भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1084

एक दिन बहुत इच्छुक देखकर, कहींसे दूध, चावल, घी, खोंड़ आदिसामग्रियाँ इकट्ठा करके खीर पकायीं। घी खोंड़ डालकर पुत्रके आगे रख दिया। आप किसी कार्य्य वश इधर उधर चली गईं। इतनेहीमें दश दिनका भूखा एक साधु उस लड़केके निकट आकर भोजन माँगने लगा। लड़केने समस्त खीर उस साधुके थालीमें देदी, वह साधु भोजनसे सन्तुष्ट हो अपने आसनपर चला गया वह बालक केवल थाली चाटकर रह गया।

उसी पुण्यके प्रतापसे बालकने एक सेठके घर जन्म पाया। समय पाकर ऐसे अतुल धनका मालिक हुआ कि, उसके बराबर कोई धनी न था। जिस नगरमें वह रहता था वह राजधानी थी, क्योंकि, राजा भी वहाँही रहता था। एक समय एक सौदागर वहाँ आया। राजाके दरबारमें जाकर उसने बहुत तरहके जवाहिरात दिखलाये। उसके पास रत्न कमल था वो राजाको दिखलाया। राजाने उसका मूल्य पूछा, उसने लाख रुपया बतलाया। पश्चात् राजाने रानीके पास भेज दिया, रानीने उसको देखकर कहा कि, इसका मूल्य बहुत है। मैं न लूँगी फेर दिया। सौदागर वहाँसे चलकर उस सेठके घर गया। सेठ तो अपने आनन्द भवनमें था पर सौदागरने उसकी विधवा माताके निकट जाकर उपरोक्त रत्न कमल दिखलाया। माता उसको देखकर सौदागरसे बोली कि,

चौरो वो यदि चाण्डालः शत्रुर्वा पितृघातकः ।

न पृच्छेद्गोत्रचरणे स्वाध्यायं च व्रतानि च ।

हृदयं कल्पयेत्स्मिन्सर्वदेवमयो हि सः ॥

जो पुरुष दूर मार्गसे चलके आया हो, थका हो, वैश्वदेव करनेके समय प्राप्त होवे उसको अतिथि कहते हैं। जो अपने पुरोहितादिक पहले वहाँ हों तो वे अतिथि नहीं कहे जा सकते।

वैश्वदेव करनेके समय (भोजन तैयार होनेपर— ब्राह्मणादि सब गृहस्थोंके घरपर, जो कोई भूखा, चोर, चाण्डाल, शत्रु तथा पिताका हनन करनेवाला भी हो, आवे तो उसे अतिथि जानना वो सबका संगम है।

पुरुष अपने गृहमें प्राप्त हुये अतिथिका गोत्र न पूछे, शास्त्रकी वार्ता भी न करे वह पढ़ा है कि मूर्ख है ऐसी बात भी न पूछे। वेदकी शाखा आदि भी न पूछे वरन् ब्रह्मचर्यादि व्रतको भी न पूछे अतिथिको सर्व देवमय अथवा अपना इष्ट देवमय जानकर अन्नदिसे यथायोग्य सत्कार करे ॥

इस प्रकार जो गृहस्थ पूर्वोक्त पंचयज्ञोंको न करके केवल अपने उदर भरनेके लियेही अन्नको पकाता है वह पुरुष अन्नरूप पापको खाता है ॥