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ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

by स्वामी विवेकानन्द

DevanagariHindipublished332 pages

२३४ ज्ञानयोग

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२३४ ज्ञानयोग

प्रकार सभी वस्तुओं मे, जीवन मे, मरण मे, सुख मे, दुःख मे—सभी अवस्थाओं मे समस्त जगत् ईश्वर से पूर्ण है। केवल आँखे खोल कर उसका दर्शन करो। वेदान्त यही कहता है; तुम जगत् को जिस रूप मे अनुमान करते हो उसे छोड़ो, कारण तुम्हारा अनुमान अत्यन्त कम अनुभूति के ऊपर—बिलकुल सामान्य युक्ति के ऊपर—स्पष्ट शब्दों मे, तुम्हारी अपनी दुर्बलता के ऊपर स्थापित है। यह अनुमानिक ज्ञान छोड़ो—हम इतने दिन जगत् को जिस रूप मे समझते थे, इतने दिन जिसमे अत्यन्त आसक्त थे वह हमारे द्वारा ही सृष्ट मिथ्या जगत् मात्र है। इसको छोडो। आँखे खोल कर देखो, हम अब तक जिस रूप मे जगत् को देखते थे, वास्तव मे उसका अस्तित्व वैसा कभी नही था—हम स्वप्न में इस प्रकार देखते थे—माया से आच्छन्न होने के कारण यह भ्रम हमे होता था। अनन्त काल से लेकर वे ही एक मात्र प्रभु विद्यमान थे। वे ही सन्तान के भीतर, वे ही स्त्री मे, वे ही स्वामी मे, वे ही अच्छे मे, वे ही बुरे मे, वे ही पाप मे, वे ही पापी मे, वे ही हत्या-कारी मे, वे ही जीवन मे एवं वे ही मरण मे वर्तमान है।

प्रस्ताव तो अवश्य कठिन है।

किन्तु वेदान्त इसी को प्रमाणित करना, शिक्षा देना और प्रचार करना चाहता है। यही विषय लेकर वेदान्त का आरम्भ होता है।

हम इसी प्रकार सर्वत्र ब्रह्म-दर्शन करके जीवन की विपत्तियो और दुःखो को हटा सकते है। कुछ इच्छा मत करो। कौन हमे दुःखी करता है? हम जो कुछ भी दुःख भोग करते है, वासना से ही उसकी उत्पत्ति होती है। तुम्हे कुछ अभाव है, वह पूरा नही होता, फल दुख। अभाव यदि न रहे तो दुख भी नही होगा। जब हम सब

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वासनाओ का त्याग कर देगे तब क्या होगा ? दीवार मे कोई वासना नहीं है, उसे कोई दुःख नही भोगना होता । ठीक है, परन्तु वह कभी उन्नति भी नही करती । इस कुर्सी मे कोई वासना नही है; कोई कष्ट भी उसे नही है, परन्तु यह जो कुर्सी है, कुर्सी ही रहेगी । सुखभोगो के भीतर भी एक महानता है और दुःखभोगों के भीतर भी। यदि साहस करके कहा जाय तो यह भी कह सकते है कि दुख की भी उपकारिता है। हम सभी जानते है कि दुःख से कितनी बडी शिक्षा मिलती है। हमने जीवन मे ऐसे सैकड़ों कार्य किये है जिनके विषय मे बाद मे लगता है कि वे न किये जाते तो अच्छा होता, किन्तु यह होने पर भी ये सब कार्य हमारे लिये महान् शिक्षक का कार्य करते है। मैं अपने सम्बन्ध मे कह सकता हूँ कि मैने कुछ अच्छे कार्य किये है यह सोच कर भी मै आनन्दित हूँ और अनेक बुरे कार्य किये हैं यह सोच कर भी आनन्दित हूँ। मैने कुछ सत्कार्य किया है इसलिये भी सुखी हूँ और अनेक भ्रमो मे भी मै पड़ा हूँ इसलिये भी सुखी हूँ. कारण उनमे से प्रत्येक ने ही मुझे कुछ न कुछ उच्च शिक्षा दी है।

मै इस समय जो कुछ भी हूँ वह अपने पूर्व कर्मों और विचारो का फलस्वरूप हूँ। प्रत्येक कार्य और चिन्ता का एक न एक फल अवश्य ही है और मोटे तौर से मैने यही उन्नति की है कि मै बड़े सुख से समय काट रहा हूँ। तब भी इस समय समस्या कठिन आ पडी है। हम सभी जानते है कि वासना बड़ी बुरी चीज़ है. किन्तु वासना-त्याग का अर्थ क्या है ? शरीर-रक्षा किस प्रकार होगी ? इसका उत्तर भी पहले की भाँति आपातत यही मिलेगा कि आत्म-हत्या करो। वासना का सहार करो और उसके साथ ही वासनायुक्त

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मनुष्य को भी मार डालो। किन्तु इसका उत्तर यही है,—तुम विषयों को ही न रक्खो, यह बात नहीं है; आवश्यक वस्तुये, यहाँ तक कि विलास की सामग्री भी न रक्खो, यह बात नहीं है। तुम्हारी जो भी आवश्यक वस्तुये, यहाँ तक कि उनसे अतिरिक्त वस्तुये भी तुम रख सकते हो—इससे कुछ भी क्षति नहीं है। किन्तु तुम्हारा प्रथम और प्रधान कर्तव्य यही है कि तुम्हे सत्य को जानना पडेगा, उसको प्रत्यक्ष करना होगा। यह जो धन है—यह किसी का नहीं है। किसी भी पदार्थ मे स्वामित्व का भाव मत रक्खो। तुम तो कोई नहीं हो, मै भी कोई नही हूँ, कोई भी कोई नहीं है। सब उसी प्रभु की वस्तुये है; ईशोपनिषद् के प्रथम श्लोक मे सभी जगह ईश्वर का स्थापन करने के लिये कहा गया है। ईश्वर तुम्हारे भोग्य धन मे है, तुम्हारे मन मे जो सब वासनाये उठती है उनमे है, अपनी वासना मे रहकर तुम जो जो द्रव्य खरीदते हो उसमे वह है, तुम्हारे सुन्दर वस्त्रो मे भी वह है, तुम्हारे सुन्दर अलङ्कारो मे भी वह है। इसी प्रकार से विचार करना पड़ेगा। इसी प्रकार सब वस्तुओ को देखना आरम्भ करने पर तुम्हारी दृष्टि मे सभी कुछ परिवर्तित हो जायगा। यदि तुम अपनी प्रत्येक गति मे, अपने वस्त्रो मे, अपनी बोलचाल मे, अपने शरीर मे, अपने चेहरे मे—सभी वस्तुओ मे भगवान् की स्थापना कर लो तो तुम्हारी आँखों मे सम्पूर्ण दृश्य बदल जायगा और जगत् दुःखमय न लगकर स्वर्ग मे परिणत हो जायगा।

“स्वर्ग का राज्य तुम्हारे भीतर है”। वेदान्त कहता है कि वह पहले से ही तुम्हारे भीतर मौजूद है। और सभी धर्म यही बात कहते

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है, सभी महापुरुष यह बात कहते है । ‘जिसके पास देखने के लिये आँख है वह देखे; जिसके पास सुनने के लिये कान है वह सुने ।’ वह पहले से ही तुम्हारे अन्दर मौजूद है और वेदान्त उसका केवल उल्लेख मात्र करता हो यह बात नही है, वह उसे युक्तियो द्वारा प्रमाणित भी करने को प्रस्तुत है । अज्ञान के कारण हम सोचते थे कि हमने उसे खो दिया है और समस्त जगत् में उसको पाने के लिये केवल रोते, कष्ट भोगते घूमते फिरते रहे, किन्तु वह सदा ही हमारे अन्तर के अन्तस्तल मे वर्तमान था । इसी तत्त्वदृष्टि की सहायता से जगत् मे जीवन काटना पड़ेगा । यदि ‘संसार त्याग करो’ यह उपदेश सत्य हो और इसको यदि उस प्राचीन स्थूल अर्थ मे ग्रहण किया जाय तो यही फल निकलता है कि हमे कोई कार्य करने की आवश्यकता नही है, आलसी होकर मिट्टी के ढेले की भाँति बैठे रहना ही ठीक होगा, कोई चिन्ता करने की या कोई कार्य करने की तनिक भी आवश्यकता नही है, अदृष्टवादी होकर, घटनाचक्र से ताडित होकर, प्राकृतिक नियमो के द्वारा परिचालित होकर इधर उधर घूमने रहने से ही काम चल जायेगा; यही फल निकलता है । किन्तु पूर्वोक्त उपदेश का अर्थ वास्तव मे यह नहीं है । हम लोगों को कार्य अवश्य ही करना पड़ेगा । साधारण मनुष्य जो व्यर्थ की वासनाओ के चक्र मे पड़कर इधर उधर भटकते फिरते है, वे कार्य के सम्बन्ध मे क्या जानते हैं ? जो व्यक्ति अपने भावो और इन्द्रियो के द्वारा परिचालित है वह कार्य को क्या समझता है ? कार्य वही कर सकता है जो किसी वासना के द्वारा, किसी स्वार्थपरता के द्वारा परिचालित नहीं है । वे ही कार्य कर सकते हैं जिनकी कोई कामना

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-नहीं है। वे ही कार्य कर सकते हैं जो कार्य से किसी लाभ की प्रत्याशा नहीं करते।

एक चित्र का अधिक भोग कौन करता है ? चित्र का बेचने वाला अथवा देखने वाला। विक्रेता तो उसके हिसाब-किताब में ही व्यस्त रहता है, उसको कितना लाभ होगा इत्यादि चिन्ताओं में ही वह मग्न रहता है। ये ही सब विषय उसके मस्तिष्क में सदा घूमते रहते हैं। वह केवल नीलाम के हथौड़े की ओर लक्ष्य रखता है और क्या भाव पड़ा यही सुनता रहता है। भाव किस तरह बढ़ता जा रहा है यही सुनने मे वह व्यस्त है। चित्र देख कर आनन्द का उपभोग वह कब करेगा ? वे ही चित्र का सम्भोग कर सकते हैं जिनको उस चित्र की बिक्री-खरीद से कोई मतलब नहीं है। वे चित्र की ओर ताकते रहते हैं और असीम आनन्द का उपभोग करते हैं। इसी प्रकार समस्त ब्रह्माण्ड एक चित्र के समान है, जब वासना बिलकुल चली जायगी तभी लोग जगत् का संभोग कर सकेंगे, तब यह बेचने खरीदने का भाव, यह भ्रमात्मक स्वामित्व का भाव नहीं रहेगा। उस समय न ऋण देने वाला है, न खरीदने वाला है, न बेचने वाला है, और जगत् उस समय एक सुन्दर चित्र के समान हो जाता है। ईश्वर के सम्बन्ध में नीचे लिखी हुई बात से अधिक सुन्दर बात मैंने नहीं देखी-‘वही महान कवि है, प्राचीन कवि है, समस्त जगत् उसकी कविता है, वह अनन्त आनन्दोच्छ्वास में लिखी हुई और नाना प्रकार के श्लोकों, छन्दों और तालों मे प्रकाशित है, वासना का त्याग कर लेने पर ही हम ईश्वर की इस विश्वकविता का पाठ और सम्भोग कर पायेंगे। उस समय सब वस्तुये ब्रह्मभाव धारण

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कर लेगी। संसार का प्रत्येक कोना, प्रत्येक अँधेरी गली, वीहड़ मार्ग और सभी छिपे हुये स्थान जिन्हें हमने पहले इतना अपवित्र समझा था, जिन सब के ऊपर का दाग हमे इतना काला दीखता था, सब कुछ ब्रह्मभाव धारण कर लेगा। वे सभी अपने प्रकृत स्वरूप को प्रकाशित करेगे। तब हम अपने आप ही हँसेगे और सोचेगे, यह सब रोदन और चीत्कार केवल बच्चों का खेल है, और हम जननी रूप मे खड़े होकर बराबर यह खेल देख रहे थे।

वेदान्त कहता है कि इस प्रकार के भाव को आश्रय करने से ही हम ठीक ठीक कार्य करने मे समर्थ होगे। वेदान्त हमे कार्य करने का निषेध नहीं करता, परन्तु यह भी कहता है कि पहले संसार का त्याग करना होगा, इस आपातप्रतीयमान माया के जगत् का त्याग करना होगा। इस त्याग का अर्थ क्या है? पहले ही कहा जा चुका है कि त्याग का प्रकृत अर्थ है सब जगह ईश्वरदर्शन, सब जगह ईश्वरबुद्धि कर लेने पर ही हम वास्तविक कार्य करने में समर्थ होंगे। यदि इच्छा हो तो सौ वर्ष जीने की इच्छा करो, जितनी भी सांसारिक वासनाये हैं, सब भोग कर लो, केवल उन सब को ब्रह्मस्वरूप मे दर्शन करो, उनको स्वर्गीय भावना मे परिणत कर लो, उसके बाद चाहे सौ वर्ष जीवन धारण करो। इस जगत् मे दीर्घ काल तक आनन्दपूर्ण होकर कार्य करते हुये सम्भोग करने की इच्छा करो। इसी प्रकार कार्य करने पर तुम्हे वास्तविक मार्ग मिल जायगा। इसे छोड कर अन्य कोई मार्ग नहीं है। जो व्यक्ति सत्य को न जान कर अबोध की भाँति ससार के विलास-विभ्रम मे निमग्न होता है, समझ लो कि उसे प्रकृत मार्ग मिला नहीं, उसका पैर फिसल गया है। दूसरी ओर जो

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व्यक्ति जगत् को त्याग कर वन मे जाकर अपने शरीर को कष्ट देता है, धीरे धीरे सुखा कर अपने को मार डालता है, अपने हृदय को शुष्क मरुभूमि बना डालता है, अपने सभी भावो को मार डालता है, और कठोर, बीभत्स और रूखा हो जाता है, समझ लो कि वह भी मार्ग भूल गया है। ये दोनो दो सिरे की बाते है, दोनो ही भ्रम है, एक इस ओर, दूसरा दूसरी ओर। दोनो ही लक्ष्यभ्रष्ट है, दोनो ही पथभ्रष्ट है।

वेदान्त कहता है, इस प्रकार कार्य करो—सभी वस्तुओं मे ईश्वरबुद्धि करो, समझो कि वह सब मे है, अपने जीवन को भी ईश्वर से अनुप्राणित, यहाँ तक कि उसे ईश्वररूप ही समझो—यह जान लो कि यही हमारा एक मात्र कर्तव्य है, केवल यही हमारे लिये जानने की एक मात्र वस्तु है—कारण ईश्वर सभी वस्तुओं मे विद्यमान है, उसे प्राप्त करने के लिये और कहाँ जाओगे ? प्रत्येक कार्य मे, प्रत्येक भाव मे, प्रत्येक चिन्ता मे वह पहले से ही स्थित है। इसी प्रकार समझकर हमे अवश्य ही कार्य करते जाना होगा। यही एक मात्र पथ है, अन्य नही। इस प्रकार करने पर कर्मफल तुमको लगेगा नही। कर्मफल तुम्हारा कोई अनिष्ट नहीं कर पायेगा। हम देख ही चुके है कि हम जो कुछ भी कष्ट भोग करते है उसका कारण ये ही सब व्यर्थ की वासनाये है। परन्तु जब इन वासनाओ मे ईश्वरबुद्धि के द्वारा वे पवित्र भाव धारण कर लेती है, ईश्वरस्वरूप हो जाती है, तब उनके आने से भी फिर कोई अनिष्ट नही होता। जिन्होंने इस रहस्य को नही जाना है, उनको इसे जानने से पहले तक इसी आसुरी जगत् मे रहना पडेगा।' लोग नही जानते कि यहाँ उनके चारों ओर सर्वत्र कितने अनन्त

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आनन्द की खान पड़ी हुई है, किन्तु वे उसको खोज निकाल नहीं पाते। आसुरी जगत् का अर्थ क्या है ? वेदान्त कहता है —अज्ञान ।

वेदान्त कहता है कि हम अनन्त जल से पूर्ण नदी के तट पर रह कर भी प्यास से मर रहे है। ढेरो खाद्य सामने रखा है, फिर भी भूखों मर रहे है। यह आनन्दमय जगत् यहीं विद्यमान है। परन्तु हम उसे खोज नहीं पाते। हम उसी में रह रहे है। वह सर्वदा ही हमारे चारो ओर रहता है, परन्तु हम उसे सदा ही कुछ और समझ कर भ्रम मे पड़ जाते हैं। विभिन्न सभी धर्म हमारे सामने उस आनन्दमय जगत् को दिखाने को आगे आते हैं। सभी हृदय इस आनन्द की खोज कर रहे है। सभी जातियो ने इसकी खोज की है, धर्मों का यही एक मात्र लक्ष्य है, और यही आदर्श विभिन्न भाषाओ मे भी प्रकाशित हुआ है; भिन्न भिन्न धर्मों मे जो सब छोटे छोटे मतभेद है, वे सब केवल कहने के दाँवपेच है, वास्तव मे कुछ भी नहीं है। एक व्यक्ति एक भाव को एक प्रकार से प्रकट करता है, दूसरा दूसरी प्रकार, किन्तु मै जो कुछ कहता हूँ, शायद तुम वही बात दूसरे प्रकार की भाषा मे व्यक्त कर रहे हो। फिर भी मै शायद अकेले ही प्रसिद्ध होने की आशा मे, अथवा अपने मन के अनुसार चलना पसन्द करता हूँ और इसलिये कहता हूँ—'यह मेरा मौलिक मत है।' इन्ही कारणो से हमारे जीवन मे परस्पर ईर्ष्या, द्वेष आदि की उत्पत्ति होती है।

इस सम्बन्ध मे अब और भी प्रश्न आते है। जो ऊपर कहा गया है वह मुख से कह देना तो अत्यन्त सरल है। बचपन से ही सुनता आ रहा हूँ—सर्वत्र ब्रह्मबुद्धि करो—सब ब्रह्ममय हो जायगा—

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२४२ ज्ञानयोग

तब सभी विषयों का वास्तविक सम्भोग कर पाओगे, किन्तु जैसे ही हम संसारक्षेत्र मे उतर कर कुछ धक्के खाते है वैसे ही हमारी सब ब्रह्मबुद्धि उड़ जाती है। मै मार्ग मे सोचता जा रहा हूँ, सभी मनुष्यो मे ईश्वर विराजमान है—एक बलवान् मनुष्य ने आकर मुझे धक्का दिया, बस मै चित होकर गिर पडा। झट उठा, रक्त मस्तक में चढ़ गया—मुट्ठी बँध गई—विचारशक्ति नष्ट होगई। बिलकुल उन्मत्त हो उठा, स्मृति लुप्त हो गई—उस व्यक्ति के अन्दर ईश्वर को न देखकर मैने भूत देखा। जन्म के साथ ही साथ उपदेश मिलता है, सर्वत्र ईश्वरदर्शन करो, सभी धर्म यही सिखाते है—सभी वस्तुओ मे, सब प्राणियों के अन्दर, सर्वत्र ईश्वरदर्शन करो। न्यू टेस्टामेण्ट मे ईसामसीह ने भी इस विषय मे स्पष्ट उपदेश दिया है। हम सभी ने यह उपदेश पाया है—किन्तु काम के समय ही हमारा गोलमाल प्रारम्भ हो जाता है। ईसप् की कहानियों मे एक कथा है। एक विशालकाय सुन्दर हरिण तालाव मे अपना प्रतिबिम्ब देखकर अपने बच्चे से कहने लगा, “देखो, मै कितना बलवान् हूँ, मेरा मस्तक देखो कैसा भव्य है, मेरे हाथ पाँव देखो कैसे दृढ़ और मांसल है, मै कितना तेज दौड़ सकता हूँ।” यह बात कहते ही उसने दूर से कुत्तो के भौंकने का शब्द सुना। सुनते ही वह ज़ोर से भागा। बहुत दूर दौड़ने के बाद हाँफते हाँफते फिर बच्चे के पास आया। बच्चा बोला, 'अभी तो तुम कह रहे थे, मै बडा बलवान् हूँ, फिर कुत्तो का शब्द सुनकर भागे क्यों?' हरिण बोला—'यही तो बात है, कुत्तो की भों भों सुनकर ही मेरा सब ज्ञान लुप्त हो जाता है।' हम लोग भी जीवन भर यही करते रहते है। हम इस दुर्बल मनुष्य जाति के सम्बन्ध मे कितनी आशाये बाँधते रहते है, किन्तु कुत्तों के भौंकते ही हरिण की भाँति भाग खड़े होते हैं! यदि

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ऐसा है तो यह सब शिक्षा देने की क्या आवश्यकता है ? अत्यधिक आवश्यकता है। समझ रखना चाहिये, एक दिन मे कुछ नहीं हो जाता।

‘आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः ।’

आत्मा के सम्बन्ध मे पहले सुनना होगा, उसके बाद मनन अर्थात् चिन्ता करनी होगी, उसके बाद लगातार ध्यान करना होगा। सभी आकाश देख पाते है, और तो क्या, जो छोटे कीड़े भूमि पर फिरते रहते है वे भी ऊपर की ओर देखने पर नील वर्ण आकाश को देखते है, किन्तु वह हमारे पास से कितनी-कितनी दूर है—बोलो तो ! इच्छा करने पर तो मन सभी जगह जा सकता है, किन्तु इस शरीर को प्रयत्न करके चलना सीखने मे ही कितना समय बीत जाता है। हमारे सभी आदर्शों के सम्बन्ध मे भी यही बात है। आदर्श हमसे बहुत दूर है, और हम उनसे बहुत नीचे पड़े हुये है, तथापि हम जानते है कि हमे एक आदर्श मान कर रखना आवश्यक है। इतना ही नही, हमे सर्वोच्च आदर्श रखना ही आवश्यक है। अधिकांश व्यक्ति इस जगत् मे कोई आदर्श लिये बिना ही जीवन के इस अन्धकारमय पथ पर भटकते फिरते है। जिसका एक निश्चित आदर्श है वह यदि एक हज़ार भूलों मे पड़ सकता है तो जिसका कोई भी आदर्श नही है वह दस हज़ार भूल करेगा यह निश्चय है। अतएव एक आदर्श रखना ही अच्छा है। इस आदर्श के सम्बन्ध मे जितना हो सके सुनना होगा; उतने दिन सुनना होगा जितने दिन वह हमारे अन्तर मे प्रवेश नही करता, हमारे मस्तिष्क में प्रवेश नहीं करता, जब तक वह हमारे रक्त के भीतर प्रवेश नहीं करता, जब

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ज्ञानयोग

तक वह हमारे रक्त के प्रत्येक बिन्दु मे, कण कण में प्रवेश नहीं करता, जब तक वह हमारे शरीर के अणु-परमाणु मे व्याप्त नहीं हो जाता। अतएव यह आत्मतत्व पहले हमे सुनना होगा। कहा गया है कि ‘हृदय भावोच्छ्वासो से पूर्ण होने पर ही मुख वाक्य का उच्चारण करता है।’ इसी प्रकार हृदय पूर्ण होने पर हाथ भी कार्य करता है।

चिन्ता ही हमारी कार्यप्रवृत्ति की नियामक है। मन को सर्वोच्च चिन्ता द्वारा पूर्ण करके रक्खो, दिनानुदिन ये सभी भाव सुनते रहो, मास प्रति मास इसका चिन्तन करो। पहले पहल सफलता न मिले; कोई हानि नहीं, यह विफलता तो स्वाभाविक ही है, यह तो मानव-जीवन का सौन्दर्य स्वरूप है। इस प्रकार की विफलता न होती तो जीवन क्या होता? यदि जीवन मे इस विफलता को जय करने की चेष्टा न रहती, तो जीवन धारण करने का कोई प्रयोजन ही न रह जाता। उसके न रहने पर जीवन की कविता कहाँ रहती? यह विफलता, यह भ्रम रहने से भी क्या हर्ज है? गाय कभी झूठ बोलते नही सुनी जाती, किन्तु वह सदा गाय-ही रहती है, मनुष्य कभी नहीं हो जाती। अतएव बार बार असफल हो जाओ तो भी कोई हानि नही है, सहस्रों बार, बार बार इस आदर्श को हृदय मे धारण करो, किन्तु सहस्र बार असफल होने पर फिर एक बार प्रयत्न करो। सब जीवो मे ब्रह्मदर्शन ही मनुष्य का आदर्श है। यदि सब वस्तुओ मे उसको देखने मे तुम सफल न हो तो कम से कम एक ऐसे व्यक्ति मे कि जिसको तुम सब से अधिक प्रेम करते हो, उसका दर्शन करने की चेष्टा करो—उसके बाद एक अन्य व्यक्ति मे दर्शन करने की चेष्टा करो—इसी प्रकार तुम आगे बढ़ सकते हो।

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आत्मा के सम्मुख तो अनन्त जीवन पड़ा हुआ है—अध्यवसाय के साथ चेष्टा करने पर तुम्हारी वासना अवश्य पूर्ण होगी।

“ अनेजदेकं मनसो जवीयो नैनद्देवा आप्नुवन् पूर्वमर्षत् ।
तद्धावतोऽन्यानत्येति तिष्ठत् तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति॥
तदेजति तन्नैजति तद्दूरे तद्वन्तिके ।
तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यतः॥
यस्तु सर्वाणि भूतानि आत्मन्येवानुपश्यति ।
सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते॥
यस्मिन्सर्वाणि भूतानि आत्मैवाभूद्विजानतः ।
तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः॥
(ईशोपनिषद्, ४-७ श्लोक)

“वह अचल है, एक है, मन से भी अधिक द्रुत गति वाला है। इन्द्रियाँ उसके पूर्व चल कर भी उसको प्राप्त नहीं होतीं। वह स्थिर रह कर भी अन्यान्य द्रुतगामी पदार्थों से आगे जानेवाला है। उसमे रह कर ही हिरण्यगर्भ सब के कर्मफलो का विधान करते है। वह चञ्चल है, वह स्थिर है, वह दूर है, वह निकट है, इस सब के भीतर है, फिर भी वह इस सब के बाहर भी है। जो आत्मा के अन्दर सब भूतो का दर्शन करते है, और सब भूतो मे आत्मा का दर्शन करते है वे कुछ भी छिपाने की इच्छा नहीं करते। जिस अवस्था मे ज्ञानी व्यक्ति के लिये समस्त भूत आत्मस्वरूप हो जाते हैं, उस अवस्था मे उस एकत्वदर्शी पुरुष को शोक अथवा मोह कहाँ रह सकता है?”

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सब पदार्थों का यह एकत्व वेदान्त का और एक प्रधान विषय है। हम आगे चल कर देखेंगे कि किस प्रकार वेदान्त सिद्ध करता है कि हमारा समस्त दुःख अज्ञान से उत्पन्न है; वह अज्ञान और कुछ नहीं—यही बहुत्व की धारणा है—यह धारणा कि मनुष्य मनुष्य से भिन्न है, पुरुष और स्त्री भिन्न है, युवा और शिशु भिन्न है, जाति जाति से भिन्न है, पृथिवी चन्द्र से पृथक् है, एक परमाणु दूसरे परमाणु से पृथक् है यह ज्ञान ही वास्तव में सब दुःखों का कारण है। वेदान्त कहता है कि यह भेद वास्तविक नहीं है। यह भेद केवल भासित होता है, ऊपर से दीख पड़ता है। वस्तुओं के अन्तस्तल में वही एकत्व विराजमान है। यदि तुम भीतर जाकर देखो तो इस एकत्व को देखोगे—मनुष्य मनुष्य का एकत्व, नर नारी का एकत्व, जाति जाति का एकत्व, ऊँच नीच का एकत्व, धनी और दरिद्र का एकत्व, देवता और मनुष्य का एकत्व। सभी तो एक है—और यदि और भी भीतर प्रवेश करो तो देखोगे—अन्य प्राणी भी एक ही हैं। जो इस प्रकार एकत्वदर्शी हो चुके हैं उनको फिर मोह नहीं रहता। वे अब उसी एकत्व में पहुँच गये हैं, जिसको धर्मविज्ञान में ईश्वर कहते हैं। उनको अब मोह कैसे रह सकता है? मोह उसको उत्पन्न ही कैसे होगा? उन्होंने सभी वस्तुओं का आभ्यन्तरिक सत्य जान लिया है, सभी का रहस्य जान लिया है। उनके लिये अब दुःख कैसे रह सकता है? वे अब क्या वासना-कामना करेंगे? वे सभी वस्तुओ के अन्दर वास्तविक सत्य की खोज करके ईश्वर तक पहुँच गये हैं, जो जगत् का केन्द्रस्वरूप है, जो सभी वस्तुओ का एकत्व-स्वरूप है। यही अनन्त सत्ता है, यही अनन्त ज्ञान है, यही अनन्त आनन्द है। वहाँ मृत्यु नहीं, रोग नहीं, दुःख नहीं, शोक नहीं,

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अशान्ति नहीं। है केवल पूर्ण एकत्व—पूर्ण आनन्द। तब वे किसके लिये शोक करेंगे? वास्तव मे उस केन्द्र मे, उस परम सत्य मे मृत्यु नही है, दुःख नहीं है, किसी के लिये शोक करना नहीं है, किसी के लिये दुःख करना नहीं है।

स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणमस्नाविरं शुद्धमपापविद्धम्।
कविर्मनीषी परिभूः स्वयंभूर्याथातथ्यतोऽर्थान्
व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः॥

(ईशोपनिषद्, ८ वाँ श्लोक)

"वह चारों ओर से घेरे हुये है, वह उज्ज्वल है, देहशून्य है, व्रणशून्य है, स्नायुशून्य है, वह पवित्र और निष्पाप है, वह कवि है, मन का नियामक है, सब से श्रेष्ठ और स्वयम्भू है; वह सर्वदा ही यथायोग्य सभी के काम्य वस्तुओ का विधान करता है।" जो इस अविद्यामय जगत् की उपासना करता है वह अन्धकार मे प्रवेश करता है। जो इस जगत् को ब्रह्म के समान सत्य समझकर उसकी उपासना करते है वे अन्धकार मे भ्रमण करते हैं, किन्तु जो आजीवन इस संसार की उपासना करते है, उससे ऊपर और कुछ भी लाभ नहीं कर पाते, वे और भी घने अन्धकार मे प्रवेश करते है। किन्तु जिन्होने इस परम सुन्दर प्रकृति का रहस्य जान लिया है, जो प्रकृति की सहायता से दैवी प्रकृति का चिन्तन करते है वे मृत्यु का अतिक्रमण करते है एव दैवी प्रकृति की सहायता से अमरत्व का भोग करते है।

हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्।
तत्त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये॥

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तेजो यत्ते रूपं कल्याणतमं तत्ते पश्यामि ।
योऽसावसौ पुरुषः सोऽहमस्मि ॥
( ईश० उप० १५-१६ )

“ हे सूर्य, हिरण्मय (स्वर्ण के) पात्र द्वारा तुमने सत्य का मुख ढँक रक्खा है। सत्य धर्म वाला मै जिससे उसे देख पाऊं, इसके लिये उसको हटा दो। ... मै तुम्हारा परम रमणीय रूप देखता हूँ—तुम्हारे अन्दर जो यह पुरुष है वह मै ही हूँ।”


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१२. अपरोक्षानुभूति

मै तुम लोगों को एक और उपनिषद से कुछ अंश पढ़कर सुनाऊँगा। यह अत्यन्त सरल एवं अतिशय कवित्वपूर्ण है। इसका नाम है कठोपनिषद् । सर एडविन अर्नाल्ड कृत इसका अनुवाद शायद तुममे से बहुतो ने पढ़ा होगा। हम लोगो ने पहले देखा ही है कि जगत् की सृष्टि कहाँ से हुई। इस प्रश्न का उत्तर बाह्य जगत् से नहीं पाया जा सकता, अतः इस प्रश्न के समाधान के लिये लोगो की दृष्टि अन्तर्जगत् की ओर आकृष्ट हुई। कठोपनिषद् मे मनुष्य के स्वरूप के सम्बन्ध मे यह अनुसन्धान आरम्भ हुआ है। पहले यह प्रश्न होता था कि इस वाह्य जगत् की सृष्टि किसने की ? इसकी उत्पत्ति कैसे हुई ? —इत्यादि। किन्तु अब यह प्रश्न उत्पन्न हुआ कि मंनुष्य के अन्दर कौन सी ऐसी वस्तु है जो उसे जीवित रखती है और उसे चलाती है, एवं मृत्यु के बाद मनुष्य का क्या होता है ? पहले मनुष्य ने इस जड़ जगत् को लेकर क्रमशः इसके आभ्यन्तर मे पहुँचने की चेष्टा की थी और इससे उसने पाया जगत् का एक जबरदस्त शासक—एक व्यक्ति—एक मनुष्य मात्र। हो सकता है कि मनुष्य के गुणसमूह को अनन्त परिमाण मे बढ़ाकर, वे उसके नाम के साथ जोड दिए गये हो, किन्तु कार्यतः वह एक मनुष्य मात्र है। परन्तु यह मीमांसा कभी पूर्ण सत्य नहीं हो सकती। अधिक से अधिक इसे आंशिक सत्य कह सकते है। हम लोग इस जगत् को मानवीय दृष्टि से देखते है, और हमलोगो का ईश्वर इस जगत् की मानवीय व्याख्या मात्र है।

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ज्ञानयोग

कल्पना करो, एक गाय दार्शनिक और धर्मज्ञ हुई—वह जगत् को अपनी गो-दृष्टि से देखेगी, वह जब इस समस्या की मीमांसा करेगी तो गाय के भाव से ही करेगी, और वह हमारे ही ईश्वर को देखेगी, ऐसी भी कोई बात नहीं। इसी प्रकार यदि कोई बिल्ली दार्शनिक हो तो वह बिडाल-जगत् को ही देखेगी, वह यही सिद्धान्त रखेगी कि कोई बिड़ाल ही इस जगत् का शासन कर रहा है। अतएव हम लोग देखते हैं कि जगत् के सम्बन्ध मे हमलोगों की व्याख्या पूर्ण नहीं है, और हम लोगों की धारणा भी जगत् के सर्वांश को स्पर्श करनेवाली नहीं है। मनुष्य जिस भाव से जगत् के सम्बन्ध मे भयानक स्वार्थपर मीमांसा करता है, उसे ग्रहण करने पर भ्रम में ही पड़ना होगा। बाह्य जगत् से जगत् के सम्बन्ध में जो मीमासा प्राप्त होती है, उसमे दोष यही है कि जिस जगत् को हम लोग देखते है, वह हम लोगो का अपना जगत् मात्र है, सत्य के सम्बन्ध मे जितनी हमारी दृष्टि है बस उतना ही है। प्रकृत सत्य वह परमार्थ वस्तु कभी इन्द्रियग्राह्य नहीं हो सकती, किन्तु हम लोग जगत् को उतना ही जानते है जितना पचेन्द्रियविशिष्ट प्राणियों की दृष्टि मे पड़ता है। कल्पना करो, हम लोगो की एक इन्द्रिय और हुई, उसके होने से समस्त ब्रह्माण्ड हम लोगो की दृष्टि मे अवश्य ही और एक रूप धारण करेगा। कल्पना करो, हम लोगो को एक चौम्बक (Magnetic) इन्द्रिय प्राप्त हुई—जगत् मे इस प्रकार की लाखों शक्तियाँ है, जिनकी उपलब्धि के लिये हम लोगो के पास कोई इन्द्रिय नहीं है—उस समय उन सब की उपलब्धि हमे होने लगेगी। हमलोगों की इन्द्रियाँ सीमाबद्ध हैं, वस्तुतः अत्यन्त सीमाबद्ध है, और इन सीमाओ के भीतर ही हम लोगो का समस्त जगत् अवस्थित है एवं हम लोगो

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अपरोक्षानुभूति २५१

का ईश्वर हमारे इस क्षुद्र जगत् की समस्या का मीमांसा मात्र है। किन्तु वह कभी भी पूर्ण समस्या की मीमांसा नहीं हो सकता। यह तो असंभव व्यापार है। यथार्थ रूप से कहा जाय तो वह कोई मीमांसा ही नहीं है। किन्तु मनुष्य तो चुप होकर रह नहीं सकता, वह तो चिन्ताशील प्राणी है, इसलिए वह ऐसी एक मीमांसा करना चाहता है जिससे जगत् की सभी समस्याओं की मीमांसा हो जाय।

पहले इस प्रकार के एक जगत् का आविष्कार करो, इस प्रकार के एक पदार्थ का आविष्कार करो जो सम्पूर्ण जगत् का एक साधारण तत्त्व स्वरूप हो—जिसे हमलोग इन्द्रिय-प्रत्यक्ष कर सके या न कर सके किन्तु जिसे हम युक्ति-बल से सम्पूर्ण जगत् की नींव कह सके तथा सम्पूर्ण जगत् के भीतर मणिमालामध्यस्थित सूत्र स्वरूप कह सके। यदि हमलोग इस प्रकार के एक पदार्थ का आविष्कार कर सके, जो इन्द्रियगोचर न हो सकने पर भी केवल अकाट्य युक्तिबल से सभी प्रकार के अस्तित्व की भित्तिभूमि कहलाकर प्रमाणित किया जा सके। ऐसा होने पर हम कहेगे कि हम लोगो की समस्या कुछ मीमांसोन्मुख हुई। अतएव यह स्थिर सिद्धान्त है कि हमारे इस दृष्टिगोचर ज्ञात जगत् से इस मीमांसा के पाने की कोई सम्भावना नहीं, क्योकि यह समग्र भाव का केवल अंशविशेष मात्र है।

अतएव जगत् के अन्त:प्रदेश मे प्रवेश करना ही इस समस्या की मीमांसा का एक मात्र उपाय है। अति प्राचीन मननशील महात्मा-गण यह समझ सके थे कि वे केन्द्र से जितना दूर जाते है उतना ही वे उस अखण्ड वस्तु से दूर होते जाते हैं, और केन्द्र के जितने निकटवर्ती होते हैं उतने ही वे उसके निकट पहुँचते जाते हैं। हमलोग

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- ज्ञानयोग

इस केन्द्र के जितने निकटवर्ती होते है उतने ही हम सब जिस साधारण भूमि पर एकत्रित हो सकते है उस भूमि के निकट उपस्थित होते हैं और हमलोग उससे जितना दूर जाते है उतना ही हमलोगों के साथ दूसरों का विशेष पार्थक्य आरम्भ हो जाता है। यह बाह्य जगत् उस केन्द्र से बहुत दूर है, अतएव इसमे कोई ऐसी साधारण भूमि नहीं हो-सकती जहाँ पर सम्पूर्ण अस्तित्व-समष्टि की एक साधारण मीमांसा हो सके। यह जगत् सम्पूर्ण अस्तित्व का अधिक से अधिक एकांशमात्र है और भी कितने व्यापार हैं; जैसे मनोजगत् का व्यापार, नैतिक जगत का व्यापार और बुद्धिराज्य का सम्पूर्ण व्यापार, आदि आदि। इन सभों मे से केवल एक को लेकर उससे समुदय जगत्-समस्या की-मीमांसा करना असम्भव है। अतएव हमे प्रथमतः कहीं एक ऐसे केन्द्र का आविष्कार करना होगा, जिससे अन्यान्य समुदय विभिन्न लोकों की उत्पत्ति हुई है। फिर हम इस प्रश्न की मीमांसा की चेष्टा करेगे। यही इस समय प्रस्तावित विषय है। वह केन्द्र कहाँ है? वह हमलोगो के भीतर है—इस मनुष्य के भीतर जो मनुष्य रहता है, वही यह केन्द्र है। लगातार भीतर की ओर अग्रसर होते होते महापुरुषो ने देखा कि जीवात्मा का गम्भीरतम प्रदेश ही समुदय ब्रह्माण्ड का केन्द्र है। जितने प्रकार के अस्तित्व हैं, सभी आकर उसी एक केन्द्र में एकीभूत होते हैं। वस्तुतः यही स्थान समुदय की एक साधारण भूमि है। इस स्थान पर आकर हम एक सार्वभौमिक सिद्धान्त पर पहुँच सकते हैं। अतएव किसने इस जगत् की सृष्टि की है?—यह प्रश्न विशेष दार्शनिक युक्तिसिद्ध नही है, और न उसकी मीमांसा ही किसी काम की है।

पहले जो मैंने कठोपनिषद् की चर्चा की है, उसकी भाषा बहुत अलंकारपूर्ण है। अति प्राचीन काल मे एक बड़े धनी व्यक्ति थे।

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अपरोक्षानुभूति २५३

उन्होने एक समय एक यज्ञ किया । उस यज्ञ मे सर्वस्वदान करने का नियम था । इस यज्ञकर्ता व्यक्ति का बाहर और भीतर समान नही था । वह यज्ञ करके खूब मान और यश पाने की इच्छा रखता था । किन्तु यज्ञ मे वह ऐसी सभी वस्तुओ का दान करता था, जो व्यवहार मे पूर्णतः अनुपयुक्त थी । उसने कितनी ही जराजीर्ण, अर्धमृत, बन्ध्या, एक आँखवाली और लँगड़ी गाये ब्राह्मणो को दान मे दीं । उसका एक छोटा पुत्र था, जिसका नाम था नचिकेता । उसने देखा, उसके पिता ठीक ठीक अपना व्रत-पालन नही कर रहे है, अपितु वे व्रत का भग कर रहे है, अतएव वह निश्चय नही कर पाया कि वह उनसे क्या कहे । भारतवर्ष मे माता-पिता प्रत्यक्ष जीवन्त देवता माने जाते है । उनके सामने सन्तान कुछ कहने या करने का साहस नही करता है, केवल चुप होकर वे खडे रहते है । अतएव उस बालक ने पिता के सम्मुख साक्षात् विरोध करने मे असमर्थ हो, उनसे केवल यही पूछा—" पिताजी, आप मुझे किस को देगे ? आपने तो यज्ञ मे सर्वस्वदान का सकल्प किया है ।" यह सुनकर पिता विरक्त हुए और बोले—" हे वत्स, तू क्या कह रहा है ? भला पिता अपने पुत्र का दान करेगा, यह कैसी बात है ? " पर बालक ने दूसरी बार, तीसरी बार बारम्बार पिता से यही प्रश्न किया, तब पिता क्रुद्ध होकर बोले—" तुझे मै यम को दे दूँगा ।" उसके बाद आख्यायिका ऐसी है कि वह बालक यम के घर गया । आदिमानव मृत होकर यमदेवता होते हैं, वे स्वर्ग जाकर समुदाय पितृगण के शासनकर्ता होते है । अच्छे व्यक्ति मृत्यु प्राप्त कर यम के निकट अनेक दिनो तक रहते है । ये यम एक अत्यन्त शुद्धस्वभाव-साधुपुरुष कहकर वर्णित है । वह बालक नचिकेता यमलोक को