भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1256

पांच तत्व और तीनों गुणोंसे यह शरीर बना है। चौदह इन्द्रियां भी पांच तीनकेही विचार हैं। जितने कहनेवाले हैं, सब इन्होंके भोतर बात कर सकते हैं। जब पूछा जाता है कि, जिसके आश्रय ये सब खड़े हैं, जो सबकी आधार है उसका क्या रूप है? क्यों जितने नाम रूप हैं वो सब माया है। तीनलोक भव-सागर माया सृष्टि है। जो मायासे पार होना चाहता हो संसार अर्थात् मायाके किसी पदार्थमें भी आसक्त हो तो उसे सत्यकी कुछ भी सुधि नहीं, ऐसा जानना चाहिये केवल गुरुही उस अद्वैतकी सुधि बता सकता है दूसरा कोई नहीं बता सकता।

संसारके सभी लोग उन्मत्तोंके समान कर्म करते हैं स्वप्न और जाग्रतमें विशेष भेद नहीं। संसारमें फँसा हुआ मनुष्य अचेत होता है उसके जितने कम होते हैं सभी अचेतताके होते हैं। यदि इनकी बुद्धि ठीक होती तो उन्मत्तोंकेसे कर्म क्यों करे? जहाँ बुद्धिको भ्रमही नहीं हो सकता उसको अनुमानकर निश्चय करना मूर्खता नहीं तो दूसरा क्या है? सब ऋषि, मुनि, महात्मा, तत्वज्ञ, विद्वान, ज्ञानी आदि सर्वदासे कहते आये हैं कि ईश्वरीय भेदमें बुद्धि कुछ काम नहीं कर सकती। जो बुद्धि और इन्द्रियोंकी पहुँच वहाँतक बतलावे वह विक्षिप्त है। समस्त इन्द्रियोंमें बुद्धि सबसे श्रेष्ठ है। यदि बुद्धिही वहाँ नहीं पहुँच सकती तो दूसरीइन्द्रियों कैसे पहुँच सकती हैं? जब बुद्धि सत्यतक नहीं पहुँच सकती फिर उसका निश्चय असत्यही हुआ। जिसने असत्यको स्वीकार कर सत्पुरुषकी भक्तिको छोड़ दिया वह मनुष्य नहीं, यही क्या मनुष्यत्वका उसमें लेश भी नहीं है।

साखी—कबीर तिनका जन्म अकार जो, विन भक्ति मरि जाँय।

मुरगीकेसे वचा ज्यों, फिरसी जगके माहिं ॥

जितने लोग और किताबोंके ऊपर भरोसा रखते हैं, उनको प्रकाशका मार्ग मिलना कठिन है। क्योंकि, किताबादि उन्हीं लोगोके लिये हैं जिनको ज्ञानका का कुछ भी प्रकाश नहीं।

बीजककी रमैनी।

बंधको दर्पण वेद पुराना। दर्वी कहाँ महारस जाना ॥

जस खर चन्दन लादे भारा। परिमल वास न जान गँवारा ॥

कहै कबीर खोजा असमाना। सो न मिला जेहि जाय अभिमाना॥

वेदके टीकाकारोंमें किता झगडा पडा है। कोई कुछ कोई कुछ कहता है। किसीको यथार्थकी सुधि नहीं है जिससे शुद्ध और सत्य टीका करे। इसी कारण कबीरसाहब कहते हैं—