भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

पृष्ठ 1323, कुल 1367 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1323

तुही साधु और पीरानका पार । तुही सिद्ध सूफीकलन्दरजिन्दः बाबा ॥ तु० ॥
दिया धर्म दासको तूही ने बाचा । तूही नानक शाहका गुरु है साँचा ॥
दिया जो छोड़ तुझके सोई काँचाँ । तुही सत पुरुष गुरुगोविंद बाबा ॥ तु० ॥
तुझे जो छोड़ दरिया सङ्ग पूजे । सुनो सन्तो इन्हें घर कौन सूझे ॥
मिला गुरु कौन और क्या ज्ञान बूझे । यह दुनिया दीनमें है निन्दः बाबा ॥ तु० ॥
जो तूने सब तमाशाको मचाया । तुही खिलकतकी रचनाको रचाया ॥
पकड़कर हाथ आजिजको बचाया । तुही कर दूर सब दुःख दुन्द बाबा ॥
तुही बन्दा खुदामें जिन्दः बाबा ।

कुछ और प्रमाण ।

येही जिन्दा बाबा धर्मदास साहबको मिले येही नानक शाहके गुरु हैं । इसी बाबाकी स्तुति गरीबदासजी करते हैं । पर नानकपंथी लोग इसको एकदम भूलगये । इस कारण में चौदह प्रमाण पहले लिख आया हूँ अब अंगरेजी इतिहासोंसे यहाँ और भी प्रमाण लिखता हूँ ।

(1) Honorable Mounttuart Elphinstone, one of the greatest and most trustworthy British writers of Indian History, ingiving his account of Nanak shah, testifies that he (Nanak) was a descpile of Kabir, but he does not give any separate account of Kabir as none of his followers played any part in the political drama of Indian History. If he may have, there is a little trace of it at present period.

Elphinstone's History of India Book XII. Chapt. I page 678 writing of Sikhs says thus —

Their (the sikh's) founder Nanak flourished about the end of the fifteenth century. He was a descpile of Kabir and consequently a sort of Hindu deist but his peculiar tenet was universal toleration &c. &c. &c.

१—एच एम० एलफिन्स्टन साहब जो कि अंग्रेजी इतिहास लिखनेवालों में नामी और बहुत बड़े इतिहास लेखक होगये हैं वह अपने भारतके इतिहासमें इस प्रकार लिखते हैं और नानकशाहके विषयमें साक्षी देते हैं कि, नानकशाह कबीर साहबके शिष्योंमें से एक शिष्य थे । पर उन्होंने अपने लेखमें कबीर साहबके विषयमें कोई पृथक् हाल नहीं लिखा । कारण यह है कि उसके अनु-गामियोंमेंसे किसीने भारतके देशी इतिहासमें कोई भाग नहीं लिया ।

एलफिन्स्टन साहबके भारत इतिहासके १२ वें जिल्दके प्रथम भागके ६७८ पृष्ठमें देखो वह सिकखोंके विषयमें इस प्रकार लिखते हैं कि, इस धर्मके

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश) · पृष्ठ 1323, कुल 1367 में से · BharatKosha