इच्छानुसार संतान
Ichhanusar Santan
बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta) द्वारा
स्रोत: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (उद्गम)
पृष्ठ 202, कुल 250 में से
संदर्भ में पढ़ेंलालनाद् पहवदोषास्ताडनाद् बहवो गुणाः। तस्मात्पुत्रव्य शिष्यव्य ताडयेन्न तु लालयेत्॥
चाणक्य नीति २/१२
अर्थ- लाड़ करने से बहुत दोष होते हैं और ताड़ना देने से बहुत गुण, इसलिए पुत्र और शिष्य को ताड़ना देता रहे, लाड़ न करे।
अति प्रत्येक कार्य में हानिप्रद होती है। बच्चों को अति प्यार करना अर्थात् स्नेह के कारण उन्होंने जो भी कार्य उचित अनुचित किया उससे कुछ न कहा, या अति क्रोध अर्थात् बच्चों ने कोई किञ्चित भी कार्य नहीं किया या बिगाड़ दिया तो उसे अति दण्ड दिया। यह दोनों ही बातें बच्चों को बिगाड़ देती हैं। परन्तु बिगाड़ ही नहीं देतीं वरन् इस कारण बच्चे अपने हाथों से भी निकल जाते हैं। इसलिए बच्चों को समयानुसार प्यार और ताड़ना दोनों ही करने चाहिये। जिसका व्यवहार क्रम चाणक्य ने कहा है।
पुत्र औ पुत्रियां में कोई भेद माता-पिता को नहीं रखना चाहिए दोनों के साथ समान व्यवहार करना उचित है। वे दोनों ही आत्मज हैं।
माता भली, पुत्र-कन्या का पालन करती एक समान।
माता बुरी, डांटती कन्या को, सुत का करती सम्मान॥
गाय अपने बच्चे को कितनी ममता प्यार से पालती है। वह अपना दूध पिलाकर उसे प्रसन्न देखना चाहती है, जब बच्चा कहीं चला जाता है तो गाय डकरा डकरा कर उसे पुकारती है। हालाँकि मनुष्य शरीर में स्त्री भी इसी प्रकार बच्चे का पोषण करती है परन्तु अन्तर इतना ही है कि वह गाय निस्वार्थ बच्चे का पोषण करती है। वह यह विचार कर बच्चे को नहीं पालती कि जब बड़ा हो जायगा तो वह मेरे लिए जंगल से हरी-हरी घास लाकर देगा या मुझे ठण्डा जल लाकर पिलायेगा, मेरी सेवा करेगा वह
इच्छानुसार सन्तान
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वीरेन्द्र गुप्तः
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