कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1086, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंवह सुनकर बहुत शोकित हुई। यह समाचार जिस समय उसके पास पहुँचा वह उस समय अपने पतिके पीछे खड़ी उसे स्नान करवा रही थी। चित्त क्षोभित होनेके कारण आँखसे आँसू टपक कर पतिके पीठपर पड़े जिससे उसके पतिने पीछे फिकर देखा। स्त्रीको रोते देखकर पूछा तू क्यों रोती है। स्त्रीने उत्तर दिया कि, मेरे भाईको वैराग्य उत्पन्न हुआ है वह स्त्रियोंको माता कहकर पुकारता है। यह बात सुनकर उसने कहा तेरा भाई मूर्ख और नीच है, वह बारम्बार अपनी स्त्रियोंको माता क्यों कहता है ? एकही बार सबको क्यों नहीं त्याग देता ? यह बात सुनकर उसकी स्त्रीने व्यङ्गसे कहा कि, आप उससे भी अच्छे हो ? यह बात सुनकर उसके मनमें बड़ी चोट लगी उसी समय वैराग्य उत्पन्न हुआ। हाथमें कमण्डलु ले लंगोटी बाँधकर चल दिया। उसकी अस्सी स्त्रियाँ थीं बड़ा भारी सेठ था, सब स्त्रियोंको एक बार ही माता कहकर सब धन दौलत छोड़ दिया। वहाँसे चला २ अपने सालके पास पहुँचा, उसे पुकारकर कहा कि, ऐ मूर्ख ! तूने क्या ढोंग पसारा है ? आ नीचे उत्तर अपनी सब स्त्रियोंको एक बारही माता कह कर त्यागदे मेरे साथ चल। अपने बहनोंईके शब्द सुनकर वह नीचे उतरा सबको त्यागकर उसके साथ चल दिया। दोनों विरक्त हो गये। घरके लोग नानाप्रकार रोते चिल्लाते रह गये। उन्होंने उनकी तरफ कुछ भी ध्यान न दिया सालसे बहनोंई अधिक धनवान् था। जैसा वह धनवान् था वैसाही पूरा संत हुआ, अपने परायोंकी ओर स्वप्नमें भी ध्यान न दिया ईश्वरमें अखण्ड ध्यान लगाकर उसीमें निमग्न हो गया।
इस कथामें जो कुछ हुआ केवल उस खीरकाही प्रताप था, जो उस लड़केने साधुको खिलाई थी। उसीके प्रतापसे पहले ऐसा सेठ हुआ, फिर साधु होकर समाधिष्ठ हुआ, जिससे मुक्तिका भागी बनकर मनुष्य देहको सफल कर लिया।
दूसरा दृष्टांत—एक संत चले जाते थे, उनको एक मनुष्यने नमस्कार करके कहा कि, महाराज ! आज आप मेरे घर भोजन करें। साधुने उसका निमन्त्रण मान लिया उसके घर भोजन करने गया। आदमीने साधुका हाथ धुलाकर थोड़ासा अलोना शाक भोजनके लिये दिया। वह बिचारा ऐसा दरिद्र था कि, शाकमें डालनेके लिये निमक भी नहीं पा सका था। साधु अलोना शाक आनन्दपूर्वक खाकर चला। साधुके घरसे बाहर निकलतेही उस श्रद्धालु भक्तके घरमें आकाशसे रत्नोंकी ऐसी वर्षा हुई कि, घर भर गया वह ऐसा धनी हो गया कि, नगरके राजाको उसपर ईर्षा आने लगी। राजाने अपने सेवकोंको आज्ञादी कि, साधुको खोज लाओ, हम भी उसको भोजन करावेंगे। राजाके सेवकोंने