भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

पृष्ठ 111, कुल 1367 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 111

कह अष्टंगी अस नहिं होई । दूसर अमर भयो नहिं कोई ॥

करहु योग तप पवन सनेही । रहे चार युग तुम्हरी देही ॥

जौलों पिरथी अकास सनेहा । कबहुँ न विनसे तुमरी देहा ॥

तब शिवने कहा हे माता ! मेरे शरीरमें बड़ा बल हो और मैं अमर होऊँ तब अधाने कहा कि, हे पुत्र ! ऐसाही होगाः—निदान शिवजी बड़े वीर और अमर हुए विष्णु तीनों लोकके स्वामी तथा ब्रह्माकी संतान अर्थात् ब्राह्मण सब झूठे तथा धूर्त हुए ।

अङ्गीसवों प्रकरण

कर्मका बदला ।

विष्णुका शेष नागसे बदला ।

अब जानना चाहिये कि, विष्णुको शेषनागने जो कष्ट पहुँचाया था । उसके बदले तो शेषनागका अवतार कालीनागका हुआ । वह कालीनाग वृन्दावनकी यमुना नदीकी कालीदहमें रहा करता था और उसके विषकी ज्वालासे पशु पक्षी इत्यादि सब भस्म हो जाते थे । जब विष्णुने द्वारपर मैं कृष्णका अवतार लिया तब कालीनागको नाथा और अपने पुराने बदलेको पूरा किया और फिर प्रबल होकर शेषनागकी छातीपर अपना आसन जमाया, इस प्रकार बदला कभी किसीका नहीं छूटता ।

उनचालीसवों प्रकरण

विष्णुका ब्रह्माको आश्रय देना ।

जब ब्रह्माको माताने शाप दिया और जब उनको जान पड़ा कि, हमारी संतान द्वार द्वारपर भीख माँगती फिरेगी, तब वे अत्यंत दुःखित तथा मलीन मुख होकर विष्णुके पास गये और कहा कि, भाई आप बड़े भाग्यशाली हैं कि, माता आपपर दयालु हुई, हम तो उसके शापसे नष्टप्राय हो गये । हे भाई ! माताका क्या दोष है, यह सब अपनीही करनियोंका फल है । तब ब्रह्माको दुःखी देखकर विष्णुने उनको बहुत कुछ सन्तोष दिया और कहा कि हे ब्रह्मा ! आप मेरे बड़े भाई हैं और मैं आपका छोटा भाई हूँ, मैं आपकी सेवा तन मनसे करूँगा और जहाँ कहीं कथा कीर्तन होम और यज्ञ संसारमें मेरे नामसे होगा, सो सब ब्राह्मणों द्वाराही होगा, ब्राह्मण बिना कुछ न होगा, जो ब्राह्मणोंको प्रसन्न करेगा उससे