भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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ॐ श्रीपरमात्मने नमः

निवेदन

त्वमेव माता च पिता त्वमेव त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव।

त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव त्वमेव सर्वं मम देवदेव ॥

मूकं करोति वाचालं पङ्खुं लङ्घयते गिरिम्।

यत्कृपा तमहं वन्दे परमानन्दमाधवम् ॥

उपनिषदोंमें ईश आदि ग्यारह उपनिषद मुख्य माने जाते हैं। उनमें बृहदारण्यक और छान्दोग्य—इन दो उपनिषदोंका कलेवर बहुत बड़ा है और उनमें विषय भी अत्यन्त कठिन हैं—इस कारण उन विषयोंका समझना-समझाना मुझ-जैसे अल्पज्ञ मनुष्यकी योग्यताके बाहरकी बात है, यह सोचकर उन दोनोंको छोड़कर शेष नौ उपनिषदोंपर यह व्याख्या लिखी गयी।

यह व्याख्या विक्रम संवत् २००५ में ईश और केन-उपनिषदपर तो स्वर्गाश्रममें और अवशिष्ट सात उपनिषदोंपर गोरखपुरमें पूज्यपाद भाईजी, श्रीजयदयालजीकी आज्ञासे ‘कल्याण’ के ‘उपनिषदङ्क’ में प्रकाशित करनेके लिये लिखी गयी थी।

इन नौ उपनिषदोंमेंसे पहला ईशावास्योपनिषद तो शुक्ल-यजुर्वेदका चालीसवॉ अध्याय है एवं अन्य आठ उपनिषद आरण्यक और ब्राह्मणग्रन्थोंके भाग हैं। इन सबमें परब्रह्म परमेश्वरके निर्गुण और सगुण स्वरूपका तत्त्व नाना प्रकारसे समझाया गया है। वेदोंका अन्तिम भाग होनेके कारण इनको वेदान्तके नामसे भी पुकारा जाता है। इन उपनिषदोंपर प्रधान-प्रधान सम्प्रदायोंके पूज्यपाद आचार्योंने अपने-अपने मतके अनुसार भाष्य लिखे हैं तथा संस्कृत और हिंदी-भाषामें भी महानुभाव पण्डितोंने बहुत-सी टीकाएँ लिखी हैं। एवं संस्कृत-भाष्य और टीकाओंके हिंदी-भाषामें अनुवाद भी प्रकाशित हो चुके हैं। इस परिस्थितिमें मुझ-जैसे साधारण मनुष्यके लिये इसपर व्याख्या लिखना कोई आवश्यक कार्य नहीं था। परंतु जब ‘कल्याण’ के विशेषाङ्क—‘उपनिषदङ्क’ के निकाले जानेकी बात स्थिर हुई, उस समय पूज्यजनोंने यह कार्यभार मुझे सौंप दिया। अतएव उनकी आज्ञाके पालनके