भारतकोश
जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

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२६४ [ २.४.१८६ खोजते हुए उसने उस सूअर को सोते हुए देख आहिस्ता से समीप जा मणि- खण्ड उठा लिया। उसके प्रताप से आकाश में उड गूलर के वृक्ष पर बैठ सोचने लगा-यह सूअर इसी के प्रताप से आकाश में घूमता हुआ यहाँ रहता है। मुझे पहले ही इसे मार कर मास खाकर पीछे जाना चाहिए। उसने एक डण्डा तोड कर उसके सिर पर गिराया। सूअर ने जागकर जब मणि को न देखा तो वह कांपता हुआ इधर उधर दौडने लगा। वृक्ष पर बैठा हुआ आदमी हँसा। सूअर ने उसे देखा तो वृक्ष से सिर दे मारा, और वहीं मर गया। उस आदमी ने उतर कर आग बनाई और उसका मास पका कर खाया। फिर आकाश में उडकर हिमालय के ऊपर से जाते हुए उस आश्रम को देख ज्येष्ठ तपस्वी के आश्रम पर उतरा। दो तीन दिन रह कर तपस्वी की सेवा की। वहाँ उसने छुरी-कुल्हाडी की महिमा देखी। 'इसे मुझे लेना चाहिए' सोच उसने तपस्वी को मणि-खण्ड की महिमा बता कर कहा- भन्ते ! यह मणि-खण्ड लेकर मुझे यह छुरी-कुल्हाडी दें। आकाश मे घूमने की इच्छा से उस तपस्वी ने मणि-खण्ड लेकर यह छुरी-कुल्हाडी दे दी। उसने थोडी दूर जा छुरी-कुल्हाडी को हाथ से रगड कर कहा-"छुरी- कुल्हाडी ! तपस्वी के सिर को काटकर मेरा मणि-खण्ड ले आ।" वह जाकर तपस्वी का सिर काट मणि-खण्ड ले आई। उस आदमी ने छुरी-कुल्हाडी को एक जगह छिपा कर मँझले तपस्वी के पास जा, कुछ दिन रह, ढोल की महिमा देख मणि-खण्ड दे, भेरी ली। फिर पूर्वोक्त प्रकार से उसका भी सिर कटवा छोटे तपस्वी के पास जा, दही के घट की महिमा देख पूर्वोक्त प्रकार से ही उसका भी सिर कटवा, मणि-खण्ड, छुरी- कुल्हाडी, ढोल तथा दही का घडा ले, आकाश में उड कर वाराणसी के पास पहुँचा। वहाँ से उसने वाराणसी के राजा के पास एक आदमी के हाथ पत्र भेजा-युद्ध करें अथवा राज्य दें। राजा सन्देश सुनते ही विद्रोही को पकडने के लिए निकल पडा। उसने ढोल के एक तल को बजाया। चारो प्रकार की सेना पहुँच गई। जब उसने देखा कि राजा ने अपनी सेना पंक्ति-बद्ध कर ली, उसने दही के घडे को छोडा। बडी भारी नदी बह निकली। जनसमूह दही में डूब गया और निकल न सका।