कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1172, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंसुषुप्ति रूप ॥
अथर्वण कहे प्रपंचे दीसे सत्य पदारथ नाहीं ॥
जो उठिजाये बहुरि नहि आवे मरि मरि कहां समाहीं ॥
स्वप्न रूप ॥
यजुर कहे सगुण परमेश्वर दश अवतार धराया ॥
गोपिनके संग रहस रम्यो है बहु प्रकारसे गाया ॥
जाग्रत् रूप ॥
साम कहे यह ब्रह्म अखंडित दुतिया और न कोई ॥
आपे आप रमे परमेश्वर सत्य पदारथ सोई ॥
सत्यवेदके मसला ॥
यह प्रमाण सबन मिलि कीन्हा ज्यों अँधरेको हाथी ॥
आदि बापका भर्म न जाने पूत होत नहि साखी ॥
अँधरेकी हाथी सांच है, सांचे है सगरे ॥
हाथनकी टोई कहें आँखिनके अँधरे ॥
अँधरनको हाथी भयो, कियो सबनही ध्यान ।
अपनी अपनी सब कहें, को काको कहे अज्ञान ॥
अँधरनको हाथी भ्यों, सांचो करके मान ।
हाथनकी टोई कहें, शब्दन ते पहिचान ॥
आँखन केरी आँधरे, बूझे विरला कोय ।
कहै कबीर सतगुरुकी सैना, आप मरे तब ओय ॥
झूलनासे निर्णय ॥
मिमांसा कहे सब कर्मही है, वैशेषिक समयको ध्यावता है ॥
न्यायवादी कर्तार ठाने, पातञ्जलि योग बतावता है ॥
सांख्यवादी नित्यानित्य कहे, वेदांती ब्रह्म अनुमानता है ॥
ये द्वन्द्व चहुँ दिशि मची, सो द्वन्द्वहीको सब गावता है ॥ १७ ॥
साखी - भर्मजाल जो जगतके, ताके अंग अनेक ॥
यक यक अंग दृढ इष्टकरि, गावहि निज निज टेक ॥ १८ ॥
वेद किताबकी जहांतक पहुँच है वहांही तक कहते हैं, उनका क्या अपराध । अपराध उसका है जो उनका विचार नहीं करता ।
यथा-वेद स्मृति कहै किन झूठा, झूठा जो न विचारे ॥
वेदका आशय और होता है, शब्दसे औरही अभिप्राय टपकता है पर पक्ष-