भारतकोश
जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

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[ २१ ] विषय पृष्ठ २१८. कूटवाणिज जातक . . . . ३५७ [ एक बनिए ने दूसरे की लोहे की फालों को 'चूहे खा गए' कहा तो उसने उसके पुत्र को 'चिडिया ले गई' कहा । ] २१९. गरहित जातक . . . . ३६१ [ बन्दर ने कुछ दिन मनुष्यों में रह कर लौटकर अपने साथियों में मनुष्यों के जीवन की बड़ी निन्दा की । ] २२०. धम्मद्ध जातक . . . . ३६४ [ राजा ने काळक के स्थान में बोधिसत्त्व को न्यायाधीश बना दिया । काळक का रिश्वत का लाभ जाता रहा । उसने बोधिसत्त्व को मरवाने के अनेक उपाय किए । शक्र बोधिसत्त्व के सहायक थे । काळक की एक न चली । ] ८. कासाव वर्ग ३७५ २२१. कासाव जातक . . . . ३७५ [ एक आदमी काषाय वस्त्र पहन हाथियों को धोखा दे उनकी सूण्ड काट काट लाकर बेचता था । ] २२२. चुल्लनन्दिय जातक . . . . ३७८ [ शिकारी ने मातृ-भक्त बन्दरों तथा उनकी बूढ़ी माता को मार डाला । उसके घर पर बिजली गिर पड़ी । ] २२३. पुटभत्त जातक . . . . ३८१ [ राजा को भात की पोटली मिली । वह उसमें से बिना रानी को कुछ दिए अकेला ही खा गया । ] २२४. कुम्भील जातक . . . . ३८५ [ वानरिंद जातक (५७) के समान कथा है । ] २२५. खन्तियवण्णन जातक . . . . ३८६ [ आमात्य ने राजा के रनिवास को दूषित किया और आमात्य के सेवक ने उसके घर में दूषितकर्म किया । ]