कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
कोलम्बसका अमेरिका प्रगट करनेका वृत्तान्त
उसको भी नहीं जान सकते । उनके अन्तःकरण रूपी आँखोंमें अज्ञानताका पर्दा-
पड़ गया जिससे सत्यका विवेक नहीं कर सके । भ्रम और अज्ञान तो तब जाता है
जब ज्ञानका सच्चा प्रकाश हो । विवेकही नहीं तो सच्चा झूठा कौन जाने ?
सब मनुष्य इसी प्रकार पक्षपात और अज्ञानरूपी अन्धकारमें पड़कर ठोकरे
खाते हैं ।
नजम — भेड़िया भेड़का किया रखवाल । कौन दम मारे तेरी ऐसी चाल ॥
तेरी हिकमत्का तुही दाना है । आदम अन्धेरमें भूलाना है ॥
जिस तफक्कुरमें अल्ल हैरान है । बहर कुदरतमें तेरी तैरान है ॥
डूबती और उछलती है सद बार । गोता खाय है न पाये करार ॥
मौत मैदान मौत गोशह है । है सफर और कमर न तोशह है ॥
जङ्गल और दङ्गल दरिन्दः है । कौन जा पार ? जो परिन्द है ॥
दस्त गीरी करे तू रहमतसे । खुद बचावे ज़माने जहमतसे ॥
है करम फ़ज़ल तेरा बे पायान हमद बेहद है तेरेही शायान ॥
ईसाई धर्म ।
हज़रत ईसा तो मूसाई धर्मवालोंमेंही उत्पन्न हुये थे पर पुरानी शरीअतसे
अपना नयाही ढङ्ग निकाला । पुराने अहदनामेसे इनके अहदनामेमें भेद है ।
इस धर्मके लोगोंमें मांस आहारकी विशेषता होनेके कारण परमात्माकी भजन
भक्तिकी और विशेष प्रवृत्ति नहीं होती । सांसारिक व्यवहारमें ही विशेष निमग्न
रहते हैं । अन्य धर्मवालोंको बहुत उपदेश करते फिरते हैं पर अपने औगुणोंकी
और बहुत कम दृष्टि देते हैं ।
क्रिता—जरा अपने ऐबोंके ऊपर गौर कर । बअकल और दानिश नज़र कीजिये ॥
तू ग़ैरोंकी बदबीनीसे दर गुज़र । नफ़ा हो न उसमें नज़र कीजिये ॥
साखी — औरनको समझावते, मुखमें पड़ गइ रेत ।
राशि बिरानी राखते, खायो वरका खेत ॥
गज़ल — खुद पन्थ चला खैर खरीदार मसीहा ।
है यक बड़ा विष्णुका औतार मसीहा ॥
मैं लाविदमें वालिद मुझ सूरतमें देख ।
यों सबसे कहा बरसरे बाज़ार मसीहा ॥
खतरमें दिया डाल सो खुद आपको वे खौ ।
सर्दारी की खातिरसे चढ़े दार मसीहा ॥
मुसलिब जो होवे सो चले संग हमारे
यों साफ किया सबसेही इजहार मसीहा ॥
नारदजीकी कथा
हैं एकही दोनों न कं उनमें आजिज । कोई विष्णुको पूजे कोई दिलदार मसीहा ॥
यह धर्म सारी पृथ्वीपर प्रचलित है । पादरी लोग सब देशों, शहरों, गावोंमें फिर २ कर उपदेश दिया करते हैं । इसमें किसी प्रकारका कोई ऐसा धार्मिक नियम नहीं है जिसके कि, करनेमें इस धर्मवालोंको कुछ कठिनता जान पड़े । रोज़ा नमाज़, पूजा, पाठ, कोई भी ऐसा नियम नहीं, जो अवश्य करना पड़ता हो । हाँ ! पादरियोंको तो कुछ नियम मानने पड़ते हैं, क्योंकि, उनको वही काम है । पादरियोंके भी भजनका कोई विशेष नियम नहीं, वरन् रविवारको गिर्जाघरमें जाकर उपस्थित होना और आये हुये लोगोंको बाइबल आदि किसी-धार्मिक पुस्तकका कुछ भाग पढ़कर सुनानाही उनका नियम है ।
पहले इस धर्मके फकीर (पादरी) लोग भजन और संयम किया करते थे, गुफाओंमें बैठकर ईश्वरके नामका अभ्यास किया करते थे, जिससे उनका अन्तःकरण शुद्ध और प्रकाशमय होता था । अब पादरियोंमें यह बात कहीं नहीं पाई जाती । ईश्वरके नाम स्मरण, बिना अन्तःकरणकी शुद्धि और ज्ञानका प्रकाश प्राप्त होना कठिनही नहीं वरन् असम्भव है ।
इतिहासोंसे जाना जाता है कि, वे पादरी, जिनसे कि, ईश्वरके नामका स्मरण और ईश्वरकी भक्तिका प्रकाश ईसाई धर्ममें फैलता था वे अब नहीं हैं । न उनका उपदेश किया हुआ नामही इन धर्मवालोंमें शेष रहा । वह नाम जिससे ईसाई साधु लोग ईश्वरी ज्ञान प्राप्त करते थे अब उसका कहीं पता नहीं । वर्तमानके ईसाईलोग नाम तो क्या लेंगे, वरन् अन्य धर्मवालोंको ईश्वरका नाम लेते देखकर हँसी, ठट्ठा उड़ाते हैं । यहाँ तक कि, उनके खण्डनमें सैकड़ों पुस्तकें छापकर प्रकाशित भी कर चुके हैं ।
जो भोजन भक्ति ईसाइयोंमें प्रथम भी थी अब उसका लेश भी नहीं रहा वरन् सबके सब सांसारिक विषय वासनाओंमें पड़कर ईश्वर भूल बैठे हैं, जो धर्मके उपदेशक पादरी लोग हैं, भारी २ वेतन पाते हैं, बगी और घोड़े दौड़ाते हैं, विषय वसानामें खूब मस्त रहते हैं; वे ईश्वरका नाम क्या जान सकते हैं ।
यह वर्तमानके विद्याभिमानी, पक्षपाती, धर्मद्वेषी और ढोंगियोंका कर्तव्य है कि, अब संसारसे ईश्वरके नामका जप स्मरण सब उठ गया । कुत्ब मुकद्दस (पवित्र पुस्तक) बाइबिलमें अपनी सम्मति मिलाकर बहुत भेद डाल दिया । उसमें जो गुण पहले था वह अब नहीं रहा । धर्मद्वेषी और विद्याभिमानियोंकी समझमें सूक्ष्म भेदकी बातें नहीं आती, बाहरी साधारण बातोंको कुछ २ समझ कर अपने विचारोंके ढंगकी बना लिया है । वास्तवमें उनका कुछ
अपराध नहीं, जैसी उनकी बुद्धि है वैसेही बनाते और करते हैं । विद्याभिमानियोंको अंतरीय प्रकाश कभी नहीं होती, फकीरोंको अंतर प्रकाश मिलता है, उससे वे लोग जो कुछ जानते हैं उसे दूसरेसे नहीं प्रगट कर सकते ।
अंतरीय प्रकाश, बिना सच्चे संत और सच्चे गुरुको कदापि नहीं मिल सकता । यही कारण है कि, सच्चे संत और विद्याभिमानी तथा संसारको चाहनेवाले ढोंगियोंमें सदासे भेद चला आता है । सच्चे संत और सच्चे साधु, ढोंगियों और मिथ्या विद्याभिमानियोंको ढोंग पाखण्ड और मिथ्या अभिमान छोड़नेको कहते हैं। तब वे कहते हैं कि, मुझे प्रत्यक्ष कुछ लाभ दिखलाओ। वो बात होनेवाली नहीं क्योंकि, सत्य विचार और निर्णयके बिना अंतरीय प्रकाश, नहीं मिल सकता । जो सर्वदा सांसारिक व्यवहार और विषयवासनामें फँसा रहेगा उसको प्रकाश कहाँसे मिले ? जो सच्चा ईसाई हो इनजीलके अनुसार कर्म करे तनिक भी विभिन्नता न होने दे तबही ज्ञानका प्रकाश प्राप्त कर सकता है ।
ईसाइयोंने साधुओंकी निन्दा करनी आरम्भ करदी। संत लोग इनसे अलग हो गये । संतोंके अलग होनेसे गुरु कहाँ रह सकते हैं ? गुरुही नहीं रहे तो पथ कौन बतावे ? इस समयमें इस धर्मके लोग साधुओंके स्थानमें पादरियोंको मानते हैं । सर्व प्रकारके शुभ कर्म करते हैं पर वह बात नहीं कि, जो सन्तोंके उपदेशसे मिलता है। क्योंकि, जब संसारीका गुरु संसारी हुआ तो; जैसे कीचसे कीचके धोनेसे शुद्धता नहीं होती उसी तरह गृहस्थी गुरुसे किसी प्रकार कल्याण नहीं हो सकता जबतक अवधूत, विरक्त, गुरु और आचार्य न मिलेगा तब तक कल्याण होना असम्भव है, जब गुरु विरक्त होगा तब भी सत्यके प्रकाश का मार्ग बतावेगा । इस धर्ममें रोजा निमाजकी कुछ भी ताकीद नहीं है यही कारण है कि, इस धर्मके लोग इन्द्रिय दमन नहीं कर सकते । इसमें बड़े २ विद्वान्, बुद्धिमान और शूरवीर लोग हैं इनके पास द्रव्य उपार्जनकी जैसी युक्ति है वैसे संसारकी किसी भी जातिमें न होगी । पर धार्मिक विचारमें ऐसे कच्चे हैं कि, उनके बराबर धर्ममें, पीछे संसारकी छोटीसे छोटी जाति भी नहीं है ।
सुना गया है कि, थोड़े दिनोंसे मेजर टकर साहब नामक किसी अंगरेजने मुक्ति फौज नामक एक मण्डली बनाई है, जिसमें सबके सब साधुओंके भेषमें रहते हैं, मन और इन्द्रिय दमन भी करते हैं । शायद वे लोग इनजील से उस वचनका कुछ आशय समझते होंगे कि:—
हजरत ईसाने किस लिये कहा कि, जो कोई अपना सलीब उठावे अपनेको भूल जावे, वह मेरे पीछे आवे प्रतिदिन सलीब उठावे । जिसने बाइबुलकी इस बातका आशय समझ लिया वही सच्चा ईसाई हुआ ।
माया नगर
वर्तमानमें हमारे देशके राजा ईसाई हैं। अङ्ग्रेजी सरकारका न्याय प्रशंसनीय है। प्रजा बहुत कृतज्ञ है। इनके राज्यमें किसी प्रकारका अत्याचार नहीं है सब शुभचिंतक हैं, अङ्ग्रेजी सरकारके शासनका ऐसा प्रभाव है कि, इनके भयसे इनके दोषको भी कोई प्रगट कर नहीं सकता विरक्तोंको उचित नहीं है कि, राजाके औगुणों पर और अत्याचारोंको उनसे प्रगट न करें, बरन उनकी भूल और भावी भयसे उन्हें सूचित करना ही सन्तोंका धर्म है जिससे जैसे शारीरिक अत्याचारसे जीवोंको छुड़ाते हैं वैसेही आत्मिक दुःखसे बचा सकें, सच्चे विरक्त सन्तोंका न होना आत्मिक अत्याचार है। जब सच्चे संतही न रहेंगे एवं विरक्त निष्काम उपदेशकही न रहेंगे तो आत्मिक उपदेश कौन करेगा ? सच्चा निष्कामी विरक्त, लोक एवं परलोककी कामनासे रहित परमार्थी सन्तोंके बिना सत्य उपदेश कौन दे सकता है ? सत्य उपदेश नहीं तो ईश्वर कहाँ ? ईश्वर नहीं तो मनुष्यत्व कहाँ ? इस कारण शासकोंको उचित है कि, सच्चे निष्कामी सन्तोंकी ओर ध्यान दें। राजा और शासकोंको बेपरवाहीसे पठित मुखोंकी बन आई हैं वे साहसी बनकर सन्तोंकी निन्दा किया करते हैं।
विशेष कथन।
समस्त स्वसम्बदका यही सार है कि, संसारी मनुष्य सच्चे सन्तोंकी सेवा सच्चे मनसे करें जिससे सन्त अपनी शारीरिक चिन्ताओंसे निश्चित होकर भजनमें लगे रहें; जिससे दोनोंका परलोक सुधरे। सच्चे निष्कामी सन्तोंकी शरण गये बिना सांसारिक जीवोंका उद्धार होना कठिन है। संसारसे तरनेका एकमात्र उपाय सच्चे सन्तोंकी सङ्गतिही है।
सच्चे सन्तोंकी सेवा शुश्रूषा बिना देशका बड़ा अपकार हुआ है। लोग अंगरेजी फारसी पढ़कर अहंकारी हो गये हैं, सन्तोंकी सेवा छोड़ बैठे हैं, जिससे सत्य पथके दिखानेवाले सन्तोंका मिलना कठिन हो गया है। सत्योपदेशका मिलना कठिन हुआ तो लौकिक पारलौकिक मार्गोंको कौन बतावेगा, देश और धर्मकी रक्षा और उन्नति कैसे हो ?
जिनका विशेष धर्म, साधु सेवा था, वे अपने धर्मको छोड़ बैठे। धम छोड़ने से उदारता और भक्ति छूट गई, कृपणता अभक्ति फैल गई। विषय वासनामें प्रवृत्ति हुई, विरक्तों एवं सच्चे इन्द्रियजित, निष्काम उपदेशकोंसे घृणा हो गई, सत्य उपदेशका मार्ग बन्द हो गया, जिससे अन्तःकरण अशुद्ध अन्धकारमय हो गया, धम्मार्धम्मका विवेक जाता रहा, पर पूर्व संस्कारोंसे धर्मका नाम सुनकर धर्मकी खोज करने लगे। सच्चे सन्तों, विरक्तोंसे पहलेहीसे घृणा हो रही थी।
सिकन्दर बादशाह और फकीर
इससे इधर उधर पूछते फिरने लगे पर सत्य धर्मका पता न लगा. क्योंकि, सच्चे उपदेशक तो सच्चे निष्कामी, देहाभिमान गलित पुरुष ही हुआ करते हैं। इधर उधर भटकनेमें जब कुछ प्राप्त न हुआ तो कोई २ (हिन्दू) ईसाई, मुसलमान, नास्तिक, नेचरियो, विधर्मी (ला सहजब) आदि होने लगे।
यह सब परिणाम हिन्दू साधुओंके धर्मकी ओर ध्यान न देनेकाही है। ईसाई पादरी लोग बेतन पाते हैं, जिससे दिनरात अपने धर्मकी उन्नतिमें लगे रहते हैं। उनके उलटा हिन्दू साधुओंको रोटी कपड़ा तथा अन्य आवश्यक पदार्थ बड़ी कठिनातासे मिलते हैं। जिसमें कुछ प्राप्त न हो वरन् दुःखही दुःख हो तो, स्वभाविकही बात है कि, उसमें कठिनातासे प्रवृत्ति होती है। हिन्दू साधु अपने शरीरयात्राके ही चिन्तामें दिनरात लगे रहते हैं तो धर्म अथवा देशकी उन्नति कैसे कर सकेंगे? ठीक इनके उलटा, पादरियोंको बेतन मिलता है जिससे वे अपनी आवश्यकतासे निश्चिन्न हो दिनरात धर्मकी उन्नतिमें ही अपना समय बिताते हैं।
धन्य है अंगरेजी सरकारको कि, जिनकी कृपासे व्यतीत मुसलमानी शासनकी अपेक्षा वर्तमानमें लोगोंको लिखने और कहनेकी स्वतन्त्रता है जो कोई कुछ लिखना और कहना चाहता है, लिख और कह सकता है। किसी प्रकार की रुकावट अथवा अत्याचार नहीं है।
अन्य २ राज्योंमें सच्चे धर्मज्ञों और सच्चे सन्तों पर जो जो अत्याचार और अन्याय हुआ करते थे वे अब नहीं हैं। अन्य राजाओंके शासन कालमें उनके धर्म और मजहबके विरुद्ध कोई अपने धर्मकी बात प्रगट नहीं कर सकता था।
साखी - कबीर-सांच कहूँ तो मारि हैं, तुरकानी का जोर।
बात कहूँ सत लोककी, कहिके पकड़े चोर ॥
जिस राज्यमें सन्तोंको गाजर मूलीके समान काट डालते थे उस समय संत सत्य भेद कैसे प्रगट कर सकते थे? अथवा क्या लिख सकते थे? उस समय कहते तो किससे? और लिखते तो किसके लिये? उस समय तो धर्मद्वेषकी अग्नि भड़क रही थी कि, कोई मुखसे खोल नहीं सकता था। कलमका तो कुछ बल ही नहीं था। बादशाह स्वयम् स्वतंत्र और धर्म द्वेषी थे, दूसरे पठित मूर्ख धर्मद्वेषियोंका भी इतना बल था कि, धर्मके नाम पर जिस प्रकार चाहते थे शासकोंके मनको फेर देते थे।
मुसलमानीधर्म।
कबीरपन्थीग्रन्थोंमें लिखा है कि, मुहम्मद महादेवका औतार है। महा-
इन्द्रकी कथा तपस्वीकी कथा
देवने ही मुहम्मदका औतार धारण कर मुसलमानी धर्म चला कर वाममार्गका प्रचार किया है। तंत्र शास्त्र और अघोर धर्ममें संसार प्रचलित किया है। महा-देव तमोगुणके रूप हैं तमोगुणी हैं। यही संसारका मूल है; तमोगुणसेही संसारका सब व्यवहार चल रहा है। इस मुसलमानी धर्मका आचार्य तमोगुण है।
मुसलमान कहते हैं कि,
كُلُّكَ لَأَنْفَعَنَّكَ
अर्थात्—कहता है कि, यदि न होता ऐ मुहम्मद तू, तो न उत्पन्न करता मैं पृथ्वी और आकाशको। प्रायः मुसलमान इस आयतसेही मुहम्मद पर बहुत अभिमान करते हैं। पर सन्तोंकी दृष्टिमें यह कुछ सार नहीं रखता वरन् अति तुच्छ और नीच है। क्योंकि, यह संसार यथार्थमें कुछ भी नहीं, मिथ्या भ्रममात्र है अविद्यासे इसकी उत्पत्ति है, असत्यही सत्य होकर दीख पड़ता है। अज्ञान कहो अथवा तमोगुण अथवा अविद्या सब एकही बात है। अज्ञानसे ही सृष्टि हुई है, अज्ञानकी कुछ श्रेष्ठता नहीं वरन् ज्ञानकी ही श्रेष्ठता है। निर्दयता और अत्याचार अज्ञानका चिन्ह है, तमोगुण बिना निर्दयता अत्याचार आदि आसुरी संपत्ति कुछ भी नहीं। इस (मुसलमानी) धर्मके लोग निमाज रोजा भी पढ़ते करते हैं नियत समय पर निमाज पढ़ना अपना धर्म जानते हैं, पर सब ऐसे निर्दई और कठोर हृदयके होते हैं कि हिंसा करना अपना मुख्य कर्तव्य समझ रखा है। फ़कीरोंमें भी बहुधा ऐसेही हिंसक हैं पर कोई कोई ऐसे भी होते हैं जो हिंसाको अधर्म समझते हैं। काजी और—मुल्ला बहका बहका कर, इस धर्मवालोंसे सब अधर्म करवाते हैं। उन्हींके कहनेसे इस धर्मके लोग ऐसी निर्दयता धारण किये हुये हैं कि, दया लाना अथवा दयाका संकल्प करना भी पाप समझते हैं।
जिस प्रकार हिंदुओंमें उसी प्रकार मुसलमानोंमें भी भजन, भक्ति, जप, तप आदि साधनोंकी बहुतसी युक्तियाँ हैं पर मुसलमान लोग सब धर्म कर्मको केवल जीवहिंसाके कारण मिट्टीमें मिला देते हैं, जीव हिंसा नहीं छोड़ते। यद्यपि इस धर्ममें भी बड़े २ प्रसिद्ध महात्मा तपस्वी, ईश्वर भक्त होगये हैं अब भी कोई कोई ऐसे हैं, जो दिनरात ईश्वरके भजनमेंही लगे रहते हैं, संसारसे कुछ भी सरो-
१ मैंने मुसलमानी पुस्तकोंमें देखा है और शरयी मुसलमान भी कहते हैं कि, जबह किये हुये पशुकी छटपटाहट और उसकी दुःखमय अवस्था को देखकर यदि किसी मुसलमानके मनमें दया आजावे तो वह उसी समय धर्मसे पतित होकर खुदाका गुनहगार बन जाता है। धन्य है ! ऐसे धर्म और खुदा तथा उसके प्रवर्तकों को।
कार नहीं रखते तो भी साधारणतः इस धर्मके लोग दया और नम्रतासे बहुत प्रयत्न करते हैं । इन लोगोंमें क्रोध और निर्दयता सब जातियोंसे अधिक है । यही प्रत्यक्ष प्रमाण है कि, इनका मुख्य धर्म कुरबानी आदि है जो तमोगुण और अविवेक अज्ञानता, निर्दयता बिना हो ही नहीं सकता ।
जबतक मुसलमान लोग तमोगुणका आसरा छोड़ सतोगुणका आसरा न लेंगे उसको अपना आधार न बनावेंगे, तबतक इनके अंतः—करण की शुद्धता न होगी, न इनको मोक्ष मार्गही मिलेगा वरन् ईश्वरके कोपमें पड़े रहकर नाना-प्रकारकी गर्भ आदिकी नर्क यन्त्रणा सहते हुये भौसारगमें गोता खाते रहेंगे ।
नम्रम् ।
यह इनसान है दर्द दिलके लिये । कि बेरहम रजवाँ न राजी किये ॥
न पावे कोई वह विहिस्ती दरखत । कि दिल जिसका होवे मखलूकसे सख्त ॥
यहाँ और वहाँ हूर गिलमाँ वही । वही मर्दी जन और मुसलमाँ वही ॥
वही नेमत और खवान अलवान है । वही नोश वखुद शौकतो शान है ॥
न पहचान पैगम्बरके पाक जो । यहाँ और वहाँ है गिफ्तार सो ॥
तुर्ब और तरागः बहानः । किया हम्बमें जमीन और जमाना किया ॥
गिरफ्तार लज्जात नफ़सानियाँ । यहाँ और वहाँ एक सेहो मियाँ ॥
भला ! यह भला है ? गला काटना । मिहर या क्रहर खूनका चाटना ॥
किसी जिस्म और सूरतमें जानदार हो । जहाँ दार उसका अमाँदार हो ॥
किसीकी वह ईजा से राजी नहीं । कि बेइल्म मुल्ला व काजी नहीं ॥
वह रहमान है सबका मिहरवाँ पिदर । वह हाजिरो नाज़िर है देखो जिधर ॥
वह बेचून सब जहाँ का ले हिसाब । खड़े होवें जब रक्बके आली जनाब ॥
न बदला छुटे कोई हो पीरो अमीर । कि है कौल यह सत्त साहब कबीर ॥
खुदावन्दकी बारगाह बेरया । जो हरकसके इनसाफ़ में दिल दिया ॥
रहीम जो रहमान् मशहूर है । हमेशः सो बेरहमीसे दूर है ॥
गला घोटना उसको भाता नहीं । छूरो वह गलेपर चलाता नहीं ॥
न छिड़कावता खून मुजविह ऊपर । नहीं गोश्त खाता न खाता ज़िगर ॥
न खूँखार ग्रफ़्फ़ार सितार है । क्या सो गुमाँ बेगुमाँ पार है ॥
जले गोश्त और पोस्त बदबूई हो । जो खुशबूय कहे खिला फ़ेअकल सो ॥
वह कौसा खुदा अक्षल से ऊँघता । जो बदबूको खुशबूय कर सृंघता ॥
जला करके कुरबान हो जाने जो । जो सृंघे वो खावे खुदा कौसा हो ? ॥
यह मूसाके मजहबकी बातें लिखा । जो मूसा धरम ईसा सोई कहा ॥
तपस्वी गाधको माया दर्शन फकीर और अघोरी
जो मूसा व ईसा के मतका खुदा । मुहम्मद के मजहब की सोई सदा ॥
बुजुर्ग व अफ़ज़ल हैं तीनां नबी । लिखा है कुरआं जो कलामे रबी ॥
वही खुदा है किया तीन ढंग । जहां जैसा वाजिब लगाया सो रंग ॥
हो जैसा खुदा वैसा बन्दः हुआ । जो हमरंग होवे आनन्दा हुआ ॥
जबह कत्ल जो खूरेजी करे । वह रहमान खुदाबन्द इससे परे ॥
ज़रा फ़िक्र को दिलमें रह दीजिये । ख्यालए बातिलको तह कीजिये ॥
अज़ल और अबद वा करम व फ़ज़ल । मदाम उसकी आईन है बेखलल ॥
शक्ति धर्म ।
आदि भवानी सब धर्मोंकी प्रवर्त्तक है; उसीकी इच्छासे सब धर्म प्रचलित होते हैं । ऐसा होनेपर भी विशेष धर्म मायाके नामसे “शक्ति धर्म” करके प्रसिद्ध है । शक्ति धर्मके सम्बन्धी जितने धर्म हैं सब ऐसे घृणित, नीच और अशुद्ध व्यवहारोंसे संयुक्त हैं कि, किसी मनुष्यकी कदापि प्रवृत्ति नहीं हो सकती । केवल राक्षस लोगही इसको धारण कर, उसके घृणित और नीच अशुद्ध नियमों को स्महार सकते हैं । यद्यपि देखनेमें मनुष्यही इस धर्मके भी ग्रहण करनेवाले हैं पर उनको मनुष्य कहना भूलका काम है । क्योंकि, आसुरी गुणोंको धारण करनेवालोंकोही उपसुर कहते हैं असुरों और राक्षसोंके सांग नहीं हुआ करते ।
इस धर्मवाले ऐसे २ नीच घृणित कार्यमें प्रवृत्त होते हैं कि, पिशाच भी उनकी क्रियासे घृणा करते हैं । उनके व्यवहारोंके स्मरण मात्रसे रोवें खड़े हो जाते हैं । उनके ऐसे घृणित और ग्लानि उपजानेवाले व्यवहार होते हैं कि, उनके लिखनेकी मेरी क्लम और वाणीमें सहन शक्ति नहीं कि, उनको लिख सकें । यह धर्म विशेष कर शिव और शक्तिका है । योगी, विषयी और मांसाहारी लोग इसके प्रवर्त्तक हैं । इस धर्मके द्वारा लाखों क्या अनन्त जीवोंकी नित्य हिंसा होती है, लाखों जीवधारियों के गलेपर छुरी चलती है । इसके अनुयायियोंके अन्तःकरणमें तनिक भी दयाका संचार नहीं होता, यदि राजभय न हो तो ये मनुष्योंको भी मारकर खाया करें । अबभी दाव घात पाते हैं मनुष्योंको मारे बिना नहीं रहते । ये मुर्दा जिन्दा सब खा जाते हैं । इस धर्ममें विशेष करके मूर्ख अपढ़ और नीच जातिके लोग बहुतसे होते हैं । जो लोग इस धर्मको स्वीकार करते हैं वे अपनेको छिपाये रहते हैं, क्योंकि, लोग उनके धर्मसे घृणाकी दृष्टिसे देखते हैं ।
इस धर्ममें मुक्तिके मूल पंच मकार मानते हैं—मुद्रा, मीन, मांस, मद, मंथुन यही पांच मकार हैं ।
राजा लवण
मंत्र जप करनेकी विशेष रीतिको मुद्रा कहते हैं। मीन मछली खाना, मांस, सबप्रकारका मांस खाना, सबप्रकारकी सराबपीकर मस्त होना, विवाहिता अविवाहिता सब प्रकारकी स्त्रियोंके साथ भोग करना। यदि सहृदय भग एक समय पूजन करनेको मिल जावे तो ये लोग साक्षात् मोक्ष मानते हैं। इस धर्मके बारह भेद हैं। सब एकसे एक बड़े चढ़े हैं। इसके लोग बड़े आनन्द और उत्साह पूर्वक अपने घृणित और नीच कर्मोंको करते हुये मोक्ष मानते हैं। इस धर्ममें जाति पौत्रिका बिलकुल विचार नहीं है। ब्राह्मण, क्षत्री, भंगी, चमार, मोची आदि नीच ऊँच जाति सब एक साथही खाते हैं। अनन्त जीवधारियोंकी हत्या करते हैं।
दैवी और आसुरी सम्प्रदाय।
इस संसारमें दो देवताओंके धर्म प्रचलित हैं। संसारके सब धर्म इन्हींके अन्तर्गत हैं। एकका नाम दैवी धर्म है। इसके अधिष्ठाता विष्णु देव हैं। दूसरी सम्प्रदाय है जिसके प्रवर्तक शिव हैं। दैवी सम्प्रदायकोही श्रीसम्प्रदाय अथवा विष्णु सम्प्रदाय कहते हैं। आसुरी सम्प्रदायको शैवी वा शांकरी सम्प्रदाय बोलते हैं।
विष्णु सम्प्रदाय सत्गुणी धर्म और मुक्तिका मार्ग है। शिव सम्प्रदाय तमोगुणी धर्म और नरकका कारण है। येही दो देवते और इनके दोनों मार्ग, जीवोंके मुक्ति और बन्धनके कारण और द्वार हैं। विष्णुभक्त मुक्ति और स्वर्गके अधिकारी होते हैं; जैसे कि, ढरुव और प्रह्लाद अपने परिवार सहित स्वर्गको गये। विष्णु सम्प्रदायमें एकसे कितनोंका भला होता है, पर शिव सम्प्रदायसे सिवाय अशुभ और दुःखके दूसरा कुछ नहीं।
मुहम्मदी कहते हैं कि, मुहम्मद साबहके कलमा पढ़नेसे मुक्ति मिलती है, जो मुहम्मदी कलमा नहीं पढ़ता उसकी मुक्ति नहीं होती। जैसा कि, मुहम्मद साहबके माता पिता नरकको गये। क्योंकि, कलमा नहीं पढ़ते थे। जो कोई कलमा पढ़े तो उसपर किसीका अहसान ही क्या हो सकता है? क्योंकि, जब कलमा स्वयम् मुक्तिदायक है, जिससे कि, कलमा उत्पन्न हुआ स्वयम् उसके माता पिताको कलमाकी क्या आवश्यकता है? इससे प्रमाणित है कि, जब मुम्मद साहब अपने माता पिताको मुक्ति नहीं दे सके, तो दूसरोंको किस तरह दे सकेंगे।
कलियुगमें शंकर और मुहम्मद दोनों शिवके औतार हैं। एकने भारत-वर्षमें संन्यास धर्म चलाया, दूसरेने पश्चिमी देशोंमें इस्लाम धर्म प्रकट किया।
महादेव आसुरी सम्प्रदायके आचार्य हैं, उनके द्वारा मुक्ति नहीं मिल सकती। हाँ यदि कोई शंख भी पाप कर्मोंसे रहित हो, पुण्यमें प्रवेश कर, दैवी सम्प्रदायको धारण करे तो समय पाकर अवश्य मुक्तिका अधिकारी हो सकता है। नहीं तो, जबतक शिवका आसरा करेगा आवागमनमें रहेगा, प्रकाशका मार्ग नहीं प्राप्त कर सकेगा।
सिंहावलोकन।
संसारमें जितने धर्म (मजहब) हैं सबके प्रवर्तक शिव और विष्णु हैं। ये दोनों देवते निरञ्जनकी ओरसे संसारमें वेद और किताबको प्रचलित करने के लिये नियत किये गये हैं। येही दोनों ब्रह्माण्डोंका प्रबन्ध करते हैं, इनके साथ सहायतामें ब्रह्मा भी रहते हैं, पर ब्रह्माकी पूजा कहीं नहीं होती। क्योंकि, इनको आद्याका शाप हो चुका है। इन देवोंमें विष्णु महाराज श्रेष्ठ हैं, येही सब संसारके कर्ताके नामसे पूजे जाते हैं। यह बात मैं प्रथम सिद्धकर आया हूँ कि, भारतवासी प्रगटहो विष्णुको पूजते हैं। अन्य योरप आदि देशवालेभी जिसका पूजन करते हैं जिसको ईश्वर मानते हैं वह भी विष्णुकाही रूपान्तर है। अरबके लोगोंके आँखोंपर पक्षपातका पर्दा पड़ा है पर मैंने पर्दा उघाड़कर कह दिया है जिसको मानना हो माने, न मानना हो तो उसकी इच्छा। इन्हीं विष्णु भगवान्की संसारमें पूजा हो रही है, दूसरा कोई नहीं है।
जो आदमका खुदा था वही इब्राहीम और मूसा आदिकका खुदा था। इब्राहीमकी संतानमें चालीस सहस्र पँगम्बर हुए,। सब उसी एक खुदाकी भक्ति करते आये। मुहम्मदतक जो अन्तिम पँगम्बर हुये सब उसीकी साक्षी भरते आये।
कुरान्सूरे उमरान ८३ आ० ३ सि० ९ रु.
قُلْ آمَنَّا بِاللَّهِ وَمَا أُنْزِلَ عَلَيْهِ وَأَنزَلَ عَلَيَّ الْكِتَابَ
इसका अर्थ—तू कह—हम ईमान लाये अल्लाहपर जो कुछ उत्तरा हम पर इब्राहीम इस्माईल, इसहाक, याकूब, तथा उसकी सन्तान पर जो कुछ मिला मूसा, ईसा और सब नबियोंको खुदाकी ओरसे, हम भिन्न नहीं करते उनमेंसे किसीको हम भी उसीकी आज्ञामें हैं।
इसी प्रकारसे सब मनुष्य उसी खुदाकी भक्ति करते हैं। कोई किसी प्रकारकी बुद्धि विद्या और युक्ति क्यों न खर्च करे पर इन तीनों देवतोंकी
अधीनतासे नहीं निकल सकता । इसमें कुछ भी संदेह नहीं कि, सारे संसारके लिये एकही ईश्वर है । ईश्वर और शास्त्र होनेपर भी भिन्न भिन्न मजहब व रीति क्यों हुई ? इसका कारण यही है कि, मनुष्य अपने यथार्थ मनुष्यत्वसे रहित हो रहे हैं, देखनेकोही मनुष्य हैं पर यथार्थमें मनुष्य नहीं हैं । यदि इनको अपने धर्मकी सुधि होती तो एक धर्मको छोड़ दूसरे धर्मको ग्रहण न करते । जब कि, सब धर्मोंका प्रवर्त्तक एकही आचार्य है तो दूसरे धर्मको धारण करने एवं एकको छोड़नेसे क्या लाभ ? लोगोंकी बुद्धिपर अन्धकार छा रहा है, जिससे अपने धर्मके आशयको न समझकर, एक दूसरेके साथ, लड़ते झगड़ते, वाद-विवाद करते और भला बुरा कहते हुए मरते मारते हैं ।
विशेषतः वे हिन्दू लोग जो किसी कारणसे मुसलमान हो जाते हैं, यदि उनसे पूछो कि, तुम मुसलमान क्यों हुये ? तो प्रगटमें तो वे बहुत बातें बताते और अपने अवगुणोंको छिपानेका यत्न करते हैं पर भीतर ही भीतर हृदयमें पछताते हैं । कोई कोई स्पष्टही कह देते हैं कि, अपने धर्मकी अनभिज्ञता के कारण हमने अपना धर्म छोड़ दिया, अब हिन्दू लोग मुझे अपने धर्ममें नहीं लेते ।
भवतारण ग्रन्थमें लिखा है कि, कबीर साहबका वचन है कि, पूर्व जन्मके बड़े पुण्य और शुभ कर्मोंके प्रतापसे उच्चकुलमें जन्म होता है सांसारिक वैभव सम्पन्न होता है । पूर्वजन्मके ही पुण्य प्रतापसे रूप यौवन और उत्तम कुल मिलते हैं, जितने धनी और राजा महाराजा अथवा उच्चपद पर स्थित हैं, सब उत्तम और श्रेष्ठ कुलकेही होते हैं । अतः ब्राह्मण, क्षत्रियादि जो उत्तम श्रेष्ठ जातिके हैं वे कैसे प्रतिष्ठाके पात्र हैं ? यहाँतक कि, यदि इन जातियोंमें कोई विशेष गुण भी न हो तो भी अपनी उत्तम जातिके कारण प्रतिष्ठाको प्राप्त कर लेते हैं । यह उत्तम कुलकी विशेषता और गुण हैं । इसी प्रकार मुसलमानोंमें भी कुलवान् सैयदोंकी सब सेवा और भक्ति करते हैं वरन् ईश्वर भी श्रेष्ठ कुलवानोंपर विशेष दया करता है । देखो तौरेतमें—इब्रानी उत्तम कुलके थे उनपर ईश्वरकी विशेष दया थी । जो हिन्दू मुसलमान हो जाते हैं, अथवा ईसाई धर्मको स्वीकार कर लेते हैं वे क्या प्राप्त करते हैं ? उच्चकुल और श्रेष्ठ स्थानसे भ्रष्ट हो नीचकुल और अधम स्थानको ग्रहण करते हैं, अन्तमें जब वे समझते हैं तब शोककर पश्चात्ताप करते हैं । जैसे कि, बादशाह दरिद्र हो जानेपर करता है वैसेही हिन्दू अपने धर्मको छोड़कर दूसरे धर्मरूपी दरिद्रताको स्वीकार करते हैं । कोई हिन्दू उच्च और श्रेष्ठ कुलका ईसाई अथवा मुसलमान नहीं होता वरन् आठ कारणोंसे कोई कोई अपने धर्मको छोड़ता है ।
मुहम्मद साहिबके मआराज
हिन्दुओंके मुसलमान होनेका कारण ।
१-अपने धर्मको न जानना । २-दरिद्रता अथवा लोभ । ३-विषयसे वासना की प्रबल कामना—उसमें खूब खुल खेलनेकी प्रबल इच्छा । ४-किसी स्त्रीकी आशक्ति । ५-उच्च पद अथवा मान बड़ाईकी इच्छा अथवा खुशामद । ६-विधर्मियोंकी विशेष संगति और उनका सहवास । ७-किसीके बहकाने और धोखा देनेसे जैसा कि, प्रायः ईसाई मिशनरी करते हैं । ८-संयोगन किसी हिन्दूका भूलसे ईसाई अथवा मुसलमानका पानी पी लेना हिन्दुओंका फिर अपनी जातिमें न मिलाना ।
यही आठ कारण हैं कि, हिन्दू अपने धर्मको छोड़कर ईसाई अथवा मुसलमान हो जाते हैं नहीं तो हिन्दू भी कभी अपने धर्मको नहीं छोड़ते ।
धर्म रक्षक ।
कबीर साहबने धर्मकी रक्षाके लिये तीन रक्षक नियत किये हैं । १ गुरु २ सन्त और ३ ग्रन्थ । जहां ये तीनों रक्षक वर्त्तमान होते हैं, वहां किसी प्रकारकी त्रुटि नहीं होती । जो इन तीनों रक्षकोंको छोड़ देगा, उनकी शरण न रहेगा, वह अवश्य धर्मसे पतित हो नीचगतिको प्राप्त होगा । उसको धर्म लाभ न होगा । इस कारण इन गुरु, सन्त और ग्रन्थ तीनोंकी प्रतिष्ठा करनी उचित है ।
प्रथम गुरुकी सेवा पूजासे अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है दूसरे सन्त भी गुरुकीही मूर्ति हैं । तीसरे सबका मूल ग्रन्थ भ्रमकी टट्टी तोड़ने और सत्यपथको बतलानेवाला है । तीनों (गुरु, सन्त, ग्रन्थ) को एकरूप जानकर, तीनोंकी समभावसे सेवा और पूजा करना उचित है । क्योंकि, गुरु और संत बिना ग्रन्थका आशय मिलना कठिन है । ग्रन्थ बिना संत और गुरुका उपदेश करनेका दूसरा द्वारही नहीं है । ग्रंथोंकेही अर्थको विचारकर संत गुरुके पदको पहुँचते हैं, फिर उन्हीं ग्रन्थोंका उपदेश दूसरोंको सुनाते हैं । जो इन तीनोंमेंसे किसी एककाभी अनादर करेगा वह धर्मसे पतित हो नरकका अधिकारी होगा । इस समय भारतवासी इन तीनों धर्म रक्षकोंसे श्रद्धाहीन हो रहे हैं, नहीं तो अन्य धर्मियोंके आखेट क्यों बनें ? हिन्दू लोग धर्म ग्रंथों और धर्मपुस्तकों तथा संत और गुरुजनोंको छोड़ अन्य धर्मियोंके धर्म ग्रंथ तथा अन्य भाषाको बड़ी श्रद्धा और भक्तिसे पढ़ते हैं उन्हींके धर्म गुरुओंसे उपदेश लेते हैं तो हिन्दू धर्म क्यों न अवनति हो ईश्वर और मृत्यु दोनोंके भयको मुलाकर लोग अधर्ममें फँस गये धर्म छो बैठे ।
संसारसे भय और घृणा
हिन्दू धर्मकी दुर्दशा ।
संसारी अर्थात् गृहस्थाश्रमी फलदार वृक्षके समान हैं; जैसे फलदार वृक्षमें जब फूल फल लगते हैं उस समय नाना प्रकारके पक्षी आकर उस पर बासा लेते हुए कलोलें करते हैं; नाना प्रकारके मनोहर शब्द सुनाते हैं, जिसके सुननेसे बड़ा आनन्द प्राप्त होता है । जब वृक्ष फलदार नहीं होता, उसमें फूल फल नहीं लगते तो, उसपर काक, उलूक आदि आकर बासा लेते हैं । वेही अपनी कान फाड़नेवाली वाणी बोलते हैं, जिससे सुननेवालोंको बहुत बुरा लगता है । उससे घृणा उत्पन्न होती है । फिर वह वृक्ष काटने और जलानेहीके योग्य हो जाता है । ऐसेही गृहस्थाश्रमी जब संत और गुरुकी सेवा करते हैं तबतक भक्ति मुक्तिकी आशा होती है, नाना प्रकारके गुण उदारता सत्सङ्ग, दया, क्षमा आदि सब उनमें आकर स्थित होते हैं पर जब कृपणता और संसारी विषय भोगमें पड़कर अपना धर्म छोड़ बैठते हैं साधु गुरुकी सेवा छोड़कर सच्चे संतों और विद्वानोंकी अप्रतिष्ठा करने लगते हैं, उस समय पाश्र्वताको प्राप्त हो, नाना प्रकारके पाखण्डोंको धारणकर, नर्कके अधिकारी होते हैं ।
मुसलमानोंने बहुत अत्याचार और अन्यायसे हिंदुओंको मुसलमान बना लिया । जिन्होंने मुसलमान होना अस्वीकार किया, वे मार डाले गये, जो अपने मृत्युसे डरा वह मुसलमान हो गया पर तो भी हृदयसे अपने धर्मकाही प्रेमी रहा । क्योंकि जो, लोग मुसलमान हो गये उनकी सन्तान अद्यापि इस बातका स्मरण रखती है कि, हमारे पूर्वज क्षत्रिय, ब्राह्मण अथवा अमुक हिन्दू जातिके थे; जैसे किसी राजा और बादशाही सन्तान याद रखती है कि, हमारे पूर्वज राजा अथवा बादशाह थे ।
समस्त पृथ्वीभरमें हिन्दू जाति सबसे श्रेष्ठ और प्रतिष्ठित जाति है । भारतवर्ष सब देशोंका शिरोमणि है । भारतवर्ष और हिन्दुओंसेही समस्त, संसारमें धर्मका नियम फैलता है । बड़े बड़े सिद्ध महात्मा, ऋषि मुनि, औरतार तत्वज्ञ आदिका प्रागट्ठ यहाँही होता है । यहाँकेही ऋषि, मुनि, विद्वान् सब संसारके लोगोंको शिक्षा देते, लौकिक पारलौकिक मार्ग बतलाते हैं । इस देशका नाम हिन्दुस्थान है, अन्य देशोंको म्लेच्छ स्थान कहते हैं, क्योंकि, वर्णाश्रम, जाति आदिका सर्वोच्च विचार और विभाग इसी देशमें है, दूसरे देशमें नहीं है । वर्णाश्रमका विवेक और विभाग ऐसा उच्च और सर्वोत्कृष्ट सिद्धान्त है कि, जिसके द्वारा अपने वर्ण आश्रमका कर्तव्य शास्त्रानुसार करता हुआ मनुष्य शीघ्रही मुक्तिपथको पा लेता है । भारतवासी अपने धर्मके ऐसे प्रेमी हैं कि,
भर जाना तो इन्हें स्वीकार है पर अपना धर्म छोड़ना स्वीकार नहीं। इसका प्रमाण मुसलमानी राज्यके इतिहासोंसे मिल सकता है। क्या हुआ? यदि कुछ डरपोक, भीरु अथवा लोभी और कामियोंने हिन्दूधर्मको छोड़ दूसरा धर्म स्वीकार कर लिया। जो हिन्दू धर्मको छोड़, सर्वोत्कृष्ट हिन्दू धर्मके नियमोंको त्याग कर देता है वह उच्च अथवा श्रेष्ठ नहीं वरन् नीच और अज्ञानी समझने योग्य है।
हिन्दू धर्मकी श्रेष्ठता।
सालहानः सिफात हिन्दू हैं। नेकि'यो'की बरात हिन्दू हैं॥
जितने अक्'वाम हैं जमी'के ऊपर। सबमें यह खूब जात हिन्दू हैं॥
सम'र साब'का अमल' अपने। अस'लकी नक़लिया'त हिन्दू हैं॥
जब लताफ़त'से यह क'सीफ़ हुआ। आदिका शब्दोयात हिन्दू हैं॥
जितनी हैं धातु' इस जमी'के ऊपर। उमदासे उम्दः धातु हिन्दू हैं॥
याद हों हस'नः फेल दर'स जिस'को। कर सकू'न जिन समात हिन्दू हैं॥
यह जमीनपर दया धरम मूरत। जुहू'द व तक्'वा कना'त हिन्दू हैं॥
है हयात—अब'दी सम'र जिसका। उस शिबि'र डाल पात हिन्दू हैं॥
जाके जिस घरमें फिर नही खौ'। उसकेही मनजिला'त हिन्दू हैं॥
यही गुरु पीर सारे दु'नियाकं। सोई बाप और मातु हिन्दू हैं॥
बन्द'गी और तिहा'रत व तक्वा। मुकिअतके मौजिबा'त हिन्दू हैं॥
हिन्द'का कह कबीर मक्ति मुका'म। शिक'न मुशकि'लात हिन्दू हैं॥
नुकतः वा'रीक अ'कल जिनकी रसा'। मा'दिने म'दरकात हिन्दू हैं॥
जिसके साबि'त हैं धर्म और ईमान। काज़ी दीन मआमलात हिन्दू हैं॥
धरके तन जिसनेकी अमल अच्छे। वख्तखु'श रब्बदा'त हिन्दू हैं॥
है न वह व'स्फ़ और अबिन आद'म। हा'दी रा'हन जाता हिन्दू हैं॥
हा'ल मा'जी ज़माना मुस्तक'ब'ल। ना'ज़रीन कु'ल नु'कात हिन्दू हैं॥
हिन्दू होकर न ऐव'के रुख'कर। मुसतहक़ हक'र सिला'त हिन्दू हैं।
१ सदाचारी, २ पुण्य, ३ जातियाँ, ४ फल, परिणाम, ५ पूर्वजन्मका, ६ कर्म, ७ जैसैका तँसा, ८ छाया, ९ सूक्ष्मता, १० स्थूल, ११ रत्न, १२ शुभकर्म सदाचार, १३ शिक्षा, १४ जिसका, १५ स्थिति, १६ तप, १७ संयम, १८ संतोष, १९ सदाकी जिन्दगी, अमरता, २० फल। २१ वृक्ष २२ भय, २३ विश्राम, २४ संसार, २५ भक्ति, २६ शौच, शुद्धि, २७ कारण २८ भारतवर्ष, २९ स्थान, ३० नष्ट करनेवाला, ३१ कठिनता, विपत्ति, ३२ सारभेद, ३३ बुद्धि, ३४ पहुँची हुई, ३५ खानि, ३६ भेदसार, ३७ स्थित, ३८ भाग्यमान, ३९ ईश्वरकी दैन, ४० गुण, ४१ मनुष्य, ४२ पथदर्शक, ४३ मुक्ति मार्ग, ४४ वर्तमानकाल, ४५ भूतकाल, ४६ भविष्यत्काल, ४७ देखने वाले, ४८ सर्व, ४९ भेद, ५० दोष, ५१ सन्मुख, ५२ अधिकारी, ५३ स्वत्व,
बे ख'ब सारेको खब'र देते । कुत्र अ'कशफुल्लोगात हिन्दू हैं ॥
जाने न और अपने अ'स्ल से वस्ल । पाते सो दाव घात हिन्दू हैं ॥
औरकी अकल है न ऐसी र'सा । दीन दुनी मवत्रिसात हिन्दू हैं ॥
बे ख'बर सारे इसम'आजमसे । नाम मुअल्लिममें क'रात हिन्दू हैं ॥
नफसको मारकर मिलावें जो गर्द । बरी' अज तोह'मात हिन्दू हैं ॥
जन्म साबिकमेंकी जो ऐसी अमल । ह'सनःके हासि'लात हिन्दू हैं ॥
साध गुरु सेवकर भजन सुमिरन । देते खुम'स और जु'कात हिन्दू हैं ॥
वे ख'बर कौम सब जमींके ऊपर । वाकिफ़ अज वार'दात हिन्दू हैं ॥
होता हिन्दू है खुश'नसीब आजिज । धरते यम सर पैलात हिन्दू हैं ॥
प्राचीन समयमें भारतवर्ष, बड़ा प्रतापी और सर्व सम्पत्ति सम्पन्न देश था । इसके क्षत्रिय शूर बीरोंसे संसार भरके यीद्धा भय खाते हुए इनका लोहा मानते थे । किसीकी समर्थ नहीं थी कि, भारतपर आक्रमण कर सके । श्री महाराजा रामचन्द्रजीके समयमे बरबर देशके म्लेच्छोंने एका एक करके भारत पर आक्रमण किया था पर महाराजाने मार भगाया । इसीप्रकार अनेकबार विदेशियोंने इस पवित्र भूमिपर आक्रमण किया पर कभी सफलताका मुंह नहीं देखा ।
मुसलमानोंके अत्याचार ।
अढाई सहस्र वर्षसे देशके भाग्यने पलटा खाया, सिकन्दरसे लेकर महमूद गजनबी तक अनेक म्लेच्छ राजाओंने आक्रमण किया, क्रमशः मुसलमानोंका राज्य हो गया, मुसलमान बादशाहोंने भारतवासियोंपर बहुत अत्याचार किया, आलमगीर, औरंगजेब ( आदिकोने लाखों हिन्दुओंका वध किया । इनके धर्म-धर्मपुस्तकों धर्मस्थानों तथा मन्दिरोंपर ऐसा अत्याचार किया, जिसके वर्णनसे मनुष्यके रोम खड़े होते हैं । इसके अत्याचारसे लाखों हिन्दुओंने आत्महत्या की पर धर्म न छोड़ा ।
हिन्दुओंकी दृढता—विचारनेकी बात है कि, इन लोगोंने हिंदुओंको इमानदार बनाया कि, वे इमान ? वे स्वयम् कैसे थे ? जो लोग हिन्दुओंको पुण्यात्मा और इमानदार बनाना चाहते थे अथवा चाहते हैं वे स्वयम् अपनी ओर
१ अचेत, २ चेत, ३ भेदोंका कोश अर्थात् सारभेद जाननेवाला, ४ असल जाननेवाला, ५ असल, ६ पहुँचा हुआ, ७ सार नाम, ८ ईश्वरी भेदके शिक्षक । ९ विषयासक्त मन, १० रहित, ११ दोष, अवगुण, १२ उत्तम प्रशंसनीय, १३ प्राप्त करनेवाले, १४ ईश्वरार्पण दान पुण्य, १५ अपने उपाजित धनमेंसे ईश्वरार्थ गुरु आदिको देना, सार भेद, १६ भाग्यवान ।
दृष्टि करके देखें कि, क्या कमाई कर गये तथा करते हैं। म्लेच्छ भला हिन्दुओंको क्या मुक्तिमार्ग बतलावेंगे? स्वयम् तो अन्धकारमें फँसे रहकर सांसारिक तापोंसे तप रहे हैं; दूसरोंको क्या मार्ग बतावेंगे? इन म्लेच्छोंकी क्या सामर्थ्य कि, हिन्दुओंको अपने धर्मसे विचलित कर सके (नीच जातियों, नीच बुद्धिओंकी बात नहीं है।)
हकीक़ तराय।
अच्छे और सच्चे हिन्दुओंने जान तो दे दी पर कभी म्लेच्छोंके धर्मको शब्दोंसे भी स्वीकार नहीं किया। इस पर यह दृष्टांत हकीक़तराय नामक क्षत्रिय बालकका लिखता हूँ। जिससे पाठकगणोंको हिन्दुओंकी धर्म श्रद्धा और दृढ़ता प्रगट हो जाय। हकीक़तराय जातिके क्षत्रिय थे, इनका जन्म १७९१ सम्बत् वि० में आगरा शहरमें हुआ था। इनके पिता धनवान् और साहसी पुरुष थे। किसी कारण इनके पिता इनको साथ लिये हुये पंजाब देशके स्थाल कोट नगर जा रहे। हकीक़तरायकी ७ वर्षकी अवस्था हुई तो इनके पिताने एक मकतबमें विद्या अभ्यासके लिये बैठा दिया। हकीक़तराय दिन दूनी रात चौगुनी उन्नति करते हुये अपनी आयुके बारहवें वर्षमें पहुँचे। नित्य मुसलमान तालिब इल्मों (विद्यार्थियोंके) साथ वाद विवाद हुआ करता था, कभी कभी धार्मिकविषय भी छिड़ जाते थे। एक दिन वाद विवादके बीचमें ही एक मुसलमान लड़केने ज्वालामाईको गाली दी। हकीक़ तरायसे अपनी पूज्य देवीकी निन्दा सुनकर सहन नहीं होसका, उसने भी बीबी फ़ात्माको गाली दी। उस मकतबका शिक्षक मुसलमान था। मुसलमान विद्यार्थियोंने जाकर उससे कहा कि, हकीक़तराय बीबी फ़ात्माको गाली दी है। वह विद्यार्थियोंको लेकर काज़ीके निकट गया। हकीक़तरायकी बहुत शिकायत करके बीबी फ़ात्माको गाली देनेका समाचार कहा। काज़ीने बहुतसे मुल्लोंके साथ मिलकर यह निर्णय किया कि, हकीक़ तरायने पैगम्बर साहबकी पैंटी, बीबी फ़ात्माको गाली दी है, इस कारण यह प्राण दण्डके योग्य है। फिर यह मुकदमा नब्बाब खान बहादुर नामक लाहौरके शासकके पास पहुँचा। नब्बाबके सन्मुख हकीक़तरायने स्पष्ट कहा कि, पहले मुसलमान विद्यार्थियोंने ज्वालामाईको गाली दी तब मैंने पीछे कहा। नब्बाबने चाहा कि, बालक हकीक़तराय न मारा जाय, किसी प्रकार बच जावे पर दुष्ट काज़ी और मुल्लाओंने अपनी बड़ी भारी भीड़ एकट्ठी की, सबने मिलकर नब्बाबसे कहा कि, यदि तुम इस बालकका पक्ष करोगे तो हमलोग बादशाहसे नालिश करेंगे। काज़ियोंकी दुष्टता देख नब्बाब बहुत विवश और दुःखी हुआ।
नव्वाबने पूछा इसके बचनेका कोई उपाय है या नहीं ? काजी मुल्लाओंने कहा कि, यदि यह बालक मुसलमान हो जाये तो बच सकता है । नव्वाबने हकीक़त-रायको गोदमें बैठा लिया । कहा कि, अब तू मेरा बेटा है, यदि तू मुसलमान हो जायेगा तो तेरेको अपना राज्य दे दूंगा । हकीक़तरायने साफ़ २ उत्तर दिया कि, मैं सांसारिक धन दौलत नहीं चाहता, मैं अपना धर्म नहीं छोड़ूंगा । हकीक़त-रायके माता पिताने भी समझाया कि, बेटा ! तू मुसलमान होना स्वीकार कर ले, तेरी जान बच जावेगी । हकीक़तरायने अपने माता पिताको बहुत समझाया कहा कि यह देह और संसार सभी नाशमान हैं, एक दिन सब नष्ट हो जावेंगे, किस दिन और किस सुखके लिये अपना धर्म छोड़ूँ ? माता पिता पुत्रके ज्ञान विवेकको देखकर कुछ विशेष नहीं कह सके । नव्वाबसे कहा कि, उसके तुल्य सोना चाँदी मुझसे लेलो इसकी जान छोड़ दो पर दुष्ट काजियों और मुल्लाओंने न माना । नव्वाबने हुकुम दिया कि, पहले इस लड़केके कोड़े मारो, छुरा चुभाओ, तलवार दिखाओ । यदि भयसे मुसलमान हो जावे तो अच्छी बात है । बधिकने वैसाही किया । हकीक़तरायको बहुत कष्ट और दुःख हुआ । पर बाहरे बहादुर ! ! ! ज़रा भी कष्टकी परवाह नहीं की । शरीर और सब संसार तथा मृत्युको धर्मकी अपेक्षा तुच्छ जाना । अन्तमें जब बहुत कष्ट देनेपर भी हकीक़तरायने मुसलमान होना स्वीकार नहीं किया तो बधिकको बध करनेकी आज्ञा हुई । बधिक तलवार लेकर हकीक़तरायके निकट गया उनकी सुन्दरता और कांतिको देखकर आशक्त हो गया, चित्त मोहवश ऐसा निर्बल होगया कि, तलवार हाथसे गिर पड़ी, स्वयम् रोने लगा वरन् गिर पड़ा । हकी तरायने बधिकको खूब समझाया कि, तू मत रोओ उठ खड़े हो, मेरा शिर काट लो तू स्वर्गको जायगा और ये सब काजी मुल्ला नरकको जायेंगे । अब यहाँसे मुसलमानो राज्य नष्ट हो जावेगा, सिकखोंका राज्य होगा ; तू किसी बातकी चिंता मतकर, मोहको त्याग मेरा शिर काटले । उस समय हकीक़तरायका अन्तःकरण प्रकाशित हो गया था । भविष्य कहने लगे । क्यों न हो ? जो अपने धर्मपर दृढ़ विश्वास रखता है, संसारसे धर्मको अच्छा समझता है, दैवी गुणोंको आसुरी गुणोंको अपेक्षा प्रेमकी दृष्टिसे देखता है, ईश्वरपर सच्ची श्रद्धा रखता है, उसको क्या दुर्लभ है ? बधिकने तलवार मारी, हकीक़तरायका शिर धड़से अलग जा गिरा । जिस समय बधिकने तलवार चलाई, उस समय लाहौर में अंधेरा छा गया, भूकम्प आया, नगरभरमें शोक फैल गया, सबके सब बालकसे लेकर बृद्ध तक रोने और हाथ मारने लगे । हकीक़तरायकी मृतक देहको नदी
संसारियोंको उपदेश
किनारे ले जाकर उसकी अन्तिम क्रिया की गई, वहाँ उनकी समाधि बनी, साल साल मेला होने लग गया। अब भी मेला होता है, सहस्रों मनुष्य इकट्ठा होते हैं। हकीकतरायके गीत पंजाबमें गाये जाते हैं।
जिसका धर्म वर्त्तमान है उसका सब कुछ है, उसीके लिये सब सुख है, वही लोक परलोकका राजा है। धर्मसे बढ़कर लोक परलोकमें दूसरा कोई पदार्थ नहीं। जिसने अपने धर्मको बचाया, उसके लिये जीवनकी आशा त्याग दी, वही सफल काम हुआ।
अनन्तर हकीकतरायके माता पिता, उनके फूल लेकर, गंगा प्रवाह कराने हरिद्वार गये। वहाँसे लौटनेपर दिल्ली बादशाही दरबारमें पहुँचे। बादशाहसे अपने पुत्रके ऊपर अन्याय और उसके व्यर्थ बधका न्याय चाहा। बादशाहने रातको हकीकतरायको यह कहते हुये स्वप्नमें देखा कि, यदि मेरा न्याय न करोगे तो तुम्हारा गला घोंटकर मार डालूंगा। बादशाह स्वप्न देखकर बहुत भयभीत हुआ। सवेरा होतेही हकीकतरायके माता पिताको बुलाकर सब हाल पूछा। नब्बाब खान बहादुरसे कैंफ़ियत मोंगी, नब्बाबने स्पष्ट उत्तर दे दिया कि, मैं इस बातमें निरपराध हूँ, मेरा तनिक भी दोष नहीं। काज़ी और मुल्लाओंने बलपूर्वक यह काम करवाया है। काज़ी और मुल्ला बुलाये गये, खूब जाँच हो जानेपर, जिन जिन काज़ी और मुल्लाओंने बधकी सम्मति दी थी, उनको एक एक नौकापर चढ़ाकर जमुनामें डुबवा दिया।
जैसे हकीकत रायने बधिकसे कहा था कि, तू स्वर्गको जायगा, उसी प्रकार ईसाके साथ दो चोर सलीनपर चढ़े थे, एक तो हजरतको गाली देता था, दूसरा कहता था ऐ ईसा! तू मेरे ऊपर दया करना, उस समय ईसाने कहा, था कि, तू स्वर्गको जावेगा।
गुरु गोविन्दसिंह गुरु तेगबहादुरके साथ भी ऐसाही हुआ था। गुरु गोविन्दसिंहके दो पुत्र तो युद्धमें मारे गये थे, शेष जो छोटे दो थे उनको लेकर उनकी दादी भागी, एक ब्राह्मणके घरमें शरण ली, जो बहुत दिनोंसे गुरु गोविन्दसिंहकेही नाजसे पलता हुआ सुख भोग रहा था। उस निमकहराम बेइमान ब्राह्मणने दोनों बच्चोंको मुसलमानोंसे पकड़वा दिया। उस बेइमान नीच ब्राह्मणने लोभवश हो ऐसी कृतघ्नता और पाप किया कि, जिसके तुल्य दूसरा कोई पाप नहीं हो सकता। मुसलमानोंने दोनों लड़कोंको पाया, जिनमेंसे एक तो सात वर्षका था दूसरा पांच वर्षका था। कहा कि, तुम मुसलमान हो जाओ
दृष्टान्त
नहीं तो तुम्हारी गर्दन काटी जावेगी । उसने स्पष्ट उत्तर दिया कि, हम अपना धर्म छोड़के मुसलमान न होंगे । मुसलमानोंने बहुत भय, आशा तथा लोभ दिखाया पर दोनोंमेंसे किसीने भी स्वीकार नहीं किया । अपना वध होना स्वीकार किया पर किसी प्रकार अपना धर्म छोड़ना नहीं चाहा बरन् मुसलमान होनेसे महान् घृणा प्रगट की । जब किसी प्रकार उन बच्चोंने नहीं माना तो निर्दयी मुसलमानोंने बिचारे निष्पाप बालकोंको, सरहिन्दकी दीवारोंमें चुनकर मार डाला । यह समाचार सुनकर मालियर कोटलेके नब्बाबने बहुत शोक किया । नब्बाबके सिवा जिन २ लोगोंने शोक प्रगट किया, गुरु गोविन्दसिंहने उनको आशिर्वाद दिया कहा कि, तुम्हारी जड़ हरी रहेगी । यह सम्बत् १७६१ विक्रमीकी बात है ।
मुख्बा ।
हकीकत रायका सिर काट किस पर । न आये दर्द दिलमें ऐसी जिसपर ॥
किया जल्लादने भी रहम जिसपर । कहो रोवे फ़लक क्यों कर न उसपर ॥
पड़े कोड़े छुरा उसको चुभाया । किया तूने जो तेरे दिलको भाया ॥
ज़रा उसने न दिल अपना डुलाया । कहो रोवे फ़लमा क्यों कर न उसपर ॥
तमा कितने दिखा मासूम बच्चे । न मुतहूरिक हुये ईमान सच्चे ॥
हुये हरगिज न लोभ और डरसे कच्चे । कहो रोवे फ़लक क्यों कर न उसपर ॥
जब आया हिन्दमें महमूद ग़ज़नी । किया उसने जो था उसको न करनी ॥
दया और धर्मको दिलमें धरनी । कहो रावे लक क्यों कर न उसपर ॥
हुआ जब सरबुलन्द औरंग औरंग । हुआ आलममें तब कुछ औरही ढंग ॥
किया हिन्दूको तब उसने बहुत तंग । कहो रोवे फ़लक क्यों कर न उसपर ॥
शहर दिल्लीमें नादिरशाह आया । तमासा अपना सो सादिर दिखाया ॥
सर अम्बार हिन्दूका लगाया । कहो रोवे लक क्योंकर न उसपर ॥
कहूँ क्योंकर गुनह शाहो गदाका । यही है धरम इस नई सम्प्रदाका ॥
न आजिज खौफ़ रहम उसमें खुदाका । कहो रोवे फ़लक क्यों कर न उसपर ॥
मुसलमानोंके अत्याचार और निर्दयताको पहलेसेही कबीर साहबने जान कर, मक्कामें प्रगट हो, मुहम्मदको मिथ्या धर्म द्वेष निरर्थक रक्तपातसे बहुत मना किया सत्य पुरुषका दर्शन कराया । मुहम्मद साहब तो, कबीर साहबका उपदेश मानकर, इस अन्यायसे रहित हुये पर उनके अनुयायियोंने नहीं छोड़ा ।
सच्चे हिन्दू और मुसलमान
मुसलमानो हदीस, तारिख मुहम्मदी तथा मौलवी अमाउद्दीन कृत तालीम मुहम्मदीमें लिखा है कि, मुसलमान लोग पहले मदिरा पीते और शूकर-का मांस खाते थे। मद्य पीकर निमाज पढ़ना विधि थी, पीछे हराम (निषेध) हो गया। इसी प्रकार बलपूर्वक मुसलमान करना भी हराम हो गया। मुसलमानोंने दो बातोंका तो हराम मान लिया पर तीसरी बात नहीं मानी। कबीर साहबने कहा है कि—
बाँधे भक्ति न होयरे भाई । बाँधे करे सो करम कसाई ।
जो लोग बलपूर्वक मुसलमान करते हैं वे स्वयम् मुसलमान नहीं हैं जो परवश मुसलमान हुये हैं वे भी मुसलमान नहीं। जो यथार्थमें मुसलमान हैं वे न तो बलपूर्वक मुसलमान करते हैं, न होते हैं।
जो गुण मने हिन्दुओंके ऊपर लिखा है, जिसमें वे गुण होंवे वे ही हिन्दू हैं। देखो हकीकतराय को मुसलमानोंने कितना दुःख दिया, प्राण तक हरण कर लिया पर वीर क्षत्रिय बालकने अपनी धर्म दृढ़ता न छोड़ी। ऐसेही पुरुष हिन्दुओंमें परिगणित होनेके योग्य हैं। जो लोग मुसलमान अथवा ईसाई होगये वे प्रथमही हिन्दू नहीं थे, न मुसलमान अथवा ईसाई, नाम धरानेपर मुसलमान अथवा ईसाई हुये। जैसे गदहेने व्याघ्रका चमड़ा ओढ़ लिया तो क्या? बैलका ओढ़ लिया तो क्या? असलमें वह गदहा ही है। वैसे ऐसे अव्यवस्थित चित्त और धर्मवाले लोगोंका कुछ भी धर्म नहीं होता। उनको धर्म बदलते, गंगादाससे यमुनादास, यमुनादाससे गोमती दास बनते कुछ भी विलम्ब नहीं है। कोई किसी धर्ममें क्यों न हो पर अपने सदाचार और पुण्यसे ही उसका कल्याण होगा क्योंकि ईश्वर एक और सम है, उसकी आज्ञा उलंघन करना पाप और नियमको न छोड़ना पुण्य है। यदि ईश्वरके नियमके विरुद्ध चलेगा तो पापी होकर दण्डका भागी होगा। सदाचरण (ईश्वरी नियम) को ही पूर्णता पर पहुँचाना सर्व धर्मोंका मूल है। जो लोग नीच घृणित मादक पदार्थ और मांस आदि हिंसा प्राप्त पदार्थोंको ग्रहण करते हैं वे भी हिन्दू नहीं हैं। केवल हिन्दुओं के ही लिये यह बात नहीं बरन् जो ईसाई अथवा मुसलमान हैं, इञ्जील तथा कुरानकी आज्ञाओं पर नहीं चलते वे ईसाई या मुसलमान नहीं हो सकते क्योंकि, मुखसे कहना और बात है, मानना और उसके ऊपर चलना और बात है। कोई क्यों न हो? जिनका जो धर्म है, वह धर्म ईश्वरी नियम (प्रकृति) के विरुद्ध न हो, उसको भली प्रकार बर्तनेसे कल्याण प्राप्त करेगा। प्रकाश और श्रेष्ठता सत्य-