कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1115, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंगुरुआ लोगोंने जो मिथ्या विचार बतलाया उसको इस प्रकार दृढ़ कर सत्य मान लिया, उसपर ऐसा दृढ़ विश्वास किया कि, पारख पदको समझाया जाय तो कोई नहीं मानता । जैसे किसीने एक काँचके टुकड़ेको हीरा समझा। बुद्धिने निश्चय करा दिया कि, यह अमूल्य रत्न है इसी मिथ्या विश्वासमें आनन्द मानता रहा । यदि कोई अपनी मूर्खतासे पत्थरको रोटी समझले तो भूखके समय वह काम न आवेगी । जिस समय गुरुआ लोगोंने निकट गया तो उन्होंने नाना प्रकारकी मुद्रा आदि बतलाई, इसने उन्हें बड़े अनुरागसे धारणकर अभ्यास करने लगा । त्राटक करके दृष्टिको एक स्थानमें जमाकर देखने लगा । ऐसा परिश्रम किया कि, पलक न झपके । कुछ देर इस प्रकार देखनेसे पित्त ऊपरको चढ़ा नाना प्रकारके रङ्ग व चकचकाहट दीखने लगे, दृष्टिमें नाना प्रकारके रूप आने लगे । अब और भी अनुराग बढ़ा कि, रात बहुत परिश्रमसे अभ्यास करने लगा । पित्त भी शनैः शनैः बढ़ते बढ़ते यहाँ तक बढ़ा उसकी ऐसी गर्मी फैली कि, उस पर कचेतता प्रगट हुई । अपना आप भूलकर अचेत होकर गिर पड़ा । फिर जब चित्त शान्त हुआ चेत आया तो कहने लगा मैंने समाधि लगाई, गुरुजीकी बड़ी कृपा हुई कि, निर्गुण अलख ब्रह्मको लखा दिया, सहज समाधि उनमनीमें लगा दिया, जिससे सहजानन्दको पहुँचा आत्मा पर प्रमात्माकी एकता हुई यह यथार्थमें भ्रम है, केवल अपनीही कल्पना द्वारा पित्तमें विकार आनेसे अचेतता होगई थी । इसी प्रकारके धोखेमें बड़े बड़े योगी विद्वान् साधु आदिक फँसे हैं, पारख पदकी ओर ध्यान न देनेसे सत्य पदसे वञ्चित रहते हैं ।
जो स्त्री इस जीवकी झाईसे प्रगट हुई थी उसीके साथ यह पागल बना, उसीके संयोगसे एकसे अनेक हुआ, यह न समझा कि मैं जिसको ब्रह्म ठहराता हूँ वह केवल मेरी छाया है, सत्य नहीं भ्रम मात्र है ।
जो लोग विराट पुरुषको साधते हैं वह दूसरा कुछ भी नहीं केवल उसीकी छाया है अपनी ही छाया अपना गुरु बनकर अपनेको सिखलाती है । अपनीही छायाका सिखलाया हुआ सिद्ध बनता है । इसी प्रकार सारा संसार अपनी छायाकी पूजा करता है । इसीकी छाया इसके ऊपर ईश्वरी करती है, उसीका दास बनकर उसीका भजन करता है, भ्रमकी ही सेवा भक्ति है, भ्रमकी ही मुक्ति प्राप्त होती है । जीव क्या है ? इसका भ्रम क्या है ? ब्रह्म जीव और ईश्वर क्या है ? यह अपने भ्रमसे सब कुछ हो गया है यही एक है यही अनेक है इसीके भ्रमने इसको बन्धनमें डाला है । सब सिद्ध साधु भ्रममें पड़े हैं भ्रमसे छूटने की औषधी नहीं मिलती । केवल एक कल्पित नाम ठहरा लिया है ।