भारतकोश
जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

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२८६ [ २.५.१६४ सुजाता कपडे बदल अलङ्कृत हो पीछे बैठी। जिस समय गाड़ी ने नगर में प्रवेश किया, उसी समय हाथी के कन्धे पर बैठ नगर की प्रदक्षिणा करता हुआ वाराणसी नरेश उधर आ निकला। सुजाता उतर कर गाड़ी के पीछे पीछे पैदल चल रही थी। राजा ने उसे देख, उसके सौन्दर्य पर ऐसे मुग्ध हो मानो वह उसकी आँखें खींच ले रहा हो, एक अमात्य को भेजा कि पता लगाए कि उसका स्वामी है वा नही ? उसने जाकर पता लगाया कि उसका स्वामी है और आकर निवेदन किया—'देव ! यह विवाहिता है। गाड़ी में बैठा हुआ आदमी उसका स्वामी है।" राजा अपनी आसक्ति को हटाने में असमर्थ था। उसने कामातुर हो सोचा, किसी उपाय से इस आदमी को मरवा कर स्त्री को लूंगा; और एक आदमी को बुलाकर कहा—"अरे ! यह चूडामणि ले जाकर रास्ते चलते हुए की तरह जाते हुए इसे इस आदमी की गाड़ी में फेंक कर आओ।" उसे चूडामणि देकर भेजा। उसने "अच्छा" कह उसे ले जाकर गाड़ी में डाल आकर कहा—'देव ! मैने डाल दी।" राजा ने कहा—मेरी चूडामणि खो गई। लोगो ने शोर मचा दिया। राजा ने आज्ञा दी—"सब दरवाजो को बन्द कर, रास्ते रोक कर चोर का पता लगाओ।" राजपुरुषो ने वैसा ही किया। नगर एक सिरे से क्षुब्ध हो गया। एक जन आदमियो को लेकर बोधिसत्त्व के पास जा बोला—"अरे ! गाडी रोको। राजा की चूडामणि खो गई है। गाड़ी की तलाशी लेगे।" उसने गाड़ी की तलाशी लेते हुए अपनी रक्खी हुई मणि उठा, बोधिसत्त्व को पकड, 'यह मणि-चोर है' कहते हुए हाथों और पाँवों से पीट, उसके हाथो को पिछली तरफ बाँध उसे ले जाकर राजा के सामने पेश, किया—यह मणि-चोर है। राजा ने आज्ञा दी—इसका सिर काट डालो। राजपुरुष उसे चार चार बेतो से पीटते हुए नगर से बाहर ले गए। सुजाता भी गाड़ी छोड़ दोनो हाथ उठा 'मेरे कारण स्वामी इस दुःख का प्राप्त हुए' कह रोती पीटती उसके पीछे पीछे चली। राज पुरुषो ने बोधिसत्व का सिर काटने के लिए उसे सीधे लिटाया। उसे देख सुजाता ने अपने सदा- चार का ध्यान कर “मालूम होता है इस लोक में कोई ऐसा देवता नही है जो पापी दुत्साहसियो को सदाचारियो पर अत्याचार करने से रोक सके" कह, रोते पीटते पहली गाथा कही—