भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1113

चले यह चर्ख चक्की और दले जाते बनी आदम ।
तले गदूर्नगर्दा कुछ नहीं बनता कुछ नहीं बनता ॥
कोइ रोजा निमाजो तीर्थो हज्जो हजाज़ी है ।
हिर्म दैरौ खरामौ कुछ नहीं बनता कुछ नहीं बनता ॥
पढ़े कुरआन पोथी है सोसारी बात थोथी है ।
हर्फ एक नाम सुबहौ कुछ नहीं बनता ॥
उठाते पाँव आगे को पड़े एकदाम पीछेको ।
हुआ आदमको खफ़कान कुछ नहीं बनता कुछ नहीं बनता ॥
यहूदी और नसारा है कोई गुरु पीर प्यारा है ।
कोइ हिन्दू मुसलमानौ कुछ नहीं बनता कुछ नहीं बनता ॥
पढ़े हैं वेद बानी सारै खाते गोता पानीमें ।
अमीके बहर पैमौ कुछ नहीं बनता कुछ नहीं बनता ॥
हुआ इल्मों अमल सारा, मुआ तौ भी अजल मारा ।
हो अगर इल्म उर्फा कुछ नहीं बनता कुछ नहीं बनता ॥
यह मलकुल मौत घेरा है करे जिस जाय फेरा है ।
हरदो कून हिरमौ कुछ नहीं बनता कुछ नहीं बनता ॥
जफाये चर्ख बर मन दर कफाय शख्त दुश्मन है ।
वफाय यार फर्मा कुछ नहीं बनता कुछ नहीं बनता ॥
बचशमें जाहिरो बातिन लिया यह देख आजिजने ।
बुजुज मुशिर्द मिहरर्बा कुछ नहीं बनता कुछ नहीं बनता ॥

कबीर साहबकी साखी ।

बैठा रहे सो लानियाँ, खड़ा रहे सो ग्वाल ।
जागत रहे सो पाहूर, तेहि धरि खायो काल ॥

इसी प्रकारसे सब मनुष्योंमें अहङ्कारकी दुर्गन्धि भर गई । मनुष्यके बन्धन का कारण यही है, इसीके कारण सब मनुष्य आवागमनमें रहते हैं । इसी मन शत्रुका सब छल है । इसीने सब मनुष्योंमें अहङ्कारकी दुर्गन्धि भरी है । इसीके फन्देमें सब बँध रहे हैं ।

नज़म - वारब यह देह क्या बला है । है झूठ और बरमला है ॥
जो रिश्तः रहते शिकत है । सब रंजको गंज पंज तन है ॥
जो लेवे क्रार पंजके धार । दीदार तो यार हो पदीदार ॥
है कर्जको फर्ज मर्दों जनमें । आदम न अदा हुआ अदनमें ॥