कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1222, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंहै करोड़ोंमें कोई रहबर एक । दुनिबवी खासोआम क्या जानें ॥
कहाँ आये कहाँको है जाना । अल्हे दुनिया मुकाम क्या जानें ॥
कौनसी राह चढ़ चलें किसपर । अस्प सो तेज गाम क्या जानें ॥
सन्त बतलावें जानै आजिज्ज सो । हिन्दियां हाड़चाम क्या जानें ॥
साखी कबीर साहबकी ।
सन्त जगतमें भगत हैं सन्त रामके पूत ।
सन्त न होते जगतमें तो राम जावता ऊत ॥
गजल—तेरा शीरीं कलाम ऐ तूती । हुई सैद बदाम ऐ तूती ॥
पिजरेसे तू छूट जाये किधर । कर जो तू सद सलाम ऐ तूती ॥
उड़ जिधर जावे तो पकड़ लावें । हो गई अब गुलाम ऐ तूती ॥
मीठी बोलोंसे आ तुझे घेरें । गर्द तुझ अजदहाम ऐ तूती ॥
अब तू सैयाद के हाथ पड़े । होवै एक दिन तआम ऐ तूती ॥
कर दिया है तुझे हब्स दायम । यह तेरी अकल खाम ऐ तूती ॥
गर करे बात बावर आजिज्ज की । जाप कर सत्य नाम ऐ तूती ॥
तू बात को न माना खुद अकिल पर दिवानः ।
शैतान वरगलाना कर काम मुर्ग बिस्मिल ॥
बे रहम काजी मुल्ला तू आन इनमें भूला ।
तुझको चढावै चूलहा कर कान मुर्ग बिस्मिल ॥
हर तरफ हैं कसाई इनसे न कुछ बसाई ।
तुझे घर की न रसाई कर कान मुर्ग बिस्मिल ॥
आजिज्ज को बात मानो उसी मेहरबानको जानो ।
मत बात अपनी ठानो कर कान मुर्ग बिस्मिल ॥
तू भार से लदा है खुद यारसे जुदा है ।
तेरा न हक अदा है क्या चीखता है गदहा ॥
कूड़ा कबाड़ खावें तो भी न होश आवें ।
वेददं हो लदावें क्या चीखता हैं गदहा ॥
दिनरात मार खाना उसही गलीमें जाना ॥
यह सब तेरे बिगानः क्या चीखता हैं गदहा ॥
धोबी कुम्हार लादा कहाँ तेरा बाप दादा ।
कहाँ मान और मर्यादा क्या चीखता है गदहा ॥