इच्छानुसार संतान
Ichhanusar Santan
बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta) द्वारा
स्रोत: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (उद्गम)
शुक्ल एवं कृष्ण पक्ष का धर्म निवारण
के स्थान पर अंग प्रत्यंग रहित केवल मास पिण्ड का जन्म हुआ। यह मूक अथवा प्रेत गर्भ ही था।
२- मुरादाबाद नगरी विलक्षण प्रतिभाओं को जन्म देने में सदैव अग्रणी रही है। संसार प्रसिद्ध दिव्य विभूतियों ने इस भूमि पर जन्म लेकर संसार को नई से नई दिशा दी है। कानूनोंधोयार्थ के निवासी, वयोवृद्ध ज्योतिष के प्रकाण्ड पण्डित श्रद्धेय जसवन्तराय जी के अनेकानेक शिष्य हैं जो ज्योतिष की ज्योति को प्रज्वलित रख कर जन सेवा में लगे हुए हैं। ऐसे महान व्यक्तित्व के निवास पर उनके सुयोग्य शिष्य विजय कुमार गुप्तः जी के साथ जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। श्री जसवन्त राय जी ने खड़े होकर मेरा स्वागत किया, यह उनकी साधुता और महान उदारता का परिचायक है।
चर्चा के बीच एक प्रसंग छिड़ा कि एक व्यक्ति अपनी पत्नी लेकर मेरे पास कई बार आये; कहा दो बार ऐसा हो चुका है कि मेरी पत्नी को गर्भ होता है और तीन मास होने के पश्चात् अनायास गायब हो जाता है, पता नहीं ऐसा क्यों हो जाता है। क्या कोई ऊपरी हवा तो नहीं जो ले जाती हो? राय साहब जी ने कहा- मेरी समझ में तो कुछ नहीं आया और मुझसे कहा- आप इसमें हमारा मार्ग दर्शन कीजिये कि वास्तविकता क्या है?
मैंने कहा- इसमें ऊपरी हवा अथवा प्रेत आदि कुछ नहीं है, जो ध्रुण को उठा कर ले जाय। 'केशाद' नाम के कीटाणु होते हैं, वह ध्रुण को खा जाता है और ध्रुण समाप्त होकर गर्भाशय खाली हो जाता है। राय साहब जी ने आश्चर्य चकित होकर कहा- आज आपसे चर्चा करके एक नई बात सामने आई, जिसकी जानकारी हमें नहीं थी। इसका कुछ उपचार भी है? मैंने कहा इसका उपचार बहुत सरल है। वह बोले क्या? मैंने कहा- इसका उपचार मैंने 'गर्भ स्थित न होने के कारण और उसका उपचार' प्रकरण में '३-' के क्रम पर आगे लिखा है, वहाँ पर देखें।
इच्छानुसार सन्तान
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वीरेन्द्र गुप्तः
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अति सूक्ष्म विचारों का प्रभाव
नगर में तसहुक हुसैन (बाबला) हकीम जी बड़े प्रसिद्ध थे। रामपुर स्टेट में एक पठान दम्पति के घर में उक्त प्रकार की घटना कई बार हो चुकी थी, वह दोनों बहुत चिन्तित थे, उनके एक मित्र जो मुरादाबाद में ही रहते थे, सलाह दी कि तुम हकीम जी को दिखाओ। पठान ने कहा- इसमें हकीम जी क्या करेंगे यह तो किसी 'आसेव' का काम है जो मेरे पीछे पड़ा है। मित्र ने कहा- दिखाने में कोई हर्ज नहीं है। पठान अपनी पत्नी को लेकर आया। हकीम जी ने हाथ देखा, और कहा- इसकी शर्माणाह में मूली चढ़ा दे। यह सुनकर पठान क्रोध से लाल हो उठा, मित्र ने पहचाना और उसी क्षण बाहर ले आया। पठान ने बाहर आकर कहा- इसने यह भयी मजाक क्यों की, रामपुर होता तो मैं इसे उसी समय चौर देता। मित्र ने शान्त किया और घर पर ले आया। समझाया क्रोध को दूर किया। दो-चार दिन के पश्चात् मित्र ने पठान से कहा- देखो वह हकीम है इलाज करता है, कोई पागल नहीं, कुछ करके देखो तो सही पठान की समझ में आया और मूली का प्रयोग किया, और देखा तो उस पर छोटे-छोटे काले कीट लगे थे विश्वास बना दो-चार दिन ऐसा ही किया कीट समाप्त हो गये और गर्भ रुक गया।
वैद्यराज श्री बुद्धासिंह जी ने इस दोष को मुझे बताया और इसकी चिकित्सा से अवगत कराया था।
३- तिलक धर्माथ औषधालय में वैद्य पण्डित बन्नीप्रसाद जी चिकित्सा करते थे। पण्डित गोपीनाथ जी चिकित्सा हेतु औषधालय पहुँचे। देखा वैद्य जी खिन्न मुद्रा में बैठे हैं पण्डित जी ने खिन्नता का कारण जानना चाहा वैद्य जी ने कहा- बच्चे का जन्म हुआ और वह चल बसा, चौथी बार ऐसा हुआ है। पण्डित जी ने कहा- आप चिकित्सक हैं इसकी चिकित्सा कीजिए? वैद्य जी ने- भाग्य की कोई चिकित्सा होती है क्या? पण्डित जी- आप
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वीरेन्द्र गुप्त:
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शुक्राणुओं का उलझा हुआ प्रश्न
वैद्य होकर ऐसी बात कह रहे हैं? यह रोग है-भाग्य नहीं। वैद्य जी- आप ही कुछ बताइये? पण्डित जी अबकी बार जब गर्भ स्थित हो तब आप मुझे बताना। कुछ समय को परघात् गर्भ स्थित हुआ, वैद्य जी पण्डित गोपीनाथ जी को घर पहुँचे। पंडित जी ने पेड़ की डाल निकाल कर दी और कहा- उसमें से चने बराबर तोड़ कर नित्य प्रातः काल गर्भिणी मुख मे डाल कर चूसती रहे। इसका सेवन प्रसव समय तक किया जायगा। वैद्य जी ने ऐसा ही किया और समय आने पर पुत्र ने जन्म लिया। वैद्य जी ने पंडित गोपीनाथ जी का धन्यवाद किया और इस प्रयोग को जानना चाह। पंडित जी ने बताया यह प्रयोग हमारे बाबा श्री पंडित जानकी दास जी से प्राप्त हुआ और आज तक कभी असफल नहीं हुआ।
प्रयोग- जिस शनिवार के दिन पुष्प नक्षत्र हो उसी दिन काले सिरस के पेड़ की सूखी डाल हाथ से छुटा कर रख लें ध्यान रहे किसी धातु से नहीं छुटानी चाहिए।
शुक्ल एवं कृष्ण पक्ष का
भ्रम निवारण
चन्द्र मास के दो पक्ष होते हैं, अमावस्या के पश्चात् बगले दिन से प्रारम्भ होने वाले पक्ष को शुक्ल पक्ष कहते हैं इसमें चन्द्रमा वृद्धि को प्राप्त होता है और पौर्णमासी के दिन चन्द्रमा पूर्ण हो जाता है इसके अगले दिन से चन्द्रमा का क्षय होने लगता है, इस पक्ष को कृष्ण पक्ष कहते हैं।
स्त्री के मासिक धर्म के भी दो पक्ष होते हैं पहला पक्ष मासिक धर्म को प्रारम्भ होने के दिन से गिना जाता है इसे शुक्ल पक्ष कहते हैं, इस पक्ष के सोलह दिनों में ही गर्भ स्थित होता है इसके पश्चात् १७वें दिन से कृष्ण पक्ष प्रारम्भ हो जाता है और
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वीरेन्द्र गुप्तः
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यह अगले मासिक धर्म तक चलता है, इस पक्ष में गर्भ स्थित नहीं होता। स्त्री को यही शुक्ल और कृष्ण पक्ष हैं। इसका चन्द्रमा के शुक्ल एवं कृष्ण पक्ष से कोई सम्बन्ध नहीं है।
यह धारणा बिलकुल निर्मूल और भ्रामक है कि चन्द्रमा के शुक्ल पक्ष में गर्भ स्थित होने पर पुत्र तथा कृष्ण पक्ष में गर्भ स्थित होने पर पुत्री की प्राप्ति होती है, यह नितान्त गलत है। इसका गर्भ में पुत्र-पुत्री के होने का कोई सम्बन्ध नहीं, इसमें तो केवल मासिक धर्म की 'सम' विषम' रात्रि ही प्रभावकारी होती है न कि चन्द्रमा के शुक्ल एवं कृष्ण पक्ष। चन्द्रमा के शुक्ल एवं कृष्ण पक्ष का बच्चे के विकासोन्मुख होने में तो अवश्य प्रभाव होता है। जिसे हमने आगे अंकित किया है।
★★★
अति सूक्ष्म विचारों का प्रभाव
आपने अति उत्तम सन्तान को प्राप्त करने के सभी साधनों पर विचार कर आचरण किया। आपने एक मास तक उत्तम भोजन लिया, ब्रह्मचर्य का पालन, मासिक धर्म की सावधानियाँ, उत्तम रात्रि, उत्तम तिथि, उत्तम नक्षत्र आदि सब कुछ विचार कर दिन का निश्चय किया। उस दिन आप आनन्दमन, प्रसन्नचित्त, शुद्ध विचारों के साथ गर्भाधान संस्कार के लिये अन्तापुर में प्रवेश कर कार्य में व्यस्त हो जाते हैं। उसी समय आपके समीपस्थ किसी साहूकार के घर पर डकैती पड़ती है। धीय-धीय बन्दूकों के फायर होने लगते हैं। उसकी भयंकर आवाजें आपके कानों तक भी पहुँची और तत्काल आपके मन में यह विचार उठा कि कहीं डकैती पड़ रही है। यदि उस समय वार्यपात होकर गर्भ स्थित हो जाय तो उस गर्भ से उत्पन्न बालक में दयुराज के विचार अवश्य ही प्रवेश कर जायेंगे। उसे कोई रोक नहीं सकेगा।
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वीरेन्द्र गुप्तः
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आपका प्रश्न हो सकता है कि इतने लम्बे समय तक के साधन और उत्तम आचरण के ऊपर इस क्षणिक वातावरण के विचारों का प्रभाव क्योंकर हो जायगा? आचरण विचारों की पवित्रता के लिये ही होता है। आकस्मिक घटना से स्थिर विचारों के विचलित हो जाने से उसके प्रभाव को रोका नहीं जा सकता। यही अति सूक्ष्म विचारों के प्रभाव का कारण है। इसका यह अर्थ नहीं कि हमने जो साधन और उत्तम आचरण को अपनाया वह सब व्यर्थ चला गया? नहीं! ऐसा नहीं होगा, जितना आपने तप किया है उसका फल और उत्तम साधनों का प्रभाव भी बच्चे में अवश्य आर्येगे। यदि वह दस्युराज बनता है तो आदर्श दस्युराज बनेगा।
शुक्राणुओं का उलझा हुआ प्रश्न
बहुत पहले से वैज्ञानिक यह मानते चले आ रहे हैं कि वीर्य के अन्दर लाखों शुक्राणु होते हैं। नई खोज के अनुसार अब यह गिनती ५ - ६ करोड़ तक पहुँच गई है। पैथोलॉजिस्ट ६० मिलियन शुक्राणु मानते हैं। यह सभी वैज्ञानिक स्वीकार करते हैं कि गर्भाधान के समय केवल एक ही शुक्रकीट सक्रिय होता है, और उसी से गर्भ धारण हो जाता है। प्रश्न उठता है कि जब केवल एक ही शुक्रकीट सक्रिय के लिये पर्याप्त उपयोगी होता है, तो प्रकृति ने एक बार के वीर्यपात में ५ - ६ करोड़ शुक्राणु के उपस्थित होने का क्या औचित्य माना है? चिकित्सक यह भी स्वीकार करते हैं कि गर्भाधान के लिये वीर्य में कम से कम ७०% सक्रिय शुक्राणुओं का होना अनिवार्य है।
यदि इससे कम सक्रिय शुक्राणु हैं तो गर्भ स्थिति का होना सम्भव नहीं है।
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वीरेन्द्र गुप्तः
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आयुर्वेद में गर्भ स्थिति को लिये रजः वीर्य का दोष रहित शुद्ध होना अनिवार्य है। इनमें से किसी एक में अथवा दोनों में कोई भी दोष है तो गर्भ स्थिति नहीं हो सकेगी। यदि गर्भ स्थित हो भी गया तो उस गर्भ से उत्पन्न बालक विकृत होगा अर्थात् अंग बिहेग होगा। आयुर्वेद में पुरुष शुक्राणुओं के न्यूनाधिक होने की और स्त्रियों में अण्डे के उपस्थित होने की कोई चर्चा नहीं है। वहीं पर तो केवल शुक्र और आर्तव की परम शुद्धता का ही उल्लेख है। शुद्ध शुक्र और आर्तव के लक्षण तथा दोष अधिकृत करते हैं।
शुक्र-दोष (वीर्य)
वात पित्त श्लेष्म शोणित कृष्णपग्रन्थि
पूति पूय क्षीण मूत्र पुरीष रेतसः।
सुश्रुत शरीर स्थान २/१
वात, पित्त, कफ, रक्त, दुर्गन्ध, गौंडदार, मवाद युक्त, क्षीण वीर्य, मूत्रगन्धी, मलगन्धी, दोष वाले पुरुष गृहस्थ में असमर्थ होते हैं।
आर्तव-दोष (रजः)
तेषु कृष्णपग्रन्थि पूतियक्षीण मूत्रपुरीष
प्रकाशमसाध्य साध्यमन्यद् भवति॥
सुश्रुत २/२
कृष्णक (सड़े मुर्दे की गन्ध), गौंडदार, मवाद युक्त, क्षीण, मूत्र मल रंग वाला, अथवा छीछड़ेदार, काले रंग का, असाध्य होते हैं।
शुद्ध शुक्र-
स्फटिकाम् द्रवं सिगंधं मधुरं मधुगन्धं च।
शुक्रमिच्छान्ति केचित् तु तैलक्षौद्रनिभं तथा॥
सुश्रुत - २/१३
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वीरेन्द्र गुप्तः
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चन्द्रमा, वीर्य और तिथि
स्फटिक मणि के समान सफेद, द्रव्यता, चिकना, मधुर गन्ध, मधुगन्ध। यह शुद्ध वीर्य के लक्षण हैं।
शुद्ध आर्तव-
शशास्तकप्रतिमं यत् तु यद्वा लाक्षारसोपमम्।
तदार्तवं प्रशंसन्ति यद्वांसो न विरज्यते॥
श्रुत २१२४
खरगोश के रक्त समान, लाल, लाख के रंग का, जो वस्त्र पर से धोने से छूट जाय। यह शुद्ध आर्तव के लक्षण हैं।
रजः-वीर्य के पूर्ण शुद्ध होने के पश्चात् भी चाहे कितना ही समर्थवान् पुरुष हो तो भी गर्भ स्थित नहीं होगा। गर्भ स्थित तब होगा जब दोनों को सामर्थ्य समान हो और एक साथ ही दोनों स्वलिप्त हों। स्वलिप्त रजः - वीर्य मिलकर गर्भाशय में प्रवेश करेगा तभी गर्भ स्थापित होगा। आगे पीछे-स्वलिप्त होने पर गर्भ स्थिति कभी नहीं होगा।
संस्कृत साहित्य में यह स्वीकारा जाता है कि कोई भी शब्द किसी का पर्यायवाची नहीं होता, प्रत्येक शब्द का अपना अस्तित्व होता है, अपना अर्थ होता है, और उपयोग भी उसका अपना अलग हो जाता है।
'शुक्राणु' और 'शुक्रकौट' यह दोनों शब्द अलग-अलग हैं। इन दोनों में स कोई भी किसी का पर्यायवाची नहीं, दोनों ही स्वतन्त्र हैं। दोनों के अर्थ भी भिन्न-भिन्न हैं। दोनों को क्रिया, कार्य, उपाधि सब कुछ अलग-अलग हैं। दोनों का एक अर्थवाची स्थान पर प्रयोग करना गलत है। शुक्रकौट का अर्थ है सन्तानोत्पादक जीव की उपस्थिति। शुक्राणु का अर्थ है शुक्र में आकृति, लोम, स्वभाव, ऊर्जा, ओज, शक्ति, सामर्थ्य और अणु का अर्थ है शुक्र का छोटे से छोटा कण। पूर्ण अर्थ बना 'शुक्राणु' शुक्र का प्रत्येक छोटे से छोटा कण ऊर्जा, ओज, शक्ति, और सामर्थ्य से सम्पन्न होने के नाते उसके समस्त कण गतिमान प्रतीत होते हैं। यह बात
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वारेन्द्र गुप्तः
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नक्षत्र और ऋतु
सत्य है कि इसी गतिमानता से ही पुरुष की ऊर्जा, पौरुष अर्थात् सन्तानोत्पादकता की सामर्थ्य को आँका जाता है।
शुक्र में पूर्व वर्णित दोषों में से जो भी विकृति होगी, उसका प्रभाव शुक्र ऊर्जा पर अवश्य होगा। इसी कारण से उसमें अणु की गति, सामर्थ्य आदि न्यून होने से सक्रिय शुक्राणु कम दीखेंगे।
इस चर्चा से स्पष्ट सिद्ध हो जाता है कि वीर्य में उपस्थित ५-६ करोड़ शुक्राणुओं को जीव की संज्ञा नहीं दी जा सकती, सन्तानोत्पादक शुक्रकोट तो केवल १ अथवा २ ही उपस्थित होते हैं, जो गर्भधारण के समय ही गर्भ में प्रवेश कर जाता है।
परमात्मा की इस प्रकृति रूप सृष्टि में कोई भी वस्तु क्रिया, प्रक्रिया निरर्थक नहीं है, केवल हमारे समझाने का अन्तर हो सकता है। हम शुक्राणु और शुक्रकोट की चर्चा विस्तार से कर चुके हैं। ५-६ करोड़ शुक्राणुओं के निरर्थक नष्ट होने की शंका निराधार है।
सोऽयमायुर्वेदः शाश्वतो निर्दिश्यते
अनादित्वात्स्वभावसंसिद्ध लक्षणत्वाद्भा
स्वभावानित्य त्वाच्च ॥२४॥
यःक संहिता
आयुर्वेद शाश्वत है निरन्तर है इसका कभी क्षय नहीं होता। अनादि होने से और स्वभाव संसिद्ध लक्षण होने से और पदार्थों के नित्य स्वभाव होने से आयुर्वेद शाश्वत है। पांचों तत्व (आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी) और उनकी तन्मात्राएँ (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध) अनादि हैं, उसी में ही आयुर्वेद भी समाहित है।
वैज्ञानिक उपबिम्बियों में हर १०-१५ वर्ष के पश्चात् परिवर्तन होता रहता है परन्तु आयुर्वेद के प्रतिपादित सिद्धान्तों में कभी परिवर्तन नहीं होता।
इच्छाभाषा, संज्ञान, १९० Collection. Digitized by eGangotri
चन्द्रमा, वीर्य और तिथि
सोम नाम ओषधि राजा।
पञ्चदश पर्वास सोम
इव हीयते वर्धते च॥
अर्थ- चन्द्रमा समस्त वनस्पतियों का राजा है। जो १५ दिन तक घटता है और १५ दिन तक बढ़ता है। इसी प्रकार 'सोम' नाम वीर्य का है, और वीर्य शरीर का राजा है। शरीर में वीर्य भी चन्द्र की भाँति घटता और बढ़ता है।
जिस प्रकार आकाश में चन्द्रमा घटता और बढ़ता है, उसी प्रकार पृथ्वी पर समस्त जलाशयों में भी जल चन्द्रमा की कलाओं के साथ घटता और बढ़ता है। इसी प्रकार पुरुष शरीर में वीर्य भी घटता और बढ़ता है। अमावस्या को चन्द्रमा नहीं दीखता तो आप उस दिन देखेंगे समुद्र में तथा कुओं में जल कम होगा। प्रमाण के लिए आप अमावस्या के दिन कुँए में रस्सी डालकर नाप लें और समुद्र किनारे पर छड़ी गाड़ दें आपको स्वयं अनुभव हो जायगा और पुरुष के शरीर में वीर्य भी कम होगा। जिस प्रकार चन्द्रमा बढ़ता जाता है उसी प्रकार जलाशयों में जल और शरीरों में वीर्य बढ़ता जाता है। पूर्णमासी को आकाश में जब चन्द्रमा पूर्ण होता है तो उसी दिन समुद्र, कुओं आदि में पूर्ण जल बढ़ जाता है और समुद्र में तो जल अपनी सीमा के बाहर भी आ जाता है। अब आप पूर्णमासी के दिन उसी रस्सी को उसी कुँए में डालकर नापेंगे तो कुँए में आपको स्वयं अनुभव हो जायगा कि आज जल बढ़ा हुआ है इसी प्रकार समुद्र के किनारे पर गाड़ी हुई छड़ी से ज्ञात हो जायगा कि समुद्र भी पूर्णमासी के दिन अपनी सीमा के बाहर आ जाता है। इसी प्रकार वीर्य भी उस दिन वीर्य कोष से बाहर सारे शरीर में फैल जाता है अमावस्या को वीर्यहीन
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वीरेन्द्र गुप्तः
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होने से और पूर्णमासी को वीर्य सारे शरीर में फैल जाने के कारण यदि वीर्य का क्षय अर्थात् स्त्री समागम करने से क्षय रोग (टीन्बी॰) हो जाती है क्योंकि अमावस्या को वीर्य न्यून होता है इसलिए उस दिन वीर्य क्षय होने से अवश्य ही शरीर में क्षीणता होगी और पूर्णमासी को वीर्य, वीर्य कोष से बाहर निकलकर सारे शरीर में फैल जाता है। इस कारण वीर्य अधिक पात होगा जिससे शरीर के सारे अंगों पर खिचाव पड़ेगा तो शरीर स्वयं क्षीणता को प्राप्त होगा। इसलिए गर्भाधान के लिए कृष्ण और शुक्ल दोनों पक्षों की पंचमी, षष्ठी, सप्तमी और नवमी यह तिथियाँ ही उत्तम हैं।
नक्षत्र और ऋतु
चन्द्रमा पृथ्वी को परिक्रमा करता हुआ जिस- जिस नक्षत्र के सामने आता है उस दिन वही नक्षत्र कहलाता है। गर्भाधान के लिए कुछ उपयुक्त नक्षत्रों की विवेचना करते हैं।
कृतिका नक्षत्र- नक्षत्र प्रायः अनेक तारों के समूह को कहते हैं। कोई नक्षत्र तो केवल एक तारा है, कोई दो तारों का समूह है, कोई तीन का और कोई चार तारों का समूह है। कृतिका नक्षत्र में सबसे अधिक तारों का समूह है। कृतिका नक्षत्र में गर्भाधान करने से बहुत से तारों के साथ सम्बन्ध हो जाता है और तारों का गर्भाधान पर विशेष प्रभाव पड़ता है। कृतिका नक्षत्र का अग्नि तारे के साथ रहना दो बातों को प्रगट करता है। एक तो यह कि दोनों का मिथुन भाव है और गर्भाधान भी मिथुन कृत्य है, दूसरे अग्नि तारे के साथ रहना अर्थात् अग्नि सम्बन्धी कृत्य करना और कराना। गर्भाधान का कृत्य तभी सार्थक होता है जब स्त्री पुरुष दोनों में कामाग्नि प्रज्वलित हो। इसलिए कृतिका नक्षत्र में गर्भाधान करना उचित है।
इच्छा-काम-संतोष Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
रोहिणी नक्षत्र- रोहिणी नक्षत्र में गर्भाधान करने से प्रजा की अधिक वृद्धि होती है। जिस प्रकार रोहिणी नक्षत्र में समस्त तारे एक समान ही तेज और रूप के हैं उसी प्रकार रोहिणी नक्षत्र में गर्भाधान की हुई सन्तान भी एक जैसे रंग रूप की होंगी।
मृगशीर्ष नक्षत्र- मृगशीर्ष नक्षत्र का दूसरा नाम प्रजापति भी है। प्रजापति प्रजा का पति होने से सब देवों (शक्तियों) में श्रेष्ठ है। सब देवों की श्री है। इसलिए मृगशीर्ष नक्षत्र में गर्भाधान करने से सन्तान भी मनुष्यों में प्रजापति के समान श्रीमान और श्रेष्ठ होती है।
पुनर्वसु नक्षत्र- पुनर्वसु नक्षत्र में पुनराधान करना श्रेष्ठ है। यदि गर्भस्थिति ठीक न हो तो पुनराधान पुनर्वसु नक्षत्र में करने से निश्चय ही गर्भ स्थित होता है। परन्तु स्त्री पुरुष में कोई रोगदि न हो।
फाल्गुनी नक्षत्र- फाल्गुनी नक्षत्र का दूसरा नाम अर्जुनी है और यह नाम गूढ है। फाल्गुनी अर्थात् फल का देने वाला नक्षत्र। फल देने की दृष्टि से फाल्गुनी नक्षत्र को इन्द्र नक्षत्र भी कहते हैं। यदि आप चाहते हैं कि मेरी सन्तान में अर्जन करने की क्षमता अधिक हो अर्थात् धन के संग्रह करने में पूर्ण समर्थ हो और सम्पत्ति का अर्जन करते हुए परम ऐश्वर्यशाली इन्द्र के समान हो तो फाल्गुनी नक्षत्र में गर्भाधान करें। फाल्गुनी नक्षत्र दो हैं। एक पूर्वाफाल्गुनी और दूसरा उत्तराफाल्गुनी। पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र में गर्भाधान करने से सन्तान धनपति उन्नीतशील होती है और उत्तराफाल्गुनी में गर्भाधान करने से सन्तान उत्तरोत्तर उन्नीतशील होती है और उसके आगे उसकी सन्तान भी श्रेय और श्री को पाने वाली होती है।
हस्ता नक्षत्र- हस्त नक्षत्र का हाथ से विशेष सम्बन्ध है। हस्ता नक्षत्र में गर्भित बालक हाथ का उदार दानी, परोपकारी होता है। अर्थात् अपने द्वार से किसी को खाली नहीं जाने देता है। यदि आप उदार दानी, परोपकारी सन्तान चाहते हैं तो हस्त नक्षत्र में गर्भाधान करें।
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वीरेन्द्र गुप्तः
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चित्रा नक्षत्र- चित्रा नक्षत्र का चित्त (हृदय) से विशेष सम्बन्ध है। चित्रा नक्षत्र में गर्भाधान की हुई सन्तान के अन्दर दूसरे को अपनी ओर आकर्षित कर लेने की विशेष शक्ति होती है। वह अपने शत्रुओं के हृदय सुगमता से जीत लेता है। दूसरे चित्रा नक्षत्र का बालक युद्ध में भी अपने शत्रुओं को परास्त कर विजयी होता है। यह नक्षत्र क्षत्रियों और सैनिकों को गर्भाधान करने के लिए अति उत्तम है। चित्रा नक्षत्र का बड़ा महत्व है। वह अपने शत्रुओं को रौंदता हुआ विजय को प्राप्त करता चला जाता है। सचमुच जो क्षत्रिय विद्वान् चित्रा नक्षत्र में गर्भाधान करता है उसकी सन्तान शत्रुओं पर विजय ही प्राप्त करती चली जाती है।
नक्षत्रों का सूर्य से घनिष्ठ सम्बन्ध है। गर्भाधान के लिए जो नक्षत्र चुना हो यदि उस नक्षत्र से युक्त सूर्य भी हो तो नक्षत्र की विशेषता कई गुना अधिक हो जाती है।
जिस प्रकार मास के दो पक्ष होते हैं, जिसमें से एक पक्ष में चन्द्र की कला का क्षय होता है और दूसरे पक्ष में चन्द्र की कला में वृद्धि होती है। इसी प्रकार वर्ष के भी दो पक्ष हैं। एक पक्ष में सूर्य की कला क्रमशः क्षय होती है और दूसरे पक्ष में वृद्धि। इसके एक पक्ष को उत्तरायण कहते हैं जिसमें सूर्य कला में वृद्धि होती है और दूसरे पक्ष को दक्षिणायन कहते हैं जिसमें सूर्य की कला का क्षय होता है। जिस प्रकार चन्द्र की कला का वीर्य पर प्रभाव पड़ता है उसी प्रकार सूर्य का भी प्रभाव पड़ता है। यह तो सत्य ही है कि चन्द्र में जो प्रकाश है वह सूर्य का है। चन्द्र के जिस भाग पर सूर्य की किरणें पड़ती हैं उसी भाग में प्रकाश उत्पन्न हो जाता है और वह किरणें जिस प्रकार बढ़ती जाती हैं, उसी प्रकार चन्द्र में प्रकाश बढ़ता जाता है। इससे स्पष्ट है कि चन्द्र में कलाओं का संचार सूर्य के ही प्रकाश से होता है।
जिस दक्षिणायन पक्ष में सूर्य की कलाओं का क्षय होता है तो वह क्षीणता चन्द्र में भी हो जाती है और वही क्षीणता वीर्य
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वीरेन्द्र गुप्तः
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कन्या और पुत्र भेद रात्रियाँ
में भी होगी। जिस समय सूर्य उत्तरायण होता है अर्थात् सूर्य की कलाओं में वृद्धि होने लगे तभी चन्द्र की कलाओं में भी विशेषता आने लगती है। जब चन्द्र की कलाओं में विशेषता होगी तो वीर्य भी विशेषता युक्त हो जाता है।
'तथा शुक्ल पक्ष का नाम 'देव' और कृष्ण पक्ष का नाम 'असुर' है। तथा उत्तरायण की 'देव' संज्ञा और दक्षिणायन की 'असुर' संज्ञा है।'
ऋग्वेदादिभाष्य भूमिका ग्रन्थप्रामाण्यप्रामाण्य विषय
सूर्य की कलाओं के क्षय और वृद्धि से छः ऋतुएँ बनती हैं। तीन उत्तरायण की वसन्त, ग्रीष्म और वर्षा। और तीन दक्षिणायन की शरद, हेमन्त और शिशिर। बसन्त ऋतु के आरम्भ से सूर्य उत्तरायण होकर कलाओं में वृद्धि को प्राप्त होता है। जब किसी में किसी प्रकार की वृद्धि होती है तो उसका प्रथम प्रभाव उसकी वृद्धि पर होता है। इसी प्रकार सूर्य की प्रथम वृद्धि कला का विशेष प्रभाव वृद्धि पर ही पहुँचा। इस प्रकार जो मनुष्य अपनी सन्तान को ब्रह्मवर्चसी वेदज्ञ और तीक्ष्ण बुद्धि की बनाना चाहते हैं तो वह वसन्त ऋतु में गर्भाधान करें। जो मनुष्य चाहते हैं कि हमारी सन्तान श्री और यश से परिपूर्ण और राजश्री को प्राप्त करने वाली बलवान क्षत्रिय हो तो वह ग्रीष्म ऋतु में गर्भाधान करें। जो मनुष्य चाहते हैं कि हमारी सन्तान पशुधन, वारिण्य और धन के संग्रह करने में चतुर, वैश्य वृत्ति में पूर्ण योग्य हो तो उन्हें चाहिए कि वह वर्षा ऋतु में गर्भाधान करें।
जिस प्रकार गर्भाधान के लिए उत्तरायण परम श्रेष्ठ है उसी प्रकार मास का शुक्ल पक्ष भी परम श्रेष्ठ है।
पारिवारिक असन्तोष की धधकती ज्वालायें भयंकर परिणाम उपस्थित कर बड़े से बड़े वंश को ध्वस्त कर देती हैं। कहीं पिता पुत्र में असन्तोष है तो कहीं भाई-भाई और भाई-बहिन में। जिसका
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वीरेन्द्र गुप्तः
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मूल कारण है विपरीत प्रकृति वाले नक्षत्रों में गर्भाधान संस्कार का होना।
जिस दम्पति की इच्छा हो कि हमारे परिवार में सदैव सुख और शान्ति का वातावरण रहे तो उन्हें उचित है कि वह अपने नाम नक्षत्र के अनुकूल प्रकृति वाले ही नक्षत्रों में गर्भाधान संस्कार करें।
नक्षत्र २८ होते हैं। अभिजित नक्षत्र उत्तराषाढ़ के पश्चात् आता है जिसका समय अति न्यून है, इसी कारण उसकी गणना कम होती है। शेष २७ नक्षत्रों के अनुकूल प्रतिकूल प्रकृति के अनुसार तीन भागों में बाँटा गया है। अपने नाम नक्षत्र वाली पत्ति के नक्षत्रों में ही गर्भाधान होने से परिवार में कभी किसी में प्रतिकूलता उत्पन्न नहीं होगा।
| प्रथम पत्ति | द्वितीय पत्ति | तृतीय पत्ति |
|---|---|---|
| १. अश्वनि | १. भरणां | १. कृत्तिका |
| २. मृगशिरा | २. रोहिणां | २. अश्लेषा |
| ३. पुनर्वसु | ३. आद्रा | ३. मघा |
| ४. पुष्य | ४. पूर्वाफाल्गुनी | ४. चित्रा |
| ५. हस्त | ५. उत्तराफाल्गुनी | ५. विशाखा |
| ६. स्वाती | ६. पूर्वाषाढ़ | ६. ज्येष्ठा |
| ७. अनुराधा | ७. उत्तराषाढ़ | ७. मूल |
| ८. श्रवण | ८. पूर्वाभाद्रपद | ८. धनिष्ठा |
| ९. रेवती | ९. उत्तराभाद्रपद | ९. शतभिष |
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इच्छानुसार सन्तान
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वीरेन्द्र गुप्त:
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कन्या और पुत्र भेद रात्रियोंँ
युग्मासु पुत्राजायन्ते स्त्रियोऽयुग्मासु रात्रिषु।
तस्माद्युग्मो सुपुत्रार्थी सविशोदातवेस्त्रियम्॥
मनु ३/४८
अर्थ- (माननीय १० रात्रियों में भी) युग्म ६, ८, १०, १२, १४, और १६ रात्रियों में (गर्भाधान होने से) पुत्र उत्पन्न होता है और अयुग्म ५, ७, ९ और १५ रात्रियों में (गर्भाधान होने से कन्या) उत्पन्न होती है।
इसलिये पुत्र की इच्छा वाले युग्म रात्रियों में और कन्या की इच्छा वाले अयुग्म रात्रियों में स्त्री से समागम करें, और सरलता से समझने के लिए हमारी पुस्तक 'पुत्र प्राप्ति का साधन' देखें।
यह रात्रियाँ मासिक धर्म से आरम्भ होती हैं।
पुमान्पु सोऽधिकं शुक्रेस्त्री भवत्यधिकं स्त्रियाः।
समेऽपुमान्पु स्त्रियां वा क्षीणोऽल्पे च विपर्ययः॥
मनु ३/४९
अर्थ- पुरुष का वीर्य अधिक होने पर पुत्र और स्त्री का रजः अधिक होने पर कन्या और रजः वीर्य दोनों समान हों तो नपुंसक या एक कन्या और एक पुत्र उत्पन्न होता है। वीर्य क्षीण हो अथवा कम हो तो सन्तान नहीं होता।
इंश्वरीय व्यवस्था के अनुसार युग्म रात्रियों में स्त्री का रजः न्यून हो जाता है और अयुग्म रात्रियों में रजः अधिक हो जाता है।
यदि पुरुष का वीर्य इतनी मात्रा में न्यून है कि जो युग्म रात्रि में स्त्री का रजः कम होने पर भी उससे कम है तो ऐसी स्थिति में गर्भाधान करने पर युग्म रात्रि में भी कन्या का ही जन्म
इच्छानुसार सन्तान
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वीरन्द्र गुप्तः
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भ्रान्ति निवारण
होना सम्भव है। रजः से अधिक मात्रा वीर्य की होने पर ही पुत्र उत्पन्न होता है। इसलिए उचित है कि पुत्र की इच्छा के लिए गर्भाधान क्रिया से २ या ३ मास पूर्व वीर्य को अधिक उत्पन्न करने वाले पदार्थों एवं औषधि का सेवन करना अत्यन्त आवश्यक है। ध्यान रहे पुरुष का वीर्य अधिक होने पर भी अयुग्म रात्रि में गर्भाधान करने से कन्या ही जन्म लेगी। क्योंकि उस तिथि में स्त्री का रजः इतना अधिक मात्रा में होता है कि उससे किसी भी प्रकार पुरुष का वीर्य अधिक नहीं हो सकता।
यदि किसी भी प्रकार से पुरुष का वीर्य स्त्री के रजः से अधिक होना सम्भव न हो सके तो ऐसी अवस्था में हम उन्हें एक विशेष साधन से अवगमन कराते हैं।
जिस प्रकार स्त्री को मासिक धर्म के दिन से युग्मायुग्म रात्रि के हिसाब से स्त्री का रजः न्युनाधिक होता है उसी प्रकार एक मास में स्त्री का रजः न्यून और अगले मास में अधिक होता है। प्रत्येक व्यक्ति के लिये यह सम्बन्ध नहीं कि वह किसी भी मास में यह जान सके कि इस मास में स्त्री का रजः न्यून मात्रा में है या अधिक मात्रा में। इसका सरल उपाय निम्न प्रकार है—
उदाहरण— यदि स्त्री ने कन्या को जन्म दिया तो कन्या का जन्म होने के पश्चात् जो प्रथम मासिक धर्म होगा वह मास रजः न्यून का मास होगा। इसके पश्चात् जब अगला मासिक धर्म होगा तो वह रजः प्रधान मास होगा। इसी प्रकार क्रम से एक मास रजः न्यून का और अगला मास रजः प्रधान का होता है।
कन्या का जन्म होने के पश्चात्—
| रजः न्यून मास | रजः प्रधान मास ---|---|--- प्रथम मासिक धर्म | (१) दिनांक..... | (२) दिनांक..... (३) दिनांक..... | (४) दिनांक..... (५) दिनांक..... | (६) दिनांक..... |
इच्छानुसार सन्तान
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वीरेन्द्र गुप्तः
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चेतावनी
इसी प्रकार यदि स्त्री ने पुत्र को जन्म दिया तो पुत्र का जन्म होने के पश्चात् जो प्रथम मासिक धर्म होगा वह मास रजः प्रधान मास होगा। इसके पश्चात् जब अगला मासिक धर्म होगा तो वह रजः न्यून मास होगा। इसी प्रकार आगे गणना करें।
पुत्र का जन्म होने के पश्चात्-
| रजः प्रधान मास | रजः न्यून मास ---|---|--- प्रथम ' मासिक धर्म | (१) दिनांक..... | (२) दिनांक..... | (३) दिनांक..... | (४) दिनांक..... | (५) दिनांक..... | (६) दिनांक.....
जिन पुरुषों में सामान्य स्थिति में स्त्री के रजः से वीर्य की मात्रा न्यून है तो उन्हें चाहिए कि वह रजः न्यून मास में युगम ६, ८, १०, १२, १४, १६ रात्रियों में ही गर्भाधान करें तो निश्चय ही उनको पुत्र लाभ होगा।
जिस बच्चे का जन्म हुआ हो उसी के अनुरूप एक चार्ट उपरोक्त प्रकार का बना लेना चाहिए। आपको इस चार्ट की सहायता से रजः न्युनाधिक मास का पता बड़ी ही सुगमता से चलता रहेगा। आपको अपनी रुचि के मास को निकालने में किसी भी कठिनाई का अनुभव नहीं होगा।
शमीभरवत्थ आरूढस्तत्र पुंसुवन् कृतम्।
तद् वै पुत्रस्य वेदनं तत् स्त्रीष्वा भरामसि॥
अथर्ववेद ६/११/१
अर्थ- शमी (जन्ड) नामक वृक्ष के ऊपर उगा हुआ पीपल के (पचांग का चूर्ण) पुमान् पुत्र उत्पन्न करने को औषधि है। इसी से पुत्र लाभ होता है और इसी औषधि को सेवन से उत्पन्न वीर्य को आधान करना चाहिये।
इसके सेवन से पुरुष का वीर्य पुष्ट होकर गर्भाधान क्रिया समय अधिक मात्रा में स्वलिप्त होकर पुत्र को ही जन्म देगा तथा पीपल के ऊपर उगा हुआ शमी पुत्री उत्पन्न करने की औषधि है।
इच्छानुसार सन्तान
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वीरेन्द्र गुप्तः
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मासिक धर्म से चौथे दिन एक प्लास (ढाक) का हरा पत्ता जीवित बछड़े वाली गाय के दूध के साथ घोटकर स्त्री को देने से, उस मास में गर्भ रहने पर पुत्र उत्पन्न होगा।
गर्भिणी स्त्री को दूसरे मास के प्रारम्भ से ही प्रतिदिन प्लास (ढाक) के छाया में सुखाये हुए पत्तों का चूर्ण समान भाग मिश्री मिलाकर ३ माशा जीवित बछड़े वाली गाय के दूध के साथ निरन्तर सेवन कराने से पुत्र लाभ हो सकता है।
जिनके कन्या ही कन्या होती हैं और वह उपरोक्त उपायों को या तो समझ न सके हैं या क्रियात्मक रूप में न ला सके हैं, तो वह इस बात का ध्यान रखें कि गर्भस्थित हो जाने के ८१ से ८५ दिन के अन्दर यदि स्त्री को 'सूर्य गुणी' औषधि का प्रयोग कराया जाय तो पुत्र उत्पन्न हो सकता है, क्योंकि स्त्रियों में चन्द्र गुण की अधिकता होती है और पुरुषों में सूर्य गुण की। 'सूर्य गुणी' औषधि वेद-कृति १३, राम विहार कालोनी, जिला सहकारी बैंक के पीछे, मुरादाबाद से प्राप्त हो सकती है।
श्रांति निवारण
अधिकतर व्यक्ति युगम अयुगम रात्रियों के निकालने में भ्रम में पड़ जाते हैं कोई तो श्रुतु स्नान के पश्चात् से तिथि की गिनती करने लगते हैं। इसका सही रूप इस प्रकार है कि मासिक धर्म जिस समय आरम्भ होता है उसी समय के पश्चात् जो पहली रात्रि आयेगी वही पहली रात्रि है और २४ घण्टे बाद दूसरा दिन या दूसरी रात्रि मानी जायगी जैसे मासिक धर्म रात्रि को आठ बजे आरम्भ हुआ तो वही रात्रि पहली है और उसी से २४ घण्टे पश्चात् अगले दिन रात्रि को पाँनेआठ बजे तो पहली रात्रि है और सवाआठ बजे दूसरी रात्रि मानी जायगी। जिस दिन से मासिक धर्म आरम्भ होता है वही पहला दिन कहलाता है। उसी दिन से १६ रात्रि तक गर्भाधान होता है उसके पश्चात् नहीं।
इच्छानुसार सन्तान
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वारन्द्ध गुप्तः
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एक और भ्रान्ति है, कोई इन तिथियों को पत्रे से जोड़ते हैं, कोई कलेंडर से यह दोनों ही गलत हैं। वास्तव में जिस दिन स्त्री को मासिक धर्म होता है, वही दिन उसका पहला दिन होता है अर्थात् पहली तारीख होती है।
चेतावनी
१- ४,७,११,१३ रात्रियों दोष युक्त कलंक को प्रदान करने वाली सन्तान को जन्म देती हैं। इन रात्रियों में कभी भूल कर भी गर्भ स्थापित न करें।
२- परदेश में अथवा दूसरे के गृह पर कभी भी गर्भाधान न करें।
३- ५,६,८,९,१०,१२,१४ रात्रियाँ दोष रहित हैं, इनमें गर्भ स्थापित करना उचित है।
४- मेरा जन्म सम्बत् १९८४ अर्थात् १९२७ ई० का है। १९५६ में इच्छानुसार सन्तान पुस्तक लिखने लगा। उसी बीच व्यास ग्रन्थ देखने को मिला, उसका आदि अन्त कुछ नहीं था। बीच के हो पुच्छ थें उसी में सोलह कला की चर्चा को देखा, जो पुस्तक में आंकित है। तब से अब तक मैं बराबर इसी विचार में लगा रहा कि सन्तानों में इस प्रकार का दोष युक्त अन्तर क्यों कर होता है। आज सम्बत् २०६४ प्रथम ज्येष्ठ की अमावस्या के दिन यज्ञ समय पर गायत्री जाप के पश्चात् अनायास नेत्रों के सामने तेज प्रकाश की चमक, चमकी और उसी क्षण परमात्म कृपा से ५१ वर्ष पूर्व इस उलझे हुये प्रश्न का समाधान मिला। वह समाधान था 'यह सब आतंक के कारण ही होता है' अर्थात् स्त्री के मासिक धर्म का 'रेजः'।
अब आपके सामने हर दिन की रात्रि के स्त्री के आतंक की
इच्छानुसार सन्तान
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वीरेन्द्र गुप्तः
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पुरुष और नारी का अन्तर
स्थिति को रखते हैं।
प्रथम तीन दिन पूर्व मास का सञ्चित आर्तव प्रवाहित होने लगता है।
चौथे दिन से नया आर्तव बनने लगता है। आर्तव के अति न्यून होने के कारण उस दिन की रात्रि में गर्भ स्थित होने पर इससे पुत्र का जन्म तो होगा, परन्तु वह आर्तव न्यून होने के कारण अल्पायु हो सकता है।
पाँचवें दिन की रात्रि में कन्या, छठे दिन की रात्रि में मध्यम आयु का पुत्र जन्म लेता है।
सातवें दिन की रात्रि में स्त्री के आर्तव में प्रजनन क्षमता के तत्व कम होते हैं। इस प्रकार के आर्तव से उत्पन्न कन्या में बन्ध्या दोष बन जाता है।
आठवें दिन की रात्रि में पुत्र, नवें दिन की रात्रि में कन्या, दसवें दिन की रात्रि में चतुर पुत्र उत्पन्न होता है।
११वीं १३वीं रात्रि में स्त्री का आर्तव अत्यन्त उत्तेजक होता है। इन रात्रियों में स्थापित गर्भ से उत्पन्न कन्या का शरीर अत्यन्त उत्तेजक आर्तव से निर्मित होता है। इसी कारण वह उत्पन्न कन्या अत्यन्त कामुक और विषयी हो जाती है। उसे इस प्रकार के पाप कर्म करने से कोई रोक नहीं सकता। ११वीं १३वीं रात्रि में अधिक उत्तेजक आर्तव के कारण स्त्रियों, उस दिन विषय वासना की अधिक इच्छुक होती हैं। इस होने वाली भयंकर हानि को ध्यान में रखते हुये इस दिन सहवास नहीं करना चाहिये।
बारहवीं और चौदहवीं रात्रि में स्त्री का उत्तेजक और उग्र आर्तव बिलकुल शान्त हो जाता है। यह एक प्राकृतिक प्रक्रिया है। बारहवीं और चौदहवीं रात्रि में उत्तम पुत्र होता है।
१५-१६ रात्रियों में स्थापित गर्भ से संसार को चकित करने वाली दिव्य विभूतियों जन्म लेती हैं। इन दोनों दिनों में स्त्री का आर्तव परिपूर्ण, शुद्ध पवित्र और दोष रहित होता है, इसी कारण
हठयोगप्रकरण, संस्कृत, शिवान Varanasi Collection, Digitized by eGangotri