कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1199, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंनहीं तो तुम्हारी गर्दन काटी जावेगी । उसने स्पष्ट उत्तर दिया कि, हम अपना धर्म छोड़के मुसलमान न होंगे । मुसलमानोंने बहुत भय, आशा तथा लोभ दिखाया पर दोनोंमेंसे किसीने भी स्वीकार नहीं किया । अपना वध होना स्वीकार किया पर किसी प्रकार अपना धर्म छोड़ना नहीं चाहा बरन् मुसलमान होनेसे महान् घृणा प्रगट की । जब किसी प्रकार उन बच्चोंने नहीं माना तो निर्दयी मुसलमानोंने बिचारे निष्पाप बालकोंको, सरहिन्दकी दीवारोंमें चुनकर मार डाला । यह समाचार सुनकर मालियर कोटलेके नब्बाबने बहुत शोक किया । नब्बाबके सिवा जिन २ लोगोंने शोक प्रगट किया, गुरु गोविन्दसिंहने उनको आशिर्वाद दिया कहा कि, तुम्हारी जड़ हरी रहेगी । यह सम्बत् १७६१ विक्रमीकी बात है ।
मुख्बा ।
हकीकत रायका सिर काट किस पर । न आये दर्द दिलमें ऐसी जिसपर ॥
किया जल्लादने भी रहम जिसपर । कहो रोवे फ़लक क्यों कर न उसपर ॥
पड़े कोड़े छुरा उसको चुभाया । किया तूने जो तेरे दिलको भाया ॥
ज़रा उसने न दिल अपना डुलाया । कहो रोवे फ़लमा क्यों कर न उसपर ॥
तमा कितने दिखा मासूम बच्चे । न मुतहूरिक हुये ईमान सच्चे ॥
हुये हरगिज न लोभ और डरसे कच्चे । कहो रोवे फ़लक क्यों कर न उसपर ॥
जब आया हिन्दमें महमूद ग़ज़नी । किया उसने जो था उसको न करनी ॥
दया और धर्मको दिलमें धरनी । कहो रावे लक क्यों कर न उसपर ॥
हुआ जब सरबुलन्द औरंग औरंग । हुआ आलममें तब कुछ औरही ढंग ॥
किया हिन्दूको तब उसने बहुत तंग । कहो रोवे फ़लक क्यों कर न उसपर ॥
शहर दिल्लीमें नादिरशाह आया । तमासा अपना सो सादिर दिखाया ॥
सर अम्बार हिन्दूका लगाया । कहो रोवे लक क्योंकर न उसपर ॥
कहूँ क्योंकर गुनह शाहो गदाका । यही है धरम इस नई सम्प्रदाका ॥
न आजिज खौफ़ रहम उसमें खुदाका । कहो रोवे फ़लक क्यों कर न उसपर ॥
मुसलमानोंके अत्याचार और निर्दयताको पहलेसेही कबीर साहबने जान कर, मक्कामें प्रगट हो, मुहम्मदको मिथ्या धर्म द्वेष निरर्थक रक्तपातसे बहुत मना किया सत्य पुरुषका दर्शन कराया । मुहम्मद साहब तो, कबीर साहबका उपदेश मानकर, इस अन्यायसे रहित हुये पर उनके अनुयायियोंने नहीं छोड़ा ।