रजा । निन्दन्तनिन्दिता नृणां तस्मान्निन्द्यानिवर्जयेत् ॥
मनु ३/८२
अर्थ- अच्छे विवाहों से अच्छी और बुरे विवाहों से बुरी सन्तान मनुष्यों के होती है। इस कारण निन्दित विवाहों का त्याग करें।
इसका अभिप्राय यह है कि व्यभिचार, अपहरण, दुराचार और बिना लक्ष के द्वारा जो सन्तान होती है वह दुष्ट प्रकृति का, धन तथा कर्म से होन, देश जाति को कलंकित करने वाली होती है, और जो विचार पूर्वक नियमानुसार संस्कारमय सन्तान होती है वह देश जाति के गौरव को द्विगुणित, चौगुणित करती है इसीलिए सुसन्तति के निर्माण हेतु ही संस्कारित विवाह के लिए वेद तथा मनु जी ने उपदेश किया है।
आजकल जिस प्रकार की पद्धति विवाह में चल रही है उसका एक उदाहरण यहाँ देते हैं, विद्वान् जन उसके दोषों को समझकर अपनी परिपाटी में परिवर्तन करें।
लाला श्यामलाल की एक पुत्री थी। जिसका नाम लक्ष्मी देवी था। उन्होंने उसे पश्चिमी पद्धति से शिक्षा दिलाई, लक्ष्मी बड़ी ही विचारशील, सभ्य और साथ ही भारतीय संस्कृति सभ्यता को भी भली प्रकार जानती थी। अपनी तीव्र बुद्धि के कारण गायनादि कला में भी पूर्ण पारंगत थी। लाला श्यामलाल ने अपने एक मित्र के लड़के के साथ उसका विवाह कर देना तय कर दिया। उस समय वह महोदय इंग्लैंड में आईन्सीएस० की तैयारी कर रहे थे। लक्ष्मी को घर के माता-पिता एवं सभी पारिवारिक जनों ने देखकर पसन्द कर लिया था।
लाला श्यामलाल के यहाँ बारात आ गई। रात्रि के तीन बजे वह महोदय कन्या के पिता के द्वार पर आ खड़े हुए। लाला श्यामलाल के पास अपना विजिटिंग कार्ड भेजा। लाला श्यामलाल
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आश्चर्य चकित हो द्वार पर आये। देखा, भावी दामाद खड़े हैं। लाला श्यामलाल ने चकित होकर रात्रि के समय उपस्थित होने का कारण मालूम किया। उत्तर में वर ने कहा मैं लड़की देखने आया हूँ, मैंने वैसे तो लड़की की बहुत प्रशंसा सुनी है। माता-पिता प्रशंसा करते नहीं थकते। परन्तु फिर भी आप जानते हैं, अपनी-अपनी आँखें हैं और अपनी-अपनी पसन्द। इसमें कोई हर्ज भी नहीं। हर्ज तो तब था जब पर्दे की प्रथा थी। क्योंकि कल को यदि न बने तो दोनों का जीवन नष्ट होने से बचा रहे। लाला श्यामलाल पुराने विचारों के पुरुष थे। उनके लिए प्रथा अटल नियम थी। उन्हें समाज का भय था। इसलिए उन्होंने पहले तो मना कर दिया और कहा मान लो मैंने तुम्हें लड़की दिखा दी और तुमने उसे पसन्द न किया तो क्या विवाह रुक जायगा? तुम कहोगे इसमें हनि ही क्या है। तुम्हारे लिए न होगी हमारी तो नाक कट जायगी। इन बातों का वर पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। वर ने कहा बिना देखे मैं विवाह न करूँगा, अब तो लाला श्यामलाल बड़ी विपत्ति में पड़ गए। बारत घर पर आ गई थी प्रातः ब्राह्ममुहूर्त में विवाह होना था, चार घण्टे का अन्तर। आखिर पिता ने लक्ष्मी को कमरे में बुला लिया। वर ने देखा वह वास्तव में वैसी ही सुन्दर है जैसी उसकी प्रशंसा सुनी थी। वर ने प्रश्न किया 'आप इग्लिश पढ़ी हैं?' लक्ष्मी ने संकोच से उत्तर दिया 'पढ़ी हैं'। लक्ष्मी के हाथ में अंग्रेजी का समाचार-पत्र देकर पढ़वाया। वह लक्ष्मी के उच्चारण और मधुर कण्ठ पर मुग्ध हो गए। लक्ष्मी ने संगीत में भी परीक्षा दी और उसमें भी उत्तीर्ण हो गई।
वर ने कहा- 'मुझे लड़की पसन्द है।' लक्ष्मी ने निश्चयात्मक रूप से कहा- 'परन्तु आप मुझे पसन्द नहीं।'
लक्ष्मी ने अपने उक्त शब्दों के समर्थन में जो कहा, वह एक सुशील भारतीय महिला के लिए उपयुक्त है।
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मनोवाञ्छित संतान
यदि तुम लड़कों को यह अधिकार है कि विवाह से पूर्व लड़कों को देखें, उसको परीक्षा लें और उसके पश्चात् अपना निर्णय दें। तो हम लड़कियों को भी यह अधिकार है कि तुम्हें देखें, परखें और अपना निर्णय दें। मेरा निर्णय यही है कि मैं तुम्हारे साथ विवाह कदापि नहीं कर सकता। मैं पूर्णरूपेण भारतीय हूँ और आप पूर्णरूपेण पश्चिमी। मैं विवाह को आत्मिक सम्बन्ध मानता हूँ जो मृत्यु के पश्चात् भी नहीं दृढ़ता। तुम्हारे समीप मेरा सबसे बड़ा गुण है मेरा गौरवण, भय कण्ठ। नर्कान कल को यदि मेरे चेचक निकल आये या किसी अन्य रोग के कारण मेरा रूप कुरूप हो जाय तो तुम्हारे नेत्र मुझे देखना भी पसन्द न करेंगे। जिसकी पसन्द ऐसी आँखों और कच्चों नाँवों पर हो, उसका क्या विश्वास? तुम में किताबों की योग्यता होगी, परन्तु मनुष्यत्व की नहीं।
आप कहेंगे तो क्या लड़कों को बिना देखे ही कुरूप आदि के साथ विवाह कर लें? नहीं मैं यह नहीं कहता, परन्तु लड़के लड़की को और लड़कों लड़के को जब तक देख करके दोनों एक दूसरे को सच पूर्वक पसन्द करके उत्तर न दें तब तक विवाह नहीं करना चाहिये। मनु जी कहते हैं कैसे रूप वाली कन्या से विवाह करें-
अव्यङ्गाङ्ग्यौ सौम्यनाम्नी हंसवारणागामिनीम्। तनुलोमकेशदशनां मुदङ्गीमुदहैत्त्रियम्॥
मनु ३/१०
अर्थ- सुन्दर आंगों वाली, अच्छे नाम वाली, हंस और गज के सद्गुण गमन करने वाली, पतले रोमाँचों वाली, बालों वाली, दौनों और कोमल शरीर वाली स्त्री से विवाह करें।
विवाह देशोन्नीति का मुख्य साधन है। क्योंकि भूमि पर जैसा बांया जाता है वैसा ही उत्पन्न होता है। यदि भूमि में उत्तम बीज बांया जायगा तो उत्तम ही अन्न उपजेंगा। इसी प्रकार स्त्री सन्तानोत्पत्ति के लिये भूमि है और पुरुष का वीर्य बीज रूप है।
इच्छानुसार सन्तान
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वीरेन्द्र गुप्तः
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क्षेत्र भूता स्मृता नारी बीज भूतः स्मृतः पुमान्।
क्षेत्र बीज समायोगत्संबधवः सर्वदेहिनाम्।।
मनु १/१३
अर्थ- खेत रूप स्त्री और बीज रूप पुरुष होता है। इस कारण खेत और बीज के मिलने से सम्पूर्ण प्राणियों की उत्पत्ति होती है।
कामामरणात्तिष्ठेद् गृहे कन्यतुमत्यपि।
न चैवैनं प्रयच्छेत्तु गुणहीनाय कहिचित्।।
मनु १/८९
अर्थ- चाहे कन्या ऋतुवाली होकर मरने तक घर में बैठी रहे परन्तु गुणहीन के लिए इसका कभी दान न करे।
गुणहीन को कन्या देने से गुणहीन, दरिद्र सन्तान होगी। देश से दरिद्रता, गुणहीनता दूर करने के लिए गुणवान को ही कन्या का दान करे।
एक ओर पुरुष स्त्रियों को अपने से छोटा और दासी समझते हैं, तो दूसरी ओर स्त्रियाँ अपने समान अधिकारों की माँग करती हैं। परन्तु दोनों ही बातें मिथ्या हैं। क्योंकि दोनों के क्षेत्र अलग-अलग हैं और दोनों ही अपने-अपने क्षेत्र में बड़े हैं, पर साथ में एक बात और भी है जब तक दोनों रथ के पहियों के समान गृहस्थ रूपी रथ में एक साथ समानता को साथ लेकर नहीं चलेंगे तब तक गृहस्थ रूपी रथ चल नहीं सकता।
प्रजनाथं स्त्रियः सुष्ठः संतानाथं च मानवः।
तस्मात्साधरणो धर्मः श्रुतौपत्यसहोदितः।।
मनु १/९६
अर्थ- गर्भ धारण करने के लिए स्त्रियों को ईश्वर ने उत्पन्न किया है और वीर्य सन्तान के लिए पुरुष उत्पन्न किये हैं। इसी से स्त्री के साथ पुरुष का वेद में समान धर्म कहा है।
इच्छानुसारं सन्तान
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वीरेन्द्र गुप्तः
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धनोपार्जन करना पुरुष का क्षेत्र है। सन्तानोत्पन्न करके उसका पोषण करना स्त्री का क्षेत्र है। गृहस्थ जीवन को सफल बनाने के लिए पुरुष को स्त्री का और स्त्री को पुरुष का मान करना चाहिए। जब तक दोनों के मन समान न होंगे तब तक गृहस्थ जीवन में सुख लाभ नहीं हो सकता। दोनों एक दूसरे को अपने ही समान जानें और देखें।
मनोवांछित सन्तान
सन्तान कितनी प्रिय वस्तु है। जिसके उत्पन्न होने से वंश वृद्धि होती है। आजकल देखने में आता है कि जब सन्तान बड़ी हो जाती है तो वह माता-पिता की आशा नहीं मानती और सामना करने के लिए आ जाती है। क्या कभी हमने बैठकर विचार किया कि इसका क्या कारण है। जब मैंने इस बात को विचारों, तो तत्काल मस्तिष्क में यह प्रश्न उठा कि सन्तान उत्पन्न की जाती है या हो जाती है। खोज करने पर ज्ञात हुआ कि पहले पूर्वज सन्तान को उत्पन्न करते थे, तभी उनके सद्गुण गुण वाली और आशानुसार कार्य करने वाली होती थी।
योगीराज श्रीकृष्ण तथा उनकी पत्नी रुक्मिणी दोनों ने १२ वर्ष का ब्रह्मचर्य व्रत धारण करके अपने रजः, वीर्य को शुद्ध पवित्र करके अपने सद्गुण प्रद्युम्न पुत्र को जन्म दिया। जिस समय प्रद्युम्न युवाकाल में आया उस समय यदि माता रुक्मिणी के सामने प्रद्युम्न अकेला आता था तो रुक्मिणी भ्रम में पड़ जाती थी कि यह पुत्र है या पति।
परन्तु आजकल सन्तान को कोई भी उत्पन्न नहीं करता। स्त्री पुरुष इन्द्रिय सुख के लिये ही समागम करते हैं और अनायास
इच्छानुसार सन्तान
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वीरेन्द्र गुप्तः
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ही गर्भस्थ भ्रूण सन्तान के रूप में आकर, माता-पिता की आत्मा के बाहर ही रहता है।
बिना लक्ष्येण शुक्र दानम्।
संसार में कोई भी कार्य ऐसा नहीं, जिसे करने से पूर्व विचारा न जाय परन्तु गर्भाधान का कार्य ऐसा है जिसे बिना विचारों की आजकल किया जाता है।
आपके मन में आया चलो कुछ दिन के लिए कश्मीर की सैर कर आर्य, तत्काल ही दूसरा विचार उठा, वस्त्र नहीं हैं, पहले वस्त्र बनवा लें। वस्त्र बनाने का विचार आते ही आप बजाज की दुकान पर कपड़ा खरीदने चले आये। बजाज ने आपको कपड़ा दिखाने से पूर्व मालूम किया। महाशय जी क्या बनवाना है, तो आप उससे यह नहीं कहते कुछ बनवा लेंगे, तुम कपड़ा दे दो। परन्तु विचारते हो कश्मीर में ठण्ड पड़ती है, कोट नहीं है, कोट बनवाना है और कमीज भी, तो आप कहेंगे लाला जी कोट और कमीज का कपड़ा दिखाइये। अब समस्या हल हुई। इसी प्रकार कपड़ा लेकर जब आप दर्ज़ी के पास गये तो उसने भी प्रश्न किया कि क्या बनेगा तो आप उससे भी यही कहते हैं कि इसका कोट और इसकी कमीज और साथ में यह भी कि कोट अल्वर कट और कमीज टाई कालर की, ना कि यह कुछ सी दे। आपको कपड़ा लेने और दर्ज़ी के पास पहुँचने से पहले ही विचार करना पड़ता है। यही नहीं भोजन, यात्रा आदि सभी कार्यों के करने से पूर्व उसका विचार पहले मन में आता है फिर उसकी रूप-रेखा, तत्पश्चात्, वह कार्य क्रियात्मक रूप में आता है। परन्तु एक सन्तति निर्माण का कार्य ऐसा है कि इसमें न तो कोई पहले विचार करता है, न उसकी रूपरेखा बनाता है। तभी तो कह सकते हैं कि आजकल सन्तान उत्पन्न नहीं की जाती परन्तु हो जाती है। यदि वह सन्तान आपको कष्ट देती है तो उसे नालायक क्यों कहते हो, गलती आप करो और थोपो सन्तान के ऊपर। जब आपने
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वीरेन्द्र गुप्तः
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क्रोडा की तब इन्द्रिय सुख के लिए। आपने कभी इस विचार से क्रोडा नहीं की, कि आज हमें धर्मराज युधिष्ठिर, श्रीकृष्ण, अर्जुन, भीम और राम, लक्ष्मण जैसे पुत्र को जन्म देना है; पुत्र, पुत्री, ६ पत्नी, पापी, धनी, निर्धनी हर प्रकार की सन्तान उत्पन्न करने की सामर्थ्य परमपिता परमात्मा ने आपके हाथ में सौंपी है।
प्रश्न- क्या वास्तव में इच्छानुसार सन्तान उत्पन्न हो सकती है?
उत्तर- हाँ! हो सकती है। उत्तम सन्तान को बनाने के लिए उत्तमोत्तम संस्कारों की आवश्यकता है। जिस प्रकार एक सुनार सोने की डली को संस्कारों द्वारा सुन्दर आभूषणों में परिवर्तित कर देता है। उसी प्रकार यदि उत्तम रीति से उत्तम संस्कार होंगे तो बच्चा उत्तम होगा यदि संस्कार निकृष्ट होंगे तो बच्चा भी निकृष्ट होगा।
घुड़साल में घोड़े ही बैठेंगे मनुष्य नहीं। कूड़े के ढेर पर मच्छर, भुनगे ही आकर बैठेंगे भले मनुष्य नहीं, तो फिर निकृष्ट रजः - वीर्य से कैसे उत्तम सन्तान को आशा की जा सकती है। उससे तो निकृष्ट सन्तान ही होगी।
पुष्पं दृष्ट्वा फलं दृष्ट्वा
दृष्ट्वा योषित यौवनम्।
त्रीणि रत्नानि दृष्ट्वेव
कस्य नो चंचलते मनः॥
अर्थ- सुन्दर पुष्प को देखकर, सुन्दर फल को देखकर और सुन्दर युवती को देखकर, किसका मन नहीं मचलता।
पिता यस्य शुचिर्भूतो,
माता यस्य पतिव्रता।
द्वार्या यः सुनु रूत्पन्न
स्तस्य नो चंचलते मनः॥
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वीरेन्द्र गुप्तः
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अर्थ- जिस पिता ने पर स्त्री गमन के भावों को स्वप्न में भी नहीं आने दिया और जिस माता ने स्वप्न में भी पर पुरुष को और दृष्टिपात नहीं किया, ऐसे माता-पिता से जो पुत्र उत्पन्न होगा उसका मन इनको देखकर कभी विचलित नहीं होगा।
जिस प्रकार सुदृढ़ भवन बनाने के लिए भवन की नींव भी सुदृढ़ बनानी पड़ती है। जिस भवन की नींव कमजोर टेढ़ी होगी उसके ऊपर का भवन भी कमजोर और टेढ़ा ही रहेगा। चाहे ऊपर कितनी ही लीपा-पोती को जाय परन्तु वह भवन टिकाऊ नहीं हो सकता। इसी प्रकार जब तक यज्ञ कुट्टार के चाक पर घूम रहा है तब तक कुट्टार उसे सीधा कर सकता है और जब वह चाक से नीचे उतर आया और जरा-सा भी सूख गया तो उस घड़े को जो टेढ़ा हो गया है, वह सीधा नहीं कर सकता, उसे तोड़ कर ही दूसरा बनाना पड़ेगा, इस बात को महर्षि दयानन्द सरस्वती ने विचारा। वह यह भी जानते थे कि समाज से व्यक्ति नहीं बनता, परन्तु व्यक्ति से समाज बनता है। इसलिए महर्षि दयानन्द सरस्वती ने व्यक्ति के निर्माण की बात को विचारा। उस विचार को संस्कार विधि के रूप में उधृत किया, साथ ही भवन की नींव के आधार पर सबसे पहला संस्कार गर्भाधान ही रखा, क्योंकि वह जानते थे कि जिस दम्पति का गर्भाधान संस्कार, संस्कार के रूप में उत्तम रीति से होगा तब उस गर्भ से उत्तमोत्तम सन्तान उत्पन्न होगा।
महर्षि के इस महत्त्व को किसी ने नहीं समझा, न संस्कार विधि उठाकर देखी, न उस पर विचार किया, न कभी समझने का प्रयत्न ही किया, और करने भी क्यों? क्योंकि इस प्रकार का ज्ञान प्राप्त करने के लिए किसी ने प्रेरित भी नहीं किया और इसे अश्लील भी समझा। परन्तु यह विज्ञान अश्लील नहीं, यह परिवार, जाति, देश और संसार को पलट देने की शक्ति रखने वाला ज्ञान है। संसार में देश, जाति को गौरवमय वैभव प्राप्त कराने की इच्छा
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रखने वाले पुरुषों, आपको इस विज्ञान को अपनाना; समझना और क्रियात्मक रूप देना होगा।
जिस प्रकार उपवन एक ही सुगन्धित पुष्प वाले पौधे से सुवासित हो जाता है उसी प्रकार विद्वान्, सुशील, गुणवान् एक ही पुत्र से सारा परिवार।
एकोऽपि गुणवान् पुत्रो निगुणैश्च शतैर्वरः।
एकश्चन्द्रस्तमो हन्ति न च ताराः सहस्रशः॥
चाणक्य नीति ४/६
अर्थ- सैकड़ों गुण रहित पुत्रों के अपेक्षा एक ही गुणवान् पुत्र श्रेष्ठ है, एक ही चन्द्रमा अन्यकार को नष्ट कर देता है, सहस्रों तारे नहीं।
यादृशं तृष्यते बीजं क्षेत्रे कालीपपादिते।
तादृग्रीहति तत्तस्मिन्बीजं स्वैव्यञ्जितं गुणैः॥
मनु ९/३६
अर्थ- जिस प्रकार का बीज उचित समय (वर्षादि ऋतु) में संस्कृत खेत में बोया जाता है उसी प्रकार का ही बीज अपने रंग-रूपादि गुणों से युक्त उस खेत में उत्पन्न होता है।
जिस भावना से जितना पुष्ट और शुद्ध वीर्य को उचित ऋतुकाल में स्त्री रूपी खेत में पुरुष वीर्य सेचन करेगा उसी भावना का बच्चा उत्पन्न होगा। जिस प्रकार भूमि में गेहूँ, चना, जौ, तिल, गन्ना आदि सब जैसे-जैसे बीज होते हैं वैसे ही उत्पन्न होते हैं। यह नहीं होता कि बोया कुछ जाय और उत्पन्न कुछ और हो। जो-जो बोया जाता है वही-वही उत्पन्न होता है। इसी प्रकार यह नहीं हो सकता कि माता-पिता को काम के वशीभूत होकर भोग करें और सन्तान उत्तम, विद्वान् चाहें। भला यह तो किसी बुद्धिहीन से भी मालूम करो तो यही कहैगा कि बबूल बो कर आम खाने को नहीं मिल सकते, मिलेंगे तो कांटे ही मिलेंगे। क्योंकि प्रधानता बीज की होती है न कि भूमि की। बीज से ही सारे जीवों की उत्पत्ति
इच्छानुसार सन्तान
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वीरेन्द्र गुप्तः
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होती है। भूमि तो उस बीज को जैसा उसमें बोया गया है उसे अपनी शक्ति से पोषण करती हुई उसी रूप में उत्पन्न कर देती है।
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जनक और जननी
ईश्वर, जीव और प्रकृति, यह तीनों अनादि हैं। इनका कभी नाश नहीं होता और न इनकी किसी ने रचना की है। यह सदा से अनादि हैं।
मृत्यु के पश्चात् जीव अन्तरिक्ष में चला जाता है। वायु द्वारा जीव मेघों में आकर जल वृष्टि द्वारा भूमि पर आता है। उस जल से अन्न में पहुँच कर भोजन द्वारा शरीर में प्रविष्ट होकर वीर्य में पहुँच जाता है।
जनक पिता को कहते हैं। क्योंकि जीव पहले पिता के वीर्य में पहुँच कर पोषित होता है। जननी माता का नाम है। जब पुरुष भोग द्वारा अपना वीर्य स्त्री के गर्भाशय में गिराता है तभी तो गर्भ स्थित होता है। तब वह जीव स्त्री के गर्भाशय में विकास को पाता हुआ समय आने पर बाहर आता है।
पुरुष हवा अयमादितो गर्भो भवति यदेतद्वेतः। तदेतत् सर्वैर्व्योडङ्ग स्युस्तेजः संभूतमात्मन्येवात्मानं विमर्ति तदा यदा स्त्रियां सिञ्च्यत्यथैनञ् जनयति तदस्य प्रथमं जन्म।
ऐतरेय उपनिषद् अ- २
अर्थ- वीर्य पुरुष के शरीर में पहला गर्भ होता है। यह समस्त शरीर का सार होता है। जब यह स्त्री के गर्भाशय में भेज दिया जाता है। तब इसका जन्म होता है।
तमागतं पृच्छति कोसीति। तं प्रतिब्रू यादविचक्षणा दूतवोरेत आभूत पंचदशान् प्रसूतात् पित्र्यावतसूतन् मा पुंसि कर्तरी एयाध्वं पुंसा कर्त्रा मातरिमा निषिञ्च सजाय उपजायमानो
इच्छानुसार सन्तान
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वीरेन्द्र गुप्तः
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द्वारशत्रयोदशोपमासे द्वारशत्रयोदशेन पित्रासं तद्विदिदेशुं प्रति तद्विदिदेशुं तन्मन्त्रतवोऽमुत्थव आमरध्व तेन सत्येन तेन तपसा ऋतु रसिम् आर्तवोऽरिम्।
काँचीतकी ब्राह्मणोपनिषद् अ १
अर्थ- जब ब्रह्मचार्यो आता है तो आचार्य पृष्ठता है 'तु कौन है?' ब्रह्मचार्यो उत्तर देता है 'शुक्ल और कृष्ण पक्षों के शासक चन्द्रमा से बीज एकत्र किया गया था जो प्रतिदिन के यज्ञ ने उत्पन्न हुआ था। यह यज्ञ देवों के द्वारा पुरुष में प्रविष्ट हुआ और उस पुरुष ने उसे स्त्री में प्रविष्ट किया उसी स्त्री से मेरा नाशवान् शरीर उत्पन्न हुआ है।'
'वह (जीव) पूर्व शरीर को छोड़ के वायु के साथ रहता है, पुनः जल औषधि वा प्राण आदि में प्रवेश करके वीर्य में प्रवेश करता है, तदनन्तर योनि अर्थात् गर्भाशय में स्थिर हो के पुनः जन्म लेता है।'
ऋग्वेदादिभाष्य भूमिका पुनर्जन्म अथवा हम पीछे लिख आये हैं कि भूमि की अपेक्षा बीज को महता अधिक है और भोजन से वीर्य किस प्रकार बनता है।
कहने का तात्पर्य यह है कि अच्छी सन्तान प्राप्ति के लिए पहले माता-पिता को डेढ़ मास पूर्व से ही जिस प्रकार के बच्चे को जन्म देना हो उसी प्रकार के वातावरण भोजन, दिनचर्या आदि को अपने व्यवहार में लाना प्रारम्भ कर दें। जिससे पुरुष के वीर्य में जो जीव है उसके संस्कार बनने प्रारम्भ हो जायें तथा पुष्ट भी होता रहे, क्योंकि हर वस्तु पर मन भावना तथा व्यवहार का तत्काल प्रभाव पड़ता है। साथ में जब तक भूमि भी पहले से जीत कर पटला आदि से तैयार नहीं कर ली जाती तब तक बीज को बीया नहीं जाता। इसी प्रकार स्त्री का रजः भी पुष्ट होकर अनुकूल भावना से संस्कृत हो जाय। क्योंकि बीज अपने पल्लवित काल में भूमि के प्रभाव से रचित नहीं रह पाता।
उच्छा-उत्तरा-सूक्तानि
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वीरेन्द्र गन्तः
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जब बीज और भूमि अर्थात् स्त्री और पुरुष दोनों के रजः और वीर्य समान पुष्ट होते हैं तभी श्रेष्ठ सन्तान की उत्पत्ति होती है और जिस वीर्य में सन्तानोत्पादक कीट अर्थात् जीव नहीं होता उस वीर्य से गर्भाधान नहीं हो सकता या वीर्य में जीव भी हो परन्तु वीर्य पुष्ट न हो या स्त्री का रजः पुष्ट न हो तो भी गर्भ नहीं रहेगा। इसीलिए रजः और वीर्य का पुष्ट होना तथा वीर्य में जीव का होना ही उत्तम गर्भाधान के लक्षण हैं।
आहार शुद्धौ सत्त्वशुद्धिः सत्त्वशुद्धौ ध्रुवा।
स्मृतिः स्मृतिलम्भे सर्वग्रन्थीनां विप्रमोक्षः॥
छांदोग्य उपनिषद् ७/२५/२
अर्थ- जब मनुष्य का आहार शुद्ध हो जाता है, तो स्मृति अटल हो जाती है और जब स्मृति पक्की हो जाती है, तब सारी गाँठें खुल जाती हैं।
दीपो भक्षयति ध्योतं कज्जलं च प्रसूयते।
यदनन् भक्ष्यते नित्यं जायते तादृशी प्रजा॥
चारुण्य नीति ८/३
अर्थ- दीपक अन्धकार को खाता है, और काजल को उत्पन्न करता है। मनुष्य जैसा अन्न नित्य खाता है, वैसी ही उसकी सन्तान होती है।
स यामिच्छेत्कांमयेत मेति तस्यामर्थ निष्ठाय
मुखेन मुखध्वं सधायापस्थमस्या अभिमृशप
जपेदङ्गादङ्गात् संभवसि हृदयादिधियासे।
सत्त्वमङ्गकषायोऽसि दिग्धिविद्वमिव मादयेभामम्॥
बृहदारण्यकोपनिषद् ६/४/९
अर्थ- हमारे अंग-अंग तथा हृदय की नाड़ी-नाड़ी से वीर्य रूपी रस उत्पन्न होता है इसलिए इसको सन्तानोत्पत्ति के उपयोग में ही लाना चाहिए व्यर्थ नष्ट करना उचित नहीं, इसलिए तुम शुभ संकल्प से उत्तम सन्तान का ध्यान करो।
इच्छानुसार सन्तान
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विरेन्द्र गुप्तः
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ऋतुवर्णन
स य इच्छेपुत्रो मे शुल्को जायेत वेद मनुब्रवीत सर्वमायुरियादिति क्षीरीदन् पाचयित्वा सपिष्मन्तमशनीयातामीश्वरो जनयितवै॥
बृहदारण्यकोपनिषद् ६/४/१४
अर्थ- जिनकी यह इच्छा हो कि मेरे गौर वर्ण, एक वेद को जानने वाला पूर्ण सौ वर्ष की आयु का भोगने वाला पुत्र हो तो दम्पति को चाहिए कि वह दूध चावल की खीर बनाकर उसमें घृत डालकर खायें, इस प्रकार के आहार से वह उक्त प्रकार का पुत्र उत्पन्न करने में समर्थ होते हैं।
अथ य इच्छेपुत्रो मे कपिलःपिङ्गलो जायेत द्वौ वेदावनुब्रवीत सर्वमायुरियादिति दध्योदन् पाचयित्वा सपिष्मन्तमशनीयातामीश्वरो जनयितवै।
बृहदारण्यकोपनिषद् ६/४/१५
अर्थ- जिनकी यह इच्छा हो कि हमारे कपिल, पिंगल भुरे नेत्र वाला, दो वेदों का ज्ञाता और सौ वर्ष की आयु भोगने वाला पुत्र हो तो वह दम्पति चावल पकाकर उसमें दही और घी डालकर भोजन करें। ऐसा करने से वह उक्त पुत्र को उत्पन्न करने में समर्थ होते हैं।
अथ य इच्छेपुत्रो मे श्यामो लो हिताक्षो जायेत त्रीन्वेदानुब्रवीत सर्वमायुरियादित्यु दौदन पाचयित्वा सपिष्मन्तमशनीयातामीश्वरो जनयितवै
बृहदारण्यकोपनिषद् ६/४/१६
अर्थ- जिनकी इच्छा हो कि हमारे श्याम वर्ण, लाल नेत्र वाला तीन वेदों का ज्ञाता और पूर्ण सौ वर्ष की आयु भोगने वाला पुत्र हो तो वह दम्पति केवल जल में चावल पकाकर भात तैयार कर लें, उसमें घी मिलाकर खायें तो वह उक्त पुत्र को उत्पन्न करने में समर्थ होंगे।
इच्छानुसार सन्तान
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वीरेन्द्र गुप्तः
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ऋतुकाल वर्णित कर्म
अथ य इच्छेद् दुहिता मे पण्डिता जायेत। सर्वमायुरियादिति तिलौदनं पाचयित्वा सपिप्पन्तश्नीयातामीश्वरो जनयितवै।
ब्रह्मदण्डकपोनिषद् ६/४/१७
अर्थ- जिनकी इच्छा हो कि हमारी कन्या पण्डिता हो और पूर्ण सौ वर्ष की आयु भोगने वाली हो तो वह दम्पति तिल और चावल की खिचड़ी पकाकर उसमें घी मिलाकर खायें। ऐसा करने से उक्त प्रकार की कन्या को उत्पन्न करने में समर्थ होते हैं।
अथ य इच्छेत्युन्नो मे पण्डितो विगीतः समितिगंमः।
शुश्रुषितां वांच भाषिता जायेत सर्वाण्वेदाननु बुवीत॥
सर्वमायुरियादिति माध्वं सौदनं पाचयित्वा सपिप्पन्तः।
न्तमश्नीयातामीश्वरो जनयितवा औक्षेणवासवमेणवा॥
ब्रह्मदण्डकपोनिषद् ६/४/१८
अर्थ- जिसकी यह इच्छा हो कि हमारा पुत्र प्रख्यात पण्डित विद्वान्नों की सभा में निर्भय प्रवेश करने वाला तथा श्रवण सुखद वाणी बोलने वाला हो, चारों वेदों का जानने वाला और पूर्ण सौ वर्ष की आयु का भोगने वाला हो तो वह दम्पति उक्ता तथा ऋषभक औषधियों से निकाला हुआ रस घृत संयुक्त चावलों में मिलाकर खायें तो वह उक्त प्रकार का पुत्र उत्पन्न करने में समर्थ होंगे।
व्यवन्प्राश अवलेह में अष्टवर्ग के नाम से आठ औषधियाँ पड़ती हैं, जिनका अभी तक सही पता नहीं चला है। उसी अष्ट वर्ग में उक्ता और ऋषभक नाम की दो बुटियाँ हैं। जो उपरोक्त सेवन के लिए लिखीं हैं। इनकी उपेक्षा में शतावरी तोला, अश्वगन्ध नागीरी १ तोला, लाल इलायची के दाने आधा तोला लेकर कूट लें। इसका चूर्ण ६ माशा पुष्प और ६ माशा स्त्री घृत युक्त चावलों में मिलाकर सेवन करें। यदि किसी कारण से चावल न प्राप्त हो सकें तो दूध के साथ प्रयोग कर सकते हैं।
इच्छानुसार सन्तान
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वैरिन्द्र गुप्तः
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