भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1281

३० प्रश्न—जीवकी ईश्वर प्राप्ति, मनुष्य ईश्वरको प्राप्त होता है क्या ?

उत्तर—यह ईश्वरको पहचानता है अपने आपमें ईश्वरको देखता है ईश्वर आत्मासे भिन्न नहीं है, जबतक ईश्वर और जीवका भेद है तबहीतक बन्धन है । ईश्वर जीवका भेद मिटे बिना मुक्ति नहीं हो सकती । ईश्वरको अपनी आत्मामेही जाननेसे मुक्त होगा ।

३१ प्रश्न—पुरुषार्थ और प्रारब्ध, मनुष्य पुरुषार्थसे जो चाहे वोकर सकता है प्रारब्धके माननेकी आवश्यकता ही क्या है ?

उत्तर—यदि प्रारब्ध न होता तो मनुष्य अपने पुरुषार्थसे जो चाहता कर लेता, कभी अपनी इच्छा नष्ट न होने देता पर इसके विरुद्ध यह देखनेमें आता है कि, कभी २ नाना प्रकारके पुरुषार्थ करने परभी मनुष्यको निराशही होना पड़ता है । अपनी कामनाकी अग्निमें जलते हुये अनन्त मनुष्योंने पुरुषार्थ करते २ अपना जीवन बिता दिया पर सफलताका दर्शन नहीं प्राप्त हुआ । इससे यह कहना कि, पुरुषार्थ ही सब कुछ है प्रारब्ध नहीं, यह केवल हठ और दुराग्रह है । पर इसके साथ ऐसा भी न समझना कि, सब कुछ प्रारब्धही है, बरन् पुरुषार्थ और प्रारब्ध दोनोंके संयोगसे कार्य सिद्ध होता है । जिस प्रकार पक्षीके एकही पर हों तो वो कदापि नहीं उड़ सकेगा, उड़ना दो पक्षोंसे ही होता है । इसके साथ २ एक बात और भी है कि, यदि दोनों पक्ष भी हों शारीरिकबल न हो तो उड़ना महान् कठिन ही नहीं बरन् असम्भव हो जाता है । उसी प्रकार प्रारब्ध और पुरुषार्थभी हो पर कार्य करनेका सम्यक् ज्ञान न हो तो कार्य सिद्ध नहीं हो सकता । इस कारण पुरुषार्थ, प्रारब्ध और गुरुकी दया इन तीनोंसे व्यवहार सिद्ध होता है । यदि मनुष्य स्वतंत्र होता तो संसारके सब दरिद्र मनुष्य भी राजा बन जाते । सभी वेषधारी सिद्ध बन जाते, सब कायर शूरवीर हो जाते, सब बन्दर हनुमान हो जाते । इससे यह सिद्ध हुआ कि, प्रारब्धके बिना पुरुषार्थ तुच्छ और पुरुषार्थके बिना प्रारब्ध तुच्छ है ।

३२ प्रश्न—सिद्धान्तोंकी भिन्नता, ईश्वर विषयक सिद्धान्त लोगोंके नाना प्रकारके हैं, कोई कुछ बतलाता है, और कोई कुछ कहता है इनमें यथार्थ क्या है?

उत्तर—यथार्थका ज्ञान किसीको नहीं है । जिसको जैसा विचार है जिसको जैसा संकल्प दृढ़ होगया है उसको वैसाही ईश्वर भान होता है । जैसा मैं पहले लिख आया हूँ कि, एक ब्राह्मणको भैंसाके रूपमें ही ईश्वरका दर्शन हुआ था । परमियाह नबीकी नोहमें लिखा है कि, रीछके रूपका परमात्मा था ।