भारतकोश
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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

माता पिताकी प्रतिष्ठा करो खून मत करो, व्यभिचार मत करो

एक दिन बहुत इच्छुक देखकर, कहींसे दूध, चावल, घी, खोंड़ आदिसामग्रियाँ इकट्ठा करके खीर पकायीं। घी खोंड़ डालकर पुत्रके आगे रख दिया। आप किसी कार्य्य वश इधर उधर चली गईं। इतनेहीमें दश दिनका भूखा एक साधु उस लड़केके निकट आकर भोजन माँगने लगा। लड़केने समस्त खीर उस साधुके थालीमें देदी, वह साधु भोजनसे सन्तुष्ट हो अपने आसनपर चला गया वह बालक केवल थाली चाटकर रह गया।

उसी पुण्यके प्रतापसे बालकने एक सेठके घर जन्म पाया। समय पाकर ऐसे अतुल धनका मालिक हुआ कि, उसके बराबर कोई धनी न था। जिस नगरमें वह रहता था वह राजधानी थी, क्योंकि, राजा भी वहाँही रहता था। एक समय एक सौदागर वहाँ आया। राजाके दरबारमें जाकर उसने बहुत तरहके जवाहिरात दिखलाये। उसके पास रत्न कमल था वो राजाको दिखलाया। राजाने उसका मूल्य पूछा, उसने लाख रुपया बतलाया। पश्चात् राजाने रानीके पास भेज दिया, रानीने उसको देखकर कहा कि, इसका मूल्य बहुत है। मैं न लूँगी फेर दिया। सौदागर वहाँसे चलकर उस सेठके घर गया। सेठ तो अपने आनन्द भवनमें था पर सौदागरने उसकी विधवा माताके निकट जाकर उपरोक्त रत्न कमल दिखलाया। माता उसको देखकर सौदागरसे बोली कि,

चौरो वो यदि चाण्डालः शत्रुर्वा पितृघातकः ।

न पृच्छेद्गोत्रचरणे स्वाध्यायं च व्रतानि च ।

हृदयं कल्पयेत्स्मिन्सर्वदेवमयो हि सः ॥

जो पुरुष दूर मार्गसे चलके आया हो, थका हो, वैश्वदेव करनेके समय प्राप्त होवे उसको अतिथि कहते हैं। जो अपने पुरोहितादिक पहले वहाँ हों तो वे अतिथि नहीं कहे जा सकते।

वैश्वदेव करनेके समय (भोजन तैयार होनेपर— ब्राह्मणादि सब गृहस्थोंके घरपर, जो कोई भूखा, चोर, चाण्डाल, शत्रु तथा पिताका हनन करनेवाला भी हो, आवे तो उसे अतिथि जानना वो सबका संगम है।

पुरुष अपने गृहमें प्राप्त हुये अतिथिका गोत्र न पूछे, शास्त्रकी वार्ता भी न करे वह पढ़ा है कि मूर्ख है ऐसी बात भी न पूछे। वेदकी शाखा आदि भी न पूछे वरन् ब्रह्मचर्यादि व्रतको भी न पूछे अतिथिको सर्व देवमय अथवा अपना इष्ट देवमय जानकर अन्नदिसे यथायोग्य सत्कार करे ॥

इस प्रकार जो गृहस्थ पूर्वोक्त पंचयज्ञोंको न करके केवल अपने उदर भरनेके लियेही अन्नको पकाता है वह पुरुष अन्नरूप पापको खाता है ॥

चोरी मत करो

तेरे पास केवल सोलह रत्न कमल हैं मेरी पतोहुओं बत्तीस हैं, यदि मैं सबको न दूंगी तो जिनको न मिलेगा वह मुझसे दुःखी होंगी । सौदागरने कहा, कि ऐ माता ! यह रत्नकमल जोड़े हैं, एकके दो दो बन जावेंगे । अन्तमें विधवा माताने सब ले लिये एकके दो दो करके अपनी बहुओंको पृथक् पृथक् दे दिये । उन्होंने जब पहने तो उसमें जो जवाहिरात जड़े हुये थे, वे शरीरमें चुभने लगे जिससे कष्ट होने लगा तब उनको उतारकर फेंक दिया । जब बूहारनेवाली आई उसको बूहारनेके समय रत्नकमल मिला । वह उसे पहनकर किसी कामके लिये राजाके महल गई । रानीने पूछा कि, यह रत्नकमल कहाँसे पाया ? उसने सेठके घरका सब हाल कहा । रानीने राजासे कहा । राजा सुनकर कहने लगा ऐसा धनवान् सेठ नगरमें रहता है, अब मैं उसकी भेंटको जरूर जाऊँगा । सेठके पास खबर भेजी कि, मैं आपसे मिला चाहता हूँ । मिलनेका समय नियत किया गया । सेठकी माताने राजाके भेंटके लिये सामग्री तैयार की उसका वर्णन बहुत विस्तारसे लिखा है, संक्षेपसे यह है कि, रत्न, मोती तथा सुवर्णके मुहरोंसे किश्तों और नानाप्रकारके नाना देशोंके बनाये हुवे सूती, ऊनी और रेशमी वस्त्र और उत्तम उत्तम घोड़े, हाथी आदि राजाकी भेंटके लिये ठीक किये । राजाके भोजनके लिये नाना प्रकारके व्यञ्जन तैयार कराये । राजाके पधारनेपर सेठके नायब और गुमाशतोंने राजाकी बड़ी प्रतिष्ठा और आवभगत करके रत्न जड़ित सिंहासनपर बैठाया । फिर सेठसे भेंट हुई, सेठने भली प्रकार आवभगत करके भोजन कराया । संयोगन राजाके हाथकी अँगूठी गिर गई उसकी खोज होने लगी, पर न मिली । यह बात सेठकी माताके कान पहुँची । उसने अँगूठीयोंके दो तीन कूवें खुलवा दिये कहा, कि आपकी जैसी अँगूठी थी वैसीही इसमेंसे खोजके निकाल लो । राजाने अँगूठियोंसे भरे कुवाको देखकर एक अँगूठी निकालकर पहन ली आनन्दपूर्वक राज महल को गया । राजाके चले जानेके बाद सेठने मातासे पूछा कि, यह कौन पुरुष था, माताने कहा कि, बेटा यह देशका राजा है, जिसकी हमलोग सब प्रजा हैं । उस युवकने कहा कि, मुझसे भी जब दूसरा बढ़कर है तो मैं दूसरेके आधीन होकर न रहूँगा । उसके मनमें उसी समय संसारसे बड़ी घृणा उत्पन्न हुई । संसार त्याग देनेका विचार किया । रात हुई उसकी स्त्री अटारीपर उसके पास गई स्त्रीको देखतेही उसने कहा,—अब तू मेरे पास मत आ, तू मेरी माताके तुल्य है । दूसरे दिन दूसरी स्त्री गई उससे भी ऐसाही कहा । जब उसने इसी प्रकार कई दिनतक किया सब स्त्रियाँ डर गयीं । उसके निकट जाना बन्द कर दिया । यह समाचार सेठकी बहिनके पास पहुँचा

सूठी गवाही मत दो इच्छीलके मुख्य धर्म

वह सुनकर बहुत शोकित हुई। यह समाचार जिस समय उसके पास पहुँचा वह उस समय अपने पतिके पीछे खड़ी उसे स्नान करवा रही थी। चित्त क्षोभित होनेके कारण आँखसे आँसू टपक कर पतिके पीठपर पड़े जिससे उसके पतिने पीछे फिकर देखा। स्त्रीको रोते देखकर पूछा तू क्यों रोती है। स्त्रीने उत्तर दिया कि, मेरे भाईको वैराग्य उत्पन्न हुआ है वह स्त्रियोंको माता कहकर पुकारता है। यह बात सुनकर उसने कहा तेरा भाई मूर्ख और नीच है, वह बारम्बार अपनी स्त्रियोंको माता क्यों कहता है ? एकही बार सबको क्यों नहीं त्याग देता ? यह बात सुनकर उसकी स्त्रीने व्यङ्गसे कहा कि, आप उससे भी अच्छे हो ? यह बात सुनकर उसके मनमें बड़ी चोट लगी उसी समय वैराग्य उत्पन्न हुआ। हाथमें कमण्डलु ले लंगोटी बाँधकर चल दिया। उसकी अस्सी स्त्रियाँ थीं बड़ा भारी सेठ था, सब स्त्रियोंको एक बार ही माता कहकर सब धन दौलत छोड़ दिया। वहाँसे चला २ अपने सालके पास पहुँचा, उसे पुकारकर कहा कि, ऐ मूर्ख ! तूने क्या ढोंग पसारा है ? आ नीचे उत्तर अपनी सब स्त्रियोंको एक बारही माता कह कर त्यागदे मेरे साथ चल। अपने बहनोंईके शब्द सुनकर वह नीचे उतरा सबको त्यागकर उसके साथ चल दिया। दोनों विरक्त हो गये। घरके लोग नानाप्रकार रोते चिल्लाते रह गये। उन्होंने उनकी तरफ कुछ भी ध्यान न दिया सालसे बहनोंई अधिक धनवान् था। जैसा वह धनवान् था वैसाही पूरा संत हुआ, अपने परायोंकी ओर स्वप्नमें भी ध्यान न दिया ईश्वरमें अखण्ड ध्यान लगाकर उसीमें निमग्न हो गया।

इस कथामें जो कुछ हुआ केवल उस खीरकाही प्रताप था, जो उस लड़केने साधुको खिलाई थी। उसीके प्रतापसे पहले ऐसा सेठ हुआ, फिर साधु होकर समाधिष्ठ हुआ, जिससे मुक्तिका भागी बनकर मनुष्य देहको सफल कर लिया।

दूसरा दृष्टांत—एक संत चले जाते थे, उनको एक मनुष्यने नमस्कार करके कहा कि, महाराज ! आज आप मेरे घर भोजन करें। साधुने उसका निमन्त्रण मान लिया उसके घर भोजन करने गया। आदमीने साधुका हाथ धुलाकर थोड़ासा अलोना शाक भोजनके लिये दिया। वह बिचारा ऐसा दरिद्र था कि, शाकमें डालनेके लिये निमक भी नहीं पा सका था। साधु अलोना शाक आनन्दपूर्वक खाकर चला। साधुके घरसे बाहर निकलतेही उस श्रद्धालु भक्तके घरमें आकाशसे रत्नोंकी ऐसी वर्षा हुई कि, घर भर गया वह ऐसा धनी हो गया कि, नगरके राजाको उसपर ईर्षा आने लगी। राजाने अपने सेवकोंको आज्ञादी कि, साधुको खोज लाओ, हम भी उसको भोजन करावेंगे। राजाके सेवकोंने

आदिमें शब्द था और शब्द ईश्वर था अवधान जन्म, खुदाको न देखा गुणोंका भेद, प्रकाश

साधुको ढूंढना आरम्भ किया उधर राजाने साधुके लिये उत्तम २ भोजन बनावेकी आज्ञा दी । सेवक लोग साधुको बुलाकर ले आये भोजन करनेके लिये बैठाय। साधुको हाथही पर खानेका अभ्यास था, राजाके रसोइयोंने ऐसी गरम २ वस्तु उसके हाथपर रखदी कि, जिससे उनका हाथ जल गया । जिस समय वह साधु भोजन करके राजमहलसे बाहर निकला उसी समय आकाशसे आगकी वृष्टि हुई राजाका समस्त राजमहल जलकर भस्म हो गया । इसमें विचार करनेकी बात है कि, उस दरिद्र दुखियेने प्रेम, शुद्ध अन्तःकरण और सच्ची भाव भक्तिसे साधुको भोजन कराया था, उसको किसी प्रकारकी लौकिक कामना न थी । केवल अपना धर्म जानकर उसने भोजन कराया था । राजाने जो कुछ किया सो सच्चे भाव भक्तिके बिना सांसारिक लोभमें पड़कर किया इस कारण दोनोंको फल मिला, वो प्रत्यक्ष है । जो कोई भाव भक्ति सहित भी सांसारिक लोभसे साधु सेवा करता है उसको बहुत थोड़ा फल मिलता है । जो कोई भाव भक्ति बिना कुछ माहात्म्य देख सुनकर, किसी प्रकारकी कामनासे, सेवा करता है उसका फल ठीक उलटा होता है, जैसा कि, राजाको हुवा ॥

रोटी देनेसे हजरत ईसाका भी शाप चला गया—किसी मुसलमानी किताबमें मैंने पढ़ा था कि हजरत ईसा फिरते फिरते एक गाँवमें पहुँचे । उस गाँवके सब लोग उनके पास जमा हो कहने लगे कि, हजरत इस गाँवमें एक धोबी रहता है वह बड़ा दुष्ट है, गाँवभरके लोगोंको बहुत दुख देता है, किसीका कपड़ा फाड़ लेता है, किसीका चुराही लेता है, किसीका बदलाही लेता है, लोग उससे अत्यन्त दुःखी हैं गाँवके लोगोंकी यह बात सुनकर हजरतके मुखसे यह बात निकल गई कि, वह धोबी घाटसे जीवित न आवेगा, वहाँही मर जावेगा । उधर धोबीके भोजन करनेका समय हुआ, तब उसके तीन रोटी गई । धोबीने हाथ, पैर धोकर रोटी खाना चाहा । इतनेहीमें एक फकीर आकर खड़ा हुआ, खानेको माँगने लगा । धोबीको दया आगई उसने एक रोटी उठाकर फकीरको दे दी । उस फकीरने रोटी खाकर आशीर्वाद दिया कि, तेरा अन्तःकरण शुद्ध होजा । धोबीने दूसरी रोटी भी फकीरको दे दी, उस फकीरने रोटी लेकर कहा कि, तुझे ईश्वर अचानककी आपत्तियोंसे बचावे फिर धोबीने तीसरी रोटी भी देदी, तो फकीरने आशीर्वाद दिया कि, खुदा तुझे स्वर्गमें एक कोठरी दे । ये तीनों बात कहकर वह फकीर तो चला गया । सन्ध्या होते ही धोबी अपने घर आया । उसे घर आया देख सब लोग हजरत ईसाके पास जाकर कहने लगे कि, या हजरत ! यह धोबी तो सही सलामत जीता जागता घरको आया, आपके वचन

विभाग, कुरानके मुख्य धर्म सबका एक, सबका सार, विद्वानोंके भेद

झूठे हुये । हजरत ईसाने अपनी अन्तरदृष्टिसे देखकर लोगोंसे कहा कि, उस धोबीकी गठरी खोलो । लोगोंने गठरी खोली तो उनमेंसे एक बड़ा विषैला सॉप निकल पड़ा । हजरत ईसाने लोगोंसे कहा कि, यदि यह विषैला सॉप धोबीको काट लेता तो यह धोबी शीघ्रही मर जाता । जिस समय मैंने लोगोंसे कहा था कि, धोबी घाट परसे जीवित नहीं आवेगा, उसी समय सॉपको आज्ञा हुई थी कि इसको काटले, किन्तु धोबीने उस समय ऐसी उदारता और पुण्य किया कि, जिसके कारण इसके प्राण बच गये इसने अपने खानेकी रोटी एक कामिल फकीर पूर्ण महात्माको देदी । इसने पहली रोटी दी थी, तो फकीरने इसके अन्तःकरण शुद्ध होनेका आशीर्वाद दिया था । दूसरी रोटी फकीरने पाई थी तब कहा था कि, तुझे ईश्वर अचानक आपत्तियोंसे बचावे, फकीरने इतना कहा उसी समय सॉपके मुंहपर मुहर लग गई । सॉप काट नहीं सका । फकीरने तीसरी रोटी खाकर उसे स्वर्गमें स्थान मिलनेका आशीर्वाद दिया अब उस धोबीका अन्तःकरण शुद्ध हो गया, वह किसी प्रकारकी दुष्टता न करेगा । वह स्वर्गीय होगया है इस कारण, नरकियोंके समान दुष्ट व्यवहार न करेगा । उसी समय धोबी शुद्ध अन्तःकरण हो सदाचारी बन गया । फकीरको केवल तीन रोटी देनेसे धोबी मृत्युके मुखसे निकल कर स्वर्गका भागी हुआ ।

लंगोटी देनेसे चीर बढ़ा—महाराणी द्रौपदीने दुर्वासा ऋषिको एक लंगोटीदी थी, जिसके कारण उनका बस्त्र इतना बढ़ा कि, दुःशासन जैसा पहलवान भी खींचते २ थक गया, कपड़ोंका ढेर लग गया पर वह कम नहीं हुआ और महारानीकी प्रतिष्ठा रह गई ।

सहन शीलता और धैर्य ।

साधु लोग जो दुःख उठाते हैं, उनका वर्णन कौन कर सकता है ? देखो ग्रीष्म ऋतुमें जब कठिन धूप पड़ती है, उस समय पाँच अथवा चौरासी धुनी लगाकर तापते हैं । ऊपरसे सूर्यकी गरमी, नीचेसे पृथिवीकी तपन, चारों ओरसे अग्नीकी लू लगती है पर वे दृढ़ होते हैं कि, उससे तब तक हटना नहीं जानते जब तक कि, अग्नी न बुझ जावे । इसी प्रकार शरद कालमें जब कि, शर्दीके मारे दांतोंसे दांत बजते हैं उस समय पानीमें घुस जाते हैं । माघ पौषके महीनेमें पानीमें नङ्गे बैठे रहते हैं । प्राण जायें तो जायें पर अपनी टेकको नहीं छोड़ते । कोई उलटा लटक कर अग्निझप लेता है, कड़कड़ोंपर लेटा रहता है, कोई बाण शय्या बनाकर सोता है, कोई मौन धारण करता है, कोई ठाढ़ेश्वरी बनता है, कोई दिन रात एक पगसे खड़ा होकर भजन करता है, कोई प्राणायाम और

दूसरे पण्डित या उलमा

योगमें सग्न रहता है, कोई षट्कर्म करता है कोई षट्चक्र वेधकर त्रिकुटीमें ध्यान लगाता है, सहस्रदल कमलमें जा समाता है ।

तप और भजनकी बहुतसी रीतियाँ हैं, उनका कौन बयान कर सकता है ? सब मतोंके साधु जो दुःख कष्ट भजनमें उठाते हैं, उससे उनका अन्तःकरण शुद्ध हो अनन्त सूर्यके समान प्रकाशमान हो जाता है, त्रिकालज्ञ हो जाते हैं, गुप्त सब भेद प्रगट हो जाते हैं । ऐसे पुण्यरूप महात्माओंको प्राकृतिक लोग दुःख कष्ट देते हैं । उनकी निन्दा करते हुए गालियाँ सुनाते हैं । वे महात्मा सब दुःखोंको धैर्यके साथ सह लेते हैं, कभी क्रोध नहीं करते, मूर्ख लोग दो चार पुस्तकें अथवा इधर उधरकी दो चार बातें, दो चार भजन साखी शब्द सीखकर उनसे बाद विवाद करके दुःख देनेका प्रयत्न करते हैं । इसपर एक दृष्टान्त लिखता हूँ ।

सिद्ध महात्मा और विद्याभिमानी—एक नगरमें फिरते २ एक साधु आये । बहुतसे नगरवासी उनके दर्शन करनेको आने लगे, उन लोगोंके साथ एक युवक विद्याभिमानी ब्राह्मण भी आया । अपनी विद्याके अभिमानसे साधुके साथ, वाद विवाद करने लगा । उसने कहा मेरे साथ शास्त्रार्थ करो । तब उसने कहा कि, तुम कहाँसे आये हो ? ब्राह्मणने उत्तर दिया—मैं इसी नगरसे आया हूँ । साधूने कहा, इसके प्रथम कहाँसे आये ? उसने उत्तर दिया कि, मेरा जन्म तो इसी नगरका है । सन्तने कहा तुम्हें कुछ सुधि नहीं । तुम पहले जन्म गीदड़ थे अब ब्राह्मणके शरीरमें आये हो जब तुम गीदड़ थे उस समय वर्षा होनेके कारण किसी कुम्हारके घरमें जा छिपे, वह किसी नाजके खानेसे तुम्हारा पेट फूल गया तुम मर गये कुम्हारने तुम्हें अपना हानिकारक जानकर खाल खींच ली वह खाल अभी तक उसके घरमें लटक रही है वह कुम्हार भी जीवित है ।

इतना सुनकर कितनेक लोगोंने कुम्हारके घर जाकर देखा तो साधुके वचनमें तनिक भी विभिन्नता न पाई । इस बातसे उस ब्राह्मण पुत्रको बड़ी लज्जा आई अपनी प्रतिष्ठा भङ्ग होते देख मनमें निश्चय कर लिया कि इस साधुका शिर अवश्य ही काट लूंगा । अर्द्धरात्रि होने पर एक तलवार ले नगरके बाहर उजाड़में पहुँचा जहाँ कि साधु ठहरा हुआ था । साधुके निकट पहुँचकर साधुको मारनेको ज्योंही तलवार उठाई त्योंही हाथ उठाये हुये पत्थरके समान रह गया । उसी प्रकार खड़े खड़े सबेरा हो गया । लोग साधुके दरशनको आने लगे लोगोंने देखा कि, वह ब्राह्मण पुत्र साधुके शिरपर नङ्गी तलवार लिये खड़ा है । यह देखकर बहुत आश्चर्यमें हुये ब्राह्मणपुत्रको बुलाने लगे पर वह न बोल सका ।

अर्थ करनेवाले, कर्तव्य ज्ञानी और अज्ञानी

फिर सबने साधुसे कहा कि महाराज ! अपराध क्षमा करो । तब साधूने कहा कि, मैंने न तो इसपर क्रोध किया, न शाप दिया, न इसका कुछ बुरा चाहा । लोगोंने बहुत विन्ती की तो साधूने उच्चस्वरसे पुकार कर कहा कि, मैंने तो इस ब्राह्मण पुत्रको कुछ दुःख नहीं दिया, यदि किसी देवताने इसको कील दिया हो तो अब छोड़ दो इसका अपराध क्षमा करें । इसपर आकाशवाणी हुई कि । साधुके कहनेसे मैं इस ब्राह्मणपुत्रको छोड़ता हूँ । नहीं तो इसको यहाँही पुखाकर मार डालता । ये केवल साधुके रक्षक देवताने जब ऐसा कहा तो ब्राह्मण पुत्रका बन्धन छूट गया । सचेत होकर साधुके चरणोंपर पड़ा उसका शिष्य हो गया । लोग साधुको धन्य धन्य करने लगे ।

मूर्खलोग सन्तोंकी बहुत निन्दा और ठट्ठा किया करते हैं पर सच्चे सन्त अपने भजन भक्तीको नहीं छोड़ते ईश्वरकी कृपा का भरोसा रख कर भजन करतेही रहते हैं । कुर्तोंके भूँकनेसे सन्तोंके भाग्यमें घटी नहीं होती, जिस विश्वम्भर ने मातृगर्भमें पालन किया, माताके स्तनोंमें दूध भर दिया, उस पर विश्वास करना ही योग्य है ।

विश्वास अङ्गकी साखी ।

कबीर - भू भूख तू क्या करे, कहा सुनावे लोग ।
भांडा गढ़ जिन मुख दिया, सोई भरने योग ॥

कबीर - रचनहारको चीन्हले, खाने को कहैं रोय ।
दिल मंदिरमें बैठिके, तान पछौरा सोय ॥

कबीर - सिर्जनहारा सिर्जिया, आंटा पानी लौन ।
देनेहारा देत है, मेटनहारा, कौन ॥

कबीर - चिता मतकर अर्चित रह, देनहार समरथ ।
पशूपखेरू जीव सब, तिनके गांठ न ग्रथ्य ॥

कबीर - अण्डा पाले काछुई, थन बिन राखे पोक ।
यों करता सब्रको करे, पाले तीनों लोक ॥

कबीर - जाके मन विश्वास है, सदा गुरु तेहि सङ्ग ।
कोटि काल झकझोरही, तऊ न होय चित भङ्ग ॥

कबीर - घटमें ज्योति अनूप है, रिज्ज मौत जिव साथ ॥
कहा सार है मनुष्यकी, कलम् धनीके हाथ ॥

कबीर - जाके दिलमें हरि बसे, सो जन कलपे काहि ॥
एकै लहर समुद्रकी, दुख दरिद्र सब जाहि ॥

पण्डित और मूर्ख मुक्तिका हेतु

कबीर – आगे पीछे हरि खड़ा, आप सहारे भार ।
जनको दुनिया क्यों करे ? समरथ सिर्जनहार ॥

कबीर – सबजन निर्धन जानिये, धनवन्ता नहिं कोय ।
धनवन्ता सोइ जानिये, राम नाम धन होय ॥

कबीर – देने हारा राम है, जाय जड़लमें बैठ ।
हरिको लेई ऊबरे, सात पताले पैठ ॥

कबीर – अर्द्ध शीश उद्धवै चरण, थह पिछली तकसीर ।
कुम्भी नरक पठाइया, जड़िया भरम जंजीर ॥

कबीर – नर नारायण रूप है, तू मत जाने देह ।
जो समझे तो समझ ले, खलक पलकमें खेह ॥
साधु महात्म्य अड़की साखी ।

कबीर – साधू आवत देखिके, चरणन लागो धाय ।
क्या जाने किहि भेषमें, हरिही जो मिल जाय ॥

कबीर – साधू आवत देखिके, हँसी हमारी देह ।
माथेका ग्रह ऊतरा, नयनों बँधा सनेह ॥

कबीर – साधू आवत देखिके, मनमें करें मरोर ।
सो तो होंगे चूहड़े, बसें गांवके छोर ॥

कबीर – आवत साधु न हरषिया, जात न दीया रोय ।
कहै कबीर ता दासकी, मुक्ति कहाँसे होय ॥

कबीर – छाजन भोजन प्रीतिसे, दीजे साधु बुलाय ।
जीवत यश हो जगतमें, मुये परम् पद पाय ॥

कबीर – हों साधुनके सङ्ग रहूँ, अन्त न कितहूँ जाउँ ।
जो मोहिं अरपे प्रीतिसे, साधुन मुख होय खाउँ ॥

कबीर – साधु नदी जल प्रेमरस, तेहि परछाले अड़ ।
कहैं कबीर निरमल भया, साधू जनके सड़ ॥

कबीर – साधु मिले तो हरि मिले, अन्तर रही न रेख ।
मनसा वाचा कर्मना, साधू आप अलेख ॥

कबीर – निराकारकी आरसी, साधुनही की देह ।
लखा जो चाहे अलख को, इनहीमें लिखि लेह ॥

कबीर – साधुनहीकी दयाते, उपजे बहुत अनन्द ।
कोटि विघ्न पलमें टरे, मिटे सकल दुख दन्द ॥

किसीका भी भ्रम न गया वर्णमालापर विचार

कबीर - हरि दरबारी साधु हैं, इन्ते सब कछु होय ।
लेई मिलावैं रामको, इन्हें मिले जो कोय ॥

कबीर - साधू खोजा रामके, धसैं जो महलन माहिं ।
औरनको परदा लगे, इनको परदा नाहिं ॥

कबीर - गिरीही सेवैं साधुको, साधू सेवैं राम ।
यार्मि धोखा कछु नहीं, सरे दुनोंका काम ॥

कबीर - जो घर साधु न सेव है, पारब्रह्मपति नाहिं ।
सो घर मरघट सारखा, भूत बसे ता माहिं ॥

कबीर - हयवर गजवर शबन धन, छत्रपतीकी नारि ।
सोऊ पटन्तर नातुले, हरि जनकी पनिहारि ॥

कबीर - साधुनकी कुतिया भली, बुरी साकठकी माइ ।
वह बैठी हरियश सुने, वह निन्दा करने जाइ ॥

कबीर - सोई कुल जगमें भला, जा कुल उपजे दास ।
जा कुल दास न ऊपजे, सो कुल ढाक पलास ॥

कबीर - साधु वृक्ष हरिनाम फल, शीतल शब्द विचार ।
साधु न होते जगतमें, जल मरता संसार ॥

कबीर - साधु सिद्धकी एक मति, साधु महा परचण्ड ।
सिद्ध तारे तन आपना, साधु तारे नवखण्ड ॥

कबीर - हरि सेती हरिजन, बड़े, समझ देखु मनमाहिं ।
कहैं कबीर जग हरिविषे, सो हरि हरि जन माहिं ॥

कबीर - सन्त बड़े संसारमें, हरिते अधिक हैं सोय ।
बिन इच्छा पूरण करें, साहब हरि नहिं दौय ॥

कबीर - दरशन होवे साधुका, साहब आवे याद ।
लेखे सो दिन धारिये, बाकीका सब वाद ॥

अथ गुरु दर्शन विधि ।

कबीर - दरशन कीजे गुरुका, दिनमें कई एक बार ।
आसूयाका मेह ज्यों, बहुत करे उपकार ॥

कबीर - कई बार न होइ सके, दौय वक्त कर लेइ ।
सद्गुरु दरशनके किये, काल दगा नहिं देइ ॥

कबीर - दौय वक्त ना हो सके, दिनमें करै इकबार ।
सद्गुरु दरशनके किये, उतरे भवजल पार ॥

कबीर – एक दिना नहिं करिसके, दूजे दिन करि लेहि ।

सद्गुरु दरशनके किये, पावे उत्तम देहि ॥

कबीर – दूजे दिन ना करि सके, चौथे दिन कर जाय ।

सद्गुरु दरशनके किये, मोक्ष मूक्ति फल पाय ॥

कबीर – बार बार ना करि सके, पक्षे पक्ष करे सोय ।

कहैं कबीर ता दासका, जन्म सुफलही होय ॥

कबीर – पक्षे पक्ष ना करि सके, मास मास कर धाय ।

यामें भेद न कीजिये, कहैं कबीर समझाय ॥

कबीर – मास मास ना करि सके, छठे मास अलबत्त ।

यामें ढील न कीजिये, कहैं कबीर अविगत्त ॥

कबीर – छठे मास ना करि सके, बरस दिना करि लेहि ।

कहैं कबीर सो सन्त जन, यमहिं चुनौती देहि ॥

कबीर – बरष बरष नाकरि सके, ताको लागे दोष ।

कहैं कबीर वा जीव सो, कबहुँ न पावे मोक्ष ॥

कबीर – माता पिता सुत स्त्री, बन्धु कुटुम्बको जान ।

गुरु दरशनको जब चले, ये अटकावे आन ॥

कबीर – उनका अटका ना रहे, गुरु दरशनकी जाय ।

कहैं कबीर सो सन्त जन, मोक्ष मुक्ति फल पाय ॥

कबीर – खाली साधु न विदाकर, सुनि लीजे सब कोय ।

कहैं कबीरा भेंट धर, जो तेरे घर होय ॥

कबीर – मुहर रुपया पैसा, कपड़ा बासन देइ ।

कहैं कबीर सो जगतमें, जन्म सुफल करि लेइ ॥

कबीर – निराकार निज रूप है, प्रेम प्रीतिसे सेव ।

जो चाहे आकारको, साधू प्रत्यक्ष देव ॥

कबीर – जा सुखको मुनिवर रमे, सुर नर करें मिलाप ।

सो सुख सहजें पाइये, सन्तों सङ्गति आप ॥

कबीर – कोटि कोटि तीरथ करे, कोटि कोटि करे धाम ।

जब लगि सन्त न सेवई, तब लगि सरे न काम ॥

कबीर – आशा बासा सन्तका, ब्रह्मा लखे न वेद ।

षट् दर्शन खटपट करें, विरला पावे भेद ॥

अंकों पर विचार

कबीर - गुरु भये है, केतकी, भँवर भये सब दास ।

जहँ जहँ भक्ति कबीरकी, तहँ तहँ मुक्ति निरास ॥

सार - कहाँतक लिखूँ, ? सन्तोंकी महिमासे समस्त स्वसम्बेद भरा हुआ है । कबीर साहब सर्वदासे पुकारते आते हैं कि, हे संसारियो ! साधुसेवाके बिना तुम्हारा कल्याण न होगा । संसारमें ही फँसे रहकर आज्ञानमें पड़े रहोगे । यह सारा संसार मृतक है, सन्त इसको जीवन प्रदान करते हैं, तब चैतन्य होता है । मुर्दके कान तो होते हैं पर सुनता नहीं, आँख होती है पर देखता नहीं, इसी प्रकार उसकी सब इन्द्रियाँ तुच्छ और बोझरूप हैं । विद्याऽभिमानियोंकी भक्ति और उदारता सन्तोंकी निन्दा करनेसे लोप हो गई । इस कलियुगमें लोग प्रायः सुकर्म से भागकर पापकी ओर जाते हैं ।

कबीर - यहि कलियुग आयो अबै, साधु न माने कोय ।

कामी क्रोधी मसखरा, तिनकी पूजा होय ॥

बुल्लेशाह - बुल्ला जिन्दा पढ़िया अल्लिफ वे । वे क्या जाने हूधथो दे ।

संसारी सर्वदा व्यवहारके चक्रमें पड़ा रहता है, जैसे राजा, धनीसेठ, साहू-कार, वैसेही मजदूर, परिश्रमी, दरिद्र, दुखिया आदि सब सांसारिक व्यवहारमें लगे रहते हैं । व्यवहारिक प्रवृत्तीमें यह विचार नहीं रहता कि, सत्सङ्ग करके अपना कल्याण करें ।

फकीर और शेखफरीदुद्दीन - एक दिन एक फकीर उक्त अत्तारसे मिलने को गया चाहता कि, कुछ बातें करें पर अत्तार साहब अपनी दूकानके कार्यायमें ऐसे निमग्न थे और इतनी भोड़ लगी हुई थी कि, इतनाभी समय न मिला जो उससे बाचचीत भी कर सकें सबेरसे शाम होगयी पर अत्तार साहब उस फकीरसे वार्तालाप न कर सके । सन्ध्याको फकीरने अत्तार साहबसे कहा कि, तुमको क्षणमात्र भी अवकाश नहीं मिलता, व्यवहारमें ऐसे निमग्न हो कि, कुछ लोक परलोककी भी सुधि नहीं, किस प्रकार तुम्हारा प्राण निकलेगा ? । इतना सुनकर फरीदुद्दीन अत्तार साहबको बहुत क्रोध आया झिड़ककर फकीरसे कहा कि, तेरी जान कैसे निकलेगी ? वह फकीर इतना सुनतेही दूकानके नीचे कम्मल और प्याला रखकर वहीं लेटकर मर गया । फरीदुद्दीन अत्तारने यह हाल देखा तो उनके मनमें संसारसे बहुत वैराग्य और घृणा उत्पन्न हुई । अंतारीकी दूकान छोड़कर फकीर होगये, फकीरोंमें पूर्णता प्राप्त की बड़े प्रसिद्धिये थे भी शेख मन्सूरके समान (११४ वर्षकी अवस्थामें) बसरामें कत्ल किये गये ।

मुहम्मदसाहिबके कार्य - योरोपके लोग नानाप्रकारकी युक्तियाँ करके

भारत वर्षसे द्रव्य ले गये और ले जाते हैं । इससे सांसारिक विषय वासना राग भोगमें पड़कर परलोकको एकदम भुला दिया है दिन दिन सांसारिक व्यवहारमें निमग्न होते जाते हैं । भजन भक्तिका अथवा पारलौकिक विचारका स्वप्नमें भी ध्यान नहीं करते । आशा, तृष्णा और सांसारिक कामनाओंमें ऐसे फँसे हुये हैं कि, दिनरात इन्हीं चिन्ताओंमें चक्कर खाया करते हैं कि, किस प्रकारसे धन, दौलत और मान, बड़ाई, प्राप्त हो । योरपवालोंमेंसे कोई भी भजन तपस्या और ईश्वर स्मरणमें लगा हुवा नहीं देख पड़ता । उनका उद्धार होना बहुत कठिन है क्योंकि, मायाके चाहनेवाले जगतसे प्रेम करनेवाले संसारमेंही रहेंगे, उनका कभी बन्धन न छूटेगा । परमात्माकी दीन दुखियोंपर असौम कृपा होती है । हजरत ईसाने कहा है कि, ऊंटका सूईके छिद्रसे निकल जाना सहज है, पर एक धनाभिमानीका मोक्ष पाना कठिन है । महम्मद साहबके समयसे पहले जब पुस्तकावलोकनका बहुत प्रचार हुआ तो उनके समयमें बहुत किताब जलाई गई थी क्यों कि, वह समझते थे किताबोंके बहुत पढ़नेसे भजन भक्ति नष्ट हो जाती है । उसी समय बुत्तपरस्ती जादूगरी, रमल, ज्योतिष, यंत्र, मंत्र आदिका बहुत प्रचार बढ़ गया था, विज्ञानकी भी बहुत चर्चा थी, पर महम्मद साहबने अरबमें उन सब बातोंका खण्डन करके मनुष्योंको रोज़ा निमाज़ सिखलाया भजन बन्दगीमें लगाया ।

बिना पढ़े ज्ञानी — अब मैं उन महात्माओंका वर्णन करता हूँ, जिन्होंने एक अक्षर भी नहीं पढ़ा है केवल एक परमात्माके नामका स्मरण करके दिनरात उसीमें निमग्न हो अपने भजनको पूरा किया है । उनकी सच्ची भक्ति देखकर सद्गुरु कबीर बन्दीछोर मिलता है । जिनको साहब नहीं मिलता वे सिद्धियोंको प्राप्त कर लेते हैं । जिनपर सद्गुरुकी कृपादृष्टि हुई उनका कार्य पूरा हुआ, वे लोग पुस्तकों के कीड़ोंको नहीं चाहते, न उनको उपदेशके योग्य ही समझते हैं । जिस प्रकार कागजके कीड़े कागज कोही खाते और उसीमें रहते हैं उसी प्रकार विद्याभिमानी लोग पुस्तकोंको चाटते रहते हैं बात बात पर वाणी और पुस्तकोंकाही आधार लेते हैं ।

नामके स्मरण करनेवालोंको आवश्यक है कि, पढ़ने लिखनेसे निवृत्त हो जावें । काम पढ़नेपर पुस्तक देखना जरूर चाहिये पर अपना सब समय उसीमें लगा देनेसे भजन नहीं हो सकता । केवल नामकोही दिन रात ध्यान करता रहै क्योंकि, नामके अतिरिक्त जो कुछ हैं वह सब मायिक और तुच्छ हैं, अन्धकारमें डालनेवाला है । यदि नीच घरका भी भोजन करके भजनमें लगा रहे, ईश्वरमें सच्चा प्रेम करे, गुरुमें सच्ची भक्ति रखे तो उसके समान राजा इन्द्र भी नहीं,

मुसलमान विद्वान् खुदा और उसका कलाम शिरके अर्थका अभाव अलिफ लाम और मीम, प्रश्न

इन्द्र उसके आगे दरिद्र और तुच्छ है। यदि खानेको नाज न मिलें, जोकी भूसी और साग पात खाकर भजन करें, तो भी सारे संसारके पदार्थोंसे वैराग्य और अनाशक्ति धारण करें। जो कोई भजनानन्दी बनना चाहता है भक्ति प्राप्त करनेकी अभिलाषा रखता है, वह अपने कामके बिना अन्य पुस्तकोंका देखना छोड़ दे। यदि पहले नाना विषयोंकी पुस्तकोंको पढ़ा हो तो उनको भी एकदम भुलो दे। जबतक मनसे लौकिक पारलौकिक सब प्रकारकी वासनाओंको नष्ट करके भजनमें न लगेगा, तबतक भजनका यथार्थ आनन्द नहीं मिल सकता। एक ईश्वर भक्तिके बिना जो कुछ लिखना पढ़ना है वो सब शत्रु तुल्य हैं।

साखी कबीर साहबकी।

कबीर - मैं जानूँ पढिबो भलो, पढिबे ते भल योग।

भक्ति न छाड़ूं रामकी, भावे निन्दे लोग॥

कबीर - लिखना पढ़ना चातुरी, यह संसारी जेब।

जिस पढ़ने सो पाइये, वह पढ़ना कितने नसीब॥

कबीर - पढ़ते पढ़ते पढ़ गये, कर गये टट्टी चोर।

जिस पढ़ने से हरि मिलें, वह पढ़ना कछु और॥

कबीर - बहुत पढ़ना दूर कर, अति पढ़ता संसार।

पेड़ न उपजे प्रेमकी, क्यों पावे करतार॥

कबीर - पढ़ना दूर करि, पुस्तक देउ बहाय।

बावन अक्षर प्रेमके, राम नाम लौ लाय॥

कबीर - धरती अम्बर ना हता, कौनसा पण्डित पास।

कौन मुहूरत थापिया, चाँद सूर्य आकाश॥

कबीर - पण्डित बोरिया पत्रा, काजी छाड़ि कुरान।

वह तारीख बताइये, थाना जमी असमान॥

सार - जो कोई भक्ति करना चाहता है वह व्यर्थका पढ़ना लिखना छोड़ कर भजनमें लग जाये। यदि कुछ पढ़नेकी इच्छा भी हो तो एक अल्लिफ अथवा-अ-पढ़ ले और कुछ न पढ़े। यदि इतनेमें भी सन्तोष न हो तो अपने धर्ममें गुरुके ग्रन्थोंको पढ़े, पेटके लिये कुछ भी चिन्ता न करे, साहब आपही पेटकी चिन्ता कर लेगा, मनुष्य अपने भजनमें चूक न करे।

शब्द - साधु भाई खेती करो, हरि नामकी॥

रुपया न लागे पैसा न लागे, कौड़ी न लागे छदामकी।

तन मन बैल सुरति हरवाहा, रई लागो गुरु ज्ञानकी॥

मुसलमानी सांसारिक पंडितोंसे प्रश्न प्रथम द्वितीय तृतीय प्रश्न अंगरेजीके विद्वानोंसे प्रश्न मनुष्यत्वका अधिकारी

आस पास सन्तनको डेरा, मैँडेया श्रीरामकी ।

कहैं कबीर सुनो भाई साधो, बलिहारी वहि नामकी ॥

बहुत भाषाओंका सीखना बोलना वैसाही है, जैसा कि, बहुतसे पशु पक्षी, एक दूसरे पशु पक्षी, अथवा मनुष्यकी बोली बोलना सीख लेते हैं । बहुत भाषा सीखनेसे मनुष्यकी कुछ बड़ाई नहीं, मँना, तोता आदि पक्षी बहुत प्रकारकी भाषा बोलते हैं, वैसेही आदमी अरबी, फारसी, अंग्रेजी, तुर्की, इब्रानी, संस्कृत आदि भाषाओंको सीख लेते हैं, इससे उनकी कुछ अधिकता नहीं हो जाती । जिसने भजन भक्तिका आनन्द पाया उसके सामने त्रिलोकीकी सब बातें तुच्छ हैं ।

जैसे सन्तोंमें वैसेही गृहस्थोंमें भी ऐसे २ सुकृतिजन हुये हैं कि, जो अपने दान, पुण्य, योग, यज्ञ, विवेक, वैराग्य, तपस्या और भक्ति आदिसे इन्द्रको भी दास बना लिया है । उनके न्याय और उदारताकी कथा बहुत प्रसिद्ध है। मैंने एक किताबमें पढ़ा था कि, एक अपढ़ राजा एक पढ़े हुये शत्रु राजाके वश हो गया । शत्रुने राजासे कहा कि, तू कानूनके अनुसार न्याय नहीं करता । उन अनपढ़ राजाने उत्तर दिया कि, मैं स्वयं कानूनका मूल हूँ; मुझे आईन कानूनकी कुछ आवश्यकता नहीं । इस प्रकार साधु विरक्त अथवा गृहस्थ दोनोंमेंसे जो अपनी सुकृतीको पूर्ण करेगा, अपना कर्तव्य न भूलेगा वह प्रतिष्ठित होगा । उसके लोक परलोक दोनों सुधरेंगे । पढ़नेसे क्या लाभ ? यदि पढ़ेके अनुसार कर्म नहीं किया तो सब पढ़ना लिखना व्यर्थ है । परमात्माने जिनको स्वाभाविक गुण प्रदान किये हैं उसको बनावटकी क्या आवश्यकता है ?

गो यह मत ना पसन्द खातिर हो । वनजर पेश सन्त शातिर हो ॥

मेरी गुफ्तार खूबसो समझे । या ब हजरत हुजूर फातिर हो ॥१॥

अध्याय २१.

जीवका वर्णन

जीवके पक्केतत्त्व — स्वसम्बेदका कथन है कि, पहले जीव अपने सत्य स्वरूप में था, उसकी सत्य स्वरूपी देह थी, पिण्ड और ब्रह्माण्ड ये दोनों सत्यस्वरूप और पक्के थे, पांच पक्के तत्त्व और तीन गुण थे । धैर्य, दया, शील, विचार और सत्य, ये ती पक्के पांच तत्व कहलाते हैं विवेक, वैराग्य, गुरुभक्ति साधुभाव ये तीन गुण थे । इन्हीं पांच तत्वोंके और तीन गुणोंकी हँसाकी देह थी । इस जीवका प्रकाश और स्वभाव अद्वितीय था ।

उपदेश, अंग्रेजी वर्णमाला

कच्चे होना ।

जब इसने अपनी सुन्दरताका विचार किया तो इसको बड़ा आनन्द प्राप्त हुआ यह आनन्दमें निमग्न हो गया । अपने शरीरकी भी सुधि जाती रही । अपनी देहकी सुधि भूलनेसे असली देह पलट गई, पक्कीसे कच्ची हो गई । तत्व प्रकृति सब बदल गये, अर्थात् धैर्यसे आकाश उत्पन्न हो गया । शीलसे अग्नि, विचारसे जल, दयासे वायु और सत्यसे पृथिवी हो गई । इसी तरह पक्के गुणोंसे कच्चे गुण होगये, फिर तो पच्चीस प्रकृति आदि कच्चे आकारका प्रादुर्भाव हुआ । जीवको कच्ची देह मिलतेही भ्रममें पड़ गया । इसी भ्रमको धारण करके वेद शास्त्र आदि वर्णित सच्चिदानन्द कैवल्य भूमिपर अधिष्ठित होकर सारे संसारका अधिष्ठाता एवं हर्त्ता कर्त्ता और स्वामी हुआ ।

मायासे संयोग – जिस समय देहकी ज्योति प्रभाव और प्रकाशको देखकर आनन्दमें बसुध होनेके बाद फिर सचेत होतेही इसने आँख उठाकर देखा । दृष्टिसे देखतेही इसे अपनी छाया शून्यमें देख पड़ी, वही स्त्री स्वरूप होकर इसके निकट आई दोनोंका संयोग हुआ इसीको माया और ब्रह्म का संयोग कहते हैं, इसीसे समस्त संसारकी रचना हुई, इसी सच्चिदानन्द ब्रह्मकी समस्त संसारमें पूजा और भक्ति होती है ।

पतन – जीवसे अहंकार उत्पन्न हुआ यह जानने लगा कि, सब मैंही हूँ । फिर स्वाभाविक “एकोऽहं बहुस्याम्” की फुरना उठी, इसी ब्रह्म सच्चिदानंदकी बात सब वेद शास्त्र, किताब, कुरान आदि करते हैं पर इसके यथार्थ स्वरूपको स्वसम्बेदके अतिरिक्त दूसरा कोई भी नहीं जानता । यह सच्चिदानन्द ब्रह्म स्वयं बन्धनमें है । जबसे यह जीव अपने सत्य स्वरूपसे गिरा तबसे बहुत प्रकारके स्वरूप पाये और इसकी अवस्ति ही होती गई जबसे इसको अहं फुरता है तभीसे यह नीचेकी ओर गिरता जाता है । जबसे यह सूक्ष्मसे स्थूल देहमें आया, तबसे अनन्त भ्रममें पड़ गया उसी अवस्थामें वेद किताब ग्रन्थ आदि वाणी बनायी, जिनका कि, कुछ पारावारही नहीं । जब सर्वोत्कृष्ट मनुष्य शरीरको प्राप्त हुआ, तो नाना प्रकारके मत मतान्तरोंकी स्थापना की । ब्रह्म, जीव, माया, सब कुछ ठहराया । योग समाधि और नवधा भक्ति आदि नानाप्रकारके उपाय और युक्तियोंसे इसी ब्रह्मके पदको प्राप्त करता है, फिर नीचे गिर जाता है । जब कभी भाग्य उदय होता है। सद्गुरु पर पूर्ण श्रद्धा होती है तब सत्यगुरुकी दया होती है । तभी यह सत्य पन्थका अधिकारी होता है उसी समय यह ज्ञान प्राप्तकर इस ब्रह्म सच्चिदानन्दसे सम्बन्ध छोड़ सत्य पदको प्राप्त हो सर्वदाके लिये आवागमनका सम्बन्ध नाशकर, सच्चे आनन्दके पदपर स्थित होता है ।

इसी सच्चिदानन्द ब्रह्मकी समस्त संसार कथा करता है, सारा संसार इसीमें उत्पन्न होता, स्थित रहता और नाश हो जाता है। यह सच्चिदानन्द इस जीवका केवल भ्रम मात्र है, यह जीव भ्रमकोही ब्रह्म मानकर उसकी भक्ति और पूजा करता है। इसीके भ्रमने इसको अधा कर रखा है। सच्चे सन्त और गुरुकी सेवा बिना इसका छुटकरा होना असम्भव है; जैसे कस्तूरी मृग, अपनी कस्तूरीके सुगन्धको दूसरे पदार्थोंमें जानकर इधर उधर घासोंको सूँघता फिरता है, महान कष्ट उठाता है, पर जबतक अपनी कस्तूरीको नहीं पहचानता तब तक वैसेही घूमा करता है।

उन्नति और अवनतिके कारण — जब यह एकसे अनेक होता है तब अज्ञानी हो जाता है, जब अद्वैतकी ओर मुख फेरता है आत्मज्ञानके लिये प्रयत्न करता है, तो इसमें ज्ञानका प्रकाश आजाता है संसार लय हो जाता है। क्योंकि, जिसकी ओर ध्यान न होगा वह अवश्यही नाश हो जावेगा। सन्त लोग इसी कारण बाहर की वृत्तियोंका निरोधकर अन्तरमुखी वृत्ति करलेते हैं। जिस प्रकार कछुआ अपने हाथ पाँवको समेटकर एक जगह बैठ जाता है, उसी प्रकार सन्त लोग अपनी वासनाओंका निरोधकर ब्रह्मपदमें बैठ जाते हैं समय पाकर कछुआके समान हाथ पाँवोंको बाहर निकालते हैं संकल्प करके सृष्टि रचते हैं। इसी प्रकार अनन्त वार हुआ करता है। जबतक वासनाका बीज नष्ट नहीं होता जबतक जीव सूक्ष्मसे स्थूल स्थूलसे सूक्ष्म हुआ करता है। यह सर्वदा अपने कम्मोंके वश हो कभी ऊपर और कभी नीचे आता है, कभी मध्यमें लुढ़कता हुआ ठोकरें खाता फिरता है। जब यह अन्तिम देह स्थूल शरीर पाकर उत्तम कम्मोंसे ईश्वरकी भक्तिमें प्रवृत्त होता है, तो पुनः शनैः शनैः ऊपरको चढ़ जाता है। जब यह अशुभ कम्मोंकी ओर झुकता है तो चौरासी योनियोंमें भटकता हुआ विकल और दुःखित रहता है।

तत्त्वमसिका अर्थ — जब यह प्रथम अपने सत्यस्वरूपसे गिरा, “तत्त्वमसि” में इसने अपना घर बनाया, यह “तत्त्वमसि सामवेदका महावाक्य है। तत्त्के अर्थ ईश्वर और त्वं—जीवको कहते हैं—असि—दोनोंका एकता करने वाला ब्रह्मपद है। तत्—पद जैसे समुद्र—त्वं—पद जैसे कुवा और तालाब आदि और असि—पद जैसे दोनोंमें जल। तत्—पद—ब्रह्म अविनाशी ज्ञानी और पूर्ण है। त्वं पद जीव नाशमान और अल्पज्ञ है। असि—पद शुद्ध ज्ञान स्वरूप है

खण्डन — ये दोनों उपाधि छूटे तो आत्मा जैसेका तैसा हो। ये तीनों पद वेदने ठहराये हैं, इन्हीं तीनों पदोंमें सब जीव फँस रहे हैं। आगेकी सुधि किसीको भी न मिली, इसी तीनों पदोंतक संसारका ज्ञान है। अरब और फारस आदिकके

पेगम्बर आदि यहांही तक पहुँचे हैं। हक्कुल यकीन — और मारफतका पद भी यही है। ज्ञानीके लिये किसी प्रकारका आवर्ण नहीं सब ब्रह्मका प्रकाश है। ज्ञानी को किसी प्रकारकी रक्षावट नहीं जहां देखो वहां वही उपस्थित है। जीव विचारा अज्ञानके कारण बंध रहा है, इसे अज्ञानके अंधेरेमें कोई राह नहीं सूझती। इस अवस्थामें यह एक द्वारसे बाहर हो सकता है, वह द्वार शास्त्र है, शास्त्रके बिना कोई मार्ग नहीं मिलता। शास्त्र माताके दूधके समान है; जिस समय बालक दूध पीता होता है वह केवल अपनी माँके स्तनोंसेही दूध पीना जानता है उसको दूसरी कोई युक्ति नहीं सूझती, जब वही बालक अपनी अवस्थाको पहुँचता है तो स्तनों का कुछ काम नहीं पड़ता, अपने आप अपनी शरीर यात्राका उपाय कर लेता है। इसी प्रकार यह जीव दूधपी वा बच्चेके समान है और ईश्वर युवकके समान। जीव और ईश्वर दोनों आवरण और विशेष शक्तियोंमें बंधे हैं। जीव अल्पज्ञ है, ईश्वर सर्वज्ञ है, विद्या और अविद्यामें दोनों बंधे हैं। यह जीव नाना प्रकारके प्रयत्न और युक्तियोंसे ईश्वर हो जाता है, ईश्वर अपनी भूलसे जीव हो जाता है। इसका कारण ब्रह्म और जीव दोनों एकही बात है, ब्रह्म बिना जीव नहीं, जीव बिना ब्रह्म नहीं। जब ब्रह्मके पदपर स्थित हो जाता है—तो सृष्टिका कर्ता हर्त्ता कहलाता है, इसी पदतक इसकी पहुँच है, यही जीवन मोक्षका पद है। अपने उपायों और युक्तियोंसे ज्ञानानि को उठाता है ज्ञानाग्नि प्रगट होकर कम्मेंके बनको जला देती है। वह आग बहुत प्रबल होता है, जिस प्रकार लाल अंगारा अपनी चमक दमकमें एकही होता है पर अंगारेकी अग्नि शनः शनः ठण्डी होती जाती है, अन्तमें पूर्ण ठण्डी हो जाती है। इसी प्रकार यह जीव ब्रह्मपदको प्राप्त करके भी फिर जीव पदको प्राप्त हो जाता है। इसी प्रकार बारम्बार जीवसे ब्रह्म और ब्रह्मसे जीव हुआ करता है। कभी लाभ और कभी हानि उठाया करता है, इसको कभी सुख नहीं मिलता। ज्ञान प्राप्त होनेपर नाममात्रके लिये जीवन्मुक्त कहते हैं, सर्वदा वन्धनमें रहे उसको जीवन्मुक्त कहनेसे क्या फल? वह तो सर्वदा जीव-नबन्ध है। इस हेतु “तत्त्वमसि” के उक्त तीनों पद भ्रम और धोखा है। क्योंकि उसे स्थिरता नहीं है। कभी होता है कभी जाता है।

जीवन्मुक्त तथा विदेहमुक्त — इस प्रकार जीवन्मुक्त और विदेह मुक्त केवल इस जीवका भ्रम मात्र है। इस जीवन्मुक्तका वृष्टान्त ऐसा समझना चाहिये कि, जैसे एक बन्दरको जङ्गीरमें बाँससे बाँध देते हैं, कभी वह बाँसके ऊपर चढ़ता है, कभी नीचे उतर आता है, इसी प्रकार जीवन्मुक्त अपने कम्मेंके बन्धनमें बाँधा हुआ कभी ब्रह्मपदको प्राप्त होता है, कभी नीचे गिर जाता है। जब यह नीचेसे

साधुओंके हंसनेवाले

ऊपरको जाता है तो भली प्रकार दृष्टि करके अपनी छायाको देखता है अज्ञान वश उसको अपना स्वरूप समझता है। यद्यपि वह उसकी छाया नहीं होती तथापि अपने ज्ञानके जोरसे अपना स्वरूप जान तदाकार हो जाता है अपनेको परमानन्द समझने लगता है। उसके ज्ञानमें जो अभीतक अन्धकार शेष है उससे यह बेसुध है। वही अन्धकार अविद्या उसके आवागमनका बीज है। जबतक अविद्या नष्ट न होगी तबतक वह अपने भ्रमको ही अपना स्वरूप समझता रहेगा। उसी भ्रमको ब्रह्म बोलते हैं, उसी भ्रममें समस्त संसार बन्धा है, उसीसे जगत्की उत्पत्ति हुई है। यह संसार भ्रमरूप है, इसकी जीवके भ्रमसे ही उत्पत्ति है। जीवही भ्रमसे एकसे अनेक और अनेकसे एक होता है। आदिमें केवल एक जीव था दूसरा कोई नहीं था, उसीसे अनन्त सृष्टि हो गई। एक वीर्यमें अनन्त वीर्य हैं। एक ब्रह्मसे अनन्त ब्रह्म हो गये। पहले एक ब्रह्म प्रगट हुआ उसीसे समस्त भ्रमरूप संसारका प्रादुर्भाव हुआ। वही भ्रम समस्त संसारकी माता है, उसीसे उत्पत्ति और लय हैं। वही जगत्का ईश्वर और कर्त्ता कहलाता है, समस्त संसारमें उसीकी भक्ति होती है। भ्रमकी भक्ति करनेसे कुछ फल नहीं मिलता, नर्क स्वर्ग और मोक्ष सब कुछ भ्रम मात्र है, जिन्होंने तत्त्वमसिके तीनों पदोंको जान लिया उनको यह सब है। भ्रमकी भक्ति करनेसे कुछ फल नहीं मिलता, नर्क स्वर्ग और मोक्ष सब कुछ भ्रम मात्र है, जिन्होंने तत्त्वमसिके तीनों पदोंको जान लिया उनको यह सब तुच्छ जान पड़ता है। इस कारण वे उनके लिये प्रयत्न नहीं करते।

भ्रम ब्रह्म — जब स्त्री गर्भवती होती है तो उससे बालक उत्पन्न होता है गर्भका रहना जोड़े बिना नहीं हो सकता। बीज ही शेष न रहा तो बालक किस-प्रकार उत्पन्न होगा। यदि जीवनमुक्तको वह ज्ञान प्राप्त होता जिससे कि आवागमनका मूलही न रहे तो उनका आवागमन क्यों न छूटेगा?। जबतक बीज हैं तबतक वृक्ष होगा, डाल, पात, फल, फूल आदिककी आशा रहेगी। भ्रमहीकी दशामें जीव 'तत्त्वमसि' के पदको सत्य मान रहा है। इसको उसके ऊपर विश्वास हो रहा है इसलिये उसको सत्य करके मानता है। यह साधारण नियम है कि, मनुष्यकी बुद्धि जिस बातको स्वीकार करलेती है उसीको वह सत्य मान बैठता है। झूठ हो अथवा सच्चे जिसपर मनुष्य विश्वास कर लेता है वह झूठ भी सचही देख पड़ता है। यदि किसी बातको न माने तो उसकी दृष्टिमें झूठही है, जैसे किसी दरिद्रीका नाम राजा रखदिया तो वह कदापि राजा नहीं हो सकता, वह तो यथार्थ में दरिद्रीही है। इस जीवने भी भ्रमकी दशामें जो कुछ निश्चय किया है वह भ्रमरूप ही है, इसी कारण सब जीवनमुक्त वासनामें बंधे आधीन रहते हैं। जो

सूठ साँचकी एकता, मायाही रामबनी

लोग स्वयं बन्धनमें पड़े हैं उनकी उपदेशसे किस प्रकार मुक्ति हो सकती है ? कीचड़से कीचड़ नहीं धोया जा सकता, कीचड़ धोनेके लिये पानी चाहिये । ऐसेही बन्धनसे छूटनेके लिये पारखगुरुके उपदेशकी आवश्यकता है, जिससे कि आवागमनका बीज नष्ट हो जाता है । इस जीवने असत्यको सत्य मान लिया है इसी कारण झूठका सत्य देख पड़ता है ।

दृष्टान्त—एक गांवमें किसी स्त्रीका पति मर गया था । वह सती होने चली स्मशानमें पतिकी चितापर बैठ गई तब आग लगा दी गई । संयोग वश उसी समय प्रबल आंधी आई, मृतकके साथ आये हुये लोग भाग गये । आगकी गर्मी बढ़ी स्त्री चितासे उतरकर एक झाड़ीमें छिप गई थोड़ी देर बाद अंधेरीके बीत जानेपर झाड़ीसे निकलकर किसी दूसरे नगर चली गई । उसमें पहुंचकर किसी पुरुषके साथ रहने लगी, जिससे उसके कई लड़के लड़कियाँ उत्पन्न हुईं ।

अब उधरका हाल सुनो । जब अन्धडके बीत जानेपर घरके लोग आये लकड़ियोंको जला देखकर अनुमान करलिया कि, वह सती होगई । चिताकी राख जमाकरके उसपर मकान बना दिया । अब सतीचोराकी पूजा होने लगी, लोग मन्त्रत मनाने लगे, बहुतोंकी इच्छाएँ पूर्ण भी हुईं, इसी प्रकारका सतीकी पूजा दिन दिन बढ़ने लगी । कई वर्ष बीतनेपर उस स्त्रीके मायकेका एक मनुष्य उस नगरमें गया उसको शिरपर पानीका घड़ा, गोदमें लड़का और दूसरे लड़केको उँगली पकड़ाये हुये जाते देखा । आदमीने उसको देखकर पहचान लिया उसका नाम लेकर पुकारा । वह खड़ी होगई, उस पुरुषने उसका नाम पूछकर पूरा निश्चय कर लेनेपर कहा कि, यदि तू तो सती होगई थी, यहां किस प्रकार आगई ? उसने लज्जित होकर कहा कि, यदि तू मेरा समाचार मेरे घरके लोगोंसे न कहे तो मैं अपना सारा हाल सुनाऊँ । उसने किसीसे न कहनेका वचन दिया । स्त्रीने अपना सारा हाल कह सुनाया. कहा कि, मैं इस नगरमें एक पुरुषके साथ रहती हूँ, उसीसे यह दो सन्तानें उत्पन्न हुई हैं, यह बात सुनकर वह गांवमें आकर सबसे कहने लगा । शनैः शनैः उस स्त्रीके मँके और समुरारवालोंने भी यह समाचार जान पाया, वहांसे कुछ लोग आकर उसको देख गये । तबसे उस सतीकी पूजा छोड़ दी गई, लोगोंकी मन वाञ्छित पूरी होनी बन्द होगई । जबतक लोगोंका विश्वास सतीमें था तबतक सब कुछ था । जब विश्वास हट गया कुछ भी न हुआ ।

इसी प्रकार यह तत्त्वमसि है इसके तीनों पदोंमें जीवोंने अपना विश्वास दृढ़ कर लिया है इनको इसीका विश्वास सत्य होकर भासता है दूसरी बात नहीं है ।

पहिले पुरुष

ज्ञानके साधन ।

सम, सन्तोष, विचार और सत्संग ये चारों मुक्तिके पौरिये हैं । जो इनको धारण करेंगे उनको सब कुछ प्राप्त होगा । इनसे अन्तःकरण शुद्ध होता है अन्तः-करणके शुद्ध होनेसे सब कुछ शुद्ध हो जाता है, इन बिना किसीको भी मुक्ति मार्ग नहीं मिल सकता । इन्हींसे मनुष्य विचार करता है, मेरे गुरुकी कहाँतक पहुँच है ? उसमें मुझे मुक्त करनेकी सामर्थ्य है वा नहीं ? वह किस देवताकी भक्ति बतलाता है ? उसकी सामर्थ्य कहाँतक है ? जो लोग अपनेको ब्रह्म कहते हैं उनमें ब्रह्म का कुछ लक्षण है या नहीं ? यदि कोई किसी पदार्थ को कपूर बतलावे उसमें कपूरकोसी सुगन्धि न हो, उसके समान गुण भी न हों तो उसे किसी प्रकार भी कपूर नहीं कह सकते । यह जीव अपने बन्धनके लिये आपही जाल रचता है उसमें आपही फँसकर मर जाता है । जो मनुष्य मनुष्यत्वको न धारण करे उसमें मनुष्यके गुण न हों, वह कैसे मनुष्य ठहरेगा ? मनुष्य अपने मनुष्यत्वके गुणोंको जान लेता है तब धारण करता है । पक्षपात और धर्मद्वेषके निकट नहीं जाता, सत्य स्वीकार करता है असत्यसे दूर भागता है । लोग प्रायः मिथ्या बकबक झकझकमें लगे रहते हैं । वे अपने मनमें तनिक भी विचार नहीं करते । न समझते हैं कि, अविद्यासे तीनोंको उत्पत्ति है, इन्हींसे सारा व्यवहार चल रहा है फिर ज्ञान और मुक्तिका मार्ग बतलानेवाला कौन हो सकता है ? यदि तीनों देवताएं अज्ञानके घेरेसे बाहर होते तो उनसे मनुष्योंको मुक्ति प्राप्त होजाती । सब पक्षपातमें फँसे हुये हैं कौन सत्यका खोज करता है ? कौन गुरु है ? किसके उपदेशसे अज्ञान दूर होकर ज्ञान प्राप्त होता है ? इसका विचार निरपक्षही कर सकता है । विद्या और अविद्या दोनोंका प्रगट करनेवाला ब्रह्म है, सो दोनों ही मिथ्या हैं । विद्या अविद्याको नष्ट कर देती है, अविद्या विद्याको मिटा देती है जैसे कि, बाँसके रगड़नेसे आग निकलती है, वो सारे बनको जलाकर अन्तमें आप भी शान्त हो जाती है ।

वह आग कौन है, कहाँ है ? जो सबको जलाकर भी शान्त न हो सर्वदा एक समान प्रकाशित रहे । यदि सब कुछ मैंही होता तो बन्धनमें डालनेवाला दूसरा कौन था, सीखनेवाला कौन है ? सीखता कौन है ? अज्ञान किसको लगा ? एक ब्रह्म अज्ञानी और दूसरा ज्ञानी क्यों हुआ ? एक ब्रह्म द्वितीयो नास्ति, यह क्योंकर कहना ठहरा ? अद्वैत न रहा तो अनन्त ब्रह्म हो सकते हैं । वेदान्ती कहते हैं कि, सब जगत्में है एकही ब्रह्म । जैनी कहते हैं कि, अनन्त ब्रह्म हैं अर्थात् जितने जीव हैं उतनेही ब्रह्म हैं । वेदान्तियोंके एक और जैनियोंके अनेकों का न्याय किस प्रकार हो ? क्या एक ब्रह्मका बाप आकर वेदान्तियोंसे कह गया है कि, एक