भारतकोश
कबीर कृष्ण गीता

कबीर कृष्ण गीता

Kabir Krishna Gita

युगल आनंद विहारी द्वारा

स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)

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कबीरकृष्णगीता ।

१९

बरसे पानी बहे समीरा । तरुवर डोले अतहि गंभीरा ॥ चरन जाउं डरपौ दिन राती । जस भंजर टोरे कोइ छाती ॥ भयउं वृक्ष तब छीले छाला । कोइ जर काट करे वेहाला ॥ गउ भयेऊं तब दुख कछु थोरा । पुछमान गउ वृक्ष अंजौरा ॥ बकरा भया चला बल देने । फांसी लगाय गरा गहि लीन्है ॥ खैंचे जाय वेदरद कसाई । भोथा शस्त्र सो गला कटाई ॥ अधमरा काट दिहिसभोहिडारी । छूटे न प्राण महादुख भारी ॥ लेकर विप्र गये घर अपना । काटेसि गर छिन मिटी कल्पना ॥ चीन्तूर भयेउं वसेउ तेहिमाहीं । टोय निकरेसी रुधिर पियाहीं ॥ मलत २ मारेसि अध मरके । दीन्हैसि डार हाहूतमह धरके ॥ बडे कष्ट छूटा तहैं प्राणा । सर्पखान जिव जाय समाना ॥ जहैलग सर्पखान जो जितनी । भमैंउं सब अजगर अवजोनी ॥ अजगर तन अतिभये मितभारी । लूक आग तन निशिदिन जारी ॥ भूखन मरही प्यासन मरही । तेहिपर अष्ट काल निशि जरही ॥ भारी देह चला नहिं जाई । दलमैं परे अहार भक्ष खाई ॥ दस हजार कोइ बीस हजार । सहस्र पांच शत कोइ जियारा ॥ अस जीवनसो मरना भले । पाख बीते कछु भोजन मिले ॥ जिया जंतु जो सोहैं धावे । स्वास संग खैंचि सुँह आवे ॥ महाकष्ट दुख अगम अथाहा । धन्य गुरु जिन तह निरवाहा ॥ सरगुणके गुरुको क्या देश । सोई देय कहुँ पास जो जैसा ॥ निगुण भक्त बिना गत नाही । मिला कबीर सब त्रिखा बुझाहीं ॥ और सुनहु चौरासी पीरा । भिक्षा माहिं भयऊं तब कीरा ॥

कबीर कृष्ण गीता · पृष्ठ 33, कुल 168 में से · BharatKosha