कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
युगल आनंद विहारी द्वारा
स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 72, कुल 168 में से
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कबीरकृष्णगीता ।
तीरथ वरतका तेजहिं आसा । गुरुके चरण केवल विश्वास । ॥ घात झोह तजे परनारी । आग्नि तजे ले बिसम विचारी ॥ हंसहि रंभर लोकहिं जाहीं । विष्णु सतगुन गुरु तारहिं ताहीं ॥ सतकबीर हंसन गते होई । सत्यकबीर निज सद्गुरु सोई ॥ गुरु सद्गुरु परमगुरु लोई । कहै कबीर अब गुप्त हम होई ॥ प्रगट होउं जब इच्छा तोही । मैं तो जात अबहि जग सोई ॥ एक बेर अब पृथ्वी जाऊं । यम सिर तोंड जीव सुत्काऊं ॥ सब मिल सुमरो सद्गुरु नामा । छांडहु कीतम देय सो वामा ॥ रामनाम सद्गुरु प्रवाना । सद्गुरु सत्यकबीर निरवाना ॥ सद्गुरु गये काल अरहैरा । ज्ञानधनुष कर ध्यान पवैरा ॥ मोरेउ मन माया अभिमानी । तारेउ साधु संत गलतानी ॥ तीन लोक बनकाथा भयऊ । तेहि मह बाघ सिंह ठग रहैऊ ॥ सत्यकबीर जो होय सहाई । तौन जीव यम जीत वनाई ॥
व्यासवचन ।
कहै सुख व्यास कृष्ण सो रोई । सत्यकबीर सम और न कोई ॥ दया करेहु तम कृष्ण गोसाई । सत्यकबीर कहैं लेहु बलाई ॥
कृष्णवचन ।
कहैं खनंग आरि व्यास समेता । कहैं कृष्ण अर्जुन समहैता ॥ कहैं कृष्ण सतनाम कबीरा । न्यारा व्यापक सकल शरीरा ॥
दोहा—तुमहिसे सब प्रगटे, तुमते सब विस्तार ।
निराकार सिर मर्दन, सो कबीर औतार ॥
देहु दरश सत्पुरुष अनादी । तुव दर्शन विन जरो ब्रह्मादी ॥