कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1181, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंउसको भी नहीं जान सकते । उनके अन्तःकरण रूपी आँखोंमें अज्ञानताका पर्दा-
पड़ गया जिससे सत्यका विवेक नहीं कर सके । भ्रम और अज्ञान तो तब जाता है
जब ज्ञानका सच्चा प्रकाश हो । विवेकही नहीं तो सच्चा झूठा कौन जाने ?
सब मनुष्य इसी प्रकार पक्षपात और अज्ञानरूपी अन्धकारमें पड़कर ठोकरे
खाते हैं ।
नजम — भेड़िया भेड़का किया रखवाल । कौन दम मारे तेरी ऐसी चाल ॥
तेरी हिकमत्का तुही दाना है । आदम अन्धेरमें भूलाना है ॥
जिस तफक्कुरमें अल्ल हैरान है । बहर कुदरतमें तेरी तैरान है ॥
डूबती और उछलती है सद बार । गोता खाय है न पाये करार ॥
मौत मैदान मौत गोशह है । है सफर और कमर न तोशह है ॥
जङ्गल और दङ्गल दरिन्दः है । कौन जा पार ? जो परिन्द है ॥
दस्त गीरी करे तू रहमतसे । खुद बचावे ज़माने जहमतसे ॥
है करम फ़ज़ल तेरा बे पायान हमद बेहद है तेरेही शायान ॥
ईसाई धर्म ।
हज़रत ईसा तो मूसाई धर्मवालोंमेंही उत्पन्न हुये थे पर पुरानी शरीअतसे
अपना नयाही ढङ्ग निकाला । पुराने अहदनामेसे इनके अहदनामेमें भेद है ।
इस धर्मके लोगोंमें मांस आहारकी विशेषता होनेके कारण परमात्माकी भजन
भक्तिकी और विशेष प्रवृत्ति नहीं होती । सांसारिक व्यवहारमें ही विशेष निमग्न
रहते हैं । अन्य धर्मवालोंको बहुत उपदेश करते फिरते हैं पर अपने औगुणोंकी
और बहुत कम दृष्टि देते हैं ।
क्रिता—जरा अपने ऐबोंके ऊपर गौर कर । बअकल और दानिश नज़र कीजिये ॥
तू ग़ैरोंकी बदबीनीसे दर गुज़र । नफ़ा हो न उसमें नज़र कीजिये ॥
साखी — औरनको समझावते, मुखमें पड़ गइ रेत ।
राशि बिरानी राखते, खायो वरका खेत ॥
गज़ल — खुद पन्थ चला खैर खरीदार मसीहा ।
है यक बड़ा विष्णुका औतार मसीहा ॥
मैं लाविदमें वालिद मुझ सूरतमें देख ।
यों सबसे कहा बरसरे बाज़ार मसीहा ॥
खतरमें दिया डाल सो खुद आपको वे खौ ।
सर्दारी की खातिरसे चढ़े दार मसीहा ॥
मुसलिब जो होवे सो चले संग हमारे
यों साफ किया सबसेही इजहार मसीहा ॥